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” अच्छा छोड़ पहले चल नहा धो कर तैयार हो जातें हैं, नसीम आपा के आने से पहले।” मैं शानू को हाथ से पकड़ कर अपने कमरे के स्नानगृह में ले चली।
मैंने और उसने एल दुसरे को खूब सहला सहला कर नहलाया। फौवारे की बौछार के नीचे हम दोनों कमसिन लड़कियां एक दुसरे के शरीर से खेलते खेलते वासना ग्रस्त हो गयीं।
” शानू, तूने तो मुझे पूरा गरम कर दिया। अब चल मेरी आग बुझा। ” मैंने शानू के साबुन के झागों से ढकी चिकनी चूचियों को मसलते हुए सिसकी मारी।
“नेहा मेरी चूत भी पानी मार रही है। कुछ कर ना ,” शानू भी पीछे नहीं रही और मेरे गदराये उरोज़ों को कास कर मसल रही थी।
मैं समझ गयी कि मुझे ही पहल करनी पड़ेगी।
मैंने पानी की बौछार में दोनों के बदन के साबुन को साफ़ करके शानू को धीरे से फर्श पर लिटा दिया। फिर मैंने विपरीत दिशा में मुड़ कर अपनी धधकती चूत को उसके खुले मुंह के ऊपर टिका दिया। जब तक शानू कुछ कहती मेरा मुंह उसकी चिकनी चूत के ऊपर चिपक गया।
मेरी जीभ शानू के गुलाबी नन्हे पपोटों के बीच छुपे उसकी कमसिन चूत की गुफा में में दाखिल हो गयी।
शानू सिसक उठी और उसकी ज़ुबान और होंठ भी मेरी चूत के सेवा में लग गए। मैंने शानू की चूत में एक उंगली डाल उसे चोदते हुए उसके भग-शिश्न [क्लाइटोरिस] को चूसने, चुब्लाने लगी। उसके चूत से बहते काम-रस की मीठी सुगंध मेरे नथुनो में भर गयी। मेरी चूत में से भी पानी बहने लगा।
मैं शानू की चूत को उसके भगांकुर को चूस रही थी। शानू भी काम नहीं थी। उसने मेरे भाग-शिश्न को दांतों से हलके से दबा कर मेरी गांड में एक उंगली डाल दी थी। दूसरी उंगली मेरी चूत को खोद रही थी।
स्नानगृह की दीवारें हम दोनों की सिस्कारियों से गूँज उठीं।
अचानक शानू का बदन ज़ोर से अकड़ उठा और वो कस कर सिसकते हुए बोली , ” काट मेरे भग्नासे को नेहा। चोद मेरे चूत। मुझे झाड़ दे जल्दी से। ”
मैं भी कगार पर थी। मैंने शानू की चूत का तर्जनी मंथन तज़कर दिया और उसके भाग-शिश्न को दांतों से चुभलाते हुए जीभ से झटके देने लगी।
शानू ने मेरे मलाशय का उंगली-चोदन की रफ़्तार बड़ा दी और मेरी चूत में धंसी उंगली से मेरी चूत की अगली दीवार को कुरेदते हुए मेरे भग्नासे को कस कर चूसने लगी।
हम दोनों एक हल्की सी चीख मार कर एक साथ झड़ने लगीं। हम दोनों बड़ी देर तक वैसे हीचिपके लेती रहीं।
आखिर में मैं शानू के ऊपर से उठी और उसके पास फर्श पर बैठ गयी। मैंने अपनी उँगलियाँ चाट कर उसके रति-रस का स्वाद चटखारे लेते हुए कहा, ” कैसा लगा मेरी चूत का स्वाद। तेरी चूत का रस तो बहुत मीठा है शानू। ”
” तेरी चूत भी बहुत मीठी है। अब तेरी गांड का स्वाद भी चख लूंगीं ,” शानू ने मुस्करा कए मेरी गांड में से ताज़ी-ताज़ी निकली उंगली को कस कर चूस कर साफ़ कर दिया, ” ऊम्म्म्म नेहा तेरी गांड का स्वाद भी बहुत अच्छा है। ”
शानू की इस हरकत से मैं गनगना उठी।
मैंने फुसफुसा कर कहा , “शानू मुझे भी अपना सुनहरी शर्बत पिला ना री। ”
इस बार शानू शरमाई नहीं , ” ज़रूर नेहा। तू भी मुझे अपना शर्बत पिलाएगी ना ?”
नेकी और बूझ-बूझ ? मैंने पहल की। शानू अब जीजू को पिलाने के तजुर्बे से सीख गयी थी। उसने अपनी धार को काबू में रख कर मेरा मुंह कई बार अपने सुनहरी मीठे-खारे शर्बत से भर दिया। मैंने भी चटखारे लेते हुए कितना हो सकता था पी गयी। फिर भी मैं शानू की मूत्रधार के स्नान से गीली हो गयी।
शानू ने बिना झिझक मेरी झरने की सुनहरी धार को खुले मुंह में ले लिया। कई बार मुंह भरा और शानू ने बेहिचक गटक लिया। मैंने भी उसे अपने सुनहरे फव्वारे से नहला दिया।
हम दोनों खिलखिला कर हंस दी और फिर एक दुसरे को बाँहों में भींच कर खुले हँसते मुंह से बहुत गीला ,लार से लिसा चुम्बन देना शुरू किया तो रुके ही नहीं।
आखिर में फिर से नहा कर मैंने थकी-थकी सी शानू को पौंछ कर सुखाया और उसे बाँहों में भर कर बिस्तर पर पलट लिया। हम दोनों समलैंगिक सम्भोग के अतिरेक से मीठी थकान से उनींदे हो गए। फिर पता नहीं कब वाकई सो गए।

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