शानू ने चाचू की सालियों की कहानी और भी उत्तेजक बना दी थी। नूसी आपा के शर्म से लाल गाल हज़ारो वाट के बल्बों जैसे दमक रहे थे। मेरा एक हाथ धीरे धीरे फिसलता हुआ चाचू की उभरती तोंद के ऊपर टिक गया। नसीम आपा का ध्यान मेरे हाथ की तरफ था।
शानू अब अपनी दादी अम्मा, अब्बू और ईशा मौसी का वार्तालाप खूब खुलासे से दोहरा रही थी। हालाँकि आदिल भैया और मैंने यह किस्सा पहले सुन रखा था पर शानू की बच्चों जैसे मधुर आवाज़ और दो दो सालियों और जीजू के बीच में बढ़ते सम्भोग के विचारों से मैं और नसीम आपा बहुत जल्दी वासना के आनंद में गोते लगने लगीं।
जैसे जैसे शानू ईशा मौसी के पहले सम्भोग का खुला बहुत विस्तार ब्यौरा देने लगी मैंने चाचू, नसीम आपा और आदिल भैया के गिलास भरने में कोइ देर नहीं लगाई। मेरा हाथ अब चुपके से चाचू के ढीले कुर्ते के नीचे चला गया। जैसा मैंने सोचा था चाचू पिछली रात की तरह पायजामे के नीचे कच्छा नहीं पहने थे। मैंने होले से अपने नन्हे कोमल हाथ को उनके भारी-भरकम लण्ड के ऊपर पायजामे के ऊपर से रख दिया। चाचू ने मर्द की तरह कोइ निशान अपने चेहरे पर नहीं आने दिया कि मेरा हाथ उनके लण्ड के ऊपर तैनात था।
मैंने दूसरे हाथ से उनकी हथेली कसमसाने का नाटक करते हुए अपनी बाईं चूची के ऊपर टिका दी।
कहानी, स्कॉच और मेरे हाथ की गर्मी से चाचू थोड़ा बहक गए और उनका दूसरा हाथ बिना सोचे उनकी बड़ी बेटी के दाएं ुरोक्स के ऊपर फिसल गया।
हम सब थोड़े से नशे की खुमारी में थे। शानू की कहानी लम्बी होती जा रही थी। उसने खाने के ऊपर भी किस्सा जारी रखा। अब वो शन्नो मौसी के कुंवारेपन के भांग वाले हिस्से पर थी। नसीम आपा मेरे खाने की मेज़ के नीचे वाले हाथ के बारे में पूरी वाकिफ थीं। मैं अब खुल कर अकबर चाचू का लण्ड सहला रही थी।
नूसी आपा ने भी मेरी तरह अपने अब्बू का गिलास भरने में बहुत दिलचस्पी दिखाई।
मीठे का वक़्त आते आते चाचू और नूसी आपा खुले खुले हलके से नशे में मस्त थे। हम सब के ऊपर नशा तारी होता जा रहा था।
मीठा ख़त्म होते होते शानू ने अपनी शन्नो मौसी की गांड का मर्दन का किस्सा के खात्मे पर थी।
जैसी ही शानू के किस्सा खत्म किया चाचू ने ज़ोर से उबासी भर कर माफ़ी माँगी , ” भाई अब आप मुझे तो माफ़ करों। लगता है शानू की कहानी और नूसी के लाज़वाब खाने से इतना पेट भर गया की आँख खुल ही नहीं पा रहीं।
शानू तुरंत चहक कर बोली ,” हाँ अब्बू आप बिस्तर जा कर आराम कीजिये। ”
चाचू ने गहरी नज़रों से अपनी बड़ी बेटी की और देखा और नसीम आपा शर्म से लाल हो गयीं। अकबर चाचू सबको चुम कर भारी भारी क़दमों अपने शयन कक्ष की ओर बाद चले।
जैसे ही उन्होंने अपने कमरे में दाखिल हो गए होंगे वैसे ही शानू और मैं जल्दी से का हाथ पकड़ कर उन्हें उनके अब्बू के कमरे की तरफ खींचने लगे , “आपा किस बात का इन्तिज़ार कर रहीं अब आप। जाइए अपने अब्बू के कमरे में। उन्हें कितना इन्तिज़ार करवाएंगी आप। ”
“मुझे बहुत डर लग रहा है नेहा ,” नसीम आपा के हिचकिचाहट ने शानू को पागल सा कर दिया।
” अरे आप तो इतनी डरपोक है आपा। यदि आप को नहीं जाना तो मैं चली जातीं हूँ हमारे अब्बू का ख्याल रखने के लिए,” शानू ने छाती फैला कर बड़ी बहन को ताना मारा।
इस तरकीब ने जादू का असर किया नूसी आपा के ऊपर , “अरे चुड़ैल मैंने तुझे तेरे जीजू को सौंप दिया और अब तू अब हमारे अब्बू को मुझसे पहले घूँटना चाहती है। तुझे मेरी कब्र के ऊपर चलना पड़ेगा मुझसे पहले अब्बू को पाने के लिए। नेहा चल इस रंडी को इसके जीजू से तब तक छुड़वाना जब तक इसकी चूतना फैट जाये। ” नसीम आपा ने वैसे तो गुस्सा दिखाया पर तुरंत माँ के प्यार से भरे चुम्बन से शानू का मुंह गीला कर दिया।
हम सब सांस रोक कर नसीम आपा के हलके क़दमों से उनके अब्बू के कमरे के और के सफर को आँखे फाड़ कर देख रहे थे।
रास्ता सिर्फ कुछ क़दमों का था पर प्यार और सामाजिक रुकावटों का ख्याल आते ही इस सफर की लम्बी मुश्किल और परेशानियां समझ आने लगतीं हैं। जैसे ही हमने पक्का भरोसा कर लिया कि नसीम आपा अपने अब्बू के कमरे में दाखिल हो कर उन्होंने हलके से दरवाज़ा बंद कर लिया वैसे ही आदिल भैया ने शानू और मुझे अपनी एक एक बाज़ुओं में हमारी कमर से उठा कर दानव जैसे गुर्राते हुए अपने कमरे की ओर दौड़ पड़े।
हमारी किलकारियां मोतियों की तरह हमारे पद-चिन्हों जैसे हमारे पीछे कालीन पर फ़ैल गयीं।

