कल निशा की गांड के सामने मैंने अपने हथ्यार कैसे डाल दिए। क्या हुआ मेरे कण्ट्रोल को।
मुझे निशा से बात करनी पडेगी। जो हो रहा है उसे रोकना होगा।
पर क्यों रोकू मैं? क्या मैं खुश नहीं हूँ। निशा की मुलायम गांड से सुन्दर गांड देखी है किसी की। सीमा शादी के वक़्त भी इतनी सुन्दर और सेक्सी नहीं थी।
निशा का क्या क़सूर है। वह सिर्फ मुझे खुश देखना चाहती है। और सारे घर का सारा काम करती है। और उसकी उम्र ही क्या है। और बदले में वह मुझसे शायद थोड़ा दोस्ती मांगती है तो यह क्या गुनाह है।
फिर भी मैं उससे बात करूंगा। पर कैसे? मुझे उससे डरकर या शर्मा कर रहना नहीं चाहिये। मैं उसका बाप हूँ कोई बॉयफ्रेंड नही। मैं ज़रूर उससे बात करुँगा।”
जगदीश राय यह सब सोचकर उठा, फ्रेश होकर, निचे ड्राइंग रूम में आकर बैठ गया।
निशा मैक्सी पहने, हाथ में चाय लेके आई।
निशा: उठ गए पापा। क्या बात है। बड़ी गहरी नींद थी। लगता है कल आप बहुत थक गए थे।।
यह कहकर निशा हंस दी।
जगदीश राय न चाहते हुआ भी शर्मा गये।
जगदीश राय: नहीं…।। बस…। युही…। लेटा रहा…।
तभी आशा और सशा दौड़ते हुए आयी, और टेबल पर पड़ी टोस्ट लेकर भाग गयी।
सशा: पापा , स्कूल बस आने ही वाली है…। लेट हो गये हम लोग…। शाम को मिलते है।
जगदीश राय: हाँ हाँ…। ठीक से पढ़ाई करना…।
निशा सशा के पीछे दरवाज़ा बंद करने ही वाली थी, तभी गुप्ताजी दिख गये। वह निशा की सेक्सी बॉडी को घूरे जा रहा था। निशा ने अपने मैक्सी को ठीक किया।
निशा: अरे अंकल आप यहा।
गुप्ताजी: निशा बेटी… कैसी हो… कॉलेज वैगरा ठीक है न…
निशा: हाँ अंकल सब ठीक है।
गुप्ताजी: कहाँ है अपने स्टंट मैन…। बस में स्टंट करते हुए गिर पड़े…।राय साहब, कहाँ हो?
जगदीश राय: अरे गुप्ता जी आप। आईये आइए, बेठिये।।।
गुप्ताजी: अब आपकी हालत कैसी है…। दर्द कम है या नहीं…।
जगदीश राय: अरे अब तो मैं एक दम ठीक हु…। ज़ख्म से भी दर्द नहीं है… और बॉडी पेन भी ग़ायब है।। बस पूरा नौजवान बन गया हु… ह। ह
गुप्ताजी: अरे वह…। मैंने तो सोचा था राय साहब तो गए एक महीने के लिये। यहाँ तो आप दो ही दिनों में ठीक हो गये।
निशा: वह तो होगा ही…। उनकी नर्स भी तो मैं ही हु…हे हे।
गुप्ताजी: हाँ… बेटी के प्यार ने ही जादू दिखाया होगा…।क्यों राय साहब…।बहुत सेवा करवा रहे हो क्या बेटी से…
जगदीश राय के मन में पिछले दिनों की सीन्स फ़्लैश बैक की तरह दौड गयी।
जगदीश राय (शर्माते हुए): अरे नहीं नहीं…कुछ भी बोलती रहती है… निशा, गुप्ताजी के लिए चाय तो बनाओ…
गुप्ताजी: अरे नहीं नहीं… मैं तो मॉर्निंग वाक के लिए निकला था…चाय पीकर निकला हूँ… फिर आऊंगा कभी …बिटिया के हाथ से खाना भी खाके जाऊंगा है है हा…।
और जाते जाते भी मैक्सी के ऊपर से निशा की फुटबॉल जैसे बड़े मम्मो को घूरते हुए चला गया।
निशा(मन में): ठरकी बुड्ढा… तू आ तुझे खाना नहीं…ज़हर देती हूँ…
फिर निशा रोज़ के काम काज पर लग गयी। उसने 11।30 बजे तक जगदीश राय से कुछ भी नहीं बोली…
पर जगदीश राय पेपर की आड़ लिए निशा को देखे जा रहा था। मैक्सी के ऊपर से निशा का हर अंग उभर कर आ रहा था।
और पेपर के अंदर से अपने लंड को सहला भी रहा था।
थोड़ी देर बाद निशा अपने पापा के सामने आकर खड़ी हो गयी और फैन से हवा खाने लगी।
निशा: ओह पापा… कितनी गर्मी है…हमे ए सी लगा देनी चाहिये…
जगदीश राय (ड्रामा स्टाइल में, पेपर हटाते हुए): हाँ… लग सकती है…
निशा पसीने में लथपथ खड़ी थी… मैक्सी पूरी तरह उसके मम्मो , पेट और जांघ से चिपक गई थी।
जगदीश राय निशा को घूरे जा रहा था। निशा इस बात से अन्जान नहीं थी। उसने पुरी कॉन्फिडेंस से अपने बदन के अंगो को पापा को दिखा रही थी।
कुछ देर बाद वह अपने कमरे में चली गयी। जगदीश राय ने राहत की सास ली। उसका लंड खड़ा हुआ था।
जगदीश राय फिर अपने आप को पेपर के पीछे छुपा दिया।
तभी निशा नीचे आ गयी।
निशा: उफ़… अब कुछ राहत है…गर्मी ने तो मार दिया…
जगदीश राय ने जब देखा तो उसके सोने-जा रहा लंड फिर फड़फड़ना शुरू कर दिया।

