दिलजले – Update 3 | Adultery Story

दिलजले - Adultery Story by FrankanstienTheKount
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दिलजले #3

लखन खेतो के डोले पर बेसुध पड़ा था . मैंने उसके गाल थपथपाए पर होश कहा था . मैंने नब्ज़ चेक की मंदी थी . आव देखा न ताव मैंने लखन को कंधे पर उठाया और चिकित्सालय की तरफ दौड़ पड़ा .

“रे डाक्टर , देख इसे जरा क्या हुआ है इसे ” मैंने लखन को मरीजो वाली बेंच पर पटकते हुए कहा .

डॉक्टर ने उसे देखा और बताया की दो तीन मेल की दारू पीने से बेसुध हो गया है , पेट में इन्फेक्शन हो गया है . इलाज कर देंगे . मैंने राहत की साँस ली पर दो पल की राहत थी . मैंने उसी लड़की को अपनी तरफ आते देखा अपनी किसी सहेली संग, हमारी नजरे एक पल को मिली और वो जोर जोर से हंसने लगी , इतना जोर से की कोई उसे देखता तो पागल ही समझता . हँसते हुए वो मेरे पास आई और बोली- टंकी पे तो बहुत बढ़ के बाते कर रहा था और यहाँ देखो , बस यही औकात है तेरी .

उसने इशारा किया तो मैंने खुद को देखा लखन के चक्कर में मैं कच्छे में ही दौड़ा आया था चिकित्सालय में .

“ले रख ले तू भी के याद करेगा किसी दिलदार से पाला पड़ा था ,और हाँ कपडे अच्छे खरीदना ”उसने अपने पर्स से नोटों की गड्डी निकाली और मेरे सीने पर फेंक दी.

कहने को तो ये अपमान था पर पी लिया .

“ये आपने क्या किया आप जानती भी है इनको ” डॉक्टर ने बीच में टोका उसे

“मैं जान पहचान करके गरीबो का भला नहीं करती ” उसने डॉक्टर की बात काट दी. मैंने डॉक्टर को इशारा किया चुप रहने का और पांवो में पड़ी नोटों की गड्डी उठाई .

मैं- तेरी मीठी बोली पर ही हार बैठे है लाडली , नोटों की तो औकात ही क्या

मैंने गड्डी उसके सर से वारी और उसके हाथ में रख दी .

“फेर मिलेंगे लाडली ” मैंने उसकी चुन्नी खींची और उसे तौलिये की तरह कमर से लपेट कर चल दिया. कुछ तो बात थी इस छोरी में , मैंने सोचा की मालूम करेंगे किसके घर का उजाला थी ये . खेत पर पहुंचा तो बापू पहले से ही मोजूद था वहां पर .

मैं- बापू यहाँ

बापू- तू घर ना आया तो मैं ही चला आया . दिन में कहीं भी रहा कर सांझ होते ही घर आ जाया कर .

मैं- चिकित्सालय में देरी हो गयी , चुनाव की दारू लोगो का नाश कर रही है , लखन को दाखिल करवा के आया हूँ .

बापू ने कुछ नहीं कहा

मैं- बापू ये लोग तेरे ही है , इतने सालो से तुझे ही जिताते आये है . इनकी मदद करनी है तो और भी तरीके है दारू ही क्यों

बापू- अभी ना हुआ है तू मुझसे जवाब मांगने वाला . सुना आज अजित सिंह ने रास्ता रोका तेरा .

मैं- रास्ता तो सबका होवे है बापू .

बापू- फ़िक्र है तेरी . तू तो जाने है रंजिश है उनसे, विस्वास ना करिए के बेरा कित वार कर दे.

मैं- चिंता न कर बापू

बापू- कुछ काम से बहार जा रहा हूँ दो तीन दिन में लौट आऊंगा. चुनाव की जिमीदारी तुझे देकर जा रहा हूँ .

मैं- ठीक है .

बापू के जाने के बाद मैंने खाना खाया और चारपाई बिछा कर सोने की कोशिश करने लगा.

“arjunnnnnnnnnnnn ” झटके से मेरी आँख खुल गयी . बदन पसीने से भीगा पड़ा था . तकिया एक बार फिर लार से सना था . उठ कर मैंने मुह धोया और साँसों को संभालने की कोशिश करने लगा. कानो में अभी तक वो चीख गूँज रही थी . अब जी लगना मुश्किल था , मैं घर आया. इतना बड़ा घर , इसका सूनापन इसका सन्नाटा कहने को तो आदत सी थी पर ये रात भी मुश्किल से कटेगी जानता था मैं. संदूक खोली , पुरानी तस्वीरे मेरे कांपते हाथो में थी . न जाने कब आँखों से बूंदे टप टप कागज को भिगोने लगी. दिल में बहुत कुछ था ,जो कहने से रह गया . जो कहना था पर कोई सुनने वाला नहीं था .

सुबह मैं लखन को देखने जा रहा था की मैं देखा अजीत सिंह एक आदमी को मार रहा था

मैं- हाथो को रोक ले अजीत . ये भी इन्सान है दर्द उसको भी होता है .

अजित- ये तेरा मामला नहीं है अर्जुन मत पड़ बीच में . इसने कर्जा लिया है जब इसकी जरुरत थी मैंने इसकी मदद की अब ये चूका नहीं रहा है .

मैं- कब लिया था तूने कर्जा

मैंने उस आदमी से पूछा

आदमी- मैंने नहीं मेरे दादा ने लिया था , मेरे बाप का बुढ़ापा आ गया , आधी उम्र बीत गयी पर कर्जा चुकता ही नहीं हो पा रहा मूल से न जाने कितना ब्याज चूका चुके है पर ठाकुर साहब कहते है की अभी बकाया है .

मैं- मामूली रकम के लिए अगर तीन पीढ़िया बर्बाद हो जाये तो शर्म से डूब मरने की बात है अजित

अजित- मैं वो सब नहीं जानता , तू इसकी तरफदारी मत कर , ये मेरा और इसके बीच का मामला है

मैं- इस गाँव का हर मामला मेरा है

अजित- तो ठीक है फिर अर्जुन इस से कह की इसकी नहर वाली जमीं मेरे नाम कर दे अंगूठा लगा दे कागजो पर

आदमी- ये अन्याय मत करो ठाकुर वो जमीन ही रोजी-रोटी का सहारा है वो गयी तो परिवार भूखा मर जाएगा

“तो फिर आज के आज ही कर्जा चूका दे ” अजित ने ठोकर मारी उस आदमी को .

मैं- अजित अपने हाथ पांवो को लगाम दे, ये मत भूल की ये गाँव जागीर नहीं है तेरी

अजित- जागीर तो तेरी भी नहीं है. अपने गुरुर को काबू में रख . इस बार हवा हमारी तरफ है एक बार सरपंची हाथ आने दे फिर देख लेंगे

मैं- हवाओ के साथ वो बहते है जिनकी रीढ़ नहीं होती अर्जुन हवाओ के रुख को मोड़ देता है . बेशक मैं दिल से चाहता था की इस बार सरपंची तेरा बाप जीते पर अब जब तूने दिल पर ही ले लिया है तोतेरी कसम दिल तोड़ने में मजा बहुत आएगा. और जितनी भी तेरी रकम बनती है घर आ जाना पूरा हिसाब कर दूंगा.

अजित- तूने सोचा भी कैसे की मैं तेरे घर आऊंगा, पैर की जुती गन्दी करनी है क्या मुझे .

मैं-कोई बात नहीं मैं पंहुचा दूंगा तू बड़ा रह ले.

मैंने अजित के कंधे पर हाथ रखा और आगे बढ़ा ही था की अजित का व्यंग्य मेरे कानो में पड़ा , “”मनहूस कही का “ मेरे पैर रुक गए .

मैं- क्या बोला तू फिर से बोल जरा

अजित- तूने सुन लिया न अब निकल यहाँ से सुबह सुबह तुझे देख लिया ना जाने दिन कैसा बीतेगा मेरा .

मैंने अजित का कालर पकड़ लिया . आस पास खड़े तमाम लोग सहम गए . एक पल में उसकी गर्दन मेरे हाथ में थी . पर मैंने अपनी पकड़ ढीली कर दी .

मैं- दुबारा इसे परेशान मत करना , रकम पहुंचा दूंगा मैं .

मैं वहां से आगे बढ़ा ही था की मेरी नजर भीड़ में खड़ी उसी लड़की पर पड़ी जो बस मुझे ही देखे जा रही थी . ………………….

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