आँख खुली तो दोपहर हो रही थी ,अलसाया बदन लिए मैं मुश्किल से उठा. हाथ मुह धोये . गाँव पहुँच कर सबसे पहले मैं मंगू से ही मिला उसे साइड में लेकर गया.
मैं- कुछ जरुरी बात करनी है तुझसे
मंगू- हाँ भाई .
मैं- तूने प्रकाश को क्यों मारा.
मेरी बात सुनकर मंगू के चेहरे का रंग उड़ गया पर मैं हरगिज नहीं चाहता था की वो नजरे चुराए.
मैं- मंगू , तू मेरा दोस्त है और मैं उम्मीद करता हूँ की तू मुझे सच बताये.
मंगू-वो राय साहब पर दबाव बना रहा था
मैं- किस चीज का दबाव
मंगू- यही की राय साहब उसे वसीयत का एक टुकड़ा दे दे और साथ में चंपा को भी उसके पास भेजे.
मैंने एक गहरी साँस ली.
मैं- क्या था उस वसीयत में
मंगू- नहीं जानता. राय साहब ने इतना ही कहा की उनका पाला हुआ सपोला उनको डसना चाहता है , उसका फन कुचल दिया जाए.
मैं- ऐसा क्या था प्रकाश के पास की वो राय साहब को ब्लेकमेल करने की जुर्रत कर पाया.
मंगू- नहीं जानता, राय साहब ने कहा उसे मार दे मैंने मार दिया .
मैं- कल को राय साहब कहेगा की कबीर को मार दे तू मुझे भी मार देगा.
मंगू- कैसी बाते कर रहे हो भाई
मैं- तूने गलत राह चुनी है मेरे दोस्त. इस राह पर तुझे कुछ नहीं मिलेगा . मेरा बाप तुझे इस्तेमाल कर रहा है जब उसका मन भरेगा तुझे लात मार देगा. बाकि तेरी मर्जी है.
मंगू- मैं कविता के कातिल की तलाश के लिए कर रहा हूँ ये सब.
मैं- काविता तुझे कभी नहीं चाहती थी , वो बस तेरा इस्तेमाल कर रही थी. इस बात को जितना जल्दी समझ लेगा तेरी जिन्दगी उतनी ही आसान होगी.
मंगू- झूठ कह रहे हो तुम
मैं- तेरी दोस्ती की कसम मैंने तुझसे कभी झूठ नहीं बोला.
मंगू के जाने के बाद मैंने सोचा की बाप चुटिया के मन में आखिर चल क्या रहा है. कैसे मालूम हो की वो क्या करना चाहता है क्या कर रहा है. थोड़ी देर बाद मैंने अंजू को देखा , उसके पास गया .
मैं- कैसी हो अब
अंजू- बेहतर तुम बताओ
मैं-तुम्हे ठीक लगे तो क्या तुम मेरे साथ सुनैना की समाधी पर चल सकती हो
अंजू- अभी
मैं- अभी
अंजू – ठीक है मेरी गाड़ी की चाबी ले आओ ऊपर से
हम दोनों जंगल की तरफ चल पड़े और ठीक उसी जगह पहुँच गए जहाँ निशा मुझे ले गयी थी .पत्थरों के टुकड़े अभी भी वैसे ही पड़े थे .
अंजू- देख लो जो देखना है
मैं- बुरा मत मानना पर मैं वो सोना देखना चाहता हूँ
अंजू ने कंधे उचकाए और समाधी के कुछ पत्थर हटा कर एक हांडी जो की बेहद पुराणी थी काली पड़ चुकी थी बाहर निकाल ली. हांडी का ढक्कन हटाते ही मैंने देखा की वो सोने से लबालब भरी थी .
अंजू ने सही कहा था मुझे.
मैं- रख दो इसे वापिस
अंजू- तुमको चाहिए क्या सोना
मैं- नहीं
अंजू- फिर क्यों देखना चाहते थे तुम इसे.
अंजू की आवाज में उतावलापन लगा मुझे.
मैं- मुझे लगा था की सुनैना ने सोना निकाला था ये एक अफवाह है .
अंजू- सच तुम्हारे सामने है .
मैं- आओ चलते है
वापसी में मुझे ध्यान आया की बैंक जाना था . अंजू को छोड़ने के बाद मैं सीधा मेनेजर के पास गया और चाचा के खाते की जानकारी मांगी. मनेजेर ने मुझे ऊपर से निचे तक देखा और बोला- कुंवर, अगर ठाकुर लोग अपना धन बैंक में रखने लगे तो उनका रसूख क्या ही रह जायेगा. बैंक ठाकुरों के दरवाजे पर जाते है ठाकुर बैंक नहीं आते. ठाकुर जरनैल सिंह का कोई खाता नहीं यहाँ.
मामला अब और उलझ गया था . मैं मलिकपुर गया उन गहनों को लेकर सुनार ने पुष्टि कर दी की वो गहने उसने ही चाची के लिए बनाये थे. रात को मैं थोड़ी देर भाभी के पास बैठा इधर उधर की बाते की . अंजू साथ थी तो खुलकर मैं कुछ कह नहीं पा रहा था . सबके सोने के बाद मैं चाची को छत पर ले गया और सीढियों का किवाड़ बंद करते ही अपने आगोश में भर लिया.
चाची- कबीर, थोड़े दिन सब्र कर ले फिर खूब बिस्तर गर्म करुँगी तेरा.
मैं- ज्यादा देर नहीं लगाऊंगा.
मैंने चाची को घुटनों के बल झुकाया और उसके लहंगे को कमर तक उंचा कर दिया. चाची के मादक नितम्बो को चूमते हुए मैंने उनको चौड़ा किया और चाची की झांटो से भरी चूत पर अपने होंठ रख दिए.
“सीईईईईई कबीर ” चाची चाह कर भी अपने पैरो को कांपने से नहीं रोक पाई. जीभ का नुकीला कोना चाची की चूत के दाने पर रगड पैदा कर रहा था जिस से वो भी उत्तेजित होने लगी थी . मैं जानता था की समय कम है. मैंने लंड पर थूक लगाया और चाची की चूची मसलते हुए उसे चोदने लगा.
चाची के गाल चूमते हुए , ठंडी रात में छत पर चुदाई का अपना ही सूख था . चाची थोडा और झुक गयी मैंने अपने हाथ उसके कन्धो पर रखे और पूरी रफ्तार से चूत मारने लगा. चुदाई का दौर जब रुका तो हम दोनों पसीने से लथपथ थे.
चाची- कर ली अपनी मनचाही, अब ब्याह तक कुछ न कहना मुझसे.
मैं – दो मिनट रुक फिर जाना निचे.
चाची- अब क्या है .
मैंने वो गहनों का डिब्बा चाची के हाथ में दे दिया. और बोला- ये गहने कभी चाचा ने तेरे लिए बनवाए थे, आज गहने लाया हूँ किसी दिन चाचा को भी ले आऊंगा. बहुत दुःख झेल लिए तूने तेरे हिस्से का सुख अब ज्यादा दिन दूर नहीं है तुझसे.
चाची ने उन गहनों को देखा , फिर मुझे देखा और बिना कुछ कहे वो वहां से चली गयी. निचे आने के बाद मैं कुछ खाने के लिए रसोई में गया . मैंने देखा की कमरे के दरवाजे पर अब ताला नहीं लगा है . खाना खाने के बाद मैं भैया के पुराने कमरे में चला गया हजारो किताबो ने अपने अन्दर न जाने क्या छिपाया हुआ था .
मैंने लैंप मेज पर रखा और एक किताब ऐसे ही उठा ली. दो चार पन्ने पलटे ही थे की बेख्याली में मेरा हाथ लैंप के शीशे पर लग गया . लैंप मेज पर गिर गया और उसकी नीली लौ मेज की लकड़ी पर फ़ैल गयी. उस नीली रौशनी में मुझे मेज पर कुछ उकेरा गया दिखा. और जब मैंने उसे समझा तो एक बार फिर से मेरे पास कहने को कुछ नही था.

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