“तू, तुझे क्या लेना देना हवेली से ” जय सिंह ने हौले से कहा
मैं-बड़ी तारीफ सुनी है तो बस देखने चला आया .
“मुझे तो कोई पागल ही लगता है तू ” जय सिंह ने कहा और पीठ मोड़ कर चल दिया.
मैं- अबे, बता तो दे रास्ता
जय सिंह- यहाँ तक आया है तो आगे भी खुद ही पहुँच जायेगा और ख़ूबसूरती कैसी लगी कभी मिले तो बताना जरुर.
जय सिंह ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया खैर मैंने भी गाड़ी आगे की तरफ बढ़ा दी और आगे गाँव में चौपाल के कोने पर बनी चाय की दूकान पर जाकर रोकी.
“एक चाय देना काका “मैंने कहा और वही बैठ गया. चाय वाला मुझे अजीब नजरो से घुर रहा था .
“यहाँ पहली बार आये हो ” उसने पूछा
मैं-हाँ
मैंने चाय की चुसकिया लेते हुए आस पास नजर दौड़ाई. ये जगह किसी छोटे बाजार जैसी दुकाने थी जरूरतों के सामान की एक तरफ बैठने को चबूतरे बने थे .
“ये ठाकुर जय सिंह कौन है ” मैने पूछा
चाय वाला- आफत है इस गाँव की,
मैं- आफत
चाय वाला- आफत तो छोटा शब्द है उसके लिए हर समय गुस्सा चढ़ा रहता है उसके नाक पर न जाने कब कौन उसके हत्थे चढ़ गए.
मैं- ऐसे आदमी को रोकते क्यों नहीं तुम सब
चायवाला-ये गाँव उसके बाप की मिलकियत है अब प्रजा की इतनी हिमत्त कहाँ की राजा के खिलाफ आवाज उठाये वो तो बस जय सिंह से ही गाँव वाले कतराते है बाकी बड़े ठाकुर साहब तो देवता आदमी है
मैं- बड़े ठाकुर ?
चाय वाला- कमाल है यहाँ पर आकर तुम बड़े ठाकुर को नहीं जानते,
मैं- तू बता देना फिर
चाय वाला- ठाकुर शौर्य सिंह का नाम तो सुना ही होगा न वो ही है बड़े ठाकुर साहब
मैं- हम्म , खैर चाय बढ़िया बनाता है सुन मुझे हवेली का रास्ता बता तू
चाय वाले के हाथ से कांच का गिलास छुट गया . उसने अजीब नजरो से देखा मुझे और बोला- तुमको क्या लेना देना हवेली से
मैं- एक मरे हुए आदमी ने मुझसे कहा की हवेली जा मैं आ गया .
चाय वाले ने कुछ भी नहीं कहा अपने कांपते हुए हाथ को उठाया और सामने की तरफ इशारा कर दिया. मैनी चाय पे पैसे रखे और गाड़ी आगे बढ़ा दी. जल्दी ही गाँव पीछे छूट गया . और जंगल शुरू हो गया. पथरीली राह पर गाड़ी झटके खाते हुए चली जा रही थी . मैंने नदी को देखा शांत पानी देख कर मैंने गाड़ी रोक दी. ये जगह बड़ी प्यारी सी थी , रस्ते के एक तरफ जंगल तो दूसरी तरफ नदी अनोखा संगम . पेंट को घुटनों तक मोड़ कर मैं पानी में उतर गया हाथ मुह धोये और जी भर कर पानी पिया. एक पल के लिए मैं भूल सा गया की मैं कहाँ हु, पर शुक्रिया उन आवाजो का जिसने मेरा ध्यान भंग किया.
दबे पाँव मैं उन आवाजो की तरफ गया तो देखा की झाड़ियो में एक औरत घुटनों के बल झुकी हुई है उसकी सलवार निचे पड़ी थी और उसकी कमर को थामे हुए एक आदमी उसे पीछे से चोद रहा है .
“ओह चंदा क्या चूत है तेरी, पुरे गाँव में तुझ सी नशीली कोई औरत नहीं जी तो करता है दिन रात तुझे ऐसे ही झुकाए रहू ” उस आदमी ने कहा.
कमर को तेजी से आगे पीछे करते हुए उस आदमी की सांसे थोड़ी थोड़ी फूलने लगी थी.
“”आह मैं तो गयीईई ” उस चंदा ने गहरी आह भरी और अपनी गांड को और ऊँचा कर लिया . आँखों के सामने चलती चुदाई देख कर मेरे कान तपने लगे.गर्मी की भरी दोपहर में दो बदन पसीने पसीने हुए एक दुसरे में समाये हुए थे .दो मिनट बाद वो आदमी भी शांत हो गया और मैंने पहली बार उस औरत की शक्ल देखि, खूबसूरत तो बहुत थी वो. बिलकुल फ़िल्मी हेरोइन जयप्रदा जैसी. उसके हुस्न का कायल हुए बिना नहीं रह सका मैं.
“तूने वो काम किया नहीं अभी तक ” उस आदमी ने चंदा से कहा
चंदा- कोशिश कर तो रही हूँ पर तुम नहीं जानते ये लोग कितने चतुर है और हाँ आज तो मैं आ गयी आगे से ऐसे नहीं आउंगी.
आदमी- मैं भी क्या करू जो बात तुझमे है वो किसी और में नहीं
चंदा- रहने दो इन बातो को अपना वादा भूल मत जाना तुम
आदमी- कभी नहीं चंदा .
मैं उस आदमी के चेहरे को नहीं देख पा रहा था क्योंकि उसने चेहरे पर साफा लपेटा हुआ था और चेहरा देख भी लेता तो क्या होता मैं कहाँ जानता था उसें. जल्दी ही वो दोनों अलग अलग रस्ते पर हो लिए मैं समझ गया था की जंगल ख़ास तो है पर वो हवेली कहाँ है जो खास थी .
कुछ दूर और आगे गया यहाँ पर बहुत ऊँचे ऊँचे पेड़ कतार में खड़े थे , और उन्ही पेड़ो के पीछे तीन मंजिला वो ईमारत खड़ी थी जिसे दुनिया हवेली के नाम से जानती थी. बनाने वाले ने क्या सोच कर ही इस ईमारत को इस जगह पर बनाया होगा. एक तरफ जंगल , एक तरफ नदी की धारा . रजवाडो की शानो शौकत का जीता जागता प्रमाण रही होगी ये ईमारत किसी जमाने में . हालाँकि आज ये वैसी नहीं थी . लगभग आठ फीट ऊँची दीवारों का चुना कई जगहों से झड़ गया था . कई जगह हरी काली काई चढ़ गयी थी . तो कुछ कब्ज़ा जंगली बेलो ने कर लिया था . चलते हुए मैं उस इमारत के पास आया. आखिरी बार शायद गुलाबी पुताई की गयी होगी इस पर. लोहे का बड़ा सा दरवाजा जंग खा चूका था पर फिर भी खड़ा था .मैंने दरवाजे को पकड़ा और उसे धक्का देना ही चाहा था की मेरे हाथ रुक गए.
“तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए ” मैंने पलट कर देखा एक बुढा हाथ में लाठी लिए खड़ा था .

