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टोना टोटका – Update 16

अगले दिन सुबह जब रुपा की नीँद खुली तो उसे अपनी जाँघ पर कुछ गङता हुवा सा महसूस हुवा। उसने ऐसे ही आलस आलस मे अब अपने हाथ पैरो को हिलाकर देखा तो पाया की वो राजु से एकदम चिपकर सो रही है, तो राजु भी उससे एकदम लिपटा हुवा है। सुबह के समय एक तो मौसम हल्का सा सर्द हो रखा था, उपर से वो दोनो ही एकदम नँगे थे इसलिये ठण्ड के कारण दोनो ही एक दुसरे से एकदम चिपककर सो रहे थे। राजु ने रुपा की ओर मुँह करके उस पर अपने हाथ पैर लाद रखे थे, तो रुपा ने भी उसे अपनी बाँहे मे भीँच रखा था और उसकी जाँघ मे जो गङ सा रहा है वो कुछ और नही बल्की राजु का एकदम तना खङा लण्ड था जो की उसकी जाँघ मे‌ चुभता हुवा सा महसूस हो रहा था।

अब खुद को राजु के साथ इस हालत मे देख रुपा को जोरो की शरम सी आई, इसलिये राजु को अपने उपर से हटाकर वो तुरन्त उससे अलग हो गयी और सीधे उठकर बैठ गयी। रुपा से अलग होकर राजु सीधे पीठ के बल सो गया था जिससे रुपा की नजर उसके तने खङे लण्ड पर चली गयी। उसका लण्ड एकदम सीधे उसके पेट के समानांतर तना खङा था तो उसकी साँसो के साथ साथ झटके से मार रहा था। राजु के लण्ड व जाँघो के पास रुपा के चुतरश व राजु के वीर्य की सफेद पपङी सी जमी हुई थी, जो की सुखकर पारदर्शी सी हो गयी थी। राजु की जाँघो व लण्ड का हाल देख रुपा की नजर अब अपनी चुत की ओर भी चली गयी। उसकी चुत व जाँघे भी राजु के वीर्य व खुद उसके चुतरश से पुरी लिपी पुती हुई थी, तो उसकी चुत व जाँघो पर हल्की लालिमा सी भी आई हुई थी।

भले ही शरीर मे राजु रुपा से आधा था, मगर रात मे उसने रुपा की चुत की‌ कुटाई पुरा दम लगाकर की थी जिससे उसकी चुत व जाँघे हल्की लाल सी हो गयी थी, जो की रुपा के एकदम गोरे रँग के कारण अलग ही नजर आ रही थी। अपनी चुत व जाँघो का हाल देख अब रात मे उसके व राजु बीच जो कुछ भी हुवा वो फिर से किसी फिल्म की तरह रुपा की नजरो के सामने घुम गया, जिससे उसे शरम के साथ खुद पर ही जोरो का गुस्सा सा आने लगा, क्योंकि राजु उससे पुरे आठ साल छोटा था, उसके साथ ये सब करना तो दुर, रुपा ने उसके बारे मे ऐसा कुछ कभी सपने मे भी नही सोचा था।

राजु को‌ तो इतनी समझ नही, मगर उसके साथ साथ वो खुद कैसे बहक गयी ये सोच सोचकर उसे अपने आप पर ही गुस्सा आ रहा था, तो साथ ही वो अब किस मुँह राजु से नजरे मिलायेगी ये सोच सोचकर उसे घबराहट सी होने लगी, इसलिये जल्दी से उठकर उसने पहले तो पास ही रखे अपने कपङे पहने, फिर एक नजर राजु की ओर देख वो सीधा उस कमरे से निकलकर बाहर आ गयी। बाहर आकर वो अब घने से पेङो के आङ देखकर उनके पीछे शौच आदि से निवृत होने चली गयी…

अब जब तक रुपा सौच आदि से निवृत होकर वापस लौटी, तब तक राजु की भी नीँद खुल गयी थी। वो भी अपने कपङे पहनकर सुबह के नित्यक्रम से निवृत होने निकल गया था जिससे रुपा ने कमरे मे आकर जल्दी से कमरे मे रखे छोटे मोटे सामान व चद्दर आदि को समेटकर थैले मे भर लिया और घर जाने के‌ लिये तैयार हो गयी। सौच आदि से निवृत होकर राजु अब वापस उस कमरे मे आया और उसने देखा की रुपा ने सारा सामान समेट रखा है तो…

“बस अब घर चलना है क्या जीज्जी..?”  वो भी रुपा से अब थोङा शरमा सा रहा था इसलिये थैले को उठाकर उसने चेहरे पर शरम की मुस्कान सी लाते हुवे पुछा।

राजु रुपा से शरमा तो रहा था, मगर रात को उसके व अपनी जीज्जी के बीच जो कुछ भी हुवा था उसकी खुशी राजु के चेहरे व आँखो से साफ झलक रही थी। रुपा को उस पर अब गुस्सा सा तो आया, मगर साथ ही शरम सी भी महसूस हुई इसलिये उसने बस …” हुँम्म्म्..!” ही कहा और चुपचाप उस कमरे से बाहर आ गयी, जिससे राजु भी थैला लेकर चुपचाप उसके पीछे पीछे ही कमरे से बाहर आ गया।

अब रास्ते मे रुपा ने राजु से कोई बात नही की। राजु ने तो फिर भी कभी कभी रुपा से थोङी बहुत बात करने की कोशिश की, मगर रुपा ने उसकी बातो का जवाब बस “हाँ..” और “हुँ..” मे ही दिया। रुपा दो तीन बार रास्ते मे पिशाब भी करने गयी, मगर टोटका पुरा होने के बाद राजु का हाथ पकङने की कोई बंदिश तो रही नही थी इसलिये वो राजु से दुर झाङियो की आङ मे जाकर ही पिशाब करके आई।

उन्हे वहाँ से निकलने मे ही देर हो गयी थी इसलिये घर पहुँचते पहुँचते उन्हे रात हो गयी, तब तक लीला ने रात का खाना तक बना लिया था। वो बस उन्ही का इन्तजार कर रही थी इसलिये रुपा व राजु को देखते ही…

“अरे..आ गये तुम..? चलो आ जाओ मै तुम्हारी ही राह देख रही थी..!” लीला ने तुरन्त रशोई से बाहर आते हुवे कहा जिससे रुपा ने बस.. “हुँऊ..!” ही कहा और सीधे कमरे मे घुस गयी।

भले ही रुपा ने लीला से कुछ कहा नही, मगर लीला एक घाघ औरत थी। वो रुपा के चेहरे को देखते ही सब समझ गयी थी इसलिये रुपा के पीछे पीछे ही वो भी कमरे मे आ गयी। राजु के साथ वहाँ जो कुछ भी हुवा उसके बारे मे सोच सोचकर रुपा अभी भी घबरा सी रही थी, इसलिये एक बार तो उसने लीला को देख..

“…व्.व्.वो् म,.मा्…” कहा फिर चुप होकर रह गयी। वो असमंजस से मे थी, की अपनी माँ को इस बारे मे बताये या ना बताये, मगर लीला बाहर ही उसके चेहरे को देखकर सब समझ गयी थी। ये सारी योजना ही उसकी बनाई हुई थी इसलिये…

लीला: तुम्हे घबराने की कोई जरुरत नही, मुझे मालुम है जो हुवा है..!

लीला ने रुपा के उतरे हुवे चेहरे की ओर देखते हुवे कहा जिससे रुपा की हवाईयाँ सी उङ गयी और वो एकदम से घबराकर इधर उधर देखने लगी, मगर लीला बोलती रही..

“टोटका के बहाने से मैने ही तुमसे तुमसे ये सब करवाया है..! तुम्हे डरने की जरुरत नही….” 

लीला ने जैसे कोई ये बम सा फोङा जिससे हैरानी के मारे अनायास ही….

“क्या्आ्आ्…?” की लम्बी आवाज के साथ रुपा का मुँह अब खुले का‌ खुला ही रह गया…

लीला: और नही तो क्या…? तेरा घर ऐसे ही उजङने देती..? और तु क्या सोच रही है टोने टोटके करने या किसी बाबा के आशीर्वाद देने से बच्चे हो जाते है, दुनिया देखी है मैने, ये बाबा भी किसी ना किसी बहाने तेरी मजबुरी का फायदा ही उठाते और फिर पता नही बाद ने क्या क्या करने को कहते… इसलिये टोटके के बहाने तुझसे ये सब करवाया है।

रुपा: पर माँ राजु के साथ..?

लीला: क्यो राजु के‌ साथ क्या हो गया..? और राजु नही तो‌ फिर किसके साथ करती..? ठीक ही है ना राजु के साथ हो गया इससे तेरा घर भी बस जायेगा और किसी को कुछ पता भी नही चलेगा….

रुपा: पर माँ…

रुपा अब कुछ कहती की तभी.. 

“बुआ मै गप्पु के घर जाकर आता हुँ..!” बाहर से राजु की आवाज सुनाई दी जिससे..

“कोई जरुरत नही अभी कही जाने की, इतनी दुर से चलकर तो आया है, थका नही अभी तक…? लीला ने उसे डाटते हुवे कहा।

“और खेत मे…?” ये कहते हुवे वो अब कमरे के दरवाजे पर आ गया।

“वो मै अपने आप चली जाऊँगी, तु हाथ मुँह धो ले और रोटी खाकर अब आराम कर…!”  लीला ने अब पहले तो राजु से कहा, फिर रुपा की ओर देखते हुवे..

लीला: अब तु बस इस नालायक का जरुर ध्यान रखना, इसे अच्छे से समझा देना, कही ये ना किसी को कुछ बता ना दे..!

रुपा: पर माँ ये सब करने से पहले तु मुझसे एक बार पुछ तो लेती…

लीला: इसमे क्या पुछती.. और मेरे पुछने से क्या तु मान भी जाती, इसलिये टोटके के बहाने तुझसे ये सब करवाया है, बस तु अब कल इसे अपने साथ ससुराल ले जा, वहाँ रात मे दामाद जी के साथ रहना और दिन मे मौका देखकर राजु के साथ, देखना महने भर मे ही तु उम्मीद से हो जायेगी उसके बाद राजु को वापस भेज देना..!

रुपा: माँआ्आ्… तुम्हे समझ भी है तु ये क्या बोले जा रही है..?

लीला: मैने जो किया वो भी सब सोच समझकर किया है और जो तुझे कह रही हुँ, वो भी सब सोच समझकर ही कह रही हुँ… बस थोङा राजु का ध्यान रखना रात मे आज उसे अच्छे से समझा देना,की वो गलती से भी इस बात का ज़िक्र किसी से ना कर दे..!

रुपा: पर माँ राजु के साथ ये सब करना..?

लीला: अब देख ले बेटी, मैने जो किया वो तेरी भलाई के लिये ही किया है और अब जो कह रही हुँ वो भी तेरी भलाई के लिये बो‌ल रही हुँ..!  बाकी तेरी मर्जी है..! मैने रोटी सब्जी बनाकर रख दी है, हाथ मुँह धोकर तु भी खा लेना और उसे भी दे देना, मै अब खेत मे जा रही हुँ…!

लीला अब कमरे से निकल गयी, मगर जाते जाते..

“खाना खाकर तु भी आराम कर लेना, बर्तन मै कल सुबह आकर अपने आप साफ कर लुँगी… ये कहकर वो खेत के लिये चली गयी जिससे रुपा भी उसके पीछे पीछे कमरे से बाहर आ गयी। बाहर आँगन मे राजु हाथ मुँह धो रहा था इसलिये रुपा ने एक बार तो उसकी तरफ देखा, फिर उसके लिये खाना डालने के लिये रशोई मे घुस गयी..

राजु अब हाथ मुँह धोकर रशोई मे आया तो…

“आ जाओ जीज्जी साथ मे खाते है..!” राजु ने नीचे बैठकर थाली को आगे सरकाते हुवे कहा।

राजु के साथ वहाँ जो‌ हुवा और उसके बारे मे लीला ने उसे जो कुछ बताया रुपा उसी की उधेङबुन‌ मे थी इसलिये…

“अभी नही … तु खा ले…मै बाद मे खा लुँगी…! 

ये कहते हुवे वो रशोई से बाहर आ गयी और आँगन मे जो नहाने धोने के लिये पत्थर की सिल जमा रखी थी वहाँ जाकर वो भी हाथ मुँह धोने लग गयी, मगर राजु के लिये रुपा की आवाज मे अब रुखापन नही था। उसने राजु को अब प्यार से ही जवाब दिया….

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