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जगदीश राय।: हाँ बेटीईई…।आहह अह्ह्ह अह्ह्ह्ह…ओह…गूड…।।आह मत रुको आआह आआआअह।

निशा जो पहली बार लंड से पानी निकला हुआ महसूस कर रही थी, लंड से निकले पानी की गर्मी को जानकर चीख पडी।

निशा: आआह पापा… ओह्ह्ह्ह।

निशा ने अपने हाथ को पापा के लंड से नहीं उठाया। वह अपने पापा के लंड के हर उड़ान को महसूस करना चाहती थी।
जगदीश राय कम-से-कम 1 मिनट तक झड़ता रहा। झडते वक़्त , सहारा देते हुये, निशा ने बाहों से लंड को दबाये रखा।

लंड से निकली वीर्य से पापा की लुंगी पूरी गिली और चीप-चिपी हो गयी थी और लूँगी निशा के हाथ से चिपकी हुई थी।

निशा अपने पापा हो न देखते हुये पैरों की तरफ मुड़कर लेटी रही और जगदीश राय के साँसों को सम्भालने का इंतज़ार करने लगी। और साथ ही खुद भी संभल रही थी।

करीब पुरे 5 मिनट के बाद जब निशा ने महसूस किया की लंड अब छोटा हो गया है।

वह धीरे से उठी। जगदीश राय निशा की तरफ देखे जा रहा था। जगदीश राय शॉक में था। निशा ने पापा की तरफ नहीं देखा। उसने धीरे से बाहों से पापा की चिपकी हुई लूँगी निकाल दी। अपने शर्ट को सीधा किया और खड़ी हो गई।

निशा: आज के लिए मेरे ख्याल से इतना मसाज ठीक है… क्यों … ठीक है पापा

जगदीश राय।: हाँ …।। बेटी।

पुरे रूम में एक अजीब सी ख़ामोशी थी। निशा तेल की डिब्बी उठाई और दरवाज़े पर मुडी ।

निशा: अब आप आराम करिये। और लूँगी जो ख़राब हो गयी है उसे वहां फेक दिजीए। धोने की ज़रुरत नही। मैं धो दूंगी, समझे पापा।

जगदीश राय ने शरमिंदा नज़रों से निशा की तरफ देखा। निशा प्यार से उसके तरफ देख रही थी।

जगदीश राय ने सर झुका कर सर हामी में हिला दिया।

निशा कमरे से बाहर आ गयी। कमरे से बाहर आकर वह खड़ी होकर मुस्कुरा दी।

निशा को अब अपने पापा अब अच्छे लग रहे थे। पापा जो थोड़े घबराये हुये, थोड़े शरमाये हुए और थोड़ा हिम्मत जुटाते हुये। निशा को अब अपने पापा से प्यार हो गया था। एक अनोखा प्यार जो सिर्फ वह ही समझ सकती थी…।

निशा अपने कमरे में घूस गयी। पापा के साथ हुए हर पल तेज़ी से मन में दौड रहा था।
सोचने से, वह और गरम हुए जा रही थी। निशा ने देरी नहीं दीखाते हुए , शर्ट उतार फेकी। और फिर पैंटी। और पूरी नंगी हो गयी।
चुत में आग लगी हुई थी चूत से पानी बहकर जाँघो तक पहुच गया था।
चुत पर ऊँगली लगाते ही वह अकड गयी और एक ही पल में कमर उछालकर झड़ने लगी।
झडते वक़्त एक ही सोच दिमाग में कायम था उसके पापा का झड़ता हुआ लंड़।
वह इतने जोर से झडी थी , की थकावट से कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला।

दरवाज़े पे बजे बेल के आवाज़ ने उसे जगा दिया। जल्द से उसने टीशर्ट और शॉर्ट्स पहन लिया और दरवाज़ा खोला।

आशा: कहाँ थी दीदी, कब से बेल बजा रही हूँ।

निशा: दो ही बार बजाए, सशा कहाँ है।

आशा: आ रही है, किसी दोस्त से बात कर रही है। ये देखो मैं क्या लायी हूँ। रैबिट का टेल। इसे मैं भी पहन सकती हूँ, देखो।

निशा: क्या… क्या है यह्। और तू क्यों पहनेगी। भला कोई जानवर का टेल पहनता है क्या।

आशा: अरे दीदी यह रियल रैबिट का टेल नहीं है। यह तो आर्टिफीसियल है। और इसे पहनकर मैं बनी रैबिट जैसे लगूँगी।

निशा: क्या बकवास…स्पाइडरमैन को जैसे स्पाइडर ने काटा था वैसे तुझे रैबिट ने काटा है लगता है। चल जा मुझे खाना बनाना है। तेरे बचपना के लिए टाइम नहीं है

आशा: यह बचपना नहीं है…।आप को पसंद नहीं तो आप की मर्ज़ी…

और वह चल दी। थोड़ी देर में सशा आ गयी।

बाकी का दिन ऐसे ही निकल गया। जगदीश राय खाना खाने नीचे आए। खाना खाते वक़्त जगदीश राय निशा से नज़रे चुराते रहे। उन्हे ताजुब हो रहा था की इतना सब होने के बावजूद निशा के चेहरे पर कोई शर्म या अपराध बोध (गिल्ट) नहीं था।

खाना परोसते वक़्त निशा पापा के बहूत क़रीब आकर खाना परोस रही थी, पर जगदीश राय उससे बच रहा था।
खाना खाते वक़्त आशा और सशा के बड़बड़ के बीच निशा पापा को घूरे जा रही थी।
निशा आज रात पापा को न दूध देने गयी न मसाज करने गयी।

रात को निशा दिन में हुए घटने पर विचार कर रही थी। एक बात वह जान चुकी थी की पापा को वह पसंद है पर भोले होने के कारण डर रहे है। इतना आगे बढ़ने के बाद वह अब पीछे नहीं जा सकती ।
उसके माँ के बाद इस घर की औरत वही है , और वह यह कर्त्तव्य पूरा करेगी। वह अपने पापा को माँ की याद में उदास नहीं होने देगी। चाहे इसके लिए उसे कुछ भी करना पडे।

अगले दिन जगदीश राय की नींद प्लेट के गिरने की आवाज़ से खुल गयी। क्लॉक पर 9 बज चुके थे। वह आज बहूत लेट उठा था।

जगदीश राय(मन में): “मैं रोज़ 7 बजे से पहले उठता हूँ, और आज इतने सालो बाद लेट उठा हूँ। आजकल सब बदल रहा है। मैं बदल रहा हूँ। निशा बदल रही है। और घर का माहौल बदल रहा है। क्यों?

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