टोना टोटका – Update 18
रुपा के साथ टोटके के लिये जाते समय से ही राजु की ये इच्छा हो रही थी की वो एक बार सामने से अपनी जीज्जी को पिशाब करते हुवे अच्छे से देखे, मगर उस समय डर व के शरम के कारण वो ये हिम्मत नही कर पाया था, अब फिर से रुपा के साथ इतना सब कुछ हो जाने के बाद उसमे भी थोङी हिम्मत सी आ गयी थी इसलिये ये मालुम होते ही की उसकी जीज्जी बाहर पिशाब करने गयी है तो राजु ने तुरन्त बिस्तर से उठकर वही कमरे मे ही रखे टोटके वाले थैले से ढुँढकर टाॅर्च को निकाल लिया…
इधर बाहर आकर रुपा ने कोने मे जो नहाने धोने के लिये जो सिल सी जमा रखी थी वहाँ तक भी जाना मुनासिब नही समझा, शायद उसे कुछ ज्यादा ही जोरो की पिशाब लगी थी या फिर अपनी चुत मे भरे हुवे राजु के वीर्य से उसे खुजली सी हो रही थी इसलिये वो ऐसे ही आँगन मे नाली के पास जाकर सीधे मुतने बैठ गयी, और नीचे बैठकर उसने अब जैसे ही अपनी चुत की मांसपेशियों पर जोर लगाया, उसकी चुत से मूत की धार के साथ साथ…
“श्श्शशूर्र.श्.र्र्.र्र.श्शर्रर्रर्र… ” की सीटी की सी आवाज घर के पुरे आँगन मे गुँज सी गयी…
तब तक राजु भी टाॅर्च को जलाकर बाहर आ गया था इसलिये अपनी जीज्जी की चुत से मूत की धार के साथ निकलती… “श्श्शशूर्र.श्.र्र्.र्र.श्शर्रर्रर्र…” की आवाज उसके कानो तक भी पहुँची तो उसका लण्ड अब फिर से तुरन्त हरकत मे आ गया, मगर रुपा कमरे के दरवाजे की ओर ही मुँह करके मुत रही थी इसलिये राजु के टाॅर्च जलाकर बाहर आते ही..
“तु यहाँ क्या लेने आया है..?” उसने राजु को देखते ही पुछा, मगर नीचे अपनी चुत से वो अभी भी पिशाब की धार को छोङती रही जिससे राजु ने कुछ कहा नही बस धीरे से उसके पास जाकर टाॅर्च की रोशनी को सीधा रुपा की चुत की ओर घुमा दिया…
अब टाॅर्च की रोशनी के पङते ही रुपा के खुद के चुतरश व राजु के वीर्य से लिपी पुती उसकी नँगी चुत व उसकी गोरी चिकनी नँगी जाँघे एकदम चमक सी उठी जिससे राजु को उसकी नँगी चुत व चुत की फाँको के बीच से निकलती पिशाब की मोटी धार का झरना तक साफ नजर आया। ढेर सारा एकदम गाढा गाढा व गोँद के जैसा चिपचिपा सफेद वीर्य अभी भी उसकी जाँघो पर लगा हुवा था तो काफी सारा वीर्य अभी भी चुत के मुँह मे भरा हुवा था जो बदन की गर्मी से पिँघलकर पिशाब मे मिलकर चाशनी की लार के जैसे नीचे जमीन पर रह रहकर टपक रहा था।
रुपा की चुत से निकलकर दुर तक जाती पिशाब की मोटी धार व नाली मे बहकर जाते उसके पिशाब तक को वो अच्छे से देख पा रहा था इसलिये अपनी जीज्जी की नँगी चुत व चुत की फाँको के बीच से निकलती मुत की मोटी धार को देख राजु का लण्ड झटके से खाने लगा तो वही रुपा उसकी इस हरकत से झेँप सी गयी, क्योंकि राजु से उसे ये कतई उम्मीद नही थी की वो ऐसा भी कुछ कर सकता है जिससे कुछ देर तो वो समझ ही नही सकी वो क्या करे.. और क्या ना करे..?
ये सब इतनी जल्दी हुवा की रुपा को सम्भलने का मौका ही नही मिला, जिससे कुछ देर तो वो ऐसे ही जाँघो को फैलाये अपनी चुत से मुत की धार छोङती रही… और राजु उसकी नँगी चुत व चुत से निकलते उस सुनहरी झरने को देखता रहा..मगर इस तरह राजु के टाॅर्च की रोशनी मे उसे पिशाब करते देखने से रुपा को जोरो की शरम सी आ रही थी इसलिये …
“बदमा्आ्आ्आ्श्…!” जोरो से कहते हुवे उसने पहले तो अपने सुट को ही सीधा करके अपनी चुत को छिपाने की कोशिश की, मगर सुट इतना बङा भी नही था की नीचे उसकी चुत को छिपा सके। सुट बस घुटनो तक ही तो होता है इसलिये सुट को सीधा करके वो बस अपनी नँगी जाँघो को ही उपर से ढक सकी। राजु को भी जैसे उसकी चुत से फुटते उस सुनहैरी झरने को देख साँप सा ही सुँघ गया था, क्योंकि अपने जीवन मे ऐसा नजारा वो पहली बार देख रहा था इसलिये उसकी नजरे बस उसकी चुत व चुत से निकल रही मुत की मोटी धार पर ही जमकर रह गयी थी, तो उसकी चुत से मूत की धार के साथ निकल रही सीटी की सी आवाज को सुनकर वो मानो जैसे वो मन्त्रमुग्ध सा ही होकर रह गता था।
वैसे तो राजु के साथ उसने इतना सब कर लिया था मगर फिर भी उसके इस तरह पिशाब करते देखने से रुपा को जोरो की शरम आ रही थी। वो अब अपनी चुत को तो छिपा नही सकी थी इसलिये राजु की ओर देखकर…
“बेशर्म..! कहते हुवे रुपा ने शर्म से अपनी गर्दन को घुमा कर दुसरी ओर कर लिया.. तब तक वैसे भी उसके पिशाब की थैली खाली हो गयी थी इसलिये राजु से नजरे चुराकर उसने अब अपनी चुत से तीन चार छोटी छोटी सी पिशाब की पिचकारियाँ सी तो छोङी फिर…
“ओय्..बेशर्म..! अब देख क्या रहा है जा पानी लाकर दे मेझे..!” रुपा ने नीचे बैठे बैठे ही अब राजु की ओर देखते हुवे कहा जिससे…
“ह्.ह्.हाँ..हाँ.. जीज्जी…!” कहते हुवे वो तुरन्त एक डब्बे मे पानी भरकर ले आया।
रुपा भी अब अपनी चुत पर पानी डाल डालकर हाथ से उसे धोने लगी, मगर पानी का डब्बा छोटा ही था जो की रुपा के दो चार बार अपनी चुत पर पानी डालते ही खत्म हो गया इसलिये…
“नीचे से सारी ही गन्दी कर दी मुझे, जा एक डब्बा और लाकर दे..!” रुपा ने अब नीचे अपनी चुत की ओर देखते हुवे कहा और पानी का खाली डब्बा राजु की ओर बढा दिया जिससे राजु अब फिर से उसे पानी से भरकर ले आया।
अच्छे से अपनी चुत को धोकर रुपा ने खाली डब्बा राजु को थमा दिया और उठकर कमरे मे चली गयी। कमरे मे जाकर वो अब ऐसे ही सीधे बिस्तर पर जाकर लेट गयी थी, तब तक राजु भी खाली डब्बे को रखकर वापस कमरे मे आ गया। उसने अभी भी टाॅर्च जला रखी थी जिसकी रोशनी उसने अब सीधे रुपा की नँगी जाँघ की ओर कर दी जिससे…
“ओय्.. बेशर्म..! क्या कर रहा है, बन्द कर इसे अब..!” रुपा ने घुटनो को मोङकर जाँघो से अपनी चुत को छिपाते हुवे कहा।
रुपा के घुटनो को मोङकर अपनी चुत को छुपा लेने के बाद भी पीछे उसके कुल्हो के पास से दिखाई देती उसकी छोटी सी व एकदम फुली हुई चुत की फाँके ऐसी दिख रही थी मानो जैसे रुपा ने सन्तरा यस मौसम्बी की दो कलियो को जोङकर अपनी जाँघो के बीच दबा रखा हो जो की जाँघो के भीँच लेने की वजह से उभरकर बाहर निकलने को हो रही थी। अब राजु ने कभी चुत देखी तो थी नही इसलिये उसके लिये ये असनँजस की स्थिति हो गयी थी, क्योंकि आगे से चुत अलग दिखाई देती है और पीछे से अलग, इसलिये…
“व्.व्.वो्.. ज्.ज.जीज्जी्..म्. म् मुझे द्.दे्.देखना है..!” राजु ने अब टाॅर्च की रोशनी मे उसे देखते हुवे कहा जिससे..
रुपा: अब क्या देखना रह गया, बेशर्म..!
राजु: व्.व्.वो्.अ्.अ्आपकी ये….!
उसने रुपा की जाँघो के जोङ की ओर इशारा करते हुवे कहा, रुपा भी समझ गयी थी की उसे क्या देखना है मगर उसे अब अपनी चुत दिखाने मे शर्म सी आ रही थी इसलिये…
रुपा: हट्.. बेशर्म, शरम नही आती क्या तुझे..? चल बन्द करके रख अब इसे..!
राजु: द्.द्.देखने दो ना जीज्जी एक बार..!
रुपा: अब क्या देखना रह गया, बेशर्म..! देख तो रहा था बाहर..
राजु:- व्.व्. वो्.ठीक से नही दिखा..!
तब तक वो रुपा के पास ही पलँग पर बैठ गया और एक हाथ से टाॅर्च को पकङे पकङे दुसरे हाथ से उसने अब धीरे से रुपा के घुटनो को खोलने की कोशिश करते हुवे कहा, मगर रुपा ने अपने घुटनो को भीँचे रखा और
रुपा: हट् बेशर्म ये क्या रहा है..?
राजु: द्.द्.देखने दो ना जीज्जी एक बार..!
रुपा: बाहर देख तो रहा था बेशर्म, अब क्या देखना बाकी रह गया..?
रुपा ने अब राजु के हाथो को अपने घुटनो पर से हटाते हुवे कहा तो…
“व्.व्. अ्.आ्पकी….च्.चु्. चुत..!” उसने शर्म के मारे गर्दन झुकाकर अब हकलाते हुवे कहा जिससे..
रुपा: ओ्.ओ्य्.य्.. बेशर्म..!
राजु के मुँह से चुत का नाम सुनकर रुपा का मुँह अब खुला का खुला ही रह गया और..
रुपा: बदमाश..? बहुत बिगङ गया है तु..! कौन सिखाता है तुझे ये सब बाते…?
राजु: क्या…?
रुपा: यही जो तु बोल रहा है..!
राजु: व्. व्.वो ग्.गप्पु ने बताया था..!
भले ही राजु अभी अनाङी था मगर जिस तरह से उसने यहाँ भी और टोटके के समय वहाँ भी उसकी चुत की कुटाई की थी उससे जाहिर था की वो अभी बच्चा नही रहा है इसलिये..
रुपा: हा.हाँ..देख रही हुँ..आजकल तु उसके साथ रह रहकर बहुत बिगङ गया है…!
राजु: पर जीज्जी अब तो देखने दो ना एक बार..!
रुपा: नही्.. बस तु बन्द कर ये टाॅर्च अब…!, और फिर से लेनी है तो अब आकर चुपचाप लेट जा..!
राजु: क्या..?
रुपा: यही जो तुझे देखनी है..!, फिर से करना है तो आकर लेट आ इधर..!
रुपा ने सोचा फिर से करने की बात सुनकर वो उसकी चुत को देखने की जिद् छोङ देगा मगर..
राजु: पर एक बार देखने दो ना जीज्जी, बस एक बार..!, फिर आकर लेट जाऊँगा.. बस एक बार..!
राजु अब मिन्नत सी करने लगा जिससे..
रुपा: नही्. बाहर देख तो रहा था, अब क्या देखना बाकी रह गया..!
राजु: बस एक बार जीज्जी..! बस बस एक बार देखने दो ना..!
मिन्नत के साथ साथ राजु अब गिङगिङाने सा लगा तो रुपा ने भी अब अपने घुडनो को थोङा ढीला छोङ दिया जिससे राजु ने अब उसके घुटनो को खोलकर जाँघो खोल दिया। रुपा को अब शर्म तो आ रही थी मगर फिर भी…
“ले देखले ले क्या देखना है बेशर्म..! उस गप्पु के साथ रह रहकर बहुत बिगङ गया है तु..!” कहते हुवे उसने भी अपनी जाँघो को खोलकर फैला सा दिया जिससे उसकी एकदम गोरी चिकनी व पाव रोटी के जैसे फुली हुई छोटी सी चुत अब राजु के सामने थी जिसे देख अब कुछ देर तो वो साँस लेना तक भुल सा गया तो वही शरम के मारे रुपा ने अब अपनी गर्दन को एक ओर घुमाकर कस कर आखे मिच ली ताकी राजु उससे नजरे ना मिला सके…
राजु भी अब आँखे फाङे बस अब उसकी चुत को ही देखे जा रहा था, क्योंकि एकदम गोरी चिकनी माँसल जाँघो के बीच उसकी फुली हुई चुत ऐसी लग रही थी मानो उसने अपनी जाँघो के बीच कोई पाव रोटी दबा रखी हो, रुपा की चुत पर ज्यादा घने व बङे बाल भी नही थे। रुपा ने कुछ दिन पहले अपनी चुत को साफ किया था जिससे उसकी छोटी सी चुत एकदम चिकनी व बेहद ही कमसिन लग रही थी।
रुपा के अपने घुटनों को मोङकर जाँघो को फैला लेने से उसकी चुत की फाँके भी थोङा खुल गयी थी जिससे चुत के अन्दर का गुलाबी भाग तक राजु को अब साफ नजर आ रहा था। एकदम गोल मटोल कचौङी की तरह फुली हुई रुपा की छोटी सी चुत व उसके अन्दर का गुलाबी भाग को देखकर ऐस लग रहा था मानो पाव रोटी को चाकु से बीच बीच काटकर उसमे सिन्दूरी रँग भर रखा हो। चुत की फाँको के बीच रुपा की साँसो के साथ हल्के हल्के हिलता चुत का नन्हा सा गुलाबी दाना, व उसके ठीक नीचे चुत की सँकरी गुफा के द्वारा से हल्के हल्के रिश्ते चुतरश से नम उसकी चुत और भी हसिन लग रही थी। अपने जीवन मे राजु पहली बार इतने करीब से नँगी को चुत देख रहा था इसलिये अपनी जीज्जी की नँगी चुत को देख कुछ देर तो राजु की साँसे जैसे थम सी गयी थी।
इस तरह राजु को अपनी चुत दिखाने मे रुपा को शरम तो आ रही थी, मगर उसने भी सोचा की जब राजु के साथ ये सब करना ही है तो उससे कब तक शरमाती रहेगी, वैसे भी उसका पति तो उसे ये सुख दे नही पाया था और राजु उसे जब उसे ये सुख दे रहा है तो उससे वो शरमा रही है, इसलिये उसने भी सोचा की जवानी के जो मजे उसे उसका पति नही दे पाया है अब क्यो ना वो सारे सुख राजु के साथ ही हासिल कर ले इसलिये अपनी नँगी चुत को राजु के आगे परोसकर वो भी अब चुपचाप आँखे मिचे पङी रही..
राजु के उसे पिशाब करते देखने से उसे पहले ही अपने बदन मे उत्तेजना सी महसूस हो रही थी। अब कुछ तो राजु से बाते करके, व कुछ इस तरह उसे अपनी चुत दिखाकर रुपा की चुत मे फिर से पानी भर सा आया था जिससे उसकी चुत की फाँके नम सी होती गयी तो वही चुत के मुँह से तो हल्का हल्का कामरश भी बहने लगा, मगर तभी चुत के मुँह पर लगी सफेद पारदर्शी व गाढी चाशनी की सी लार ने राजु का ध्यान खीँच लिया जो की चुत के मुँह से निकलकर उसकी एक जाँघ तक तार के जैसे खिँचकर लम्बी हो रखी थी।
वैसे तो ये रुपा की चुत का रश ही था मगर थोङा गाढा व गोँद के जैसे एकदम चिपचिपा था इसलिये चाशनी की तरह लम्बी लार के जैसे खीँच रहा था। शायद रुपा के अपने घुटनो को मोङ लेने के कारण ये चुत के मुँह से निकलकर उसकी जाँघ तक लम्बी लार के जैसे खीँच सा गया था। अभी तक राजु ने रुपा की चुत को छुवा नही था वो बस उपर उपर से चुत की बनावट को ही देख रहा था मगर उसके मन मे उसकी चुत की फाँको को खोलकर अच्छे से देखने की भी जिज्ञासा हो रही थी…
अभी तक रुपा शरम के मारे आँखो को मीचे चुपचाप पङी हुई थी मगर राजु ने उसकी चुत की फाँको को खोलने के लिये जैसे ही अब उसकी चुत को छुवा रुपा तुरन्त अपनी जाँघो को भीँचकर..
“ईश्श्श्श्…क्.क्या..कर रहा है बेशर्म…?” कहते हुवे वो एकदम सिसक सी उठी, जिससे राजु ने तुरन्त अपने हाथ को उसकी चुत पर से हटा लिया, मगर जो चाशनी के जैसी लम्बी लार सी उसकी चुत की फाँको पर लगी थी, वो लार अब चुत को छुने से राजु के उँगलियो से चिपक गयी।
राजु ने उस लार को अँगुठे व उँगलियो से मसलकर देखा जिससे वो उसे गोँद के जैसे एकदम गाढी व इतनी चिकनी लगी की उसका अगुँठा व उँगलियाँ भी उससे एकदम चिकने हो गय। राजु ने धीरे से रुपा की नजरो से बचाकर अब अपने हाथ उँगलियो को सुँघकर भी देखा जिससे उसके नथुनो मे एक मादक तीखी व तेज गन्ध सी समा गयी। इस गन्ध को वो अब भलीभाँति पहचानता था, क्योंकि टोटके के समय अपनी जीज्जी की इस गन्ध का वो एक बार पान कर चुका था इसलिये अपनी जीज्जी की चुत की ये मादक गन्ध फिर से पाकर वो अब एकदन बावरा सा हो उठा, उसने तुरन्त अपने अँगुठे व उँगलियो को बारी बारी से मुँह भरकर उन्हे पुरा चाट मारा…
रुपा की चुतरश की की उस चिपचिपी लार को चाटकर राजु का मुँह का स्वाद भी थोङा लिसलिसा तो हो गया था मगर चुतरश के एकदम चिकने व नमकिन स्वाद का जैसे उस पर कोई नशा सा चढ गया जिससे राजु से अब रहा नही गया। अपनी जीज्जी की चुत की इस नमकिन व चिकनी मलाई को चाटने के लिये अपने आप ही उसका सिर अब रुपा की जाँघो के बीच घुसता चला गया जिससे रुपा की चुत की और भी एकदम तीखी व तेज गन्ध उसके नथुनो मे भरती चली गयी…
राजु के मुँह व नाक से निकल रही गर्म गर्म साँसो को अपनी जाँघो पर महसूस हुई तो…
ओय्..छीः.छीः… गन्दे…! य्.ये क्या कर रहा है..?” कहते हुवे रुपा अब उसके सिर को पकङ लिया और उठकर बिस्तर पर बैठ गयी, मगर राजु पर तो जैसे उसकी चुत की महक पाकर कोई खुमार सा चढ गया था इसलिये रुपा के पकङने के बावजुद भी उसने रुपा की चुत की गन्ध का पीछा करते हुवे अपने सिर को उसकी जाँघो के बीच घुसा दिया। अब रुपा जब तक सम्भल पाती तब तन उसने सीधे ही रुपा की चुत के होठो से अपने होठो को जोङ दिया जिससे रुपा अब..
“ईईईश्श्श्श्.. आ्ह्.ओय्.य्..!” कहकर एकदम सुबक सी उठी…
उसने “ओय्..ओ्य्..छीः… य्.ये क्या कर रहा है..?..बेशर्म…!” कहते हुवे राजु के सिर को पकङकर अब अपनी चुत पर से हटाना भी चाहा मगर राजु तो मानो जैसे उसकी चुत की गन्ध पाकर एकदम बावरा सा हो गया था इसलिये रुपा के हटाने के बावजूद भी उसने रुपा की चुत को छोङा नही, बल्की हठ सा करके उसे फिर से बिस्तर पर गीरा दिया और उसकी चुत को पागलो की तरह जोरो से चुशना चाटना शुरु कर दिया जिससे रुपा भी एकदम हाँफ सी गयी।
वो उसकी चुत को इतनी जोरो से चुश और चाट रहा था की रुपा को चुत की फाँको के साथ साथ अपना गर्भाशय तक खीँचकर राजु के मुँह मे समाता सा महसूस हो रहा था मगर उसकी अपनी चुत के प्रति ये दिवानगी देखकर रुपा ने भी उसे अब अपनी चुत पर हटाने की कोशिश छोङ दी और बस मुँह से..
“ईईश्श्श्..ओय्.ह्ह्ह्ह ..
अ्.आ्आ्ह्ह्ह..य्.य्.क्.क्या कर रहा है.धीईरेऐऐ्… ओ्य्..छीः… य्.ये क्या कर रहा है..?..बेशर्म..!” करती रही मगर उसे अब अपनी चुत पर से हटाने की इतनी कोशिश नही की। राजु ने भी उसकी चुत पर से अपने मुँह को अब तब तक नही हटाया जब तक की चुत को चुशते चुशते खुद उसकी साँसे नही फुल गयी….
रुपा की चुत को चुशते चुशते जब वो एकदम हाँफ सा गया और खुद उसे साँस लेने मे दिक्कत होने लगी तब ही उसने अपने सिर को उपर उठाया मगर उसने अब जैसे ही अपने सिर को उपर उठाया रुपा तुरन्त उसके सिर को पककर फिर से बिस्तर पर बैठ गयी और…
“अ्.आ्ह्.ओय.त्.तु्..पागल है क्या.. इतनी जोर से करते है क्या…? और अभी ये गन्दी है बेशर्म..!” रुपा ने उसके सिर को उपर उठाकर उसके चेहरे की ओर देखते हुवे कहा।
“ह्.ह्…हो्…हो्…..
ग्.गन्दी् नही…..
ह्.ह…..ब्.बहुत अ्. अच्छी है..!” राजु ने अपनी उखङती साँसो के कारण हाँफते हुवे मुश्किल से जवाब दिया।
उसका चेहरा भी रुपा के चुतरश भीगकर एकदम तरबतर हो रखा था। मुँह व नाक पर लगे चुतरश से भीगकर अँधरे मे भी उसका चेहरा चमक सा रहा था जिसे देख रुपा को अब शरम सी महसूस हुई इसलिये..
“अच्छा… इतनी ही अच्छी लगती है तो तु मेरे साथ ही क्यो नही चलता, वहा तुझे रोज देखने भी दुँगी और करने भी दुँगी…?” राजु के चेहरे पर लगे अपने चुतरश को देख रुपा ने अब शर्म हया की मुस्कुराते हुवे पुछा।
राजु: “क्.क्या….?”
रुपा: हाँआ्.. मेरे साथ मेरी ससुराल चल… वहाँ तुझे रोज दुँगी करुँगी..
राजु: हाँ.आ्. हाँ….ठीक है.. पर बुवा….? बुवा से क्या कहुँगा..?
रुपा देख रही थी की राजु पहले कभी जल्दी से उसके ससुराल जाने के लिये हामी नही भरता था पर आज उसके साथ वहाँ जाने के लिये इतनी जल्दी मान भी गया था, और वहाँ रहने के लिये भी तैयार हो गया था और ये सारा कमाल किया था उसकी चुत ने, जो वो इतनी आसानी से मान गया था। उसकी माँ ने सही ही कहाँ था की किसी भी मर्द को बस अपने जाँघो के बीच की जगह दिखा दो, फिर वो कुछ भी करने को तैयार है, फिर वो ना रिश्ते नाते देखता है और ना भला बुरा बस उसे इस दो ईँच की जगह मतलब होता है खैर..
रुपा: वो मै देख लुँगी..? तुजे चलना है तो बता..?
राजु: हाँ हाँ ठीक है..! बस आप बुवा से बता देना..! ये कहते हुवे राजु ने अब फिर से उसकी जाँघो बीच अपना सिर घुसाना चाहा मगर..
अ्.अ्.ओ्य्.ओ्य्.. ब् बस् अब..अब क्या है…?” ये कहते हुवे रुपा ने तुरन्त उसके सिर को पकङ लिया।
राजु भी नीचे से नँगा ही था इसलिये उसे अपनी चुत पर से हटाकर…
“ला अब मुझे भी तो दिखा…!” ये कहते हुवे रुपा ने राजु के लण्ड को पकङने के लिये अपना एक हाथ अब नीचे ले जाकर उसके लण्ड की ओर बढा दिया..मगर जैसे उसने राजु के लण्ड को पकङा उसका पुरा बदन कँपकँपा सा गया और वो..
“य.ए..ये..ये… क्.क.क्या.आ..?” कहकर एकदम बङबङाकर सी उठी… क्योंकि राजु का तना खङा एकदम कठोर लण्ड उत्तेजना के मारे तप सा रहा था जिसे हाथ मे लेकर रुपा को अपनी हथेली सुलगती सी महसूस हुई तो वही उसके लण्ड की कठोरता को महसूस कर वो अन्दर तक सहम सी गयी थी।
रुपा के पति का लण्ड अपने पुरे ताव मे आकर भी नर्म ही रहता था, मगर राजु का कुँवारा लण्ड किसी लोहे की राॅड की तरह एकदम कठोर था, तो उत्तेजना के मारे वो तप सा रहा था। उसके एकदम तने खङे व कुँवारे लण्ड को पकङकर रुपा को ऐसा महसूस हो रहा था मानो उसने किसी एकदम लाल गर्म लोहे की जलती सलाख को ही अपने हाथ मे पकङ लिया हो। उसने राजु के लण्ड को अब कस कर ऐसे अपनी मुट्ठी मे भीँच लिया मानो जैसे उसे कोई खजाना मिल गया हो।
राजु ने रुपा की चुत को चुशकर पहले ही उसके बदन मे उत्तेजना की एक आग सी भर दी थी, जो की राजु के एकदम कङे व कुँवारे गर्म लण्ड को पकङकर और भी भङक गयी थी। राजु का लँड भी पहले से ही तन्नाया हुवा था अब अपनी जीज्जी के कोमल हाथो का स्पर्श पाकर वो और भी जोरो से तमतमा कर फुँफकारने लगा जिससे रुपा ने एक हाथ से उसके लण्ड को पकङे पकङे ही अब दुसरे हाथ से राजु को अपनी ओर खीँचकर उसके होठो जोरो से चुसना चाटना शुरु कर दिया…
राजु का पुरा चेहरा रुपा की चुत के रश से लिपा पुता था तो उसके होठ व मुँह तो उसकी चुत के रश से भरे पङे थे। अब राजु के होठो को चुशने से रुपा के मुँह मे भी उसकी खुद की चुत का रश घुलने लगा तो रुपा की हवश की आग और भी भङक गयी जिससे उसने राजु के होठो को चुशते चुशते ही उसे बिस्तर पर नीचे गीरा लिया और खुद उसके उपर चढकर बैठ गयी। वो राजु के होठो को जोरो से चुश चाट तो रही ही थी, बीच बीच मे उसके होठो को दाँतो से भी काट ले रही थी मगर राजु अब कुछ भी नही कर पा रहा था।
राजु के उपर चढकर रुपा उसके दोनो ओर पैर करके उसके उपर लेट सी गयी थी। राजु से बदन मे तो वो थोङा भारी थी ही उपर से राजु के उपर चढकर उसने राजु को अपने भार तले दबाकर जैसे कोई बिल्ली कबुतर को दबोच लेती है वैसे ही रुपा ने राजु को एकदम दबोच सा लिया था जिससे रुपा के उसके होठो को काटने पर वो किसी भीग्गी बिल्ली की तरह मिमियाँ सा तो रहा था पर चाहकर भी कुछ कर नही पा रहा था। उसे कुछ समझ नही आ रहा था की उसकी जीज्जी को आखिर ये हुवा क्या है..?
रुपा ने भी उसके उपर चढकर अब कुछ देर तो उसके होठो को चुशा फिर अपने घुटनो के बल खङी हो गयी और एक हाथ से राजु के लँड को पकङकर अपनी चुत के मुँह पर लगा लिया… राजु को अब अपने लँड पर उसकी गीली चुत की गर्मी महसूस हुई तो वो भी सुबक सा उठा, मगर रुपा ने उसके लँड को अपनी चुत के मुँह पर लगाकर अब एक बार तो राजु की तरफ देखा… फिर अपने शरीर को कङा सा करके तुरन्त झटके से उस पर बैठ गयी और एक ही बार मे अपनी भुखी चुत से राजु के पुरे लण्ड को निगल गयी…
रुपा के एक बार मे ही अपनी चुत से राजु के पुरे लण्ड को खा जाने से राजु अब सिसक सा उठा, तो वही रुपा के मुँह से भी .. “ईईश्श्श्..आआआह्ह्ह्ह्….इईई.श्श्शशह्…” की सित्कार सी फुट पङी, शायद एक बार मे ही राजु के एकदम कङे व कुँवारे लँड को अपनी चुत से निगल लेने से रुपा को पीङा हुई थी मगर उत्तेजना व आनन्द के वश उस सारे दर्द को वो पी गयी…
राजु की कब से ये तमन्ना रही थी की वो अपनी जीज्जी की चुँचियो को छुकर देखे.. अब जिस तरह रुपा उस पर सवार होकर उसके लण्ड को अपनी चुत मे निगले बैठी थी वो खुद तो कुछ कर नही पा रहा था इसलिये उसने अपने दोनो हाथो को उठाकर रुपा चुँचियो को पकङ लिया। रुपा नीचे से तो एकदम नँगी थी मगर उपर अभी भी वो सुट व उसके नीचे ब्रा पहने हुई थी इसलिये राजु ने जैसे ही उसकी चुँचियो को पकङा, रुपा ने अब खुद ही अपने हाथो को उठाकर पहले तो अपने सुट को उतारा, फिर ब्रा को भी उतार कर राजु के हाथो मे अपनी नँगी चुँचियो को थमा दिया…
किसी स्पँज के जैसे नर्म मुलायम व एकदम गोल मटोल नँगी चुँचियो को पाकर राजु ने उन्हे अब तुरन्त कस कर अपनी मुट्ठी मे भीँच लिया जिससे..
“ईईश्श्श्.. ओ्ओ्य.ह्ह्ह्…!” कहकर रुपा अब सिसक सी पङी तो वही उसकी चुत की दिवारे राजु के लण्ड पर कस सी गयी थी। राजु ने भी रुपा की चुँचियो को भीँचने पर उसकी चुत की दिवारो मे होने वाले सँकुचन को अपने लण्ड पर साफ महसूस किया था इसलिये वो वैसे ही उसकी चुँचियो को मुट्ठी मे भरकर किसी स्पँज के जैसे भीँचने व मसलने सा लगा…
रुपा ने भी उसके हाथ को अब अपनी चुँचीयो पर से हटाया नही…बल्की उसके हाथो मे अपनी चुँचिया को थामाकर उसने अब खुद अपने हाथ राजु के कन्धो पर रख लिये और जैसे किसी घोङे की सवारी करते है वैसे ही धीरे धीरे अपनी कमर को आगे पीछे हिला हिलाकर धक्के से लगाने शुरू कर दिये जिससे राजु का लँड अब उसकी चुत की गीली दवारो से घीसने लगा और रुपा के साथ साथ राजु बदन मे भी आनन्द की लहरे सी उठना शुरू हो गयी…
रुपा ने अपने दोनो हाथो से राजु के कन्धो को पकङा हुवा था और आगे पीछे हो होकर धक्के लगा रही थी जिससे उसकी पुरी चुत ही राजु के लण्ड व लण्ड के पास के झाँटो से घीस रही थी जिसने उसके मजे को दोगुना कर दिया था तो राजु भी बिना कुछ किये ही अपनी जीज्जी की चुत की नर्म मुलायम चुत की दीवारो की मालिस की मालिस के मझे ले रहा था। रुपा अपनी कमर को हिला हिला कर उसके लँड को अपनी चूत से चूस सी रही थी तो राजु भी उसकी चुँचियो को मिच मिचकर मजे से उसकी चुत की नरगम मुलायम दिवारो से अपने लण्ड की मालिस करवा रहा था…
खैर धीरे धीरे रुपा की कमर की हरकत अब तेज होने लगी तो आनन्द के वश राजु ने भी उसकी चुँचियो को जोरो से मसलना शुरु कर दिया जिससे रुपा के मुँह से अब सिसककियाँ सी फुटना शुरु हो गयी। अन्धेरे मे इतना ज्यादा कुछ दिखाई तो नही दे रहा था मगर रुपा ने अपनी गर्दन को पीछे की ओर झुका रखी थी। वो उपर छत की ओर देखते हुवे अपनी कमरे से धक्के लगा लगाकर राजु के लण्ड से अपनी चुत की दिवारो को घीस रही थी तो साथ ही मुँह से..
ईश्श्श्.आ्ह्ह्…
ईईश्श्श्..आ्आ्ह्ह्ह्..
ईईईश्श्श्श्….आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्…. की सिसकारियाँ सी भर रही थी।
उत्तेजना व आनन्द के वस रुपा की चुँचियो को भीँचते भीँचते ही राजु ने अब थोङा उपर की ओर उकसकर उसकी नँगी चुँचियो को चुमने की सोची, मगर रुपा को ना जाने क्या सुझी की, उसने दोनो हाथो से राजु को उपर उठाकर उसकी टी-शर्ट को उतार फेँका। वो खुद तो पुरी नँगी थी ही उसने अब राजु को भी एकदम नँगा करके वापस धकेलकर बिस्तर पर पटक लिया और खुद उसके उपर लेटकर अब अपनी चुँचियो को उसके नँगे सीने पर रगङते हुवे धक्के लगानेे लगी…
राजु तो जैसे अब पागल ही हो गया, क्योंकि नीचे से तो उसकी जीज्जी की गर्म गर्म चुत उसके लँड की मालिस कर ही रही थी अब उपर से भी किसी स्पँज के जैसी उसकी नर्म मुलायम और भरी भरी सी हुई चुँचिया भी उसके सीने को गुदगुदाने लगी। आनन्द से उसके दोनो हाथ अब अपने आप ही रुपा की नँगी पीठ पर से रँगते हुवे उसके बङे बङे और गोलाकर कुल्हो पर आ गये।
राजु ने अपने दोनो हाथो से उसके कुल्हो को पकङ लिया और उन्हे प्यार से सहलाते हुवे रुपा को आगे पीछे हिलाने मे उसका सहयोग करने लगा जिससे रुपा की कमर की हरकत अब और भी तेज हो गयी। अब इस तरह राजु के उपर लेटेकर धक्के लगाने से बार बार रुपा के होठ, तो कभी उसके गाल राजु के होठो को छु जा रहे थे इसलिये रुपा ने दोनो हाथो से उसकी गर्दन को पकङकर उसके होठो को भी अपने मुँह मे भर लिया और उन्हे जोरो से चुशते चाटते हुवे धक्के लगाने लगी।
नीचे से रुपा की चुत तो राजु के लण्ड को चुश रही थी अब उपर से भी वो राजु के होठो को पीने लगी थी मगर इस तरह रुपा के धक्के कुछ धीमे हो गये थे जो की शायद रुपा को मँजुर नही थे इसलिये उसने राजु के होठो को अब एक बार तो कस कर के जोरो से चुशा, फिर वापस उठकर बैठ गयी, मगर इस बार अपने साथ साथ उसने राजु की गर्दन मे हाथ डालकर उसे भी उठा लिया और उसके लण्ड को अपनी चुत मे लिये लिये ही वो उसे बिस्तर पर बिठाकर अब खुद उसकी गोद मे बैठ गयी.. .
रुपा की कमर की हरकत अभी भी रुकी नही.. उसकी गोद मे बैठकर उसने राजु के सिर के बालो से पकङकर फिर से उसके होठो को अपने मुँह मे भर लिया और उसके होठो को पीते पीते ही अपनी कमरे से धक्के लगा लगा कर उसके लण्ड से अपनी चुत की दिवारो को घीसती रही जिससे राजु भी अब उत्तेजना से सिसकने सा लगा। वो इस खेल मे अनाङी व एकदम नया खिलाङी था। उसे नही मालुम था की इस तरह से भी चुदाई होती है। उसकी नजर मे चुदाई के लिये लङकी नीचे लेटती है और लङका उसके उपर चढकर उसे चोदता है, मगर जिस तरह से रुपा चुद रही थी उसे समझ नही आ रहा था की वो उसे चोद रहा है या उसकी जीज्जी उसे चोद रही है..?
खैर धीरे धीरे अब उत्तेजना के वश रुपा के धक्को की गति बढने लगी तो उसने अपनी बाँहे राजु के गले मे डाल ली और जोरो से… “ईईई.श्श्शश…आआ.ह्ह्ह्ह्हहह…..
ईईई.श्श्शशश…आआ.ह्ह्ह्ह्हहहहहहह….” की किलकारियाँ सी मारते हुवे राजु की गोद मे बैठकर उसके लँड पर फुदकने लगी। राजु ने भी अब अपने हाथ पीछे ले जाकर उसके दोनो कुल्हो को थाम लिया और उसके कुल्हो से पकङकर उसे जल्दी जल्दी आगे पीछे हिला हिलाकर उसका धक्के लगाने मे सहयोग करने लगा जिससे रुपा के धक्को की गति और भी बढ गयी तो वही एक बार फिर से लकङी के उस पलँग से चरमराने की आवाज निकलना शुरु हो गयी..
रुपा की इस धक्कमेपेल व किलकारियो से ही वो पुरा कमरा एकदम गुँज सा रहा था जिसे घर मे ना तो सुनने वाला था और ना ही कोई देखने वाला, फिर लकङी के उस पलँग के चरमराने को कौन सुनता। खुद उसकी माँ लीला ही उसे राजु के साथ ये सब करने की खुली छुट देकर गयी थी। वो उन्हे ये सब करने छुट देने के लिये ही तो खुद खेत मे जाकर सोई थी जिसका रुपा भी पुरा फायदा उठा रही थी। वैसे भी भी रात का समय था और घर के आस पास किसी का घर भी नही था इसलिये उनकी आवाजे रात के सन्नाट मे घर की चार दिवारी मे ही घुम होकर रह जा रही थी।
रुपा के माथे पर पसिना निकल आया था तो उसकी साँसे भी उखङ सी आई थी मगर वो अब अपने चर्म के करीब ही थी इसलिये राजु के लँड से अपनी चुत की गीली दिवारो को घीसने के साथ वो अपनी पुरी ही चुत को उसके लण्ड के पास की चमङी से घीसने लगी जिससे राजु के मुँह से भी सिसकियाँ निकालना शुरु हो गयी। उसने रुपा के दोनो कुल्हो को और भी कसकर पकङ लिया और उसे जोरो जोर से व जल्दी जल्दी अपने लण्ड पर उछाल उछालने लगा जिसका परिणाम अब ये निकला की कुछ ही देर बाद रुपा के बदन मे ऐँठकर बल से पङने लगे..
उसने….
“ईई.श्श्श्..अ्आ्.ह्ह्…
ईईई..श्श्श्श्…आ.आ.ह्ह्ह्….
ईईईई…श्श्श्श्….आ्आ्आ्..ह्ह्ह्ह्ह्ह्…” की किलकारियाँ सी मारते हुवे चार पाँच बार तो इसी तरह अपनी पुरी चुत व चुत के अन्दर की दिवारो को राजु के लण्ड से कसकर व रगङ रगङकर घीसा, फिर एकदमे से वो राजु को अपनी बाँहो मे भीँचकर उससे कस कर चिमट सा गयी तो साथ ही नीचे से उसकी चुत की दिवारो ने भी राजु के लण्ड को एकदम कसकर जकङ लिया।
राजु के लण्ड को अपनी चुत की दिवोरो से जकङकर उसने अब एकदम कस कसकर उसके लण्ड को अपनी चुत से निचौङना सा शुरु कर दिया तो साथ ही रह रहकर उसके लण्ड को भी अपनी चुत का गर्म गर्म रश पिलाने लगी। राजु का रशखलन नही हुवा था जिससे उसके लण्ड से वीर्य नही निकल रहा था मगर रुपा अपनी चुत से उसके लण्ड को इतनी जोरो से निचौङ सा रही थी की बिना रशखलन के ही राजु के लण्ड से भी वीर्य की बुन्दे निकलने लगी थी।
रुपा नीचे अपनी चुत के होठो से तो राजु के लण्ड को चुश ही रही थी, उपर से भी उसके होठो को अपने होठो से चुस रही थी जिन्हे रशखलन की उत्तेजना मे उसने इतनी जोरो से चबा डाला की राजु एकदम छटपटा सा उठा, मगर रुपा ने उसे इतनी जोरो से झकङा हुवा था की चाहकर भी रुपा से अपने होठो को नही छुङवा सका। ऐसे अब ही कुछ देर राजु के लण्ड को अपनी चुत से निचौङने के बाद रुपा निढाल सी हो गयी तो अपने आप ही उसका बदन को ढीला पङ गया जिससे वो अब राजु की बाँहो मे एकदम झुल सी गयी..
रुपा का रशखलन हो गया था जिससे वो अब स्थिल हो गयी थी मगर राजु अभी भी अपनी मजिँल से दुर था। वैसे तो रुपा वजन मे उससे भारी थी मगर फिर भी वो उसे गोद मे लिये लिये ही बिस्तर पर आगे की ओर लेट गया जिससे रुपा अब नीचे लेट गयी तो राजु उसके उपर आ गया। उसका लण्ड रुपा की चुत से थोङा बाहर निकल आया था जिसे रुपा के उपर लेटकर उसने फिर से उसकी चुत की गहराई तक उतार दिया और कमर से धक्के लगा लगाकर उसकी चुत की मखमली दिवारे से अपने लण्ड को घीसने लगा, जिससे अब रुपा अपने बदन को कङा करके कराहने सा लगी..
दो बार चुदाई से रुपा की चुत की दीवारे घीस घीसकर एकदम गर्म हो गयी थी, अब रशखलन के बाद राजु के लण्ड के घीसने से रुपा को अपनी चुत मे जलन सी हो रही थी जिससे वो एक बार तो…
“ईश्श्श्श्श्..बस्स्स्…जल रहा है..!” कहकर कराही, मगर उसे मामुम था की राजु अभी अधुरे मे ही है। उसका काम अभी हुवा नही है इसलिये उसने राजु को रोका नही बस अपने बदन कङा सा कर लिया और वैसे ही पङी रही…
राजु ने भी पहले पाँच सात धक्के तो धीरे धीरे ही लगाया, मगर रुपा ने उसे अब ज्यादा कुछ कहा नही तो उसने भी जल्दी जल्दी अपनी कमर को उचककाकर तेजी से धक्के लगाने शुरु कर दिये जिससे…
“आआ.ह्ह्ह…उऊऊ.ह्ह्ह्ह…” की कराहो के साथ रुपा की गीली चुत से भी “फच्च.फच्च….” की सी आवाजे निकलना शुरु हो गयी… रशखलित के बाद उसकी चुत के अन्दर की दिवारे प्रेमरश से भीगकर और भी चिकनी और एकदम मुलायम हो गयी थी जिसमे अब राजु का लँड अन्दर बाहर होने से अपने आप ही ये आवाज निकल रही थी।
रुपा अब कुछ देर तो ऐसे ही अपने बदन को कङा किये कराहती सी रही, मगर धीरे धीरे उसकी चुत की दिवारो मे फिर से सँकुचन सा होना शुरु हो गया, तो वही उसकी साँसे भी भारी हो आई। वो भी अब फिर से उत्तेजित होने लगी थी। राजु के धक्को से उसे भी अब मझा आने लगा था इसलिये उसने अपने बदन को ढीला छोङ दिया और राजु के धक्का लगाने पर कराहो की जगह वो धीरे धीरे सिसकने सा लगी।
राजु के धक्को के साथ ही रुपा की कमर भी अपने आप ही कभी कभी हल्की हल्की जुम्बीश करने लगी थी इसलिये ये देखने के लिये की… “सही मे ही उसकी जीज्जी नीचे से कोई हरकत कर रही है या उसका ही ये वहम है..!” राजु ने अब कुछ देर के लिये धक्के लगाने बन्द कर दिये जिससे रुपा अब तुरन्त गर्दन को घुमाकर राजु की ओर देखा… अभी तक वो अपने बदन को कङा किये चुपचाप आँखे मिचे पङी थी मगर जैसे ही राजु ने अपनी कमर की हरकत बन्द की उसने तुरन्त राजु की ओर देखा और..
“तु क्यो रुक गया… “कर ले तु भी…?” ये कहते हुवे उसने राजु की सहुलियत के लिये पैरो को फैलाकर अपनी जाँघो को थोङा खोल दिया…
रुपा की उत्तेजना तो जोर मार रही थी मगर शायद वो थकी हुई थी क्योंकि उसका दो बार रशखलित हो चुका था और दुसरी बार के लिये तो जो भी मेहनत थी वो सारी खुद रुपा ने ही कि थी इसलिये रुपा ने अब धक्के लगाने मे तो राजु का साथ नही दिया मगर फिर भी उसने अपनी जाँघो को पुरा फैलाकर अपने पैरो को राजु के पैरो पर रख लिया ताकी उसे धक्के लगाने मे और भी आसानी हो जाये और उसका पुरा लँड रुपा की चुत मे अन्दर तक जाकर उसकी चुत की दिवारो की मालिश कर सके..
राजु भी अब कहाँ रुकने वाला था उसने भी जोर जोर से और जल्दी जल्दी धक्के लगाकर अपने लँड को रुपा की चुत के अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया जिससे अब फिर से रुपा के मुँह से सिसकीयाँ सी फुटनी शुरु हो गयी तो वही अपने आप ही उसके पैर राजु के पैरो पर चढने लगे। अब धक्के लगाते हुवे राजु के होठ बार बार रुपा के गालो को छु रहे थे मगर रुपा का उस पर कोई ध्यान नही था। वो बस आँखे मिचे मुँह से सिसकियाँ सी ले रही थी। शुरु से ही राजु की इच्छा थी की वो भी अपनी जीज्जी के होठो को चुसे मगर रुपा ने अभी तक उसे ये मौका ही नही दिया था…
राजु ने अब ये सही मौका जानकर धक्के लगाते लगाते ही थोङा आगे होकर धीरे से उसके होठो को अपने मुँह मे भरने की कोशिश की, जिससे रुपा ने भी अब झट से आँखे खोल दी… अभी तक वो ऐसे ही आँखे मिचे पङी थी मगर जैसे ही राजु के होठ उसके होठो से छुऐ, उसने तुरन्त दोनो हाथो से राजु के सिर को पकङ लिया और राजु से पहले ही उसके होठो को अपने मुँह मे भरकर उन्हे जोरो से चुशने लग गयी…
अब एक बार फिर राजु अपनी जीज्जी के होठो का रश पीने के लिये तरसता रह गया था मगर शायद रुपा को उस पर तरस आया होगा की कुछ देर बाद ही उसने राजु के एक होठ को आजाद कर दिया जिससे राजु तुरन्त रुपा के एक होठ को अपने मुँह मे भरकर पीने लग गया। राजु के मुँह अपनी जीज्जी का होठ लगते ही उसके धक्को की गति भी बढ सी गयी थी इसलिये रुपा ने अब थोङी और दरीयादिली दिखाते हुवे होठ के साथ साथ अपनी जीभ को भी राजु के मुँह दे दिया..
अब तो राजु जैसे एकदम पागल ही हो गया, क्योंकि उसका ये पहला अनुभव था। उसे नही मालुम था की ये खेल इस तरह से भी खेला जाता है। अपनी जीज्जी की जुबान को चुशकर उसके मुँह का मीठा मीठा व चिकना सा स्वाद अब राजु के मुँह मे घुलने लगा तो वो एकदम बावरा सा हो गया और उत्तेजना के वश अपने आप ही उसके धक्को की गति और भी तेज हो गयी। रुपा की जीब व होठ को चुशते हुवे राजु अब जोरो से धक्के लगाने लगा जिससे रुपा की सिसकियाँ भी और तेज हो गयी तो वही उत्तेजना व आनन्द के वश उसके दोनो हाथ भी अब अपने आप ही राजु की पीठ पर आकर रेँगने से लगे…
कुछ देर राजु को अपने होठ व जुबान का स्वाद देने के बाद रुपा ने अब अपनी जुबान को वापस खीँच लिया जिससे उसकी जुबान का पीछा करते हुवे अब राजु की जीभ रुपा मे मुँह मे जा घुसी…रुपा तो चाहती ही ये थी इसलिये ही तो उसने अपनी जुबान को राजु के मुँह मे दिया था, इसलिये अब जैसे ही राजु की जीभ रुपा की जीभ का पीछा करते हुवे उसके होठो तक आई, रुपा ने अपना मुँह खोलकर उसे तुरन्त अपने मुँह भर लिया और उसे इतनी जोरो से चुशने लगी की एक बार तो राजु को अपनी पुरी जुबान ही हलक से निकलकर रुपा के मुँह मे समाती महसूस हुई…
अब इसका बदला राजु ने रुपा की चुँची से लिया। उसने अपना एक हाथ बीच मे लाकर उसकी एक चुँची को कस कसकर मुट्टी मे भीँच लिया तो साथ ही उसने अपने धक्को की गति को भी बढाकर अपने पुरे लँड को रुपा की चुत मे अन्दर तक पेलने लगा जिससे रुपा की सिसकियाँ और भी तेज हो गयी। उसके पैर अब राजु की जाँघो तक चढ गये तो जोरो से सिसकीयाँ भरते हुवे उसने अब खुद भी नीचे से धक्के लगाने शुरु कर दिये..
उसने राजु की जीभ व होठो को तो अब छोङ दिया और दोनो हाथो से उसकी पीठ को पकङकर जल्दी जल्दी अपनी कमर को उचकाते हुवे मुँह से…
“इईईई.श्श्शशश…आआ.ह्ह्ह्हहह…
इईईई.श्श्शशश…आआ.ह्ह्ह्हहह…!” की आवाजे निकालने लगी जिससे उस लकङी के पलँग से एक बार फिर से चरमराने की आवाजे निकलना शुरु हो गयी..
राजु भी अब पुरे जोश मे आ गया। अपनी जीज्जी का ये साथ पाकर वो भी अब अपने सीने को उपर उठाकर अपने हाथो के बल हो गया और अपनी अपनी कमर को उचका उचकाकर अपनी पुरी ताकत व तेजी से धक्के लगाने लगा जिससे रुपा जैसे अब पागल ही हो गयी, वो जोरो से अपनी कमर को उचकाते हुवे मुँह से..
“इईईई.श्श्शशश…आआ.ह्ह्ह्हहह…
इईईई.श्श्शशश…आआ.ह्ह्ह्हहह…” किलकारीया सी मारने लगी।..
अब जितनी तेजी से रुपा अपनी कमर को उचका रही थी राजु उससे दुगनी तेजी से धक्के लगा कर अपने लँड से उसकी चुत की धज्जियाँ सी उङा रहा था जिससे रुपा की किलकारीयोँ के साथ साथ कमरे मे
“फट्…,फट् ट…” की आवाजे भी गुँजने लगी… इस जोरो की धक्कमपेल से दोनो के ही शरीर पसिने से नहा गये थे तो उनकी साँसे भी उखङ आई मगर तभी राजु के बदन मे बल से पङने लगे। उसने तीन चार धक्के तो अपनी पुरी ताकत व वेग से लगाये, फिर रुपा से कस कर एकदम चिपक सा गया और रह रहकर उसकी चुत मे अपने लण्ड से वीर्य की पिचकारियाँ सी छोङकर चुत को भरना शुरु कर दिया..
रुपा भी रशखलन के मुहाने पर ही थी इसलिये अब जैसे ही उसे अपनी चुत मे रह रहकर राजु के लण्ड से निकलता गर्म गर्म वीर्य महसूस हुवा, उसने भी अपने हाथ पैरो को समेटकर राजु को अब उपर से कस कर अपनी बाँहो मे भीँच लिया तो नीचे उसकी चुत की मांसपेशियों ने भी अन्दर ही अन्दर राजु के लण्ड को एकदम जकङ सा लिया और उसके लण्ड से निचौङकर उसके गर्म गर्म वीर्य को चुशने लगी तो साथ ही बदले मे उसके लण्ड को भी अपने रश पिलाने लगी..
रशखलन के आवेश मे उत्तेजना व आनन्द के वश रुपा की सिसकीयाँ अब पहले तो आहो मे बदली और फिर आहे हिचकीयो मे बदलती चली गयी। इस बार उसका ये रशखलन इतना उत्तेजक व उग्र हुवा की हिचकिया लेते हुवे कुछ देर तो रुपा साँस लेना तक भुल गयी, उसकी चुत की मांसपेशियों के प्रसार और सँकुचन को राजु भी अपने लण्ड पर अब काफी देर तक महसूस करता रहा। अपनी अपनी कामनोओ को एकदुसरे पर उडेलकर दोनो ही अब एक दुसरे को बाँहो मे लिये लिये ढेर होकर लम्बी लम्बी साँसे लेने लगे।
अब कुछ देर तो दोनो ऐसे ही एक दुसरे की बाँहो मे समाये पङे रहे फिर रुपा ने राजु पीठ को थपथपाकर उसे उठने का इशारा सा किया, मगर राजु का अभी भी उस पर से उठने का मन नही था इसलिये वो वैसे ही उससे चिपके रहा जिससे…
“ऊ.ह्ह.उठ अब …, बहुत गर्मी लग रही है…!” रुपा ने उसके गाल को चुमते हुवे कहा और करवट बदलकर उसे अपने उपर से नीचे उतार दिया..
राजु के उतरते ही उसका लण्ड भी रुपा की चुत से बाहर निकल आया था जिससे रुपा की चुत मे भरा उसका वीर्य भी उसकी चुत के मुँह से बह निकला जो की, उसकी चुत के से निकलकर सीधे उसके कुल्हो की गहराई की मे घुस गया… रुपा को अब उससे खुजली सी महसुस हुई तो उसने पास ही पङे अपने कपङो मे से जो भी उसके हाथ लगा उससे पहले तो अच्छे से अपनी चुत को साफ किया, फिर करवट बदलकर राजु की ओर ही मुँह करके लेट गयी…
राजु ने भी करवट बदलकर अब रुपा की ओर ही मुँह कर लिया मगर उसका दिल अभी भी नही भरा था इसलिये उसने धीरे से थोङा नीचे खिसककर रुपा की एक चुँची को अपने मुँह मे भर लिया। अब रुपा को राजु की जीभ की गर्मी व होठो की नर्मी से अपनी चुँची पर गुदगुदी सी हुई तो वो एकदम सिँहर सी गयी और…
“ऊ.ह्ह..ओ्ह्ह्य्..!” कहते हुवे उसने तुरन्त राजु के सिर पकङ को लिया, मगर तब तक राजु ने रुपा की चुँची को पीते पीते उससे चिपककर अपने लण्ड को भी उसकी नँगी जाँघो से सटा दिया जिससे रुपा भी एक बार तो सहम सी गयी, क्योंकि अभी कुछ देर पहले ही उसका रशखलित हुवा था इसलिये एक बार के लिये तो रुपा को यकिन ही नही हुवा की राजु का लण्ड फिर से इतनी जल्दी कैसे तन गया।
कहाँ तो उसका पति का लण्ड है जो रशखलित होने के बाद दो तीन दिन तक होश मे ही नही आ पाता और कहाँ राजु का एकदम कङा और कुँवारा लण्ड, जो की दो बार रशखलित होने के बाद भी कुछ ही मिनटो मे अकङकर एकदम पत्थर हो गया था। राजु के एकदम कङे व गर्म गर्म अपनी जाँघो पर महसूस करके रुपा दिल भी अब एक बार तो फिर से मचलने सा लगा था मगर दिनभर पैदल चलने की थकान व दो बार की इस लम्बी चुदाई से उसकी अब फिर से कुछ करने की हिम्मत नही हो रही थी इसलिये…
ईईश्श्.. बस्स्. अब क्या पुरी रात ही लगा रहेगा है..? बहुत रात हो गयी…. सोना भी है..!” रुपा ने अब एक हाथ से बङे ही प्यार से राजु के सिर के बालो को सहलाते हुवे कहा और उसके सिर को पकङकर उससे धीरे से अपनी चुँची को छुङवार उसे वापस उपर खीँच लिया…
राजु को उपर खीँचकर रुपा ने उसके होठो से अपने होठो को जोङकर पहले तो प्यार से कुछ देर उसके होठो को चुशा फिर.. “ऐसे ही सो जा मुझसे चिपककर..!
बाकी वहाँ जाकर कर लेना ..! सो जा अभी…!” ये कहते हुवे उसकी कमर मे हाथ डालकर उसे अपने नँगे बदन से चिपका लिया। राजु का अभी सोने का मन तो नही था मगर फिर भी रुपा के कहने से वो भी अब चुपचाप उससे चिपककर सो गया जिससे कुछ देर बाद ही दोनो को नीँद भी आ गयी। दिन भर की थकान व रशखलन के आनन्द के वश उन्हे अब इतनी गहरी लगी की सुबह जब लीला ने काफी देर तक आवाज दी तब जाके रुपा की नीँद खुल सकी।
अब नीँद खुलते ही रुपा ने खुद की व राजु की हालत देखी तो वो एकदम घबरा सही गयी, क्योंकि वो दोनो बिस्तर पर एकदम नँगे पङे हुवे थे और बाहर उसकी माँ आ गयी थी। वैसे तो उसकी माँ से कुछ भी छिपा नही था, रुपा को राजु के साथ ये सब करने की सलाह ही उसकी दी हुई थी मगर फिर भी नारी लज्जा के वश ये सब अपनी माँ के सामने तो कर नही सकती थी इसलिये रुपा ने अब पहले तो कमरे से ही…
“हाँ.आ्.आ्..आ रही हुँ ..!” की आवाज देकर अपनी माँ को जवाब दिया, फिर…
“राजु….ओ्य्..राजु… माँ आ गयी है, जल्दी से उठकर अपने कपङे पहन…!” उसने राजु को कन्धे से पकङकर हिलाते हुवे कहा और खुद भी जल्दी जल्दी अपने कपङे पहनने लग गयी…
लीला के आने की बात सुनते ही राजु की भी अब तुरन्त नीँद खुल गयी और वो भी उठकर जल्दी जल्दी अपने कपङे पहनने लग गया। जब तक राजु ने कपङे पहने तब तक रुपा ने अपने कपङे पहनकर घर का दरवाजा खोल दिया। रुपा के दरवाजा खोलने मे देरी व उसकी घबराहट देखकर लीला भी अब समझ गयी की रुपा ने उसकी बात मान ली है इसलिये रुपा से बिना कुछ पुछे वो चुपचाप घर के अन्दर आ गयी। तब तक राजु भी अपने कपङे पहनकर बाहर आ गया जिससे लीला ने एक बार तो उसे उपर से नीचे तक घुरकर देखा फिर…
“जाना है तो जा..! यहाँ मै देख लुँगी, कुछ दिन वहाँ रह कर आ जाना..! तेरी जीज्जी को अकेले ही खेत सम्भालने पङते है, इसलिये फसल कटावाने तक वहाँ रह कर वापस आ जाना इसकी भी कुछ मदत भी हो जायेगी..!” लीला ने अब रुपा की ओर देखते हुवे कहा जिससे रुपा ने गर्दन झुका ली।
रुपा ने लीला से अभी तक कोई बात भी नही की थी मगर फिर रात उसके व राजु के बीच जो कुछ भी हुवा वो सब समझ गयी थी इसलिये शर्म के मारे रुपा गर्दन झुकाकर नीचे की ओर देखने लगी मगर राजु ने सोचा की उसकी जीज्जी ने लीला से वहाँ उसके साथ जाने की बात बता दी है इसलिये…
“ह्.हाँ.हाँ.आ्.. ब्.बुवा् वो जीज्जी बोल रही थी उनके साथ आने को..!” ये कहते हुवे राजु अब हकला सा गया।
शरम के मारे रुपा अभी भी गर्दन झुकाये नीचे की ओर देख रही थी इसलिये..
“तु जाकर रशोई मे चाय चढा, तब तक मै दुध निकालती हुँ…!” लीला रुपा को अब ज्यादा शर्मीँदा नही करना चाहती थी इसलिये ये कहते हुवे वो अब पशुओं को चारा डालने व दुध निकालने मे लग गयी और रुपा चाय बनाने के लिये रशोई मे घुस गयी।
जब तक लीला ने पशुओं के काम निपटाये तब तक रुपा ने भी चाय बना ली थी इसलिये तीनो ने साथ मे ही बैठकर चाय पी मगर इस बीच तीनो के बीच कोई बात नही हुई, क्योंकि राजु जहाँ डर सा रहा था वही रुपा की शर्म के मारे कुछ बोलने की हिम्मत नही हुई और लीला कुछ कहकर रुपा को शर्मीँदा नही करना चाहती थी इसलिये वो भी चुप ही रही। लीला तो खेत से आते समय ही सौचा आदि से निवृत हो आई थी इसलिये चाय पीकर लीला अब घर के झाङु कटके व साफ सफाई के काम मे लग गयी और राजु व रुपा सौच आदि से निवृत होने के लिये चले गये…
