#85
चौपाल के पेड़ के निचे बैठे बैठे मैंने सोचा की सूरजभान को पकडूँगा दिन उगते ही . उस से ही शुरू करूँगा अब जो भी होगा किसी का लिहाज नहीं करूँगा. मैंने रमा से वादा किया था की उसकी बेटी के कातिल से मैं बदला लूँगा पर वो कातिल मेरा चाचा था . खून ही खून को बहाने वाला था . सुबह होते ही मैं मलिकपुर पहुँच गया . सूरजभान मुझे रमा की दुकान के पास ही मिल गया . मैं उसके पास गया .मुझे देख कर वो चौंक गया.
सूरजभान- तू यहाँ क्या कर रहा है
मैं- तुझसे ही मिलने आया हूँ
सूरज-मुझसे, भला मुझसे क्या लेना देना तेरा
मैं- कुछ बात करनी थी तुझसे , सिर्फ बात करनी है फिर मैं लौट जाऊंगा.
सूरज ने कुछ पल सोचा फिर अपने कंधे उचकाए और बोला- ठीक है
हम दोनों पास में बड़ी एक बेंच पर बैठ गए .
मैं- देख सूरजभान मैं मानता हूँ की पिछला कुछ वक्त हम दोनों के लिए ठीक नहीं रहा , तेरे मेरे बिच जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था . मेरे कुछ सवाल है जिनके जवाब मैं तुझसे चाहता हूँ
सूरज- मेरी कोई मंशा नहीं थी तुझसे झगडा करने की . खैर जो हुआ सो हुआ बता क्या पूछना चाहता है तू
मैं- क्या वजह है की अभिमानु भैया मुझसे ज्यादा तुझे चाहते है
सूरज- ऐसा नहीं है , वो बस मेरी मदद कर रहे है मेरे व्यापार को शुरू करने में .
मैं- पर किसलिए
सूरज- कभी बताया नहीं पर शायद नंदिनी दीदी ने कहा हो उनसे .
मैं- भैया ने काफी सालो से मलिकपुर की तरफ देखा भी नहीं था फिर ऐसा क्या हुआ की वो लौट आये यहाँ
सूरज- कबीर तेरी मेरी उम्र लगभग एक सी ही है , मुझे क्या मालूम की पहले क्या हुआ था और क्या नहीं .
मैं- तू समझ नहीं रहा है मेरी बात को सूरजभान, भैया कुछ तो ऐसी बात करते होंगे तुझसे जो तू समझ नही पाता होगा. कोई तो बात उनका व्यवहार तू इतने साथ रहता है उनके कुछ तो खटकता होगा तुझे.
सूरज- भैया बहुत अच्छे है , तू भाग वाला है कबीर जो तेरे सर पर बड़े भाई का हाथ है . कभी कभी मुझे जलन होती है तुझसे की काश तेरी जगह मैं होता.
मैं- समझ सकता हूँ नंदिनी भाभी और भैया की प्रेम कहानी मलिकपुर में ही शुरू हुई थी उसके बारे में बता दे कुछ जानता है तो .
सूरज- मैं छोटा था तब पर फिर भी इतना जानता हूँ की पिताजी और तेरे चाचा दोनों इस ब्याह के खिलाफ थे , पिताजी और ठाकुर जरनैल की तब ताजा ताजा लड़ाई हुई थी किसी बात को लेकर . उसी समय अभिमानु भैया और नंदिनी दीदी के प्रेम वाली बात सामने आ गयी थी .
मैं- कोई है जो आसपास के गाँव वालो को मार रहा है ,
सूरज- तलाश में हूँ उसकी
मैंने सूरजभान के कंधे पर हाथ रखा और बोला- हमारे दरमियाँ जो भी हुआ नहीं होना चाहिए था . कुछ बाते समझनी चाहिए थी मुझे .
सूरजभान से मिलकर मुझे इतना समझ आया था की रुडा और चाचा के बीच जो बात हुई थी ठोस ही रही होगी वर्ना चाचा ये जानते हुए भी रुडा किसी ज़माने में राय साहब का दोस्त रहा था रुडा का गिरेबान नहीं पकड़ता . शायद यही बात चाचा और पिताजी के झगडे का कारन रही होगी. दोपहर में खेतो पर भैया मिले .
मैं- आपसे बात करनी थी भैया
भैया- हाँ, पर पहले तू मेरी मालिश कर दे.
मैं- जरुर
भैया ने अपनी शर्ट उतारी और औंधे लेट गए . मैंने तेल लिया भैया की पीठ पर मालिश करने लगा. मैंने देखा की पीठ पर काफी खरोंचे थी .
मैं- ये चोट कैसी पीठ पर
भैया- कीकर काटी थी कांटे लग गए कुछ
मुझे यकीं नहीं हुआ इस बात का क्योंकि भैया ने खेती या पेड़ो का काम मेरे देखते देखते कभी ही किया हो
भैया- कुछ कह रहा था तू .
मैं- भैया गाँव की सब औरते अपने अपने परिवार के साथ राजी ख़ुशी रहती है मुझे चाची की फ़िक्र होती है , वो कहती नहीं पर उनका दुःख समझता हूँ मैं
भैया- जानता हु तू क्या कहना चाहता है छोटे, पर हम कर भी तो नहीं सकते कुछ चाचा न जाने कहाँ गायब हो गया मैं थक गया , हार गया उसे ढूंढते हुए. गाँव शहर जहाँ भी जिसने भी बताया वाही गया उसे तलाशने पर वो नहीं मिला कभी भी .
मैं- अगर पिताजी चाचा से झगडा नहीं करते तो क्या पता चाचा हमारे साथ होते.
भैया- पिताजी चाचा को बहुत चाहते थे
मैं- आप मुझे कितना चाहते है भैया
भैया- तुझे क्या लगता है कितना चाहता हूँ मैं तुझे
मैं- आप मुझे जरा भी नहीं चाहते भैया
भैया ने पीठ मोड़ी और मेरी तरफ होकर बोले- फिरसे बोल जरा
मैं- आप मुझे नहीं चाहते , अगर चाहते तो उस तस्वीर को कमरे से नहीं हटाते मुझे बता देते की वो तस्वीर किसकी है .
भैया- बस इतनी सी बात के लिए अपने भाई के प्यार पर सवाल उठा रहा है तू छोटे
मैं- सवाल तो बहुत है पर आप जवाब नहीं देंगे
भैया- और क्या है वो सवाल
मैं- आप हमेशा से जानते थे न की रमा की बेटी को चाचा ने मारा था .
भैया खामोश से हो गए.
मैं- आप जानते थे न भैया. आप जानते थे फिर भी आपने छिपाया इस बात को
भैया- छिपाता नहीं तो क्या करता मैं छोटे
मैं- आप समझा सकते थे चाचा को रोक सकते थे
भैया- काश मैं कर पाता उसे न जाने किस चीज का जूनून था , रुडा से लड़ाई करके आया था वो . फिर घर आते ही पिताजी से लड़ पड़ा . तेरी भाभी और मेरा ब्याह नहीं होने देना चाहता था वो .
मैं- क्या दिक्कत थी चाचा को इस रिश्ते से
भैया- आजतक नहीं मालूम हुआ किसी को
मैं- जंगल में क्या तलाशते है आप
भैया- मुझे भला क्या जरुरत है कुछ तलाशने की सब कुछ तो है मेरे पास
मैं- पक्का कुछ नहीं तलाशते आप
भैया- साफ साफ बोल न छोटे
मैं- कुछ नहीं तलाशते तो तलाशनी शुरू कर दीजिये भैया , जिस रक्त तृष्णा की दवा आप ढूंढते है न आपके भाई को भी उसकी जरुरत पड़ने वाली है बहुत जल्द.
मैंने अपना राज भैया के सामने खोल दिया था मैं जानता था की मेरा भाई हद से ज्यादा मुझे चाहता है उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाना था मुझे अब ………………………

