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तभी जगदीश राय के हाथ से दाल की कटोरी फिसल गयी और थोड़ी सी दाल फर्श पर गिरी।
जगदीश राय: ओह न, सोर्री। मैं साफ कर दूंगा। तुम लोग खाओ।
निशा: पापा आप रुकिये। मैं साफ़ कर देती हूँ।
फिर निशा किचन से एक पोछा ले आई।
निशा: पापा, आज कल आप फर्श बहुत गन्दा कर रहे है। क्या बात है?

जगदीश राय यह सुनकर दंग रह गया। उसने निशा की तरफ देखा, उसके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान थी।

जगदीश राय: मैं…।नही तो…क्यूं

निशा: कोई बात नही। मैं तो साफ़ कर ही लूंग़ी। अआप बस गिराते रहिये।

जगदीश राय कुछ नहीं बोला। वह चुप चाप प्लेट की तरफ देखकर खाने लगा। सशा और आशा कुछ समझ नहीं पा रही थी।

जगदीश राय जल्द से खाना ख़तम करके वहां से चला गया। और सीधे रूम पर जाके लेट गया।

वह पुरे दिन की घटनाओ को सोच रहा था और अपने सब सवालो पर सवाल कर रहा था। जवाबो की उससे कोई उम्मीद नहीं थी, बल्कि जवाबो से उसे थोड़ा डर लग रहा था।
निशा की चूत और आशा की गाण्ड उसके ऑंखों के सामने बार बार आ रहे थे। उसका लंड अब लोहे ही तरह तना हुआ था।

तभी, डोर पर एक नॉक सुनाई दी। इसके पहले वह कुछ बोले, दरवाज़ा खुल गया और निशा खड़ी थी। वह एक मैक्सी पहनी हुई थी और जगदीश राय ने जाना की वह उसकी स्वर्गवासी पत्नी की मैक्सी थी।

जगदीश राय : निशा बेटी तुम।
निशा: हाँ , मैं हु आपके लिए दूध लेके आयी हूँ।
जगदीश राय : लेकिन मैं तो दूध नहीं पिता रात को
निशा: लेकिन आज से आप पिएँगे, सोने से पहले। 10।30 हो गयी है, लो पी लो। इसमें काजू और पिस्ता भी डाला हुआ है, आपके सेहत के लिये।
जगदीश राय : पर यह सब मेरे लिए…क्यों…
निशा: क्यों की आज से आपका ख्याल मैं रखूँगी। अब ज्यादा सवाल मत कीजिये।

जगदीश राय कापते हाथो से गिलास लेकर होटों पर लगा दिया। निशा की नज़र अपने पापा के शरीर पर गुज़र रही थी। और जाकर रुकि उनकी पायजामें पर। उसे अपने पापा का मोटा और खड़ा लंड साफ़ दिखाई दे रहा था। और बिना किसी शर्म के उसे घूरे जा रही थी।

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