नेहा का परिवार – Update 140 | Erotic Family Saga

नेहा का परिवार - Pariwarik Chudai Ki Kahani
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जीजू ने मेरी गांड में से खीरा निकला और उसे मेरे मुंह में ठूंस दिया। मैंने अपने मुंह में ठूंसे आधे खीरे को चाटा और चूसा। मेरे मलाशय के सौंधे स्वाद और महक से मेरा मुंह पानी से भर गया। जीजू ने फिर खीरे के दूसरा हिस्सा अपने मुंह में भर कर दिल खोल कर चाटा और चूसा।
“साली जी जब मेरा लण्ड आपकी गांड से निकलेगा तो उस पर इस खीरे से बहुत ज़्यादा आपकी गांड का रस लगा होगा। अल्लाह कसम इतना लज़ीज़ रस के लिए तो मैं आपकी गांड घंटों तक रगड़ सकता हूँ ,” जीजू ने चटखारे लेते हुए मुझे आगाह किया। उनकी बात भी सही थी। उनके विकराल लण्ड की लम्बाई मोटाई खीरे से दुगुनी से भी ज़्यादा थी। मेरी गांड की खैर नहीं थी।
“तो जीजू फिर इन्तिज़ार किस बात का कर रहे हैं। बातें ही बनाएंगें या फिर मर्दों की तरह अपने दानव जैसे लण्ड के कारनामे भी दिखाएंगें ,” मैंने बुद्धुओं की तरह पहले से ही बेअंकुश भड़के हुए सांड को लाल रुमाल दिखा दिया।
जीजू ने मेरे गदराये थिरकते दोनों चूतड़ों पर तीन चार थप्पड़ टिकट हुए मेरी गीली चूत में खीरा हद तक ठूंस दिया, “अरे साली साली जी अभी आपको दिखता हूँ की मैं सिर्फ मुंह से ही बातें ही बनाता हूँ या मर्दों के तरह लण्ड से भी बोल सकता हूँ। ”
मैं चीख उठी , “जीजू यह आपकी अम्मी के चूतड़ और चूत नहीं है। इनसे सभ्य इंसानों की तरह पेश आइये ,” मेरी गांड का बाजा बजने वाला था और मैं चुप ही नहीं हो के दे रही थी। इसे ही तो कहते हैं ‘आ बैल मुझे मार ‘और बैल भी बजरंगी लण्ड वाला।
” रंडी साली जी मेरी फरिश्तों जैसी अम्मी को क्यों अपनी रांडों जैसी गांड चुदाई के बीच में ला रही हैं। गांड तो फटनी ही है आपकी। क्या ऐसी फड़वाने की तमन्ना है कि कोई शहर का मोची भीना सिल सके ?” जीजू ने मेरे पहले से ही लाल चूतड़ों पर तीन चार ठप्पड़ टिका दिए। मैं चीख उठी, बिलबिलाती हुई।
जब तक मैं कुछ वाचाल जवाब सोच पाती जीजू ने मेरे चूतड़ों को फैला कर अपना लण्ड मेरी गांड के छल्ले पर दबा दिया। मेरा हलक सुख गया और मेरी साँसें तेज़ हो गईं। जीजू के लण्ड के ऊपर सिर्फ शानू की चूत के रस के सिवाय कोई तेल या लेप नहीं था। मेरी सूखी गांड वास्तव में फटने वाली थी।
जीजू ने जैसा वायदा किया था उसको निभाते हुए एक बलशाली झटके वाले धक्के में अपना मोटे सब जैसा सुपाड़ा मेरी गांड दिया।
न चाहते हुए भी मैं दर्द से बिलबिला उठी। मेरी चीख कमरे उठी। मेरी आँखें गंगा के जल से भर गईं। मेरी सूखी गांड को मानों जैसे जीजू ने तेज़ चाकू से काट कर उसमे मिर्चें भर दी हों। मेरी बोलती बंद हो गयी। जीजू के मर्दानगी ने मेरी रंडीबाजी वाले वाचाल लच्छेबाजी की भी गांड फाड़ दी।
” अरे साली जी अभी से टसुये बहाओगी तो आगे क्या होगा। अभी तो साली की गांड में मेरा सुपाड़ा ही अंदर गया है बाकि का खम्बा तो अभी भी बाहर है ,” जीजू ने मेरे तड़पने, बिलखने को बिलकुल नज़रअंदाज़ करते हुए मेरे उनके थप्पड़ों से दुखते चूतड़ों को बेदर्दी से मसल दिया।
दर्द से मेरा हलक भींच गया था और मेरी आवाज़ ना जाने किस गड्ढे में गुम गई थी पर मुझे सारे संसार की सालियों की इज़्ज़त का भी ख्याल था।
मेरी आवाज़ में पहले जैसी शोखी चाहेना हो पर रुआँसी आवाज़ में थोड़ा तीखापन भी भी शुमार था, ” अरे जीजू तो खम्बा क्या अपनी अम्मी की क़ुतुब मीनार से चुदी गांड में डालने को बाहर रख झोड़ा है?” मैंने कह तो दिया पर तुरंत अपनी आँखें मींच ली आने वाले आतंक के ख्याल से।
जीजू ने इस बार एक भी लफ्ज़ ज़ाया नहीं किया। मेरी कमर को भींच कर एक भीषण धक्का मारा और कम से कम तीन चार, घोड़े के लण्ड जैसी मोटी, इंचें मेरी गांड में शरमन टैंक की तरह दाखिल हो गईं। मेरी दर्द से नहायी चीखें अब रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। मेरी आँखें बाह चली। मेरा सुबकता खुला मुंह लार टपका रहा था। जीजू ने पहले धक्के के बाद दूसरा, तीसरा धक्का लगाया। उनकी घुंघराली झांटे अब मेरे लाल कोमल चूतड़ों को रगड़ रहीं थीं। उनका हाथ भर लम्बा बोतल जैसा मोटा लण्ड जड़ तक मेरी तड़पती फटी गांड में समां गया था।
मैंने अब बेशर्मी से सुबकना शुरू कर दिया। जब गांड फट रही हो तो कम से कम खुल के रो तो लेना चाहिये। और वो ही किया मैंने अगले दस पंद्रह मिनटों तक। जीजू ने निर्ममता से अपना घोड़े जैसे महा लण्ड से बिफरे सांड की तरह मेरी गांड-मर्दन करने लगे।

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