नेहा का परिवार – Update 77 | Erotic Family Saga

नेहा का परिवार - Pariwarik Chudai Ki Kahani
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सुशी बुआ ने बड़े पूछा ,” बेटी के चूत आराम से मारी ना आपने ? मैं तो बेचारी के बारे में सोच सोच कर घबरा थी। ”
बड़े मामा ने सुशी बुआ के हिलते विशाल दाहिने उरोज़ को मसल कर बोले, “सुशी, यदि कुंवारी लड़की की चूत सही तरीके से नहीं मारी जाय तो उसकी अपनी पहली चुदाई की खुशी अधूरी रह जाती है। नेहा की कस कर चुदाई हुई और उसने आगे बढ़ कर सबके लंड लिए। ”
सुशी बुआ ने गहरी सांस भरी और छोटे चाचा ने पूछा ,”भैया नेहा की गांड की सील भी तोड़ दी है ना आपने ? मैं कई सालों से उसकी फैलती मटकती गांड देख उसे चोदने के सपने देख रहा हूँ। ”
“विक्कू, भांजी का पीछे का द्वार पूरा खुल चूका है अब तुम जब चाहे उसे चोद लो,” छोटे मामा ने सुशी बुआ की चूची मसल कर उनकी सिसकारी निकाल दी।
“विक्कू, नेहा को चोदते समय मुझे सुन्नी की याद आ रही थी। सुन्नी तो नेहा बेटी से तीन साल छोटी थी, याद है ?” बड़े मामा ने मीथीं यादों में गोते लगाते प्यार से कहा।
सुशी बुआ ने भी भावुक अवायज़ में कहा ,”आप दोनों की बातों ने तो मेरी यादें ताज़ा कर दीं। इस समय ऐसा लग रहा है जैसे बीस साल नहीं कल की बात हो जब मैंने अक्कू के लंड की पहली बार मुठ मारी थी। ”
मैं मुश्किल से भौचक्केपन की सिसकारी दबा पायी। अक्कू माने मेरे पापा अक्षय जो बुआ से छोटे हैं।
सुशी बुआ की बात सुन कर छोटा मामा बोले, “सुशी पूरे कहानी बताओ ना भई।अब तक बस संक्षिप्त विवरण ही दिया है। ”
बड़े मामा ने भी हामीं भरी ,”सुशी देखो पूरी कहानी सम्पूर्ण विस्तृत प्रकार तो सुनाओगी तो विक्कू और हम तुम्हारे दोनों छेदों को तब तक चोदेगें तब तक तुम्हारी चूत या गांड ना फट जाए। ”
“अच्छा जी भैया यह तो बहुत ही आकर्षक प्रलोभन है। ” सुशी बुआ खिलखिला के हंस दीं।

सुशी बुआ के संस्मरण
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अक्कू और मैं हमेशा से बहुत करीब थे। मम्मी ने उसकी देखबाल मेरे ऊपर छोड़ दी थी। जबसे अक्कू पैदा हुआ मैं तब दो साल की थी पर मुझे नन्हा सा छोटे-छोटे हाथ-पाँव फैंकता हुआ गुड्डा बिलकुल भा गया। अक्कू तभी से मेरे दिल में हमेशा के लिये बस गया। मैंने उसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ा। मम्मी ने भी मुझे प्रोत्साहित करने के लिए अक्कू की देखबाल मेरे ऊपर छोड़ देने का वातावरण सा बना देतीं थीं।
मम्मी मज़ाक में सबसे कहतीं थीं कि अक्कू भले ही मेरी कोख़ से जन्मा हो पर सुशी उसकी माँ है। मैं इस बात को मज़ाक नहीं वास्तविकता समझती थी , इतना प्यार था मुझे अपने छुटके भाई से। मैं उस समय बच्ची थी पर गर्व से फूल कर अक्कीउ की माँ की तरह का व्यवहार करती थी।
अक्कू और मैं स्कूल भी इकट्ठे जाते। मैं तब गोल मटोल थी [ “मैं आज भी सूखा कांटा नहीं हूँ,” ] और अक्कू बिजली की तेज़ी से बढ़ रहा था। वो स्कूल में सबसे लम्बा और बड़ा था और स्कूल के सब लड़के उससे डरते थे।
मेरी ज़िद पर मम्मी ने मुझे अक्कू को नहलाना सिखाया। अक्कू जब बड़ा हुआ तो उसे मुझसे शर्म आने लगी और उसने खुद नहाना शुरू कर दिया। मुझे ना जाने क्यों ऐसा लगा कि मुझसे कुछ छिन गया है।
मैं भी और लड़कियों के मुकाबले जल्दी विकसित हो गयी। मुझे में किशोरावस्था के पहली ही शारीरिक इच्छाएं जगने लगीं जो मुझे समझ नहीं आतीं थी।
एक दिन मैं अक्कू के स्कूल के काम में मदद करने के लिए उसके कमरे गयी।
अक्कू के स्कूल के कपड़े बिस्तर पे बिखरे पड़े थे। कमरे से लगे हुए स्नानगृह से शॉवर की आवाज़ से मैं समझ गयी कि अक्कू नहा रहा था। मुझ से रुका नहीं गया। मैंने अपने सारे कपडे उतार दिए। तब तक मेरे उरोज़ों की जगह सिर्फ दो भारी चर्बी के उभार थे। मैं हल्के हलके पांवों से स्नानगृह में प्रविष्ट हो गयी।
खुले शॉवर के नीचे अक्कू नंग्न था। उसका कद मुझसे बहुत लम्बा हो चूका था। पर मेरी आँखे उसके गोरे लंड पर जा कर टिक गयीं। अक्कू का लंड मुझे बहुत बड़ा लगा। मैंने तब तक कोई लंड नहीं देखा था फिर भी।
मैं अक्कू से जा कर चिपक गयी ,”अक्कू, तुम मेरे साथ क्यों नहीं नहाते हो। मुझे तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता है। ”
अक्कू ने मुझे भी बाँहों में भर लिया ,”दीदी , सॉरी। मुझे एक परेशानी होने लगी थी और उस वजह से आपसे मैं शर्माने लगा। ”
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७०
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“अक्कू, मेरे से शर्म आने का मतलब है कि तुम मुझसे प्यार नहीं करते ?” मैं कुछ रुआंसी हो गयी।
“नहीं दीदी, मैं तो आपके बिना रह नहीं सकता। जब आप मेरे साथ नहाते हो तो मेरा यह अजीब सा हो जाता है ,” अक्कू ने अपनी निगाहें से अपने लंड की ओर मेरा ध्यान इंगित किया।
“अक्कू, मुझे पता नहीं कि इसको कैसे ठीक करें पर मैं पता लगाऊंगीं। पर तुम मुझे ऐसे नहीं तरसाया करो। ” मैंने बिना सोचे समझे अपने दोनों हाथों से अक्कू के लंड को प्यार से सहलाना शुरू कर दिया।
अक्कू की सिसकारी निकल गयी, “दीदी ऊं दीदी। ” वैसी ही जैसे कि जब मैं उसकी खरोंचों पर डेटोल लगती थी ।
मैं घबरा गयी कि मैंने अक्कू को दर्द कर दिया ,” सॉरी अक्कू। बहुत दर्द हुआ क्या। मैं तो इसे …… यह मुझे इतना प्यारा लग रहा है मैंने सोचा ……… ओह! अक्कू सॉरी यदि मैंने दर्द ……। ”
अक्कू ने घबरा कर मेरे मुंह को चूम लिया और जल्दी से मुझे प्यार से पकड़ते हुआ कहा, “नहीं दीदी मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा था। प्लीज़ और करो न। ”
अब मेरी हिम्मत खुल गयी मैंने झुक कर दोनों हाथों से अक्कू के लंड को सहलाना शुरू कर दिया। उस समय भी अक्कू का लंड मेरे दोनों नन्हें हाथों में मुश्किल से समा पा रहा था।
अब मैं अक्कू की सिस्कारियों से घबराने की जगह प्रोत्साहित हो रही थी ।
अक्कू ने अपने गोरे चिकने पर भारी और मज़बूत चूतड़ों से मेरे हाथों में अपने लंड को धकेलने लगा। मैं अब उसका लंड और भी तेज़ी से सहलाने लगी। उसका गुलाबी मोटा सा सुपाड़ा [ तब मुझे इस सबका नाम नहीं पता था ] बहुत प्यारा लगा और मैंने उसे दो तीन बार चूम लिया। अक्कू ने ज़ोर से सिसकारी मारी। अब तक मैं समझ गयी थी ऊंची सिसकारी का मतलब था कि अक्कू को और भी अच्छा लग रहा था।
मैंने दोनों हाथो से सहलाते हुए अक्कू के सुपाड़े को लगातार चूमती रही।
अक्कू के मुंह से वैसी की आवाज़ें निकल रहीं थी जैसी एक बार मम्मी के कमरे से मैंने सूनी थीं। जब मैंने मम्मी से डर कर पूछा कि, “पापा आपको दर्द कर रहे थे,” मम्मी ने मुझे प्यार से चूम कर कहा ,” नहीं पगली वो तो मुझे प्यार कर रहे थे। ”
फिर मम्मी ने मुझे समझाया, “सुशी बेटा जब बड़े लोग, यानी मम्मी पापा जैसे दो बड़े लोग, प्यार करते हैं तो उन्हें जब बहुत अच्छा लगता है तो उनके मुंह से कई तरह की आवाज़ें निकलती हैं। इसी तरह के प्यार से तो पापा ने तुम्हें और अक्कू को मेरे पेट में बनाया था। ”
यह बात अचानक मुझे समझ आ गयी। मैंने अक्कू के सुपाड़े को औए भी ज़ोर से चूमना शुरू कर दिया। मेरे हाथ और मुंह थोड़ा थकना शुरू हो गये थे पर मैं अपने छोटे भईया के लिए कुछ भी कर सकती थी।
लम्बी देर के बाद अक्कू ने ज़ोर से कहा , “दीदी अब तो और भी अच्छा लग रहा है। दीदी प्लीज़ अब मत रुकियेगा। ” मैं तो रुकने की सोच भी नहीं रही थी।
अचानक अक्कू के लंड ने हिचकी जैसे ठड़कने मारी और तीन चार ऐसे ठड़कने के बाद अचानक उसके सुपाड़े से एक सफ़ेद पानी की धार निकल कर मेरे मुंह पैर फ़ैल गयी। मैं चौंक कर थोडा पीछे हो गयी। मुझे लगा कि शायद अक्कू का पेशाब निकल पड़ा। पर मैंने अक्कू को कितनी बार पेशाब कराया था और मुझे उसके लंड से निकलते सफ़ेद धार बिलकुल पेशाब की तरह नहीं लगी। मुझे अक्कू के पेशाब की सुगंध तो बहुत अच्छे से याद थी पर इस धार की सुगंध तो बिलकुल अलग थी।

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