निर्मला -कोई हवेली नहीं है….. न थी ना है .
मैं – तो फिर क्या है क्या छिपाया गया है मुझसे.
निर्मला- कुछ नहीं छिपा रही तुमसे मैं अर्जुन
मैं- बताती भी तो नहीं , तुमको मेरी कसम है भाभी अगर तुमने मुझे ना बताया तो .
निर्मला- ये क्या कह दिया तुमने अर्जुन . कसम दी भी तो ऐसी
मैं- मेरा नहीं तो कसम का ही मान रख लो
निर्मला- तुमसे कुछ नहीं तुम्हे दुनिया से छिपाया गया है अर्जुन .
निर्मला की बात ने हैरानी में डाल दिया गया . मैंने मूर्खो की तरह उसे देखा.
मैं- कैसे
निर्मला- अर्जुन, सरपंच जी तुम्हारे पिता नहीं थे .
निर्मला ने मुझ पर बम सा ही फोड़ दिया था .
मैं- झूठ कहती हो तुम . ये नहीं हो सकता कभी नहीं हो सकता.
निर्मला- कुछ सच आज के आईने को पल भर में तोड़ देते है अर्जुन . आज तुम्हारे भ्रम के आईने को टूटना ही लिखा है . एक रात लहुलुहान अवस्था में सरपंच जी एक नन्ही सी जान को अपनी बाँहों में लेकर आये थे . उस बात को बस तीन लोग जानते थे मैं, सरपंच जी और इस घर की मालकिन जानकी जी, जिस रात तुमको सरपंच जी लाये थे उसी रात जानकी जी ने एक मरी हुई औलाद को जन्म दिया और फिर खुद भी चल बसी. मेरी सहायता से सरपंच जी ने गाँव में कहला दिया की लड़का हुआ है और तुम उनकी जिन्दगी बन गये.
मैं- मैं नहीं मानता
निर्मला- जिस तस्वीर को तुम घंटो देखते हुए रोते हो वो जानकी जी तुम्हारी माँ नहीं थी अर्जुन
मैं- तो फिर कौन थी मेरी माँ और कहाँ है मेरा परिवार.
निर्मला ने एक गहरी साँस ली और बोली- ये राज सरपंच जी के साथ ही चला गया .
निर्मला ने पानी का गिलास मुझे दिया और बोली- सरपंच जी कहते थे तुम सब जान जाओगे .
मैं- कैसे
निर्मला-जिन्दगी से बड़ा कोई शिक्षक नहीं अर्जुन. यहाँ से पन्द्रह कोस दूर लाल मंदिर है , वहां जाकर कोई मिले तो पूछना की हवेली जाना है .
निर्मला ने इतना कहा और बर्तन समेट कर निचे चली गयी. वो तो चली गयी थी पर मन में एक तूफ़ान खड़ा कर गयी. रात आँखों आँखों में काटी मैने.
सुबह गाँव में चुनाव था, कहने को चुनाव था पर मेरे लिए होकर भी नहीं था वो वजह जो मुझे सरपंची से जोडती थी वो खत्म हो गयी थी . अजित के परिवार को मैंने स्कूल के बाहर खड़े देखा जिनके चेहरे पर अपार ख़ुशी थी और होती भी क्यों न बरसो बाद उनका सपना जो पूरा होने जा रहा था . मैंने गाड़ी के शीशे ऊपर किये और लाल मंदिर की तरफ चल दिया .
शीशे से अन्दर आती गर्मी ने तपा दिया था मुझे, जब मैं उस जगह पर पहुंचा तो वहां कुछ भी वैसा नहीं मिला जैसा मैंने उम्मीद की थी . चारो तरफ झाड-झंखाड़ था , कंटीली कीकरो का जाल फैला हुआ था पहली नजर में तो मैं पत्थर की बनी सीढियों को देख ही नहीं पाया था . जैसे तैसे करते हुए मैं ऊपर गया तो पाया की बरसो से शायद इस मंदिर में किसी ने कदम नहीं रखा होगा. पत्थर, धुप-बारिश की मार में तिडक गए थे . मूर्ति खंडित थी
“यहाँ तो कोई नहीं है कौन मदद करेगा मेरी फिर ” मैंने आस पास नजरे घुमाते हुए कहा . उस जगह को घुमते हुए देख ही रहा था की तभी मेरे पाँव में काँटा चुभ गया . मैं उसे निकालने के लिए झुका ही था की “धांय ” की आवाज से कलेजे को झटका सा लगा . ऐसे लगा की आग मेरे पास से गुजर गयी हो . मैं थोडा घबरा सा गया .देखा की सामने मुझ बड़ा एक लड़का खड़ा है . लम्बा कद, पैनी मूंछे, भूरी बिल्लोरी आँखों हाथ में दुनाली लिए.
मैं- पागल है क्या बन्दूक चलाने के लिए होश करना भी जरुरी होता है. गोली लग जाती तो.
वो- मारने के लिए ही चलाई थी पर जिन्दगी में पहली बार निशाना चूक गया.
वो मेरे पास आया और दुनाली मेरे सीने से लगा दी.
मैं- इस बदतमीजी की कीमत क्या होगी सोच कर देख .
वो- तू सोच कर देख, तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ अपने कदम रखने की ये जानते हुए भी ठाकुर जय सिंह की बहन इस समय पूजा करने आई हुई है.
मैं- पहली बात तो मुझे कोई दिखा नहीं तेरे सिवा और दूसरी बात अगर तेरी बहन है भी यहाँ तो तेरे बाप-दादा की जागीर नहीं है ये जगह . ये मंदिर है तो सब का हुआ न और अगर मंदिर में भी किसी की मर्जी से आना जाना हुआ तो क्या ख़ाक सल्तनत हुई उस ऊपर वाले की.
मैने दुनाली अपने सीने से हटाई और बोला- तुझे जानता नहीं पहचानता नहीं, तूने मुझ पर वार किया फिर भी मैं छोड़ता हु इस बात को . पर कोशिश करना फिर कभी तू उलझ न जाए मुझसे क्योंकि अगली बार मैं भूलूंगा नहीं .
“हरामजादे , तेरी ये हिम्मत जानता भी है तू किसके सामने खड़ा होकर अपनी जुबान चला रहा है इस जुबान को खींच लूँगा मैं ”उस लड़के ने मुझे गाली दी. मैंने उसके घुटने पर लात मारी और उसकी बाहँ मोड़ कर पीठ से लगा दी. बन्दूक उसके हाथ से गिर गयी .
मैं- जब हाथो में ताकत ना हो न तो हथियारों का शौक नहीं रखना चाहिए, तू जो भी है मुझे परवाह नहीं.
“छोड़ मेरा हाथ ” उसने कहा और मैंने बाहँ और मरोड़ दी. वो इस बार थोडा बिलबिलाया पर अगले ही पल मुझे उसका हाथ छोड़ना पड़ा .
“क्या हो रहा है भैया यहाँ पर ” मेरी नजर उस चेहरे पर जम गयी जो न जाने कहाँ से आकर मेरे सामने खड़ा हो गया था . उसे देखा तो बस देखता ही रह गया. फिर मैंने कुछ और देखा ही नहीं. केसरिया कपड़ो में सूरज की धुप में सोने सी दमकती वो हाथो में पूजा की थाली लिए वो मेरे सामने कड़ी थी . मैंने उस लड़के का हाथ छोड़ दिया.
लड़का- कुछ नहीं छोटी, बस ऐसे ही
उस लड़के ने कहा पर मेरा ध्यान मेरे सामने वाली पर था वो मुझे देख रही थी मैं उसे.
“तू चल कर गाडी में बैठ छोटी मैं आता हूँ ” उसने कहा और वो आगे बढ़ गयी .
लड़का- तेरी किस्मत आच्छी थी मैं छोटी के सामने कभी गुस्सा नहीं करता वर्ना आज तू जिन्दा वापिस नहीं जाता.
मुझे हंसी आ गयी
मैं-हम फिर मिलेंगे, बार बार मिलेंगे. मेरा नाम अर्जुन है याद रखना क्योंकि ये नाम तू आज के बाद कभी भूल वैसे भी नहीं पायेगा.
मैने बन्दूक उठा कर उसके हाथ में दी और बोला- मर्दों को इसकी जरुरत नहीं पड़ती . वैसे एक सवाल पूछना था तुझसे मुझे हवेली जाना है रास्ता बताएगा क्या
मैंने इतना कहा और उसके चेहरे का रंग उड़ गया.

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