जगदीश राय दूध पीकर गिलास निशा को दे दिया, जो उसके तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी।
निशा मुडी और दरवाज़ा के तरफ बढी। जगदीश राय पीछे से निशा की मटकती बड़ी गांड को देख रहा था। वह अब मैक्सी में और भी सेक्सी लग रही थी।
जगदीश राय: बेटी , यह मैक्सी तो माँ की है न।
निशा: हाँ पापा, मुझे आज मैक्सी पहनने का मन किया। क्यों कैसी लग रही हूँ।
जगदीश राय: अच्छी लग रही हो।
निशा: हाँ थोड़ी टाइट है मेरे लिये, यहाँ चेस्ट और हिप्स पर। बाकि सब ठीक है।
जगदीश राय निशा की चूचियों को देखा जो मैक्सी में समां नहीं रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे दो फुटबॉल घुसा दिया हो। जगदीश राय के मुह में पानी आ गया।
निशा अपने पापा की यह हालत समझ गयी। और मुसकुराकर बोली।
निशा: अब सो जाइए। फ़िज़ूल की बातें सोचकर जागकर रात मत काटिये।, हा हा।
और अपने गाण्ड को मटकाकर चल दी।
जगदीश राय के लंड को उनके हाथ का स्पर्श जानते हुआ देर नहीं लगी।
कमरे से निकलकर निशा अपने रूम में चलि गयी। जाते जाते आशा और सशा को आवाज़ दी।
निशा: तुम दोनों सो जाओ अब। मोबाइल पर खेलना बंद करो।
रूम में से: ठीक है मैडम हिटलर।
निशा समझ गयी की यह तो आशा ही है जो इतनी बदतमीज़ी कर सकती है।
अपने रूम में जाकर लेट गयी। उसके माँ को गुज़री 6 महीने हो चुके थे। आज पहली बार उसे एक अजीब सी ख़ुशी और आश्वासन मिला था। वह समझ गयी की आज तक वह अपने पिता के लिए चिन्तित थि, आज उसे जवाब मिल गया था। वह मुस्करायी।
अपने पापा के लम्बे लंड के बारे में सोचते सोचते कब आँख लग गयी पता नहीं चला।
दूसरे दिन, निशा फिर रोज़ के काम में लग गयी। पापा को चाय दे दिया, सबका खाना बना दिया। खुद कॉलेज चली गयी और सारा दिन गुज़ार गया। पापा भी थोड़े लेट आए ऑफिस से। और सीधे खाना खाके रूम में चल दिए।
निशा ने देखा की उसके पापा उसको अवॉयड कर रहे है। आँख नहीं मिला रहे है। बात भी खुलकर नहीं कर रहे है। उसे अब अपने बरताव पर थोड़ा पछ्तावा होने लगा था। उसे डर लग गया की कहीं उसका और पापा का फ़ासला बढ़ तो नहीं गया, बल्कि कम होने के बदले।
वह पापा को अपना प्यारे दोस्त के रूप में देखना चाहती थी।

