पुरा समय जगदीश राय के होठ निशा के चूत का साथ नहीं छोडा। और निशा ने भी चूत को जगदीश राय के मुह के अंदर तक धकलते झड रही थी। वह चाहती थी की चूत रस का एक बूंद भी बेकार नहीं होना चाहिये।
कोई 5 मिनट बाद निशा शांत हुई। और टेबल पर ढेर हो गयी। उसका सारा शरीर कांप रहा था।
फिर धीरे से निशा ने आख खोला। उसके पापा अभी भी , अपने ही धुन में, होठ चूत पर लागए मक्खन और चूत के रस को चूस और चाट रहे थे।
निशा हँस पडी।
निशा: यह क्या पापा…आप ने तो मुझे झडा ही दिया…और आपने केला तो पूरा खाया ही नही। क्या आपको पसंद नहीं आयी।
जगदीश राय: कभी ऐसे हो सकता है बेटी…मैं तो बस तुम्हारे रस को खोना नहीं चाहता था…यह लो।।
जगदीश राय ने टेबल पर पड़े निशा के चूत रस में भीगा हुआ केले का टुकडा, अपने मुह से कुत्ते की तरह उठा लिया।
और एक भाग अपने होठ पर रख दूसरा भाग निशा की मुह के तरफ ले गया।
निशा ने तुरंत केले को खा लिया।
निशा: छी…आपने तो मुझे मेरा ही रस चखा दिया…वैसे बुरा नहीं है…हे हे…
जगदीश राय: पर अब उठने की सोचना भी मत…।मेरा नाश्ता हुआ नहीं है अभी…
निशा: आप जब तक चाहे आज नाश्ता कर सकते है…।में कुछ नहीं बोलूंगी…
जगदीश राय ने, बड़ी ही बारीकी से चूत चाटकर साफ़ करना शुरू किया।
जगदीश राय: बेटी…मैं तुम्हारा गांड भी चाटना चाहता हु…।
निशा (मुस्कुराकर): क्यों नहीं…।
और निशा अपने दोनों हाथो से अपने बड़ी सी गांड के गालो को अपने पापा के लिए खोल दिया।
गाँड के खोलते ही जगदीश राय ने देखा की काफी सारा मक्खन और रस गांड के दरार पर फसा हुआ है।
वही टेबल के ऊपर निशा गांड खोले लेटी रही और यहाँ जगदीश राय गांड को मदहोशी से चाट रहा था।
जगदीश राय: वाह बेटी मजा आ गया…।क्या नास्ता था…ऐसे नास्ता के लिए तो मैं रोज पैदा होना चाहूँगा…।वैसे क्या नाम है इस नाशते का…।निशा बेटी
निशा (शरारती ढंग से इतराते हुए): यह है “निशा का बानाना स्प्लिट”,…।।हे हे हे।।
जगदीश राय हस्ते हुए निशा की चूत पर एक ज़ोरदार चुम्बन चिपका देता है।
निशा अपने हाथ से पापा के सर को पकड़कर अपने चूत में दबा देती है।
जगदीश राय: लगता है मेरे बेटी का चूत और भी प्यार माँग रही है।
निशा अपने दोनों हाथो से चूत को पूरी खोल देति है।
निशा: प्यार के बहुत तरसी है यह।।
जगदीश राय का पूरा मुह निशा की चूत में फस जाता है और वह भवरे की तरह रस चूस चूस कर निकालने लगता है।
थोड़ी देर बाद।।
जगदीश राय: बेटी …अब रहा नहीं जाता…मेंरा लंड और रुक नहीं सकता।।
निशा: वाह पापा…आपका नाश्ता हो गया…मेरे नाश्ता का क्या…।
जगदीश राय:मतलब…।
निशा अपने पैरो से अपने पापा को दुर करती है…
निशा: चलिये …हटिये…
और टेबल पर से छलांग लगाकर किचन की और जाती है। निशा की नंगी गाँड , मटकती हुई , जगदीश राय के लंड को और भी कड़क बना देती है।
निशा के हुकुम के अनुसार वह उसे हाथ नहीं लगा सकता था।
और निशा अपने साथ एक कटोरी में कुछ ले आती है।
निशा: अब आप की बारी…चलिए…टेबल पर जैसे मैं बेठी थी वैसे बैठ जाईये…
जगदीश राय बिना कुछ कहे टेबल पर चढ़ जाता है। और अपना पैर फैला देता है।

