तेरे प्यार मे… – Update 86 | FrankanstienTheKount

तेरे प्यार मे …. – Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#86

मैं- मुझे भी उस दवा की जरुरत पड़ेगी भैया,

मैंने फिर से कहा . भैया की नजरे बस देखती रही मुझ को पर वो कुछ बोले नहीं , एक शब्द. मेरे कान बेकरार थे उनके मुह से कुछ भी सुनने को . पांच, दस, बीस, तीस मिनट बीते भैया कुछ न बोले. शून्य में ताकते रहे वो .

“भैया, कुछ तो बोलिए ” मैं भैया को ख्यालो की दुनिया से धरातल पर लाया.

भैया- रूपांतरण हुआ

मैं- नहीं काबू है अभी तो मेरा खुद पर , पर नहीं जानता कब तक रख पाऊंगा.

भैया- तेरा भाई अभी जिन्दा है , भरोसा रख कुछ नहीं होगा तुझे, मैं होने ही नहीं दूंगा कुछ तुझे. ये बात किसी और को मत बताना. चाहे कुछ भी हो जाये मत बताना.

भैया ने मुझे दिलासा तो दिया था पर उनके चेहरे का तेज खो गया था . भैया वहां से चले गए . मैं खेतो में घुमने चल पड़ा कुछ दूर जाने पर मैंने चंपा को देखा अकेले पगडण्डी पर बैठे हुए.

मैं- यहाँ क्यों बैठी है

चंपा- बस ऐसे ही , तुम बताओ आजकल मिलते ही नहीं न जाने कहाँ गायब रहते हो .

मैं- कुछ जरुरी काम पुरे कर रहा हूँ. तेरे ब्याह के बाद मैं भी शादी करके जीवन शुरू करना चाहता हूँ .

चंपा- तूने बताया नहीं कौन है वो

मैं-सबसे पहले तुझे ही बताया था

चंपा ने इधर उधर देखा और बोली- क्या तू सच में डाकन से ही ब्याह करेगा.

मैं- सच में ही

चंपा- पागल हुआ है तू.

मैं- पागल ही सही , दीवानों को ये जमाना पागल ही समझता है खैर तू बता कैसी कट रही है तेरी.

चंपा- बस जी रही हूँ, जबसे तू रूठा है लगता है बदन का एक हिस्सा टूट गया है .

मैं- मैं कहाँ रूठा तुझसे. मुझे कोई गिला नहीं तुझे , ये तेरी जिन्दगी है इसे तुझे जीना है . तू अपनी मर्जी से जी , जीना भी चाहिए .

चंपा- गलतिया तो इंसानों से ही होती है न

मैं- कोई गलती नहीं मानता मैं इसे. दो पक्षों की रजामंदी है तो कोई गलती नहीं . तू भी अपने दिल से इस मलाल को निकाल दे. जब से तेरी हंसी रूठी है घर की रौनक ही गायब हो गयी . और फिर कहे भी तो किस हक़ से हमाम में तू भी नंगी मैं भी नंगा . रिश्तो की डोर तुझसे भी टूटी मुझसे भी टूटी. तुझे गलत कहा तो मैं सही कैसे हुआ फिर. मेरे मन की ब्यथा मैं तुझे नहीं बता सकता तू अपने मन की बात मुझे नहीं बता सकती . बस इतना जरुर याद रखना कबीर चंपा के साथ पहले भी था और हमेशा रहेगा.

इस से पहले की चंपा की आँखों से आंसू गिर पड़ते मैंने उसके चेहरे को हाथो में लिया और उसके गुलाबी लबो को चूम लिया.

“”दोस्ती में शर्ते नहीं होती, दोस्ती में बंधन नहीं होता. दोस्ती में मजबुरिया नहीं होती दोस्ती बस दोस्ती होती है . ये कभी मत भूलना कबीर की दोस्त है तू. ” मैंने चंपा के सर पर हाथ फेरा .

रिश्तो की इस भूलभुलैया में उलझे हुए मैं इतना तो समझ गया था की अभिमानु भैया के लिए कितनी मुश्किल रही होगी इस परिवार को एक सूत्र में थामे रखना. कुछ देर खेतो पर रहने के बाद मैं रमा के पुराने घर पर पहुँच गया . मजदूरो ने तक़रीबन काम ख़तम कर दिया. घर तैयार था बस रमा को वापिस लाना था यहाँ.

मलिकपुर जाने से पहले मैं कपडे बदलने के लिए घर गया . अपने चौबारे में था ही की भाभी आ गयी .

मैं- भाभी, थोड़ी मदद चाहिए

भाभी- क्या चाहिए बताओ

मैं- कुवे पर एक कमरा बनाना है , भैया हाँ नहीं कह रहे आप कहेंगी तो आपका कहा नहीं टालेंगे वो.

भाभी- उन्होंने बताया था मुझे इस बारे में

मैं- आप तो जानती हो मना लो न भैया को

भाभी- वो कभी नहीं मानेंगे .

मैं- भैया नहीं मानेगे तो तुम मान जाओ भाभी

भाभी- जब तुमने फैसला कर ही लिया है तो मेरा मानना ना मानना क्या रह गया.

मैं- उस को नहीं छोड़ सकता बड़ी मुश्किल से उसने हाँ की है उसका हाथ छोड़ा तो जमाना रुसवा करेगा मुझे और आगे कोई मोहब्बत नहीं करेगा

भाभी- मोहब्बत , हम्म्म, मोहब्बत कैसी है तुम्हारी मोहब्बत महज कुछ मुलाकातों को मोहब्बत मान बैठे हो तुम . कितने समय से जानते हो तुम उसको. जानते क्या हो तुम उसके बारे में. मानती हूँ की मोहबत में सवाल-जवाब नहीं होते, उंच-नीच नहीं होती. कुछ भी नहीं होता . बस हो जाता है प्रेम. पर प्यारे देवर जी, जिसे हम चाहते है उसके बारे में हमें थोडा बहुत तो मालूम होना चाहिए न . मैं जानती हूँ की तुम उसका साथ नहीं छोड़ोगे पर मेरा एक कहा जरुर मानना,

मैं- जी भाभी

भाभी- जैसा की तुमने कहा की चंपा के ब्याह के अगले दिन ही तुम उससे ब्याह रचाने का सोच रहे हो . तो डाकन से जाकर कहना की जब तुम उसे लेने आओगे तो वो दिन के उजाले में लेने आओगे. होली के दिन जब फाग से ये धरती अम्बर रंग होगा तब तुम उसे लेने आओगे . अंधेरो की रानी उजालो को कैसे संभालती है देखना है मुझे.

मैं- परीक्षा लेना चाहती हो हमारी मोहब्बत की

भाभी- वो आशिकी ही क्या जिसमे इम्तिहान न हो.

मैं- ये भी सही

चोबारे से निचे आया तो आँगन में ही चाची मिल गयी.

चाची- कहाँ भागमभाग रहता है तू आजकल

मैं- कल करना चाहता था पर भाभी सो गयी तुम्हारे पास

चाची- उसके अलावा भी मेरा तुमसे कोई रिश्ता है न

मैं- बिलकुल

चाची- बहुरानी ने बताया की तू ब्याह करने वाला है कम स कम मुझे तो बता ही देता .

मैं- तुम्हे मिलवा ही दूंगा उस से चाची बस कुछ दिनों के बात है .

ये कह कर मैं चलने लगा तो चाची ने मुझे टोका.

चाची- कबीर रुक एक मिनट.

मैं- क्या हुआ

चाची- जेठ जी को तो बता दे कम से कम. बेहतर होगा की लड़की के घर वो ही जाये

मैं- समय आएगा तो बता दूंगा चाची.

हल्का अँधेरा होते होते मैं मलिकपुर पहुँच गया रमा के ठेके पर .

“तुम यहाँ , ” उसने पूछा मुझसे

मैं- तुम्हे लेने आया हूँ.

रमा- कहाँ चलना है

मैं- घर, तुम्हारे घर.

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