तेरे प्यार मे… – Update 138 | FrankanstienTheKount

तेरे प्यार मे …. – Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#138

मैंने चाची से खाना परोसने के लिए कहा और कमरे में चला गया . कुछ देर बाद चाची मेरे पास गयी .

चाची- जेठ जी को मालूम होगा तो बहुत नाराज होंगे वो. मेरा मन घबरा रहा है .

मैं- बाप चुतिया है , वो कभी नहीं समझेगा चाची.

चाची- मन व्याकुल सा हो गया है. बेटा बहु को लाया है पर हालात ऐसे है की चाह कर भी खुशी नहीं मना सकते, किस मुह से मनाये कुछ रोज पहले के मातम के आंसू तो सूखे भी नहीं है .

मैं- समझता हूँ . वो दुःख तो रहेगा ही

चाची-जेठ जी आयेंगे तब तू अपने भाई की आड़ लेना

मैं- जरुरत नहीं है मैने सुबह ही बता दिया था पिताजी को

चाची- कहीं तेरा ये कदम घर को ना तोड़ दे कबीर

मैं- ये घर, कभी घर था ही नहीं चाची. तू ही बता तू मालकिन है इस घर की पर तुझे कितना सुख मिला इस घर में . तुझसे ज्यादा कौन घुट घुट कर जिया इस घर में . चाचा भोसड़ी का दुनिया भर की रंडियों के मजे लुटता रहा पर खुद की लुगाई के पास नहीं आ पाया. सच कहूँ तो अकेला चाचा ही नहीं हम सब भी तेरे दोषी है . तुझे क्या दे पाए हम , कुछ भी तो नहीं.

चाची- मुझे किस चीज की जरुरत भला, दो बेटे दो बहुए . तुम सब को जब देखती हूँ तो दिल को जो सकूं मिलता और और भला क्या चाहत होगी मेरी फिर. खाना खाकर मैं आया तो देखा की निशा ऊपर चोबारे में थी. मैं उसके पास जाना चाहता था की अंजू ने मुझे पकड़ लिया.

मैं- क्या हुआ

अंजू- रमा का कहीं कुछ पता नहीं चल रहा . कल रात प्रकाश के नए घर में आग लग गई. सब कुछ जल कर ख़ाक हो गया.

मैं- रमा की ही कारस्तानी होगी . पर वो अकेली नहीं है कोई तो है जो छिप कर ये खेल खेल रहा है

अंजू- कौन हो सकता है

मैं- अभी तो नहीं मालूम पर आज नहीं तो कल मालूम हो ही जायेगा.

अंजू- आज रात मैं फिर से ख़ाक छानुंगी जंगल में

मैं- एक बात सच बताना क्या तुम परकाश से सच्चा प्यार करती हो

अंजू- सच-झूठ कुछ नहीं होता कबीर, प्यार बस प्यार होता है तुमसे जायदा कौन जानता है इस बारे में

मैं- तो फिर प्रकाश से सम्बंधित सभी राज जानती होगी तुम

अंजू- क्या कहना चाहते हो तुम

मैं- रमा प्रकाश के लिए भी काम करती थी , वो एक मात्र कड़ी है जो पिताजी, चाचा, महावीर, और प्रकाश से जुडी है . तुमने उस रात देखा तो था ही न की कैसे प्रकाश रमा के साथ कार के बोनट पर क्या कर रहा था .

अंजू-प्रकाश चाहता था की राय साहब उसे उसका हिस्सा दे दे.

मैं- वसीयत का चौथा टुकड़ा

अंजू- हाँ ,

मैं इस से पहले कुछ कहता की बाहर से आते शोर ने मेरा ध्यान भटका दिया.

“बिशम्भर दयाल कहाँ छिप कर बैठा है बाहर निकल ” इस आवाज को सुनते ही मेरा दिल जोर से धडक उठा. मैं जानता था की ये होगा पर इतनी जल्दी होगा ये नहीं जानता था .

पिताजी के कमरे का दरवाजा खुला और पिताजी बाहर आये. सामने चौधरी रुडा खड़ा था . चेहरे पर दुनिया जहाँ का गुस्सा लिए.

“तुम यहाँ ” पिताजी ने बस इतना कहा

रुडा- आना ही पड़ा मुझे बिशम्भर , मैं अपनी अमानत लेने आया हूँ . लौटा दे उसे.

पिताजी ने एक नजर अंजू को देखा और बोले- अंजू जाना चाहती हो तो जाओ

रुडा- अंजू की बात नहीं कर रहा मैं . तेरी इस नालायक औलाद से पूछ क्या पाप किया है इसने

पिताजी ने एक नजर रुडा को देखा , एक नजर मुझे देखा और बोले- कबीर, चौधरी साहब किस बारे में बात कर रहे है .

मैं- निशा से ब्याह कर लिया मैंने

इतना कहते ही पिताजी की तरफ से एक जोर का थप्पड़ मेरे गाल पर आ पड़ा .

“तेरी हिम्मत कैसे हुई ये गुस्ताखी करने की . क्या सोचा तूने कोई खेल चल रहा है. कैसे सोचा की हर बार तेरी मनमर्जी चलेगी. ” पिताजी ने गुस्से से कहा.

पिताजी- हरामजादे, ये जानते हुए भी की निशा……….

“हाँ ये जानते हुए भी की मैं कौन हूँ कबीर ने मेरा हाथ थामा,मुझसे प्रेम किया मुझसे ब्याह किया ” सीढिया उतर कर निचे आते हुए निशा ने कहा .

रुडा ने निशा को देखकर थूकते हुए कहा -तू कैसे भूल गयी की तेरा नाम किस से जुड़ा है . जो पाप तूने किया है उसकी सजा तुझे मिलेगी. अरे कलंकिनी तेरे कदम क्यों नहीं कांपे घर की चोखट पार करते हुए.

निशा- घर , किस घर की बात करते है आप . घर तो वो कभी था ही नहीं . किसको फ़िक्र थी मेरी. मैं हूँ भी या नहीं . कितने ऐसे दिन थे जब आपने मेरे सर पर हाथ रखा. मेरा हाल पूछा आपको तो याद भी नहीं की उस घर में मैं भी रहती थी . किस हक़ से आप घर की बात करते हो.

“जुबान पर लगाम रख बदचलन ” रुडा ने निशा को थप्पड़ मारने के लिए अपना हाथ उठाया .

मैंने आगे बढ़ कर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- सोच कर चौधरी रुडा, अब ये मेरी पत्नी है और मेरी पत्नी से किसी ने बदतमीजी की न तो फिर ठीक नही होगा.

आस पास गाँव वाले इकठ्ठा होने लगे थे . राय साहब बिशम्भर दयाल जो दुनिया के तमाशे सुलझाता था आज उसके खुद के घर में तमाशा हो रहा था .

मैं- निशा मेरी पत्नी है यही एकमात्र सच है . हमने प्रेम किया है हमें अपनी जिन्दगी जीने दो

पिताजी- ये कहने से तेरे कर्म ठीक नहीं हो जायेंगे कबीर. गलती की है तूने समाज का नियम तोडा है तूने.

मैं- किस समाज की बात करते है आप वो समाज जो न जाने कब का मर चूका है , वो समाज जो झूठे नियम-कानून की सड़ांध में जी रहा है .

पिताजी- एक विधवा की मांग में सिंदूर भर कर तुमने पाप किया है

कबीर.

मैं – ये विधवा थी पर अब नहीं है इसका पति आपकी आँखों के सामने खड़ा है.और फिर नियमो की किस किताब में लिखा है की विधवा दुबारा से ब्याह नहीं कर सकती. ये विधवा हुई इसमें इसका क्या दोष था . क्या इसको अपनी जिन्दगी जीने का हक़ नहीं. इसे हक़ है , इसे वो तमाम है हक़ है जो दुनिया की किसी भी औरत को मिलने चाहिए.

रुडा- विशम्भर , आज तुम्हारे सामने चौधरी रुडा नहीं बल्कि एक बाप खड़ा है जो अपने बेटे की अंतिम निशानी, अपनी बहु को वापिस ले जाने आया है जिसे तुम्हारा बेटा ले आया है . सारी दुनिया तुम्हारे दरवाजे पर न्याय के लिए आती है आज मैं भी आया हूँ, करो न्याय. मुझे लौटा दो निशा को .

पिताजी- कबीर, निशा को लौटा दे.

मैं- हरगिज नहीं

पिताजी- कबीर तूने सुना नहीं हमने क्या कहा

मैं- निशा कहीं नहीं जाएगी वो मेरी पत्नी है और इस घर की छोटी बहु वो यही रहेगी

पिताजी- कबीर………..

मैं- देखते है कौन माई का लाल निशा को मुझसे जुदा करता है . खून की होली खेल कर आया हु मलिकपुर में , अगर किसी की भी फाग खेलने की इच्छा है तो आगे आये…………………

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