दिलजले – Update 10
मैंने मुड कर देखा हाथ में लालटेन और सर पर लकडिया लिए चंदा कड़ी थी वो ही चंदा जिसे आज दोपहर में मैंने जंगल में चुदते हुए देखा था . उसकी नजरे मुझ पर थी और मेरी नजरे उसकी छातियो पर .
“क्या हुआ बाबु कोई परेशानी है क्या ” उसने पूछा
मैं- गाड़ी पंक्चर हो गयी है ऊपर से अँधेरा घिर आया है
चंदा- परेशानी की बात तो है पर इतनी भी नहीं , थोड़ी दूर पर ही एक कबाड़ी है जो ठाकुरों की गाड़ी ठीक करता है अगर वो गया नहीं होगा तो तुम्हारी मदद कर देगा . चलो मैं तुमको लेकर चलती हु
उसने अपनी लकडिया गाड़ी के पास ही रखी और हम दोनों कबाड़ी की दूकान पर जा पहुंचे पर बदकिस्मती से वो ताला लगा कर जा चूका था
मैं- किस्मत ही ख़राब है
चंदा- अब तो सुबह ही ठीक हो पायेगी गाड़ी तुम्हारी
हम दोनों वापिस से गाड़ी तक आये.
मैं- मदद के लिए शुक्रिया ,
चंदा- मदद हुई तो नहीं पर मदद कर सकती हूँ रात घिर आई है तुम चाहो तो मेरे घर रुक जाओ , सुबह गाडी ठीक करवा कर चले जाना
मैं-नहीं मेरी वजह से तुमको तकलीफ होगी , मैं यही गाड़ी में ही सो जाऊंगा
चंदा- भला मुझे क्या तकलीफ होगी मैं तो अकेली ही रहती हूँ
चंदा मुझे दिल्स्च्प सी लगी मैंने हां कर दी और उसके पीछे पीछे उसके घर आ गया. घर तो क्या था थोड़ी बड़ी सी झोपडी ही कहना ठीक था उसे, खेतो के किनारे पर रहती थी वो. उसने चारपाई बिछाई और मुझे बैठने को कहा. आँगन में ही एक टीन लगा कर उसने रसोई बनाई हुई थी अन्दर एक कमरा था बस यही था उसके पास.
चंदा-पहले कभी देखा नहीं तुमको बाबु इस गाँव में
उसने पानी का गिलास दिया मुझे
मैं- पुराणी चीजो का व्यापार है मेरा, उसी सिलसिले में इधर-उधर आना जाना होता है , इस गाँव में एक पुराणी हवेली के बारे में किसी ने बताया था तो सोचा देखता चलू पर गाँव में कोई तैयार ही नहीं था उसके बारे में बात करने को . वैसे तुम बता सकती हो क्या मुझे कुछ उसके बारे में
चंदा- नहीं मैं नहीं जानती
मैं- देखो तुम मेरी मदद कर सकती हो बदले में मैं तुम्हारी मदद करूँगा
चंदा- मुझे मदद की भला क्या जरुरत है , एक जान हूँ मैं कोई आगे न पीछे रोटी-पानी का जुगाड़ हो ही जाता है मुझ को और क्या चाहिए वैसे भी हवेली का जिक्र कोई नहीं करता
मैं- तुम कर सकती हो जिक्र
मैंने जेब से कुछ नोट निकाल कर चंदा के हाथ में रखे
चंदा- कौन हो तुम
मैं- नही जानता अभी तो नहीं जानता पर हवेली को जानना चाहता हूँ .
चंदा- इस दुनिया में अभी भी कुछ बचा है जो बिकाऊ नहीं है , पैसे से हर काम नहीं होता मुझसे जानना चाहते हो तो फिर खुद को क्यों छिपाया है , इतना तो मैं जान गयी हूँ की तुमने अपना झूठा परिचय दिया है कोई पुलिसवाले हो क्या
मैं- क्यों पुलिस वाले भी आते रहते है क्या हवेली के बारे में पूछने तुमसे.
चंदा-नहीं पुलिस की क्या औकात जो सर उठा कर देख सके बड़े ठाकुर की मिलकियत की तरफ
मैं- तो बताती क्यों नहीं मुझे हवेली के बारे में
चंदा- अब कुछ है नहीं बताने को
मैं- अब नहीं है तब तो होगा, जब वो ईमारत आबाद रही होगी. तुम हवेली की पुराणी नौकर हो तुमसे ज्यादा कौन जानेगा उसको.
“तुम्हे किसने बताया की मैं हवेली में काम करती थी ”चंदा ने अधीरता से पूछा .
मैंने उसे जवाब नहीं दिया . उसने दो पल मुझे देखा और बोली- उस मादरचोद भूषण ने कहा न तुमसे .
मैं- नहीं , दोपहर में जब तुम किसी आदमी के साथ सलवार उतारे घुटनों पर झुकी हुई थी तब मैंने तुम्हारी बाते सुन ली थी .
चंदा के हाथ से गिलास छुट कर गिर गया. अविश्वास से उसने मुझे देखा और बोली- ये बात किसी से न कहना बाबू. एक विधवा हूँ मैं गाँव में किसी को भनक भी लगी तो गजब हो जायेगा.
मैं- मुझे क्यों कहना है किसी से .तुम अपनी जिन्दगी चाहे जैसे जियो ये तुम्हारी मर्जी है . इस गाँव में किसी ने भी मुझे नहीं बताया हवेली के बारे में , मैं तुमसे भी गुजारिश ही कर सकता हूँ चंदा .
चंदा ने गहरी साँस ली और बोली- वो हवेली जिसे तुमने देखा है वो हमेशा ऐसी नहीं थी , जिन्दादिली की मिसाल थी वो . ठाकुर शौर्य सिंह ने बड़े अरमानो से बनवाया था उसे, तीन मंजिल की वो काले पत्थरों से बनी इमारत जिसकी ख़ूबसूरती के किस्से हवाए भी बताती थी . हर रात वहां पर महफ़िल लगती दूर दूर से कलाकार आते . दिन बहुत सुख से बीत रहे थे पर फिर एक रात ऐसा कुछ हुआ की हवेली के दिए बुझ गए. ठाकुर साहब के तीनो बेटे उस जश्न की रात मर गए.
मैं- कैसा जश्न था वो .
चंदा- ठाकुर के बड़े बेटे पुरुषोत्तम का जन्मदिन था .सारे गाँव को भोज दिया गया था . रात आधी बीत जाने तक नाच-गाना हो रहा था लोग मजे में ,नशे में झूम रहे थे पर सुबह अपने साथ हाहाकार लेकर आई थी . सुबह अपने अपने कमरों में ठाकुर के तीनो बेटे मरे हुए मिले.
मैं- किसने किया
चंदा- अठारह साल बीत गए , कोई नहीं जान पाया. हवेली के दिए बुझ गए, ठाकुर साहब ने कातिलो को तलाशने के लिए दिन रात एक कर दिया जिस पर भी शक हुआ अगले दिन वो गायब हो गया. बहुत बुरा दौर था वो नालियों में पानी कम और खून ज्यादा बहता था . पर फिर दो साल बाद ठाकुर साहब खुद हादसे का शिकार हो गए. आज तक कोमा में पडे है .
मैं- और बाकि बचे लोग.
चंदा- ठाकुर साहब की जायदाद पर उनके भतीजे ने कब्ज़ा कर लिया . उसका बेटा जय सिंह और बेटी चांदनी गाँव में ही नए मकान बना कर रहते है .
मैं- बस
चंदा- बस
मैं- ठाकुर परिवार की औरते कहाँ गयी तुमने उनका जिक्र क्यों नहीं किया
चंदा- बड़ी ठकुराइन सरिता देवी बेटो के गम में ऐसी खाट पकड़ी की फिर कभी उठ नहीं पायी . पुरुषोत्तम की पत्नी रुपाली ठकुराइन उनकी मौत के बाद विदेश में बस गयी , यहाँ तक की ठाकुर साहब के कोमा में जाने की खबर सुनने के बाद भी वो नहीं लौटी. बस एक बात जिसे सबने परेशां किया हुआ है की कामिनी कहाँ गयी. जिस रात ठाकुर साहब के साथ हादसा हुआ उसी रात से कामिनी गायब है कहाँ गयी किसी ने नहीं देखा. बस यही है दास्ताँ हवेली और उसमे रहने वाले लोगो की .
चंदा की बताई कहानी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. बापू ने मरते वक्त कहा था की हवेली. वो इस हवेली से कैसे जुड़ा था . मुझे वसीयत में वो चाबी क्यों दी गयी थी और रुपाली क्यों छोड़ गयी इतनी बड़ी जायदाद बाकि की रात तमाम सवालो को सोचते हुए कट गयी.

