नेहा का परिवार – Update 171 | Erotic Family Saga

नेहा का परिवार - Pariwarik Chudai Ki Kahani
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नाश्ते की मेज़ पर नानाजी और बुआ थीं। बाकी सब अपने प्रोग्राम और योनाओं के मुताबिक कहींना कहीं चले गए थे।
मैं दौड़ कर नानाजी की गोद में बैठ गयी। उन्होंने अखबार बंद कर के मुझे अपनी मज़बूत बाँहों में भींच लिया। बुआ ने मुझे नाश्ता परोसा और फिर चिढ़ाया , “देख मेरे ससुरजी कितने बेचैन थे तुझे देखे बिना। रोज़ पूछते थे कि कब वापस आएगी नेहा अकबर भैया के घर से ?अब आराम से सुनाना अपने नानू को पूरे का पूरा किस्सा। ”
मैं शर्म से लाल हो गयी और अपने मुँह ननु की घने बालों से ढके सीने में छुपा लिया।
नानाजी और बुआ हंस पड़े , “बहु और मत छेड़ो हमारी नन्ही नातिन (धेवती) को। वैसे तेरा क्या प्लान है सुशी बेटी। ”
सुशी बुआ इठला कर बोलीं ,”नन्ही नहीं है आपकी प्यारी धेवती बाबूजी। आपके दोनों बेटे अपनी बहन को ले गए है दिन भर खरीदारी करने को। आखिर खास दिन है आज आप चारों के लिए। पारो आज बहुत थकी थी तो मैंने उसे आराम करने को कह दिया है। इसीसलिए मैं अपने पापा की मालिश करने जाने वालीं हूँ।अक्कू भैया (यानि मेरे पापा ) मम्मी के साथ झील पर गए हुए है। ”
पारो हमारे घर की मालिश की ज़िम्मेदार थी। पारो दीदी पांच फुट दो इंच की गठीली सुंदर स्त्री थी। उसकी शादी रिश्तेदारों के धोके से एक कुटिल व्यक्ति से हो गयी। जब उनके ऊपर होते अत्याचार के बारे में मामाओं को पता चला तो उन्होंनेना सिर्फ उनके निकम्मे पति को सबक सिखाया पर उन्हें घर ले आये। अब पारो और उनके विधुर पिताजी प्रेम से पारो की बेटी पाल रहे थे । उसके पिता रामचंद उर्फ़ जग रामू काका हमारे घर के मुख्य बावर्ची थे।
नानाजी ने मुस्कुरा कर मुझे पूछा ,”नेहा बेटी तेरा क्या प्लान है ?”
मैं कल रात की भयंकर चुदाई से थकी हुई थी पर ना जाने क्यों मुझे अब बुआ और नानाजी के अनकहे विचार साफ़ दिखने लगे।
“नानू, यदि बुआ दादू की मालिश करेंगी तो मैं आपकी मालिश करूंगी आज।” मैंने नानू के होंठो को चूमा प्यार से।
“याद है जब तू बोर कर देती थी नानू और दादू को “डंडी कहाँ छुपाई ” खिलवा कर ? आज क्यों नहीं खेलती वो खेल पर नए तरीके से ? क्या मैंने गलत कहा बाबू जी?” सुशी बुआ अब पूरे प्रवाह में थीं।
“बहु जैसा नेहा कहेगी उसके नानू और दादू वैसे ही खेलने को तैयार हैं ,”मुझे नानू के शब्दों में और कुछ ही सुनाई दिया और मैं रोमांचित हो गयी उन अनकहे शब्दों के विचारों से।
सुशी बुआ ने हमारे घर की खासियत मालिश के तेल का सोने का डोंगा मुझे थमा दिया। मालिश का तेल गोले और सरसों के तेल के अलावा, ताज़े मक्ख़न का ख़ास मिश्रण था।
सुशी बुआ वैसा ही सोने का दूसरा डोंगा लेकर अपनी विशाल गांड हिलती दादू के कमरे की ओर चल दीं।
“नानू चलिए मैं भी आपकी मालिश करती हूँ ,”नानू ने मुझे बाहों में उठा लिया। जैसा घर का माहौल था। मैंने सिर्फ पापा की टी शर्ट पहनी थी। मुझे उसी समय याद आया कि नीचे मैंने पैंटी नहीं पहनी थी। पर नानू की बाहों में झूलते मुझे कोई शर्म नहीं आयी। शायद अब मुझे अपने घर मके सदस्यों के बीच अथाह प्रेम की कुंजी मिलने वाली थी।
नानू ने मुझे कमरे में लेजा कर फर्श पर नीचे खड़ा कर दिया ,”नानू चलिए बिस्तर में। कपड़े उतारिये आज नेहा मालिश्ये की मालिश से आप सब मालिशें भूल जायेंगें। ” मैंने छाती बाहर निकलते हुए नाटकीय अंदाज़ में कहा।
नानू हँसते हुए शीघ्र अपना कुरता और पजामा निकाल कर बॉक्सर शॉर्ट्स में खड़े थे। उस उम्र में भी नानू का पहलवानों जैसा बालों से भरा शरीर ने मुझे पहली बार नानू को एक पुरुष की तरह देखने के लिए विवश कर दिया। मेरे विचारों में अकबर चाचू के पारिवारिक प्रेम की यांदें ताज़ा हो गयीं। नानू पेट के बल लेट गए थे बिस्तर पे।
“नानू कहीं पूरे कपड़े बिना उतारे कोई अच्छी मालिश हो सकती है ?”मैंने नानू के बॉक्सर को पकड़ कर नीचे खींच कर उतर दिया, नानू ने अपने भारी भरकम बालों से भरे कूल्हों को उठा कर पेरी मदद की।
नानू का विशाल शरीर अब मेरी आँखों के सामने था। विशाल पेड़ के तनो जैसे जाँघे , चौड़ी कमर और बहुत चौड़ा सीना , बहु बलशाली भुजाएं। मुझे अपनी चूत में जानी पहचानी कुलबुलाहट होती महसूस होने लगी।
“नेहा बेटी पारो अपने कपड़े तेल से ख़राब होने से बचाने के लिए सब उतार कर मालिश करती है ,”यदि नानू की आवाज़ में नटखटपन था तो मुझे अपने कानो में सांय-सांय जैसी आवाज़ों में नहीं समझा पड़ा।
मैंने बिना एक क्षण सोचे अपनी लम्बी टी शर्त उतर दी। मैंने खूब तेल लगा कर ज़ोर से मालिश की नानू के कमर कन्धों, जांघों की। फिर मैं घोड़े की तरह उनकी जाँघों के ऊपर स्वर हो कर उनके विशाल चूतड़ों की मालिश करने लगी। नानू की साँसे बहुत मधुर मधुर लग रहीं थी मुझे। मैंने उनके चूतड़ों को फैला कर उनकी घने बालों से ढकी गांड के ऊपर मालिश का तेल गिरा कर अपनी ऊँगली से चूतड़ों की दरार की मालिश के बहाने उनकी गांड की छेद को सहलाने लगी। मेरी चूत में रस की बाढ़ आ गयी।
मैंने सूखे गले से निकली आवाज़ में कहा ,”नानू अब पलट जाइये। आपके सामने की मालिश का नंबर है अब। ”
नानू बिना कुछ बोले अपनी पीठ पर पलट गए। इन्होने कई सालों के बाद अपनी प्यारी षोडसी धेवती के विकसित होते नग्न शरीर को पुरुष की निगाहों से सराहा और मैं अपने नेत्र नानू के विशाल अजगर से नहीं हटा पायी। बड़े मामू जैसा विशाल मोटा मूसल झूल रहा था नानू की वृहत जाँघों के बीच में।
मैंने हम दोनों का ध्यान हटाने के लिए ऐसे व्यवहार किया जैसे मैं हर रोज़ नग्न हो कर उनकी मालिश करती थी। नानू आँखें मूँद ली शायद आगे आने वाले मालिश के आनंद के लिए।
मैंने उनकी विशाल सीने की तेल लगा लगा कर ज़ोर से मालिश की।
फिर उनके काफी बाहर निकले पेट की मालिश। मेरी आँखें नानू के अजगर जैसे महा लंड से हट ही नहीं पा रहीं थीं। मैंने दिल मज़बूत करके अपना ध्यान नानू की जाँघों पर लगाया। मैंने उनके पैर की हर ऊँगली की मालिश करते हुए फिर से उनकी जाँघों को तेल से मसलते हुए उनकी जांघों के बीच दुबारा पहुँच गयी और मरी चीख निकलते निकलते रह गयी।
नानू का लंड अब खम्बे जैसा तन्ना कर्व थरथरा रह था। मेरा गला सूख गया। मेरी साँसें भारी हो गयीं। अब मेरी आँखें नानू के लंड से हटने में पूर्णरूप से अशक्षम थीं। नानू का लंड ने मानो मुझे सम्मोहित (हिप्नोटाइज़) कर दिया था।
“नानू अब मैं आपके ख्माबे की मालिश करने लगीं हूँ। पारो भी तो करती होगी इसकी मालिश,” मेरा हलक सूख चूका था रोमांच से। मेरी आवाज़ मेढकों जैसे टर्र-टर्र की तरह भारी थी।
“बेटा पारो कोई हिस्सा नहीं छोड़ती ,”नानू की आखें बंद थी और उनके होंठों पर मंद मंद मुस्कान खेल रही थी।
मैंने खूब सारा तेल लगा कर कंपते हाथों से नानू के महालँड को पकड़ लिया। परे दोनों हाथों की उँगलियाँ नानू के लंड की परिधि को घेरने में पूरी तरह असफल थीं। नानू का लंड अपने बेटों जैसा लम्बा मोटा था। आखिर सेब पेड़ से ज़्यादा दूर तो नहीं टपकेगा।
मैंने मन लगा कर तेल से चिकेन नानू के लंड को खूब ज़ोर से सहला सहला कर उसकी मालिश की। अब मुहसे रुका नहीं जा रहा था। मैं कुछ बोलना ही चाह रही थी कि नानू ने प्यार से कहा ,”नेहा बेटा पारो से मत कहना पर इतनी अच्छी मालिश तो मुझे हमेशा याद रहेगी। अब तू तक गयी होगी यदि तेरा मन करे तो हम “डंडी कहाँ छुपाई” खेल सकते है।”
मैं अब नानू के तेल से लिसे चकते महा लंड को अपने नहीं हाथों से सहला रही थी मुझे पता नहीं कहाँ से साहस आ गया , “नानू आप बुआ वाले नये खेल की बात कर रहें हैं या बचपन वाले खेल की। ”
“नेहा बेटा अब तो तू बड़ी हो गयी है शायद बचपन वाले खेल से जल्दी ऊब जाएगी,” नानू ने अचानक आँखें खोल दीं। मैं शर्म गयी पर मेरे हाथ नहीं हिले नानू के लंड के ऊपर से।
“नानू मैं छुपाऊं डंडी को ?”मैंने थरथरती आवाज़ में पूछा।
“हाँ बेटा जहाँ मर्ज़ी हो छुपा लो डंडी को फिर मैं कोशिश करूंगा ढूँढ़ने की ,”नानू अब मुस्कुरा कर मुझे बेचैन कर रहे थे।
उस खेल में एक खिलाड़ी डंडी को चुप देता था एक खांचे में और फिर दुसरे को अंदाज़ लगाना होता था की किस खांचे में थी डंडी। यदि सही अंदाज़ लग जाता तो दुसरे को उस खांचे के नंबर मिलते अन्यथा छुपाने वाले को नंबर मिल जाते।
मैंने अब सम्मोहित कन्या की तरह एक तक नानू के एक आँख वाले अजगर को स्थिर कर अपनी नन्ही चूत के द्वार को उनके बड़े सेब जैसे सुपाड़ी के ऊपर टिका दिया।

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