#11
काली साडी में लिपटी हुई एक बेहद खूबसूरत लड़की. जिसकी आभा उस चाँद की रौशनी में खिली हुई थी. विपरीत हालातो में मैं उस से इस सर्द रात में ऐसी जगह मिला जहाँ किसी को भी उसके होने की भनक तक नहीं थी . उसने जो कहा था मेरे कानो में पिघले शीशे सा उतर गया था . सर्द रात में माथे से बहते पसीने को मैंने गर्दन तक महसूस किया.
मैं- कैसे मान लू तुम डायन हो
वो मेरी तरफ देख कर हंसी और बोली- इस बियाबान में , इस तनहा रात में , इस उजड़े खंडहर में डायन नहीं तो किसके मिलने की उम्मीद कर रहे थे तुम.
मैं- सच कहूँ तो मुझे मालूम भी नहीं था की इस जंगल में ऐसी भी कोई जगह है आजतक वनदेव के मंदिर से आगे कभी कदम बढे ही नहीं थे . मेरी तन्हाई मेरा व्यथित मन न जाने किस तरह मुझे यहाँ ले आया.
पसीजी हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए मैंने उस से कहा.
“यूँ इन अंधेरो में भटकना ठीक नहीं है . लोग तो उजालो में भी इस तरफ नहीं आते. मुझे उम्मीद भी नहीं थी बहुत समय से किसी को देखा जो नहीं यहाँ. देखो, कितनी दिलचस्प रात है एक डायन और एक इन्सान बाते कर रहे है . अजीब है ” उसने अपनी उंगलियों को चटकाते हुए कहा.
मेरी धडकनों की रफ़्तार अचानक से ही तेज हो गयी थी . नजरे उस शोख हसीना का ऊपर से निचे अवलोकन कर रही थी . न वो कुछ कह रही थी न मैं . दोनों के बीच अजीब सी कशमकश हो रही थी आखिर मैंने चुप्पी तोड़ी.
“तो अब क्या , एक इन्सान एक डायन आमने सामने है . क्या तुम मुझे मारने वाली हो “ मैंने कहा
डायन- तुम्हे ऐसा क्यों लगा की मैं तुम्हे मारूंगी.
मैं- मुझे लगा तुम्हारा यही प्रयोजन होगा. डायने तो मारती ही है न इंसानों को
डायन- क्या तुम्हे डर लग रहा है .
मैं- नहीं , नहीं तो
डायन दो कदम आगे बढ़ी. मेरे पास आई. इतना पास की उसके स्तन मेरे सीने से रगड़ खाने लगे.
“तुम्हारी बढ़ी हुई धड़कने, बेकाबू पसीना तो कहता है की तुम डरे हुए हो ” ऐसा कह कर वो फिर से वापिस हो गयी.
मैंने उसके व्यंग को महसूस किया.
“मुझे नहीं लगता की तुम डायन हो ” मैंने कहा
वो- क्यों भला
उसने त्योरिया चढ़ाई .
मैं- तुम वैसी नहीं हो.
वो- कैसी .
मैं- जैसा मुझे मालूम है डायन इतनी सुन्दर नहीं हो सकती . वो वीभत्स होती है उसके दांत हाथो के नाखून नुकीले होते है . शरीर सडा हुआ होता है रक्त की बदबू आती है उस से .उसके पाँव उलटे होते है .
मेरी बात सुन कर वो जोर जोर से हंसने लगी. इतना जोर से की उसकी आवाज दूर दूर तक गूंजने लगी. कुछ देर बाद वो रुकी.
“मुझसे पहले किसी और डायन से मिले हो तुम , किसी और डायन को देखा है तुमने ” उसने प्रशन किया.
मैं- नहीं
वो- तो तुम्हे कैसे मालूम की डायन का हुलिया वैसा होता है जैसा तुमने बताया.
मैं- मैंने सुना है . गाँव में लोगो ने अपनी बातो में बताया की कैसे उन्होंने डायन को देखा था .
वो- उन लोगो ने तुम्हे ये तो बताया ही होगा की डायन से मुलाकात के बाद क्या हुआ.
मैं- ये तो नहीं बताया
वो- क्या तुमने कभी ईश्वर को देखा है क्या तुम बता सकते हो वो कैसा दीखता है .
मैं- देखा है उसे. कितनी ही तस्वीरे मुर्तिया है इश्वर की
वो- क्या तुम्हे पक्का विश्वास है इश्वर वैसा ही दीखता है जैसा की वो मूर्तियों तस्वीरों में है
उसकी बात ने मुझे उलझन में डाल दिया.
वो- वो तस्वीरे, वो मुर्तिया एक माध्यम है बस ये दर्शाने का की इश्वर ऐसा होगा. ऐसे ही किस्से-कहानियो में डायनो का वैसा वर्णन है जो तुमने सुना है .
मैं- मैं कैसे मान लू तुम सच में डायन हो.
वो फिर हंसी जैसे मैंने कोई मूर्खतापूर्ण बात पूछ ली हो .
डायन- उफ्फ्फ ये इंसानी जिज्ञासा, बताओ मैं क्या करू तुम्हे विश्वास दिलाने के लिए . अपने पैरो को उल्टा मोड़ कर हवा में लटक जाऊ. या फिर उंगलियों के नाखून लम्बे कर के तुम्हारे पेट से अंतड़ी निकाल लू.
ये सुनते ही मेरी आँखों के सामने वो बुजुर्ग आ गया. उस मंजर की याद आते ही मेरी रीढ़ में सिरहन दौड़ गयी.
“तुम्हे ठण्ड लग रही है चाहो तो अन्दर दिवार की ओट में बैठ सकते हो ” उसने कहा .
मैं- वहां ले जाकर तुमने मेरा अहित कर दिया तो
डायन- अगर मेरा वैसा इरादा है तो फिर क्या दिवार और क्या ये खुला आसमान सब कुछ मेरा ही तो है.
मैं उसके पीछे पीछे जाकर दिवार की ओट में बैठ गया . उसने एक छोटा अलाव जला दिया. सच कहूँ तो बड़ी राहत मिली मुझे. सिंदूरी आंच की रौशनी में उसके गोरी आभा बड़ी खूबसूरत लग रही थी . ये रात न जाने मेरी किस्मत में क्या लिखने वाली थी .
“तुम्हारा नाम क्या है ” उसने पूछा मुझसे
मैं- कबीर.
एक बात मैंने देखि की जबसे वो मुझसे मिली थी वो बार बार चाँद की तरफ देखती थी .
मैं- क्या मैंने तुम्हारे किसी कार्य में बाधा डाली है यहाँ आकर
वो- नहीं . इतने बरस बाद किसी इन्सान के कदम इधर पड़े है तो अजीब लग रहा है .
मैं- कदम कैसे पड़ेंगे. तुम्हारे डर से लोग इधर आने की हिम्मत कर ही नहीं पाते होंगे.
वो-डरना भी चाहिए . एक दुसरे की हद का सम्मान बना रहे तो बेहतर है सबके लिए.
मैं- पर मैंने यहा आकर उस हद को पार कर दिया है. मेरी सजा क्या होगी.
वो-इतनी बेबाकी. बताओ तुम ही क्या सजा हो तुम्हारी.
मैं- जो करना है तुम्हे ही करना है मैं भला क्या ही कर लूँगा एक डायन के सामने.
मेरी बात सुनकर वो मुस्कुराई और बोली- ठीक है तो मैं तुम्हे जाने देती हूँ
मैं- और ये मेहरबानी किसलिए
वो- आज बरसों बाद कोई ऐसा मिला है जिस से दिल खोल कर बात हुई मेरी. तुमने मेरे अस्तित्व पर सवाल नहीं किया . ऐसा व्यवहार दुर्लभ है . दूसरी बात आज मुझे रक्त तृष्णा नहीं है . पर जब मुझे ये तृष्णा होगी तो मैं आउंगी तुम्हारे पास , तुम्हारा रक्त पीने.
जैसे ही उसने अपनी बात समाप्त की . अचानक से जंगल में सियारों का रुदन शुरू हो गया. ऐसा शोर मैंने पहले नहीं सुना था .
होऊ हूँ की आवाज दूर दूर तक गूँज रही थी . डायन ने मेरी तरफ देखा और बोली- तुम्हे जाना होगा अभी . मैं तुम्हे सुरक्षित हद तक छोड़ देती हूँ.
उसने मेरा हाथ पकड़ा बर्फ सा अहसास मुझे अन्दर तक भिगो गया. सियारों के रुदन के बीच उसकी पायल की आवाज मुझे रोमांचित कर रही थी . मैं बिलकुल नहीं जानता था की जंगल में वो मुझे कहाँ किस तरफ ले जा रही थी पर बहुत जल्दी मैं वनदेव के पत्थर के पास था की उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और बोली- अंधेरो से दूर रहना ये किसी एक सगे नहीं होते. जाओ.
मैंने मुड कर देखा. अंधेरो में कोई नहीं था न किसी पायल की आवाज गूँज रही थी .

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