तेरे प्यार मे… – Update 15 | FrankanstienTheKount

तेरे प्यार मे …. – Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#15

एक झटके से मैं चाची से अलग हो गया और दरवाजे पर गया . देखा की वहां पर भैया और मंगू थे. दोनों को ऐसे देख कर मेरा दिल शंका के मारे विचलित होने लगा.

भैया- छोटे तुझे मेरे साथ चलना होगा अभी .

मैं- जी भैया पर कहाँ

भैया- आ तो सही .

हम तीनो जल्दी ही गाँव के पंच के घर पर थे जहाँ और भी भीड़ थी . औरतो का रोना-धोना चालू था . भैया मुझे एक कमरे में ले गए . जहाँ पर पंच के लड़के को एक चारपाई पर बाँधा हुआ था .और वो उस पकड़ को तोड़ने के लिए पूरा जोर लगा रहा था . अपने हाथ -पाँव मार रहा था मैंने देखा की उसकी गर्दन कुछ टेढ़ी हो गयी थी . आँखे पथरा सी गयी थी और हाथो से वो कुछ अजीब इशारे कर रहा था .

“न, मेरा इसमें कोई हाथ नहीं है , ” मैंने भैया से कहा .

भैया – कोई भी नहीं कह रहा है की इसकी ये हालत तूने की है . तू बस इस को देख . मंगू कहता है की हरिया भी ऐसे ही हालात में तुम्हे मिला था .

मैं-इसे सबसे पहले किसने देखा था और कब .

भैया- थोड़ी देर पहले ही इसे लेकर आये थे . गाँव के कुछ लड़के जंगल में गए थे लकडिया काटने के लिए. ये न जाने कब उनसे अलग हो गया. बाकि लडको ने जब तलाश किया तो ये झाड़ियो में मिला.

मैंने पञ्च को देखा जिसकी शक्ल ऐसी थी की रोने ही वाला हो .

मैं- पंच साहब, तुम्हे दुःख है क्योंकि ये तुम्हारा बेटा है . इसकी नासाज हालत देख कर तुम्हारा कलेजा जल रहा होगा. पर सब कर्मो के लेख है. दो दिन पहले तुमने दो लाशो के लिए फरमान सुनाया था . ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती पर उसकी मार बहुत तेज लगती है . देखो आज तुम्हारा लड़का मौत की दहलीज पर है और तुम, तुम्हारा ये समाज. तुम्हारे बनाये वो तमाम रीती-रिवाज जिनकी दुहाई तुम पंचायत में दे रहे थे .उनमे से एक भी बात तुम्हारे काम नहीं आ रही अब.

पंच ने मेरे सामने हाथ जोड़ दिए और बोला- कुंवर, कुछ भी करके मेरे बेटे को बचा लो . मेरे जीवन के एकमात्र आस यही है .

मैं- मेरे बस में होता तो मैं न हरिया को मरने देता न रामलाल को. अगर इसका शिकारी भी वो ही है जो हरिया का था तो इसे तुरंत शहर के हॉस्पिटल में ले जाना होगा. इसके बदन का खून बहुत जल्दी सूखेगा. खून की जरुरत होगी इसे. कुछ दिनों का समय मिल जायेगा इसे. तब तक तुम लोग प्रयास करना क्या मालूम कोई मिल जाये जो मदद कर दे इसकी.

भैया- मंगू , तुंरत मेरी गाड़ी लेकर आओ . साथ ही एक-दो और साधनों का जुगाड़ करो . इसे तुरंत शहर ले जायेंगे.

बेशक पंच के प्रति मेरे मन में कड़वाहट भरी थी पर उसके लड़के के लिए मैं द्रवित था .पर मैं करता भी क्या हरिया के लिए भी मैं कहाँ कुछ कर आया था . जल्दी ही सारी व्यवस्था हो गयी . भैया ने मुझे घर जाने को कहा क्योंकि वो खुद शहर जा रहे थे .

मेरे लिए यही वो मौका था वो करने का जो मैंने सोचा था . जैसे ही वो लोग शहर के लिए निकले. मैं भी पैदल ही निकल पड़ा अपनी मंजिल की तरफ. एक बार फिर मैं काले मंदिर जा रहा था क्योंकि ये जो भी हो रहा था इसके बारे में अगर कोई बता सकती थी तो वो थी सिर्फ डायन.

गाँव की हद से बाहर आते ही ठण्ड दुगुनी हो गयी जिसे रोकने के लिए मेरी ये जाकेट काफी नहीं थी . मुझे याद आया की मेरा गर्म कम्बल खेतो पर ही रह गया था . वहां जाने का मतलब था की देर में और देर होना और अगर घर जाता दूसरा कम्बल लाने तो फिर चाची या भाभी हजार सवाल करती. तो मैंने पहले खेतो पर जाने का सोचा.

ठिठुरते हुए , गीली पगडण्डी पर पैर घसीटते हुए मैं खेतो की तरफ मुड गया. मैंने दूर से ही जलते अलाव की आंच को देख लिया.

“इस वक्त कौन होगा वहां पर. शायद कोई मजदुर या फिर कोई और ” सोचते हुए मैं कुवे पर बने कमरे के पास पहुंचा तो मैंने जो देखा मेरा दिल इतनी जोर से उछला की धडकनों ने कुछ पलो के लिए हार ही मान ली हो.

मेरी जमीन पर मेरे कुवे पर वो थी . उसकी आमद मेरी जगह पर होना मुझे अन्दर तक हिला गया . नोवेम्बर की ठण्ड में मैं पसीने-पसीने हो गया और होता भी क्यों नहीं. सारी दुनिया से बेखबर अपने आप में मगन वो आंच जलाये उस पर मांस के टुकड़े भून रही थी . चाचड़ चाचड़ करती आंच में मांस की खुसबू भरी हुई थी .

“तुम , तुम यहाँ ” मैंने थूक गटकते हुए उस से पूछा

उसने मेरी तरफ देखा और फिर से मांस के एक टुकड़े को भूनते हुए बेफिक्री से बोली- तुम मेरे घर बिना बताये जा सकते हो और मैं चली आई तो ये सवाल . इस्तकबाल का तो जमाना ही नहीं रहा .

मैं- मुझे उम्मीद नहीं थी तुमसे यूँ ऐसे अचानक से मुलाकात हो जाएगी.

वो- उम्मीद तो हमें भी नहीं थी की भरी दोपहरी में तुम चोरी से हमारे घर छान-बिन करने पहुँच जाओगे.

मैं- तो तुम्हे मालूम हो गया . पर कैसे.

वो- हमारा घर है वो .

मैं- माफ़ी चाहूँगा पर तुमसे मिलना बड़ा जरुरी था मेरे लिए. और संयोग देखो मुलाकात हुई भी तो कैसे.

वो- बैठो, आंच ताप लो आज ठण्ड बहुत बरस रही है .

मैं- ठीक हूँ मैं

वो- बैठ भी जाओ, इतने तकल्लुफ की जरुरत नहीं है तुम्हारी ही जमीन है

उसके ताने ने मुझे चोट पहुचाई. मैं अलाव के पास बैठ गया .

वो- मांस खाओगे, एक दम ताजा है कुछ देर पहले ही शिकार किया है . उसने भुने हुए कलेजे का टुकड़ा मेरी तरफ किया.

मैं- तुम यहाँ कैसे आई.

वो- कितना सोचते हो तुम . अरे इधर पास में ही शिकार किया था मैंने ये जगह बेहतर लगी तो इधर ही दावत सजा दी. तुम भी मेरे साथ शामिल हो जाओ. और हाँ , किसी इन्सान का मांस नहीं है . बकरे का है .थोडा इमांन हममे भी बाकी है .

मैं- इमांन की बात करती हो. तो फिर निर्दोष मासूमो को क्यों मार रही हो.

वो- मैंने तुमसे उस दिन भी कहा था मैं किसी को नहीं मारती. सब कुछ नियति करती है .

मैं- नियति का मोहरा हो क्या तुम

वो- मैं तो बस मैं हूँ.

मैं- तो ये प्यास क्यों. इतने जानवर है जंगल में तो फिर इन्सान ही क्यों .

वो- क्योंकि इंसानों का स्वाद ही अलग है .

मैं- तुमने मुझसे कहा था की जब तुम्हे रक्त तृष्णा होगी तो तुम रक्त पीने मेरे पास आओगी . मैं तुम्हे कहता हूँ अगर तुम गांववालों से दूर रहोगी तो जब भी तुम्हारा मन करेगा. तुम्हारे हर बुलावे पर मैं अपना रक्त तुम्हे अर्पण करूँगा.

मेरी बात सुनकर वो हंसने लगी. उसकी आवाज दूर दूर तक गूंजने लगी.

वो- सौदेबाजी करना चाहते हो मुझ से. तुम्हारे रक्त का क्या ही मोल मेरे लिए वो तो हमारी पहली मुलाकात में ही गिरवी हो गया मेरे पास.

मैं- तो फिर गाँव वाले कब तक ऐसे ही शिकार होकर मरते रहेंगे.

वो-नियती ही जाने इसके बारे में तो .

जी भरकर उसने अपना भोजन किया और फिर बाकि बचे हुए को फेंक दिया. उसके होंठ रक्त से सने थे. आंखो में ऐसा ठंडा खौफ पर उन खौफ भरी आँखों में ही मैंने अपने दिल को डूबता हुआ महसूस किया.

वो- दुबारा कभी भी अकेले मेरे घर नहीं जाना. मैं दुबारा नहीं कहूँगी.

मैं- मेरा मन मुझे बार बार वहां ले जायेगा. तुम रोक नहीं पाओगी

वो-ऐसी भी क्या चाहत एक डायन से मिलने की

मैं- आज तो नहीं मालूम पर एक दिन इस का जवाब जरुर दूंगा तुम्हे.

वो- ठीक है पर हमारी मुलाकात दिन के उजालो में कभी नहीं होगी. मैं तुम्हे कुछ राते बताती हूँ हम केवल तभी मिलेंगे. और यदि तुमने नियम तोडा तो फिर मैं तुम्हारे घर पर दस्तक दूंगी . जिसकी भरपाई तुम कर नहीं पाओगे.

उसने मुझे वो खास राते बताई. जिन्हें मैंने ध्यान से जेहन में बसा लिया.

मैं- इस खूबसूरत डायन का नाम क्या है

वो मेरे पास आई और मेरे कान में बोली- किसी ज़माने में लोग निशा कहते थे .

जैसे ही उसने इतना कहा मेरे सीने में खलबली मच गयी.

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