वापस घर आके हम दोनों ने पहले शानू को सब कुछ बताया। शानू आदिल भैया के जन्म पिता का रहस्य सुन कर ख़ुशी से समा नहीं पा रही थी। फिर हमने शाम की योजना का इंतिज़ाम कर लिया। खूब सारी शराब, वाइन और खाना, आखिर यदि दो मर्द महनत करेंगे तीन चार लड़कियों को चोदने की तो उनके लिए पुष्ट आहार का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा।
तब तक जीजू या आदिल भैया भी आ गए और उन्हें भी उनके जन्म की असलियत पता चली तो उन्हें ख़ुशी हुई और उन्होंने नूसी और शानू को अपनी बाँहों से भर लिया।
जैसे ही आदिल भैया, नूसी आपा और शानू अपने और भी गहरे रिश्तों की ख़ुशी से थोड़ा शांत हुए तो उनको ‘नेहा’ की गहरी चाल के बारे में साफगोई से बताया गया। उन्होंने नाटक में अपना हिस्सा अच्छे से समझ लिया।
अब बस अकबर चाचू को प्यार से अपने जाल में फ़साना बाकी था। लेकिन अब सबको कामयाबी का पूरा भरोसा था।
आदिल भैया एक बार हम तीनो को चोदना चाहते थे पर नूसी ने याद दिलाया कि उनकी अम्मी की दिली ख्वाहिश का तो उन्होंने तुरंत अपनी ताकत शाम के लिए बचाने के लिए तैयार हो गए।
फिर हम तीनो ने शाम के कपडे निकाल लिए। मकसद था कि चाचू को हमारे चूचियों और चूत की पहुँच आसान होनी चाहिये। बिना कच्छी के लहँगा और बिना ब्रा के चोली से बढ़िया क्या हो सकता था।
अब अकबर चाचू के आने का इन्तिज़ार था। हमें शब्बो बुआ को फोन करके एक बार फिरसे शाम के नाटक का ब्यौरा अच्छे से एक दुसरे समझ लिया। मैंने अपने आई-फोन पे टेक्स्ट तैयार रख लिया सिर्फ बटन दबाने की ज़रुरत थी ।
नूसी आपा ने बावर्चियों से अच्छे अच्छे पकवान बनवा लिए थे। अकबर चाचू के पसंदीदा नर्गिद कबाब भी शामिल थे उनमे। नूसी आपा ने लाल और सफ़ेद मदिरा की कई बेहतरीन ख़ास सालों की बोतलें बाहर निकाल लीं। फिर नूसी आपा ने छह-सात ख़ास शैम्पेन की बोतलों को ठंडा होने रख दिया। नूसी आपा और शानू के दिल की धड़कने दूर तक सुनाई दे रहीं थीं। मैं भी अपने नाटक की सफलता के लिए बेचैन होने लगी। आखिर इस के बाद अकबर चाचू का परिवार हमेशा के लिए एक दूसरी राह पे चल पड़ेगा। वो रास्ता जो समाज के हिसाब से वर्जित, अनुचित और गैर कानूनी था। पर प्यार, पारिवारिक वफ़ादारी और आदमियत की स्वन्त्रता के दृष्टिकोण से समाजिक वर्जना यदि सामाजिक निगाहों से छुपी रहे तो चाहे आप उसे छल-कपट कहें पर प्यार की फतह तो हो जाएगी।
अकबर चाचू के घर में घुसने से ठीक पहले ही नूसी आपा और शन्नो कमरे में चली गयीं। मैंने अकबर चाचू को प्यार से चूम के उनका स्वागत किया. फिर उनके हाथ पकड़ के उन्हें उनके कमरे में ले गयी। मैंने प्यार से उनके बाहर के कपड़े उतारे। अकबर चाचू ने कई बार मेरी चूचियां दबाई। मैंने अपनी चूचियां और भी उनके हाथों में दबा दीं। मैंने अकबर चाचू के घर के कपड़े निकाल दिए। बिना कच्छे के लुंगी और कुरता। चाचू वैसे रोज़ाना पठानी पजामा या साधारण पजामा और कुरता पहनते थे। पर आज तो लन्ड और चूत जितनी आसानी से बाहर निकल सकते उतना अच्छा था।
जब अकबर चाचू और मैं नीचे पहुंचे तब तक हर मदिरा और शैम्पेन बाहर थी। सफ़ेद मदिरा और शैम्पेन बर्फ की बाल्टी या डोलची में थीं। स्टार्टर्स और एपेटाइज़र्स इतने स्वादिष्ट लग रहे थे की मेरी भी लार टपकने लगी। नूसी आपा ने शायद उस सिद्धान्त का पालन किया था कि यदि मर्द का पेट भरा हो और खुश हो तो पेट के नीचे वाला भी खुश रहेगा।

