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#65

सुबह जब मैं जागा तो निशा जा चुकी थी . बाहर आकर देखा की भाभी, चंपा और मंगू तीनो ही खेतो पर थे. मैंने एक नजर उन पर डाली और जंगल में चला गया. वापिस आते ही चंपा ने मुझे चाय का गिलास पकडाया . मेरी नजर भाभी पर पड़ी जो हमें ही देख रही थी . मैं उनके पास गया .

मैं- इतनी सुबह आप खेतो पर

भाभी- कभी कभी मुझे भी घर से बाहर निकलना चाहिए न .

मैं- सही किया जो आप आ गयी मैं आ ही रहा था आपसे मिलने

भाभी- मुझसे क्या काम

मैं- वसीयत के चौथे टुकड़े के बारे में बात करनी थी

भाभी – मैं नहीं जानती उसके बारे में

मैं- पर मुझे जानना है . चाची, भैया और मैं हमसे अजीज और कौन है पिताजी के लिए . क्या चंपा का नाम है उस चौथे हिस्से में

भाभी- वो इतनी भी महत्वपूर्ण नहीं है .

मैं- तो बता भी दो मुझे

भाभी- मुझे जरा भी दिलचस्पी नहीं है जायदाद में कबीर .

मैं- इतना भी प्रेम नहीं बरस रहा इस परिवार में की ना आप हिस्सा चाहती है न भैया और न चाची. आप सब को इस जमीन में दिलचस्पी नहीं है तो क्या चाहते है आप लोग क्या ख्वाहिश है आप सब की

भाभी- परकाश नाम है उसके पुरखे मुनिमाई करते थे राय साहब के यहाँ उसने वकालत का पेशा चुना . राय साहब और तुम्हारे भैया के सारे क़ानूनी मामले वही संभालता है. वो ही बता सकता है क्या था उस हिस्से में .

मैं- क्या भैया को मालूम है उस चौथे हिस्से के बारे में

भाभी- क्या तुम जानते हो तुम्हारे भैया को

भाभी- परकाश से मिलो . खैर , क्या अब भी उस डाकन से मिलते हो तुम

मैं- मिलना क्या है पूरी रात साथ ही सो रहे थे हम

मैंने भाभी से कहा और वापिस मुड गया. मैंने देखा नहीं भाभी के चेहरे पर क्या भाव थे .मैंने मंगू को देखा जो खाली खेतो को देख रहा था .

मैं- कहाँ गया था तू भैया के साथ

मंगू- टेक्टर लेने , भैया का कहना है की जमाना बदल रहा है हल की जगह खेती में टेक्टर का उपयोग करना चाहिए . पैसे भर आये है जल्दी ही आ जायेगा.

मैं- भैया वो जो नई जमीन के बारे में कह रहे थे वो जमीन देखने कब जायेंगे

मंगू- मुझे नहीं पता

मैं- मंगू बुरा मत मानियो पर मुझे लगता है की कविता का तेरे आलावा किसी और से भी चक्कर चल रहा था .

मंगू ने अजीब नजरो से देखा मुझे

मंगू- वो चालू औरत नहीं थी

मैं- क्या कभी उसने तुझे कुछ बताया

मंगू- हम ज्यादा बाते नहीं करते थे बस मिलते चुदाई करते और अलग हो जाते.

मुझे लगा की चंपा सच कहती थी की कविता बस इस्तेमाल कर रही थी मंगू का . कविता के बारे में कुछ तलाशना था तो उसके घर से ही शुरुआत करनी थी . मैंने पता लगाया की वैध किसी दुसरे में गाँव में गया हुआ है मैं चुपके से उसके घर में घुस गया. एक तरफ दुनिया भर की शीशिया थी जिनमे दवाइया और उन्हें बनाने का सामान था . मैंने कविता के कमरे में तलाशी शुरू की . दीवारों में बने खाने औरत के कपड़ो से भरे थे .

कमरा वैसे तो कुछ खास नहीं था एक पलंग था . पास में एक मेज थी जिस पर औरतो का कुछ सामान लाली-पोडर पड़ा था. मेज की दराज खोली तो उसमे तरह तरह की कच्छी पड़ी थी . रेशमी, जालीदार और भी कई तरह की . मैंने उनको हाथ में लेकर अच्छे से देखा. गाँव में मनिहारिन तो ऐसी नहीं बेच सकती थी मैं दावे से कह सकता था . मुझे कुछ जेवर मिले . गाँव की एक आम औरत जिसकी आर्थिक स्तिथि इतनी अच्छी भी नहीं थी की वो इतने जेवर बनवा ले इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया.

मैंने कमरे को और अच्छे से खंगाला. मुझे एक छोटा बक्सा मिला जिसमे सौ-सौ के नोटों की गद्दिया थी. मेरा तो दिमाग ही घूम गया . एक वैध की बहु के पास इतना पैसा कहाँ से आया. किसने दिया. इतनी रात में जब आदमखोर का आतंक मचा हुआ है कविता जंगल में जाती है , जाहिर है उसे कुछ तो ऐसी प्रचंड लालसा रही होगी या फिर कोई गहरी मज़बूरी सिर्फ इन्ही दो सूरतो में वो जा सकती थी . कुछ तो कुकर्म कर रही थी वो .मंगू के आलावा कौन पेल रहा था उसे. कविता के जेवरो को वापिस रख ही रहा था की मेरी नजर आईने के पास पड़ी डिबिया पर पड़ी.

उत्सुकता वश मैंने उसे खोला . उसमे कांच की चुडिया थी . ऐसा लगा की मैंने इनको पहले देखा हो पर याद नहीं आ रहा था मैंने थोडा जोर दिया और जब याद आया तो ऐसा याद आया की सर्द मौसम में भी मैं अपने माथे पर आये पसीने को नहीं रोक सका. मैंने अपनी जेब से टूटी चूड़ियां निकाली और मिलान किया . मामला शीशे की तरह साफ़ था . ये चुडिया, ये पैसे और ये महंगे जेवर चीख चीख कर कह रहे थे की ये सब राय साहब की ही मेहरबानी थी . राय साहब ही वो दुसरे शक्श थे जो कविता को चोदते थे.

गरीबो का मसीहा, सबके लिए पूजनीय राय साहब का ऐसा चेहरा भी हो सकता था कोई विश्वास नहीं करे अगर मैं किसी से कहूँ तो पर सच शायद ये ही था. पर यहाँ एक सवाल और मेरे सामने आ खड़ा हुआ था की वसीयत का चौथा हिस्सा कविता का नहीं हो सकता क्योंकि कविता तो मर चुकी थी . वो शायद बस दिल बहलाने के लिए ही हो . निशा ने कहा था हवस , अयाशी खून में दौड़ती है . अब मुझे ये सच लग रहा था कितनी आसानी से मैंने चाची को चोद दिया था . कितनी ही मचल रही थी चंपा मुझसे चुदने के लिए.

वैध के घर से आने के बाद मैं चौपाल के चबूतरे पर बैठे सोच रहा था की राय साहब को रंगे हाथ चुदाई करते हुए पकड़ने के लिए मुझे एक ठोस योजना बनानी पड़ेगी जिसके लिए मुझे दो लोग तलाशने थे एक जो राय साहब का बिलकुल खास हो और जो उनके खिलाफ हो. खैर सुबह मुझे प्रकाश से मिलना ही था . कुछ सोच कर मैं रमा के ठेके की तरफ चल दिया. वहां पहुन्चा तो पाया की काफी लोग दारू पी रहे थे पर सूरजभान या उसका कोई साथी नहीं था.

मैंने रमा को देखा उसने मुझे इशारा किया और हम ठेके के पीछे बने कमरे में आ गए.

रमा- कैसे है कुंवर जी

मैंने रमा की भरपूर खिली हुई चुचियो पर नजर डाली और बोला – बढ़िया तुम बताओ

रमा- वो मुनीम का छोरा प्रकाश बहुत चक्कर लगा रहा है मलिकपुर के रुडा से खूब मिल रहा है

मैं- वकील है न जाने कितने लोगो का काम देखता होगा.

रमा-बड़ा धूर्त है वो .

मैं- क्या प्रयोजन हो सकता है उसका

रमा-रुडा की लड़की सहर से पढ़ कर आई है . मुझे लगता है की उसी के चक्कर में जाता होगा .

मैं- जान प्यारी नहीं क्या उसे . परकाश को क्या नहीं मालूम की ठाकुरों की बहन-बेटियों पर बुरी नजर डालने का क्या अंजाम होगा.

रमा- बहन-बेटी तो सबकी समान होवे है कुंवर जी, कोई माने या ना माने वैसे भी हर औरत निचे से एक जैसी ही होती है .

बातो बातो में रमा ने मुझे बताया की पहले वो मेरे गाँव में ही रहती थी फिर उसके पति की मौत हो गयी तो वो मलिकपुर आ गयी यहाँ भी तक़दीर ने उसे दुःख ही दिए.

हम बात कर ही रहे थे की बाहर से कुछ चीखने चिल्लाने की आवाजे आने लगी तो हम ठेके की तरफ गए और वहां जो मैंने देखा ……………….

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