#64
“कहाँ जाना है आपको ” मैंने राय साहब से पूछा
पिताजी ने एक नजर मुझपर डाली और बोले- तुम्हारा जानना जरुरी नहीं है .
मैं- ये फिर कभी जाएगी आप के साथ मुझसे इस से कुछ काम है बाद में आएगी ये
पिताजी- चंपा तूने सुना नहीं हमने क्या कहा
मैं- चंपा ने सुना भी और देख भी रही है पर ये अभी यही रहेगी.
पिताजी ने गहरी नजरो से देखा चंपा को उसने अपने कदम आगे बढ़ाये की मैंने उसकी कलाई पकड़ ली .
“बदतमीजी एक हद तक ही बर्दास्त के काबिल रहती है बरखुरदार ” इस बार पिताजी थोडा तल्ख़ थे.
चंपा – जाने दे कबीर, मैं बाद में मिलूंगी तुझे.
मैं चाहता तो नहीं था पर चंपा की आँखों में एक विनती सी थी .दस्तूर तो ये था की चंपा अपनी चूत किसी को भी दे उसकी मर्जी पर न जाने क्यों मुझे बुरा बहुत लगने लगा था . मैंने रजाई ओढ़ी और सोने की कोशिश करने लगा क्योंकि नींद ही मेर सर के दर्द को मिटा सकती थी .
नींद उचटी तो पाया की अँधेरा घिरा हुआ था . आसमान में कुछ नहीं था काली रात के सिवाय . मटके से पानी पीने आया तो देखा की कुवे की मुंडेर पर निशा बैठी थी .
मैं- तू कब आई
निशा- तूने देखा तभी
मैं- मुझे जगा लेती और बाहर क्यों बैठी है
निशा- अजब सा सकून है तेरे दर पर कदम अपने आप बढ़ने लगे है इस दहलीज की तरफ .
मैं- जहाँ तक तेरी नजर देखे सब कुछ तेरा ही तो है
निशा- बेशक ,पर मुझे क्या मोह क्या चाहत जो कुछ है तू है
मैं- कहती है तू मानती तो नहीं
निशा-मैं मानु न मानु ये रात सब जानती है
मैं- अन्दर आजा
मैंने पानी पिया और हम अन्दर आ गए.
निशा मेरी रजाई में घुस कर बैठ गयी और बोली- क्या बात है कुछ परेशान से लगते हो कुंवर जी
मैं – वही घर की परेशानी . चंपा और राय साहब का अलग ही नाटक चल रहा है .
निशा- बड़े रंगीले है पिताजी तुम्हारे. तुम्हे बुरा लगता है क्योंकि वो बाप है तुम्हारा पर ठाकुरों को विरासत में अय्याशी ही मिलती है . खून में दौड़ता है जिस्मो को पाने का नशा. इनको लगता है की दुनिया में जो भी मिले उसे अपने निचे पटक लो.
मैं- कहती तो तू सही है मेरी जाना पर क्या करू तू ही बता
निशा- जीने दे उनको अपनी जिन्दगी . चंपा को ठीक लगता है तो चलने दे जो चल रहा है .
मैं- बात सिर्फ इतनी सी नहीं है मेरी समस्या गाँव वालो की सुरक्षा की भी है . ये जो सिलसिला शुरू हुआ है इसका अंत न जाने क्या होगा
निशा-जो भी होगा ठीक ही होगा
मैं- तू कर न मेरी मदद .
निशा- क्या चाहिए तुझे बता
मैं- कविता उस रात जंगल में क्या कर रही थी इसका जवाब चाहिए और कल राय साहब जंगल में क्या कर रहे थे ये भी .
निशा-जंगल का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है कबीर. जंगल साक्षात् जीवन है क्या नहीं देता ये तुमको. खाना , पानी इंधन, जडीबुटी . पर लोग इसको भूलने लगे है . कितनी ही लोग इसको ख़राब कर रहे है , मतलबी इंसानी जात . ये लोग भी अपना कोई मकसद साध रहे होंगे.
मैं- क्या पिताजी कल तेरे ठिकाने की तरफ आये थे .
निशा- वहां कोई नहीं आता , भुला दी गयी एक कहानी है वो जिसे मैं और तू जी रहे है . क्या हुआ कभी कोई पशु बेशक आ निकले पर इन्सान नहीं झांकता उधर. दूसरी बात वो एक शापित जगह है और इन्सान एक कमजोर कौम है जिसके दिल में कुछ नहीं सिवाय खौफ के .
मैं- समझ नहीं आ रहा की ऐसा क्या है इस जंगल में जो कविता और राय साहब को खींच लाये . तूने तो देखा था न कविता को
निशा- मुझे अफ़सोस है की मैं उसे बचा नहीं पाई. वैसे क्या तूने चंपा और राय साहब को देखा हमबिस्तर होते हुए
मैं- नहीं भाभी ने बताया मुझे
निशा – कानो का कच्चा है क्या तू . तूने मान लिया
मैं- और वो टूटी चुडिया
निशा- बड़े भोले हो कुंवर जी , तुम्हे रंगे हाथ पकड़ना चाहिए उन दोनों को . भाभी ने अगर उनको देखा तो उसने तुम्हारे भैया को क्यों नहीं बताया उसने क्यों प्रतिकार नहीं किया की घर में ये अनैतिक काम क्यों हो रहा है पर उसने चुप्पी साधी और तुम्हे बताया .मैं पूछती हु क्यों तुम ही क्यों
मेरे पास कोई जवाब नहीं था निशा की बात का
निशा- जो राज घर में दबे होते है उनकी जड़े बहुत गहरी होती है . मैं तुम्हे रास्ता दिखा सकती हूँ चलना तुम्हे खुद पड़ेगा .
मैं-वही कोशिस कर रहा हूँ . एक मेरे घर की समस्या दूजा वो आदमखोर और तीसरा एक चुतिया वो सूरजभान कुंडली मार कर मेरे सुख पर बैठ गए है .एक तू ही तो है जिसको देख कर मैं अपना गम भूल जाता हूँ तू एक बार कह तो सही मैं सब कुछ छोड़ दू तेरे लिए तू कहे तो उसी खंडहर को हम अपना आशियाँ बना लेंगे. तू एक बार थाम तो सही हाथ मेरा
निशा- न मुझमे इतनी शक्ति है कबीर न मेरी नियति में तेरा साथ है ये एक अकाट्य सत्य है
मैं- तू ही बता मैं क्या करू
निशा- तू खोज उस सच को जो तेरी दहलीज में छुपा है . तुझे लगता है तेरे पिता गलत है तो साबित कर उनको गलत . इतिहास को तलाशना बहुत मुश्किल होता है कबीर . गड़े मुर्दे उख्ड़ेंगे तो उनकी बदबू जीना हराम कर देगी तेरा. कड़ीयो को जोड़ना सीख . पहली कड़ी तुझे तलाशनी है तो देख वो कमजोर कड़ी कहाँ है .
मैं- ठीक है चंपा से कल खुल कर पूछताछ करूँगा.
निशा- लोगो को पहचान परख उनको
मैं- समझ गया .
निशा ने मेरे गालो को चूमा और बोली- कल राय साहब किसी आदमी के साथ थे जंगल में . दोनों बड़ी देर तक दोनों कुछ देख रहे थे अनुमान लगा रहे थे
मैं- क्या देख रहे थे
निशा- शायद कुछ ऐसा जो तू जानना चाहता है .

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