#58
मेरे सवालो में दो सवाल और जुड़ गए थे पहला की वसीयत की इतनी जल्दी क्यों दूजा चौथा कागज किसका था. मेरे ख्याल जब टूटे जब चाची ने मुझे खाना खाने के लिए अंदर बुलाया. चाची ने खाना परोसा और हम दोनों खाना खाने बैठ गए.
मैं- पिताजी ने इतनी जल्दी वसीयत क्यों बनवा ली
चाची- ये तो जेठ जी ही जाने पर मैंने कह दिया है मुझे कुछ नहीं चाहिए . मेरी पूंजी तो तू और अभी मानु हो.
मै- तुम्हारी भावनाओ की कद्र है चाची. विचार करो जरा पिताजी ने क्या पूरी ईमानदारी से वसीयत बनवाई है.
चाची- जायदाद के तीन टुकड़े किये एक मुझे और दो तुम दोनों भाइयो के. मुझे आधा हिस्सा इसलिए दिया क्योंकि तेरे चाचा होते तो आधा उनका मिलता.
मैं- उसकी बात नहीं कर रहा हूँ .
चाची-तो फिर क्या कहना चाहता है तू
मैं चाची से कुछ कहता उस से पहले ही भाभी अन्दर आ गयी मेरी बात अधूरी रह गयी.
भाभी- आजकल तो आपने हमें पराया ही कर दिया है चाची जी.
चाची- अपने बच्चो को कोई माँ कभी पराया नहीं कर सकती बैठ अभी परोसती हूँ तुझे भी .
हम तीनो हलकी-फुलकी बाते करते हुए खाना खाने लगे. फिर चाची बर्तन समेट कर बाहर चली गयी रह गए हम देवर-भाभी.
भाभी- तो बात कुछ आगे बढ़ी तुम्हारी.
मैं- कैसी बात भाभी
भाभी- इतने भी भोले नहीं तुम
तब मुझे समझ आया की निशा की बात कर रही है भाभी
मैं- बात पक्की तब समझूंगा जब वो दुल्हन बन कर इस चोखट पर आएगी
भाभी- उफ्फ्फ्फ़ ये दिल्लगी.
मैं- आशिकी भाभी
भाभी- पिताजी ने वसीयत बनवा ली है
मैं- जानता हूँ
भाभी- तुम्हारे तो वारे-न्यारे है सबसे ज्यादा हिस्सा तुम्हारा ही होने वाला है
मैं- मुझे ये परिवार चाहिए और कुछ नहीं . इस धन-दौलत का मोह नहीं मुझे
भाभी- मोह कैसे होगा दिल एक डाकन से जो लगा बैठे हो
मैं- बार बार एक ही बात करने से क्या हासिल होगा आपको
भाभी- मुझे लगता है की इस वसीयत में कमी है जल्दबाजी में बनवाई गयी है ये.
मैं- मेरा भी यही मानना है
भाभी- तो क्या कमी पकड़ी तुमने
मैं- अभी पकड़ी नहीं है पर जल्दी ही पिताजी से आमने सामने बात करूँगा
भाभी- मुझे लगता है की तुम्हे वसीयत को दुबारा पढना चाहिए
मैं- क्या आपको लगता है की पिताजी ने हमसे दूर कुछ ऐसा किया हुआ है जिसका हमें मालूम नहीं . मेरा मतलब कोई दूसरी औरत या परिवार
भाभी- तू जब अगली बार घर से बाहर जाओ तो जो भी तुम्हे पहला सक्श मिले और फिर अंतिम सख्श तक तुम सबसे ये सवाल करना तुम्हे जवाब मालूम हो जायेगा और ये भी की राय साहब का कद कितना बड़ा है .
मैं- पर उसी राय साहब ने अपनी बेटी समान चंपा को गर्भवती कर दिया
भाभी- ये दुनिया उतनी खूबसूरत कहाँ है जितनी हम सोचते है . ये जीवन उतना सरल कहाँ जितना हम सुनते है . मेरी एक बात गाँठ बाँध लो इस जग में केवल दो सच्चे रिश्ते है एक पुरुष और एक औरत का बाकी सब मिथ्या है . झूठ है .
भाभी ने बहुत बड़ी बात कही थी पर वो सोलह आने सच थी .
भाभी- पुरुष हर औरत को बस एक ही नजर से देखता है और उस नजर के बारे में तुम्हे बताने की जरूरत है नहीं. औरत के लिए उसकी सुन्दरता उसका सबसे बड़ा अभिशाप है . चंपा तो मात्र एक उदाहरण है . तुम खुद को देखो कितनी आसानी से चाहे जो भी बहाना रहा हो तुमने चाची संग सम्बन्ध बना लिए. चाची की गलती रही हो या तुम्हारी उमंगें पर रिश्ता सिर्फ औरत और मर्द का. अगर मैं भी तुम्हारे सामने टांगे खोल दू तो यकीन मानो देवर भाभी के रिश्ते की मर्यादा टूटते देर नहीं लगेगी.
मैं- आपकी हिम्मत कैसे हुई ये नीच बात जुबान पर लाते हुए. आप जानती हो मैंने हमेशा माँ का दर्जा दिया है आपको
भाभी- माँ तो चाची भी है न जब तुम उसके साथ सो सकते हो तो मेरे साथ क्यों नहीं, मेरे ख्याल से ये बेचैनी क्यों हुई.
भाभी की बात खरी थी .
मैं- वो परिस्तिथिया अलग थी आप समझ नहीं पाएंगी मैं समझा नहीं पाऊंगा.
भाभी- परिस्तिथिया कितना आसान बहाना है न .मैं मान लेती हु तुम्हारी बात कुछ पलो के लिए अब विचार करो वो क्या अलग परिस्तिथिया रही होंगी जब राय साहब और चंपा के बीच जिस्मो का खेल हो गया.
मैं- आपने ही मुझे बताया उसके बारे में और अब आप ही उनका पक्ष ले रही है
भाभी- मेरे प्यारे देवर जी, मैं तुम्हे समझा रही हूँ की परिस्तिथि कितना कमजोर बहाना है. असली सच है रजामंदी , मन की चाह . चाची या तुम्हारे मन में चाहत तो जरुर रही होगी एक दुसरे को पाने की.
मैं- क्या पिताजी अपनी जायदाद में से चंपा को कुछ हिस्सा दे सकते है
भाभी- वो चाहे तो पूरी जायदाद उसे दे दे
मैं- क्या आपको कभी ऐसा लगा की पिताजी की नजरे आप पर भी गलत है
भाभी- कभी भी नहीं
मैं – तो ऐसा क्या हुआ की एक इतनी साख वाला इन्सान चंपा संग ये कर बैठा.
भाभी- तुम जानो ये
न जाने मुझे क्यों लगने लगा था की भाभी मुझसे कुछ तो छिपा रही है.
खैर, चाची के आने से हमारी बात बंद हो गयी. मैं उठ कर बाहर चला गया. थोड़ी देर गाँव में घूमा . एक बात का सकूं था की फिलहाल गाँव में उस आदमखोर के हमले कम हो गए थे जो राहत थी . घूमते घूमते मैं जोहड़ के पीछे की तरफ चला गया मिटटी के टीले पर चढ़ कर मैं पेड़ो की तरफ गया ही था की मुझे भैया की गाडी खड़ी दिखी.
“भैया यहाँ ” मैंने खुद से सवाल किया . पर गाड़ी में भैया नहीं थे . ऐसे गाड़ी छोड़ कर वो कहाँ जा सकते थे . अजीब बात थी ये. की तभी मुझे दूर से एक और गाडी आती दिखी मैं पेड़ो की ओट में हो गया दौड़ कर और देखने लगा. वो गाड़ी भैया की गाड़ी के पास आकार रुकी मैंने देखा की उसमे भैया और सूरजभान थे. सूरजभान के सर पर पट्टी बंधी थी . पर भैया इस नीच के साथ क्या कर रहे थे और कहाँ से आये थे . सोच कर मेरा सरदर्द करने लगा.
थोड़ी देर कुछ बाते करने के बाद भैया की गाड़ी गाँव की तरफ बढ़ गयी और सूरजभान जिस रस्ते से आया था उसी पर वापिस मुड गया.
“कोई तो बात है जो मुहसे छिपाई जा रही है ” मैंने कहा

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