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जगदीश राय (मन में): अगर निशा ने फर्श पर पड़ी वीर्य को देख लिया तो बवाल खड़ा कर देगी। शायद मुझसे बात ही न करे।

उसने जल्द अपना तौलिया(टॉवल) लिया और अपने आप को पोछ लिया और अपने कमरे में घूस गया।

कमरे में घूस कर उसने एक लूँगी उठाई और पहन लिया। अपने तौलिए को उसने कंधे पर डाल दिया। उसने प्लान बनाया था की हॉल में जाकर, टॉवल फर्श पर गिराकर सारा वीर्य साफ़ कर दूंगा।

अपने रूम से बाहर आकर देखा तो निशा का रूम खुला है और किचन से आवाज़े आ रही है।

जगदीश राय: शायद निशा किचन में है, ओह गॉड़। जल्दी कर जगदीश।।

वह हॉल में आ गया और सीधे सोफे की तरफ गया।
और टॉवल नीचे फर्श पर फेकने ही वाला था, की देख कर चौक गया। फ़र्श एक दम साफ़ था। सोफा भी ठीक से रखा हुआ था।

जगदीश राय: यह कैसे हो गया। मैंने तो साफ़ नहीं किया। तो क्या निशा!!। ओह नो…क्या उसने अपने हाथो से…मेरा वीर्य।

उसमे शर्म के साथ साथ एक अजीब सा कामुक उत्साह भी आ गया।

वहाँ निशा अपने आँख के कोने से अपने पापा को देख रही थी। उसे हँसी आ रही थी, अपने पापा पर। उसने कचरे के डब्बे पर पड़ा हुआ पेपर का टुकड़ा देखा, जिस पर सफ़ेद पानी लगा हुआ था और पेपर के अंदर से धीरे धीरे बह रहा था।

निशा (मन में): कितना सारा वीर्य था। उफ्फ्फ्, साफ़ करते हाथ दर्द हो रहे थे। इतना मोटा और लम्बा लंड से तो इतना वीर्य तो निकलता होगा शायद। ब्लू फिल्म्स में भी लोगों का इतना निकलता न हो। पापा को कोई ब्लू फ़िल्म में एक्टिंग करना चाहिये।

यह सोच कर वह हँस पडी। जगदीश राय अपनी बेटी की हंसी सुना, और शर्मा कर चुप चाप टीवी के सामने बैठ गया।उसे लगा निशा उस पर हँस रही है।

दोनो बाप बेटी एक दूसरे के बारे में सोच रहे थे।

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