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“कबीर बचा ले मुझे ” सिस्कारिया भरते हुए चंपा की आवाज मेरे कानो में पड़ी
अनजानी आशंका लिए धडकते दिल को संभाले मैं पलटा तो देखा की चंपा का खूबसूरत चेहरा खून से सना था . उसका कुरता फटा हुआ था . सीने पर गहरी खरोंचे थी .
“क्या हुआ चंपा ” मेरी आवाज लरजने लगी .
चंपा और जोर से मुझसे लिपट गयी और गली के किनारे की तरफ इशारा किया और जो मैंने देखा मेरी समझ से बाहर हो गया . एक शख्स खड़ा था जिसके हाथ पैर अजीब तरीके से हिल रहे थे .
“कौन है तू और तेरी हिम्मत कैसे हुई चंपा पर हमला करने की ” मैंने जोर से कहा
पर उधर से कोई जवाब नहीं आया . मैंने एक नजर चंपा पर डाली जो भय से थर थर कांप रही थी मैंने अपना कम्बल उसे ओढाया क्योंकि कुरता फटने से उसका सीना नंगा हो गया था. मैं उस शख्स की तरफ बढ़ा की चंपा ने मेरा हाथ पकड़ लिया .
“हाथ छोड़ मेरा ” मैंने कहा
चंपा- मत जा कबीर वो खतरनाक है
मैं- सुना नहीं तूने हाथ छोड़ मेरा .
चंपा की ऐसी हालत देख कर मेरा दिमाग हद से ज्यादा ख़राब हो गया था . मेरी नजर एक घर के दरवाजे के पास रखे लट्ठ पर पड़ी मैंने उसे उठाया , कमबख्त मेरा कन्धा भी ना, मैंने दुसरे हाथ से उस लट्ठ को उसकी तरफ फेंका पर वो बन्दा जरा भी नहीं हिला. मैं थोडा और उसकी तरफ बढ़ा की तभी बिजली आ गयी लट्टू की रौशनी में मैंने जो देखा मेरी हैरत का ठिकाना नहीं रहा .वो कोई और नहीं वो कारीगर था जिसकी तलाश में मैं दिन रात एक किये हुए था .
मैं- कारीगर तू ,
पर उसने कोई जवाब दिया , न जाने क्या बडबडाते हुए वो मेरी तरफ लपका और मुझे गिरा के चढ़ गया मुझ पर .
“कबीर ,,,,,, कबीर ” चंपा की चीख एक बार फिर से वातावरण की शान्ति को चीर गयी . मुझ पर हुए हमले से घबरा गयी थी वो .
मैं- होश कर कारीगर . देख समझ मैं क्या कह रहा हूँ
पर उस पर न जाने कौन सा जूनून चढ़ा था . उसने मेरे गले पर अपने दोनों हाथ कस दिए और मेरा गला दबाने लगा. उसके हाथ इतने भारी हो गए थे की जैसे न जाने कितने किलो के बाट रख दिए हो . बड़ी मुश्किल से मैंने उसे अपने से दूर किया .
खांसते हुए मैं अपनी सांसो को दुरुस्त कर रहा था की वो दौड़ कर चंपा की तरफ गया और उसे पकड़ लिया
“कबिर्र्र्रर्र्र्र ” चंपा खौफ से चीखने लगी . मैं उठ कर भागा उसकी तरफ. और उसे चंपा से दूर किया . लट्टू की रौशनी में मैंने ध्यान से उसका चेहरा देखा जो एक तरफ से सड गया था .
“बस बहुत हुआ अब तक मैं टाल रहा था पर अब नहीं ” इस से पहले की मेरी बात पूरी होती कारीगर ने खींच कर मुक्का मारा जो मेरे कंधे के जख्म पर जाकर लगा. न चाहते हुए भी मैं अपनी चीख को रोक नहीं पाया. उसने फिर से चंपा को पकड लिया और उसे मारने लगा. मेरे सब्र का बाँध टूट गया . मैंने अपने कंधे पर बंधी पट्टियों को खोला और हाथ को जकदन से आजाद किया . कारीगर के प्रति मेरे मन में जो भी था अब सिर्फ नफरत बची थी .
मैंने उसके पैर पर मारा वो जैसे ही झुका मैंने उसे उठा लिया. पर कंधे की कमजोरी मेरे लिए आफत बन गयी थी . उसे लिए लिए ही मैं गिर गया और उसने एक लात मेरे पेट में मारी मैं दूर जाकर गिरा. वो फिर से चंपा की तरफ बढ़ा मैंने उसका पैर पकड़ लिया पर जैसे उसे फर्क नही पड़ा मुझे घसीटते हुए वो चंपा के पास पहुँच गया जो सड़क के बीचो बीच पड़ी थी . उसने हम दोनों को उठाया और हमारे गले दबाने लगा.
आँखे जैसे बाहर ही निकल आई थी लगा की अब प्राण गए की तभी उसकी पकड़ हमसे ढीली हो गयी और वो हमारे ऊपर से होते हुए दूर जाकर गिरा . पनियाई आँखों से मैंने देखा अपने भाई को , जो हाथ के लोहे का एक पाइप लिए उसकी तरफ बढ़ रहा था .
“मेरे भाई को मारेगा तू हरामजादे , देख मैं क्या करता हूँ तेरा ” जिन्दगी में पहली बार मैंने भैया को इतने गुस्से में देखा था . भैया ने लगातार उसे मारा पर फिर उसने पाइप पकड़ लिया और भैया के हाथ से छीन लिया . कारीगर न जाने किस भाषा में क्या बोल रहा था उसने भैया की पीठ पर मारा भैया धरती पर गिर गए.
कारीगर ने पाइप ऊपर किया और इस से पहले की वो भैया के सर पर दे मारता भागते हुए मैंने कारीगर की कमर पकड़ी और उसे लिए लिए गिर गया भैया तुरंत खड़े हुए और कारीगर के सर पर लात मारी. मौके का फायदा उठाते हुए मैंने कारीगर का एक पैर तोड़ दिया . वो तड़पने लगा घिसटने लगा. तभी भैया को एक घर की चोखट पर रस्सी लटकी दिखी उन्होंने एक सिरा मेरी तरफ फेंका मैं समझ गया की क्या करना है . गोल गोल घूमते हुए हमने उसे फंसा लिया और रस्सियों को विपरीत दिशाओ में खींचने लगे.
मेरा कन्धा दर्द से परेशान था भैया इस बात को समझ गए .
“छोटे तू चिंता मत कर मैं संभाल लूँगा ” भैया ने अचानक से रस्सी छोड़ दी और अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ा ली . भैया ने एक बार मेरी और चंपा की तरफ देखा और फिर अगले ही पल मैंने वो देखा जो मैंने दारा के साथ किया था . उस पल मुझे लगा की मैंने भैया को नहीं बल्कि काली मंदिर में दारा को हलाल करते हुए खुद को देखा हो . सब कुछ जब थमा तो भैया कारीगर के रक्त में सने हुए थे . उस पल को भी उन्हें देखता तो दहशत से ही मर जाता .
“मेरे भाई-बहनों को मारेगा साले. ” भैया कारीगर के जिस्म को तार तार कर रहे थे . वो तब तक नहीं रुके जब तक की भाभी की चीख उनके कानो में नहीं पड़ी . मैंने देखा की भाभी-चाची और कुछ गाँव वाले गली में आ पहुंचे थे . मैंने भाग कर बेसुध पड़ी चंपा को दुबारा से कम्बल ओढाया .चाची-भाभी ने चंपा को संभाला
“अपने अपने घर जाओ सब लोग , सुबह बात हो गी जो भी होगी , और कोई तुरंत वैध को हमारे घर आने का संदेसा दो ” भैया ने सबसे कहा तो गाँव वाले घरो में दुबक गए भैया ने मुझे उठाया और घर ले आये.
“वैध जी आते ही होंगे छोटे ” भैया ने मुझे चारपाई पर लिटाते हुए कहा
मैं- मैं ठीक हूँ भैया , चंपा को देखिये उसे चोट लगी है
भैया- उसे भी कुछ नहीं होगा.
वैध जी ने आते ही अपनी कार्यवाई शुरू की और हमारी मरहम पट्टी की . एक दो काढ़े पिलाये . चंपा के सीने पर गहरा जख्म लगा था . सर भी फूटा था . मैंने पाया की भाभी की नजरे मुझ पर जमी थी .
मैं- ऐसे क्या देख रही हो मैंने कुछ नहीं किया इस बार तो भैया और चंपा भी गवाह है और हमला करने वाला भी .
भाभी- तुम्हे कैसे पता चला की चंपा पर हमला हुआ है और तुम चंपा के पास कैसे पहुंचे
मैंने अपना माथा पीट लिया और भाभी को देखा . उसके मन में आये शक ने मेरा जीवन हरम कर दिया था . इस से पहले की मैं कुछ भी कहता सियार अन्दर आया और मेरी चारपाई पर चढ़ गया ………..

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