तेरे प्यार मे… – Update 12 | FrankanstienTheKount

तेरे प्यार मे …. – Adultery Story by FrankanstienTheKount
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#12

“अरे यहाँ चबूतरे पर क्यों सोया पड़ा है ” चाची ने मुझसे कहा .

मैंने आँखे खोली खुद को चाची के चबूतरे पर पाया. ठन्डे फर्श पर पड़े मेरी कमर अकड़ गयी थी.

“”उठ अन्दर आ, दरवाजा खडका भी सकता था न , जाने कबसे ठण्ड पर पड़ा है “चाची ने मुझे उठाया और अन्दर ले आई. अन्दर जाते ही मैंने अपने सीले कपडे उतारे और रजाई में घुस गया. चाची ने थोड़ी देर पहले ही बिस्तर छोड़ा होगा रजाई में गर्मी बाकी थी .

“चाय बना लाऊ तुम्हारे लिए ” चाची ने कहा.

मैंने चाची का हाथ पकड़ा और कहा- सोना चाहता हूँ . चाची ने घडी में देखा सुबह के पांच बज रहे थे . उन्होंने दरवाजा बंद किया और फिर मेरे साथ ही बिस्तर में घुस गयी मैंने चाची के ऊपर अपना हाथ डाला और उस से चिपक गया . गर्म जिस्म की तपिश ने बहुत राहत दी. चाची ने अपना मुह मेरी तरफ कर लिया इस तरह उसका सर मेरे कान के पास आ गया. चाची की गर्म सांसे जब मेरे चेहरे पर पड़ती तो किसी अलाव की आंच सा लगता.

“कहाँ थे रात भर ” चाची ने मेरी पीठ को सहलाते हुए पूछा.

मैं- नहीं मालूम.

चाची- मुझसे भी अब बाते छिपाने लगे हो. मंगू बेचारा बहुत देर तक तलाशता रहा तुम्हे.

मैं- बस इधर उधर ही भटक रहा था .

चाची- मुझे कहना तो बहुत कुछ है तुमसे पर अभी नहीं कहूँगी.

मैंने चाची की उंगलियों में अपनी उंगलिया उलझाई और बोला- आपका भी उलाहना सुन लूँगा.

चाची- जेठ जी बहुत नाराज हुए थे घर आकार

मैं- मैं क्या करू फिर

चाची- किसी दुसरे के लिए अपने घर में कलेश करना कहाँ जायज है बेटा.

मैं- दो लोगो को मारना भी तो गलत है न

चाची- ये दुनिया तेरे मेरे हिसाब से नहीं चलती , यहाँ जिसकी लाठी उसकी भैंस . जो हुआ उसे अब कोई वापिस नहीं कर सकता एक बुरा सपना समझ कर भूल जा उसे.

मैंने चाची के स्तनों पर अपना सर टिकाया और आँखों को बंद कर लिया.

जब नींद पूरी हुई तो दोपहर बाद का समय था . मैंने देखा की चंपा आई हुई थी . मैं बिस्तर से उतरा .

“तू कब आई ” मैंने पूछा

चंपा- थोड़ी देर पहले ही . आज खीर पूरी बनाई थी . तेरे लिए ले आई.

मैं- ये बढ़िया किया

मैंने देखा की चंपा की नजर मेरे शरीर के निचले हिस्से जमी हुई है मैंने गौर किया तो पाया की पेशाब के जोर की बजह से मेरा लिंग तना हुआ था. चूँकि वो सुजा हुआ था तो और बड़ा लग रहा था . मैंने ये गौर ही नहीं किया था की मैं सिर्फ कच्छे-बनियान में ही हूँ. मैंने तुरंत अपने कपडे पहने और बाथरूम में घुस गया. कुछ देर बाद मैं आया तो चंपा मुझे देख कर हंस रही थी.

मैं- पागल हुई है क्या जो अकेले दांत निपोर रही है .

चंपा उठ कर मेरे पास आई और बोली– सच बता मुझे देख कर ही तेरा ऐसा हाल हुआ न.

मैं- पागल हुई है या तू. वो तो मैं नींद से उठा था इसलिए वैसा था .

चंपा- मेरे सिवा और कौन आ रहा है तेरे सपनो में

मैं- कोई और बात कर.

चंपा ने अचानक से मेरे लिंग को पायजामे के ऊपर से पकड़ लिया और बोली- ये तो कह रहा है की मैं बस ये बात ही करता रहूँ. उफ्फ्फ कितना बड़ा है मेरी तो जान ही ले जायेगा तेरा ये केला.

हद से जायदा बेशर्म थी ये लड़की .

मैं- पागल मत बन . ये ठीक नहीं है छोड़ इसे .

मैंने चंपा को खुद से परे किया. पर वो भी पक्की वाली थी. मेरे गालो पर एक पप्पी ले ही ली उस मरजानी ने

चंपा- खीर पूरी खा ले फिर मैं जाउंगी घर.

मैं- परोस दे.

चंपा के घर जब भी खीर बनती थी वो या मंगू हमेशा मेरे लिए लेकर आते थे. सब कुछ भूल कर मैं खाने पर ध्यान देने लगा.

चंपा- उस रात कुवे पर तूने सब कुछ देख लिया था न .

मैं- हाँ.

चंपा- फिर अन्दर क्यों नहीं आया तू.

मैं- मेरी अपनी हदे है चंपा .

चंपा- नुकसान तो तेरा ही हुआ न , दो दो रसीले जाम चख सकता था तू उस रात.

मैं- तुम दोनों तो मेरी ही हो न . मुझसे कहाँ दूर हुई तुम.

चंपा- तेरी इसी अदा पर तो मैं मरती हु . सच बताना उस रात तुझे कैसी लगी मैं. तेरे मन में मुझे नंगी देख कर क्या आया.

मैं- मेरा मन , मेरे मन की कौन जाने चंपा

चंपा- तू बेगाना नहीं है कबीर हम सब हमेशा तेरे साथ है . साथ रहेंगे. कल पंचायत में तूने जो किया रात भर मैं तेरे बारे में ही सोचती रही .

मैं- ठीक है अब तू जा . मुझे भी वैध जी के घर जाना है पट्टी बदलवाने .

चंपा ने बर्तन समेटे और बोली-साथ चलते है मैं घर जाउंगी तू आगे चले जाना. हम घर की दहलीज पर पहुंचे ही थे की अचानक से चंपा मुझसे लिपट गयी और अपने होंठो को मेरे होंठो पर टिका दिया.

“श्ह्हह्श , इतना तो हक़ दे मुझे ” उसने कहा और मुझे चूमने लगी. एक मीठा सा स्वाद मेरे होंठो से होते हुए मुह में घुलने लगा मेरी आँखे बंद होने लगे. नशा सा छाने लगा. जब वो अलग हुई तो उसकी छातिया धौंकनी सी ऊपर निचे हो रही थी . पट्टी करवाने के बाद मैं सोचने लगा की कहाँ जाऊंगा . सर का दर्द भी ताजी चोट की वजह से ज्यादा था .

घर आने के बाद मैं सीधा अपने चोबारे में गया और कुर्सी पर बैठ गया. थोड़े देर बाद भाभी गर्म दूध का गिलास लेकर आ गयी .

भाभी- पियो इसे , अच्छा लगेगा तुम्हे.

मैंने कुछ घूँट भरी.

भाभी- कल पूरी रात तुम गायब थे, जानते हो तुम्हारे भैया और मुझे कितनी फ़िक्र हुई.

मैं- माफ़ी चाहूँगा. मुझे जरुरी काम था .

भाभी- ऐसे कौन से काम है तुम्हारे जो रातो में ही होते है . काम ही करना है तो भैया के साथ करो. कारोबार सीखो .

मैं- कोशिश कर रहा हूँ भाभी.

भाभी-देवर जी , मुझे बहुत चिंता है . इस घर में सबसे छोटे हो तुम. नटखट हो . जानती हूँ की तुम कभी कुछ ऐसा वैसा नहीं करोगे जिस से परिवार की प्रतिष्ठा पर आंच आये. अपने से ज्यादा मुझे तुम पर मान है . बस इतना ही कहूँगी की यूँ रातो को भटकना उचित नहीं है.

मैं- ध्यान रखूँगा भाभी.

भाभी- ये कुछ दवाए है समय से खाते रहना . घाव जल्दी ही भर जायेगा.

करने को कुछ खास था नहीं तो मैंने फिर से बिस्तर पकड़ लिया. कुछ असर शायद दवाओ का था मेरी आँख लग गयी. पर जब आँख खुली तो घडी में पोने एक बज रहा था . प्यास के मारे गला सूख रहा था . टेबल पर रखा जग खाली था. मैं पानी के लिए निचे आया तो देखा की हमारा दरवाजा खुला था . वैसे तो ये कोई नयी बात नहीं थी पर फिर भी मैंने सोचा की इस बंद कर देता हु. वहां पहुंचा तो गली में कुछ आवाज सी आई. कम्बल को सही करते हुए मैं गली में देखा .और जो देखा मैंने अपनी पेंट को मूत से गीला होते हुए महसूस किया. गली में एक उबलती हुई चीख गूंजने लगी जिसने गाँव की नींदे उड़ा दी.

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