22 नायाब जाम – 2
जब राज ने अपने होंठों के बीच बहन के चोचले को दबाया तो एक क़ायनाती मस्ती के आलम में डॉली के मुँह से चीख निकल गयी थी। उसने राज के कानों को पकड़ कर अपनी ऐंठती चूत से भींच दिया थी। राज फिर अपने रस से सने मुँह को हिला हिला कर अपनी लहराती जीभ को डॉली की नशीली, ललचाती चूत के और अन्दर गोदने लगा था। अपनी बहन की चूत का जायका राज को मजेदार लग रहा था।
चाहता तो पूरी रात चूत – चुसाई कर सकता था, पर अचानक उसे अपने टट्टों मे उमड़ता मीठा सा दर्द और अपनी जाँघों के बीच झूलते हुए तने हुए बम्बू का खयाल आया। अपनी बहन की चूत से मुँह हटा कर उसने अपने भूखे लन्ड को उस मांद पर दागा जहाँ पर चन्द लम्हों पहले उसका मुँह हरकत कर रहा था। उतावलेपन में राज ने लन्ड के एक ही झटके में अपनी बहन की चूत में दाखिल होना चाहा था, पर उसका लन्ड एक इन्च भी अन्दर दाखिल हुआ था कि जा कर चूत की झिल्ली पर जा टकराया। । “माँ क़सम! तेरी चूत तो कुआँरी है!!” उसने चौंक कर बोला था।
“हाँ भाई! तुझे कसम है ऊपर वाले की! अब मत रुकना !” डॉली चीख कर गिड़गिड़ायी थी।
“बहनचोद राज ! ऊउह्ह्ह मुझे भाई से ही चुदना है! चोद के मेरा कुआँरापन लूट ले बहनचोद !” । बहन की जुबान से खुद के लिये ऐसी गालीयाँ सुनकर राज बेइन्तेहाँ दीवाना हो गया।
“हे ऊपर वाले! हाँ, बहन को चोदूंगा मैं ! क़यामत तक चोदूंगा! बहनचोद बनूंगा !” चीखता हुआ राज बोला। | एक बार तो राज को लगा की एक ही जबरदस्त झटके में झिल्ली तोड़ कर अपना लन्ड बहन की लसलसाती, टाइट चूत में ढकेल दे। पर अपनी बहन की कमसिन जवानी पर उसे तरस आ गया था। उसे लगा की डॉली दर्द को झेल नहीं पायेगी। | फिर राज ने अपनी हथेलियाँ बिस्तर पर टेक कर अपने मजबूत बदन का सारा भार बाजुओं पर डाल दिया था। मन्झे हुए खिलाड़ी की तरह वो डॉली को अपने मोटे लन्ड के तनाव को अपनी चूत में क़बूल करने का वक़्त देना चाह रहा था। उसका सुपाड़ा उसकी बहन की चूत के कड़े शिकन्जे में कैद था।
गरम चूत की कसती हुई जकड़न , उसे अपना लन्ड अन्दर घुसाने पर मजबूर किये देती थी। एक हलके से झटके से राज ने अपना लन्ड आधे इन्च और अन्दर ठूसा। डॉली चीखी, और उसी के साथ राज को झिल्ली के फटने का एहसास हुआ। फ़तह के जोश में वो चीखा और उसका लम्बा लन्ड बहन की चूत की गहराईयों में फिसलता चला गया, जब तक की उसके टट्टे डॉली की नम, चिकनी गाँड की खाई में धंस न गये।
राज के लन्ड ने जब चूत में अपनी क़ायनाती हरकत शुरू की तो डॉली एक अलग ही लहजे में चिखने लगी थी। “ऐसे ही! चोद मुझे ! रहम मेरे खुदा! कस के चोद! मैं तेरी गुनहगार हूं! लगा के चोद !”
सूअर ! दम नहीं क्या लन्ड में ? मम्मी के भोंसड़े को कैसे चोदता था! मेरी चूत इतनी ढीली नहीं! तेरा लन्ड थक जायेगा !”
बहनचोद ! रुका क्यों ? टट्टे सूख गये क्या !” । जिस्मानी जुनून में बेक़ाबू होकर मासूम लगने वाली डॉली गाली-गलौज कर रही थी। उसकी पीठ कमान की तरह पीछे को तनी थी। लम्बे बाल जन्गली जानवर जैसे हवा में लहरा रहे थे। उसने अपनी आँखेन बन्द कर रखी थी। सर्दी के मौसम में भी दोनो के बदन पर बेलौस पसीना बह रहा था। राज तसल्लि से बहन की चूत को लम्बे, गहरे ठेले देकर चोद रहा था।
उस रात डॉली तीन बर झड़ी थी। उसके बाद राज ने अपने खौलते वीर्य को बहन की उचकती चूत में बहा दिया था। उसके बाद डॉली फिर चार बार झड़ी थी।
आज उस हसीन रात की याद कर के डॉली की चूत में फिर वही उबाल आ ह था। अपने मासूम मजेदार गुनाह की सुहागरात के बाद भी ऐसी अनगिनत रातें हुई थीं।
डॉली के भाई की सैक्स की प्यास मम्मी के साथ मिलकर भी वो नहीं मिटा पाती थी। अभि सुबह-सुबह ही तो चोद कर उसने डॉली को नींद से जगाया था। डॉली को अब एक और चुदाई की फ़ौरी जरूरत थी। पर मिस्टर शर्मा के फ़ोन पर बुलावे पर राज वहाँ दफ़ा हो गया था। ऐसी भी क्या जल्दी थी बहनचोद को ? डॉली ने सोचा। “क्या मिसेज शर्मा से उसका टाँका तो नहीं भिड़ गया था ?” एक शैतानी भरी मुस्कान उसके कमसिन चेहरे पर नाच रही थी, “ह्मम! शैतान का लन्ड, जभ भी चूत मिलती है, चोद डालता है !”
अपनी मैगजीन को अलग फेंकती हुई डॉली सीधे मकान के पीछे बगीचे में पहुंची। पड़ोस में मिस्टर शर्मा के घर में झाँका तो पूल के आस-पास कोई भी नहीं था। दौड़ कर डॉली शर्मा जी के बाहर पहुंची और बाजू वाले दरवाजे को खुला हुआ पाया। घर के अन्दर झाँकी और कान खड़े कर के किसी आहट को सुनने की कोशिश करने लगी। | पूरा घर सुना लग रहा था, तो बेखौफ़ होकर डॉली अन्दर खुसी। मेहमान खाना और किचन दोनों खाली थे। पर ऊपर किसी रूम से दबी से आवाजें सुनाई पड़ती थीं। जैसे-जैसे वो गलियारे में अन्दर चल रही थी, उसे वो आवाजें ज्यादा साफ़ और तेज सुनाई दे रही थीं। उसके कानों पर कराहने की जानी-पहचानी आवाज़ पड़ी, उसके भाई की। ‘पक्का किसी लौन्डिया को चोद रहा था। पर आखिर किस को ? मिसेज शर्मा ही होंगी। राज हर वक़्त टीना जी की चूत को एक न एक दिन फ़तह करने का दावा करता फिरता था। लगता है आज हरामी ने मैदान मार ही लिया!’ दबे पाँव डॉली आवाजों की जानिब पहुंची। आवाज एक बेडरूम से आ रही थी। मारे रोमांच के, डॉली की नब्ज़ बढ़ने लगी।

