जानकी दीदी ने अपने पिछले सालों के कपडे निकाले थे। मीनू को उनके छोटे ब्लाउज भी ढीला पड़ा। आखिर में मीनू के पास उस समय चूचियाँ ही नहीं थी और जानकी दीदी के स्तन बहुत कम उम्र में विकसित हो गए थे। पर लहंगा तो ढीला ही होता है सो उसमे मीनू चमक उठी। दोनों वस्त्र बहुत ही महीन कोमल रेशम से बने थे और उनपर अत्यंत जटिल और बारीक पेचीदा सोने के धागों से सजावट थी। मीनू उन बड़े माप के वस्त्रों में और भी अविकसित और नन्ही पर बला की सुंदर लग रही थी।
मेरा ब्लाऊज़ भी उतना ही सुंदर और आकर्षक था। मेरे भरे भरी चूचियों ने उसे लगभग पूरा भर दिया। लहंगा भी उतना ही सुंदर और आकर्षक था।
मीनू और मुझे ब्रा और पैंटीज नहीं पहनने की आज्ञा दी गयी थी। जानकी दीदी और नमृता चाची ने मीनू और मेरी चूत और गांड में एक ख़ास क्रीम लगायी। उस से हमारी चूत और गांड पहली चुदाई के समय जैसी तंग हो जाएँगी।
“अरे बुद्धू कुंवारी कन्याओं। क्या तुम अपने दूल्हों को ब्रा और पैंटीज उतारने में उलझाना पसंद करोगी ?”
हमें हलके श्रृंगार से और भी सुंदर बनाया गया। नम्रता चाची ने सोने की नथनी हम दोनों को पहनायी।
“चलो दुल्हनें तो तैयार हो गयीं अब दूल्हों और बारात को तैयार करतें हैं। ” नम्रता चाची ने प्यार से मीनू और मुझे चूमा। अचानक उनकी आँखों में आंसू भर गये, “हाय, कितनी सुंदर लग रहीं हैं मेरी बेटियां ? कहीं इन्हें मेरी ही नज़रना लग जाये ?”
“आज तो ठीक है पर मैं वास्तव में तो इनका कन्यादान कभी भी नहीं कर पाऊॅंगी। इन्हें तो सारा जीवन अपने घर में हीं रखूँगी किसी को भी इन्हें अपने घर से नहीं ले जाने दूंगी।” नम्रता चाची की आवाज़ में रोनापन आने लगा।
ऋतू मौसी और जानकी दीदी के नेत्र भी गरम आंसुओं से भर गए।
“दीदी, इनके दुल्हे तो हमारे घर के ही हैं। यह दोनों कहीं भी नहीं जा रहीं। ” जानकी दीदी ने मज़ाक से बात सम्भाली।
तीनों अपनी आँखें पौंछते हुए कमरे कमरे से रवाना हो गयीं।
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लगभग दो घंटों में नम्रता चाची, ऋतू मौसी और दीदी भी मीनू और मेरे जैसे चोली और लहंगे में सज- धज कर हमें लेने आयीं।
मीनू और मेरे धड़कनें अपने आप तेज़ हो गयीं। हम दोनों के चेहरे शर्म से लाल हो उठे। समारोह की व्यवस्था तरणताल के घर में की थी।
बड़े मामा पूरे निवस्त्र थे सिर्फ एक दुल्हे की पगड़ी के सिवाय। उनकी तरह ही सुरेश चाचा भी नग्न थे लेकिन सर पर पगड़ी थी।
मीनू और मैंने हॉल में सब तरफ देखा। संजू भी निवस्त्र था। उसके पास वस्त्रविहीन विशाल बालों से भरे शरीर के मालिक गंगा बाबा थे। उनके अगले सोफे पर नग्न मनोहर नानाजी बैठे थे। मनोहर नानू उस समय शायद छियासठ साल के थे। नानू लम्बे चौड़े मर्द हैं. वो भी सुरेश चाचा की तरह मोटे थे। उनकी तोंद चाचू से भी बड़ी थी पर बालों से भरा पहलवानो जैसा शरीर बहुत ही आकर्षक और शक्तिशाली लग रहा था। उनके बाद के सोफे पर राज मौसा बैठे थे। राज मौसा उस समय पच्चीस साल के थे और उनका बलवान हृष्ट-पुष्ट बड़ी बड़ी मांसपेशियों से भरा लम्बा शरीर उनके अत्यंत सुंदर चेहरे की तरह हर स्त्री के हृदय की धड़कन बढ़ाने में सक्षम था। जब राज मौसाजी ऋतू मौसी के पास खड़े होते हैं तो कोई भी देख कर कह सकता है कि दोनों एक दुसरे के लिए ही बने हैं चाहे समाज कुछ भी कहे.
इसीलिए दोनों शहर में एक जगह ही काम करते हैं और एक घर में ही रहते हैं। दोनों का शादी का कोई भी इरादा नहीं था।
मनोहर नाना और राज मौसा के विकराल लंड बड़े मामा उनकी बलशाली भारी जांघों के बीच में मोटे महा-अजगर की तरह विराजमान थे।
नम्रता चाची ने छोटी सी घोषणा की ,”पापा, राज भैया, गंगा बाबा, संजू बेटा। हम सब आज अपनी दो बेटियों के कौमार्यभंग के उस्तव के लिए यहाँ हैं। आज उनका विवाह उसी लंड के मालिक से होगा जिसने उनका कौमार्य-भंग किया है। उसके बाद उसी लंड से आज हम सबके आशीर्वाद और उत्साहन के अधीन इन दोनों का अधिकारिक कौमार्यभंग एक बार फिर से होगा।”
नम्रता चाची ने एक गहरी सांस ली और फिर से शुरू हो गयीं, “अब मैं तो पुजारी बन चुकीं हूँ सो ऋतू तुम गंगा बाबा और संजू के लिए समर्पण हो और जानकी तुम पापा और राज के लिए। अब तुम दोनों वस्त्रविहीन हो अपने पुरुषों के लिए समर्पित हो जाओ। ”
“आखिर की घोषणा है कि आज रात के रंडी-समारोह की रंडी मेरी बेटी जैसे छोटी बहन ऋतू है। जानकी और मैं उसके सौभाग्य के लिए ऋतू को हार्दिक बधाई देते हैं। ” नम्रता चाची के कहे शब्दों का पालन जानकी दीदी और ऋतू मौसी ने लपक कर किया। शीघ्र ही उनके विशाल गदराये गोल सख्त पर मुलायम उरोज़ चोली से मुक्त हो गए।
उनके लहंगे भी कुछ क्षणों में फर्श पर थे। उनकी मांसल गदराई जांघों के बीच में घने घुंघराले बालों से ढके अमूल्य कोष के लिए तो बड़े युद्ध शुरू हो सकते थे। उनके लहंगे भी कुछ क्षणों में फर्श पर थे। उनकी मांसल गदराई जांघों के बीच में घने घुंघराले बालों से ढके अमूल्य कोष के लिए तो बड़े युद्ध शुरू हो सकते थे। दोनों के रेशम जैसी झांटे उनके रति-रस गीली हो गयीं थी। उनकी योनि के रस की बूंदे उनकी झांटों पर कर रात के असमान में तारों की तरह झलक और झिलमिला रहीं थीं।
ऋतू मौसी अभी संजू और गंगा बाबा के बीच में बैठ ही पायी थीं कि उन दोनों के हाथ उनके अलौकिक लंडों पर जम गये। ऋतू मौसी अपने नाजुक कोमल हाथों से संजू और गंगा बाबा के धड़कते हुए लंडों को सहलाने लगीं।
जानकी दीदी को मनोहर नानाजी ने खींच कर अपनी गोद में बिठा लिया और उनके विशाल चूचियों से खेलने लगे। राज मौसा ने जानकी दीदी के सुंदर कोमल पैरों को सहलाने लगे।
नम्रता चाची ने मीनू और मुझे हमारे दूल्हों के साथ खड़ा कर दिया। मीनू अपने पापा के साथ लग कर खड़ी थी और मैंने बड़े मामा के चिपक कर खड़ी हो गयी।
नम्रता चाची कुछ गोलमोल संस्कृत जैसे श्लोकों को बुदबुदा कर ज़ोर से बोलीं ,”अब कुंवारी कन्या अपने दुल्हे का लंड पकड़ेगी। “
नेहा का परिवार – Update 61 | Erotic Family Saga

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