नेहा का परिवार – Update 89 | Erotic Family Saga

नेहा का परिवार - Pariwarik Chudai Ki Kahani
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हम दोनों नहा कर अपने स्कूल का कार्य खत्म कर टीवी देखने पारिवारिक-भवन में चल दिए। कुछ देर में मम्मी पापा भी वहां आ गए। मम्मी के चेहरे पर अत्यंत प्यारी थकन झलक रही थी। उस थकन से मम्मी का देवियों जैसा सुंदर चेहरा और भी दमक रहा था। मुझे थोड़ा डर लगा की अक्कू की चुदाई से क्या मेरा मुंह भी ऐसे ही दमक जाता है और क्या मम्मी को संदेह हो सकता है ?
लेकिन जब तक मैं और फ़िक्र कर पाऊँ पापा ने मुझे अपनी गोद में खींच कर बिठा लिया और मैं सब कुछ भूल गयी। मम्मी ने प्यार से अक्कू को चूमा और अक्कू हमेशा की तरह मम्मी की गोद में सर रख कर सोफे पर लेट गया। मम्मी ने उसके घने घुंगराले बालों में अपनी कोमल उँगलियाँ से कंघी करने लगीं।
देश-विदेश के समाचार सुन कर पापा चहक कर बोले ,” कौन आज नयी स्टार-वार्स की मूवी देखना चाहता है। ”
मैं लपक कर खुशी से चीख उठी ,” मैं पापा मैं और छोटू भैया भी.” मुझे अक्कू के बिना तो कुछ भी करना अच्छा नहीं लगता था।
अक्कू ने भी खुश हो कर किलकारी मारी ,” पापा फिर खाना फ़ूड-हट में ?” फ़ूड-हट शहर का सबसे प्रथिष्ठिस्ट भोजनालय था।
मम्मी भी पुलक उठीं ,” हम सब बहुत दिनों से फ़ूड-हट नहीं गयें हैं। ”
पापा ने मुझे प्यार से चूम कर कहा ,”चलिए मेरी राजकुमारी साहिबा अपने छोटे भाई को तैयार कर जल्दी से खुद तैयार हो जाइए। ”
अक्कू छुटपन से ही मेरी ज़िम्मेदारी बन गया था। उस के बिना मैं तड़प उठती थी।
मम्मी ने हमारी भागती हुई पीठ से पूछा ,” आप दोनों का स्कूल का काम तो पूरा हो गया ना ?”
हम दोनों ने चिल्ला कर कहा , “हाँ मम्मी। ” और हम दोनों अपने कमरे की ओर दौड़ पड़े।
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हमें पापा और मम्मी के साथ और बाहर खाना खाना बहुत था। ड्राइवर के साथ नई फिल्म देखने में आता था। हम घर देर से शाम पहुंचे। मम्मी पापा के लिए स्कॉच उठीं तो उन्हें रोक कर कर खुद पापा का पसंदीदा स्कॉच का गिलास ले आयी, उसमे सिर्फ दो बर्फ के क्यूब्स थे जैसा पापा को पसंद है ।
पापा ने मुझे प्यार से अपनी गोद में बिठा कर मेरी प्रशंसा की मानो मुझे नोबेल प्राइज़ हो। मम्मी ने मेरे गर्व के गुब्बारे को पिचका दिया ,”अजी अपनी प्यारे बेटी से पूछिए की मम्मी की ड्रिंक कहाँ है ?”
मेरे मुंह से “ओह ओ !”, निकल गयी और मैंने हँसते हुए प्यार भरी माफी माँगी , ” सॉरी मम्मी। ”
पर तब तक अक्कू दौड़ कर मम्मी का ड्रिंक बना लाया। बेलीज़ एक बर्फ के क्यूब के साथ, मम्मी के एक हल्का का घूँट भर कर अक्कू की प्रशंसा के पुल बांध दिए।
हम परिवार के शाम के अलसाये सानिध्य में थोड़ा कटाक्ष, थोड़ा मज़ाक, पर बहुत प्यार संग्रहित होता है।
मम्मी ने रात के खाने के लिए तैयार होने को हमें कमरे में भेज दिया।
अक्कू ने मुझे लपक कर दबोच लिया और हमारे खुले मुंह एक दुसरे के मुंह से चिपक गए। अक्कू के हाथ मेरे गोल मटोल मुलायम चूतड़ों को मसल रहे थे।
मेरे कमसिन अविकसित चूत भीग गयी। मेरी गांड का छेद भी फड़कने लगा ,” अक्कू हमें देर हो जाएगी। थोड़ा सब्र करो। ” हालांकि मेरा मन भी अक्कू ले लंड को पहले चूस कर अपनी गांड में घुसाने का हो रहा था पर मैं उस से बड़ी थी और उसके उत्साह को नियंत्रित करने की ज़िम्मेदारी मेरे थी।
अक्कू ने मुझे और भी ज़ोर से जकड़ लिया ,”अकु देखो पापा और मम्मी कितने संयम से बैठे थे। क्या उनका मन नहीं करता की एक दुसरे के कपडे फाड़ कर पापा मम्मी की गांड मारने लगे। ” मेरा ब्रह्म-बाण काम कर गया।
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खाने के बाद सारे परिवार ने मम्मी के चहेते धारावाहिक कार्यक्रम देखे और फिर सोने का समय हो गया। हम दोनों ने पापा और मम्मी को शुभ-रात्रि चूम कर कमरे की
मम्मी का ” अरे आराम से जाओ, गिर कर चोट लगा लोगे ” चिल्लाना हमेशा की तरह हमारे बेहरे कानों के ऊपर विफल हो गया।
मैं अक्कू को बिलकुल रोकना नहीं चाह रही थी। अक्कू ने मेरी छाती के उभारों को निर्ममता से मसल कर दर्दीला और लाल कर दीया। मैंने उसका लंड चूस कर एक बार उसका मीठा रस पी गयी। अक्कू ने मेरी चूत और गांड चाट, चूस कर मुझे अनेकों बार झाड़ दिया और फिर अक्कू ने मेरी गांड फाड़ने वाली चुदाई शुरू की तो देर रात तक मुझे चोदता रहा जब तक में निढाल हो कर पलंग पर लुढकना गयी।

तब से अक्कू अरे मेरे कुछ नियम से बन गए। हम स्कूल से ऐनी के जल्दी से नाश्ता खा कर कमरे में जा खाए पहले एक दुसरे को झाड़ कर स्कूल का काम ख़त्म करते थे। फिर अक्कू मेरी गांड मारता था उसके बाद हम एक दुसरे के मूत्र से खेलते थे और हमें एक दुसरे का मूत्र और भी स्वादिष्ट लगने लगा। अक्कू को स्कूल में भी मेरी आवश्यक्ता पड़ने लगी। मैं मौका देख कर उसका लंड चूस कर उसे शांत कर देती थी।
मेरे किशोरावस्था में कदम रखने के कुछ महीनों में ही जैसे जादू से मेरे स्तनों का विकास रातोंरात हो गया। अब मेरी छाती पर उलटे बड़े कटोरों के समान , अक्कू को बहुत प्यारे लगने वाले, दो उरोज़ों का आगमन ने हमारी अगम्यागमन समागम को और भी रोमांचित बना दिया। अब अक्कू कई बार मेरे उरोज़ों को मसल, चूस और सहला कर मुझे झाड़ने में सक्षम हो गया था।
अक्कू भी ताड़ के पेड़ की तरहलम्बा हो रहा था मुझे उसका लंड बड़ी तेज़ी से और भी लम्बा और मोटा होने का आभास निरंतर होने लगा था।
एक शुक्रवार के दिन अक्कू को सारा दिन स्कूल में मेरी ज़रुरत थी पर हमें एकांत स्थल ही नहीं मिला। उस दिन हमनें अपना स्कूल का काम उसी दिन ख़त्म करने की कोई आवश्यक्ता नहीं थी। मुझे अपने छोटे भैया के भूखे सख्त वृहत लंड के ऊपर बहुत तरस आ रहा था।
अक्कू और मैं जब अपनी रोज़ की रति-क्रिया में सलंग्न हो गए तो उस दिन हम दोनों ने पागलों के तरह संतुष्टना होने का मानो संकल्प कर लिया था। हमें समय का ध्यान ही नहीं रहा। अक्कू मेरी तीसरी बार गांड मार रहा था। उसके बड़े हाथ मेरे उरोज़ों को बेदर्दी से मसल रहे थे। उसका मोटा लम्बा लंड निर्मम प्रहारों मेरी गांड का लतमर्दन कर रहा था। मेरी हल्की चीखें, ऊंची सिस्कारियां कमरे में गूँज रहीं थीं।
हमें मम्मी की खाने के लिए आने की पुकारें सुनाई नहीं दीं।
मैं ज़ोरों से अक्कू से विनती कर रही थी , “अक्कू और ज़ोर से मेरी गांड मारो। अक्कू मेरी गांड फाड़ दो जैसे पापा मम्मी की गांड फाड़ते हैं। ”
अक्कू ने भी ज़ोर से घुरघुरा कर बोला, “दीदी मेरा लंड तो हमेशा आपकी गांड में घुसा रहना चाहता है। ” अक्कू ने मेरे दोनों कंचों जैसे चूचुकों को उमेठ कर मेरी चीख को और भी परवान चढ़ा दिया।
उस समय यदि भूताल भी आ जाता तो अक्कू और मुझे पता नहीं चलता। पर एक शांत स्थिर आवाज़ हम दोनों के वासना से ग्रस्त मस्तिष्कों की मोटी तह को छेद कर प्रविष्ट हो गयी , “अक्कू और सुशी, जब तुम दोनों फारिग हो जाओ तो पापा और मुझे तुम दोनों से आवश्यक बात करनी है। ”
मम्मी के शांत स्वरों को सुन कर अक्कू मुझे से इतनी जल्दी दूर हुआ मानो कि उसे किसी ने बिजली का झटका लगा दिया हो। उसके मोटा सुपाड़े ने मेरी गांड के तंग छेद को रबड़ बैंड के तरह तरेड़ दिया और मेरे रोकते हुए भी मेरी चीख निकल गयी।
मम्मी पापा शांति से हमें देख रहे थे। अक्कू और मेरे तो प्राण ही निकल गए।

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