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अध्याय 58

“सुरेश है ये हमारे काम आ सकता है”

पुनिया आज बहुत खुस दिख रहा था,सुरेश आरती के मामा का लड़का था,और वीरेंद्र की मौत तथा आरती के इस तरह जवानी में ही विधवा हो जाने को लेकर बहुत ही दुखी भी रहता था,वो वन विभाग में एक अधिकारी के पोस्ट में था,और उसकी नफरत ठाकुरो और तिवारियो से हमेशा से थी,ठाकुरो से इसलिए क्योकि उनके कारण वीरेंद्र की जान गई और तिवारियो से इसलिए क्योकि उन्होंने उसके बहन को दूसरी शादी नही करने दिया,कभी सुरेश पुनिया के गांव में ही इंचार्ज हुआ करता था और जग्गू और पुनिया के लिए सहानुभूति भी रखता था,लेकिन सालो से उनका इससे कोई भी मेल मिलाप नही था….

“लेकिन क्या वो मानेगा,खफा होना और दुश्मनी होने में बहुत ही फर्क है ,सुरेश चाहे कितना भी नफरत करता हो वो हमारे साथ आएगा उसकी गुंजाइस थोड़ी कम ही है,”

जग्गू ने नाम तो सुझा दिया था लेकिन वो भी कंफर्म नही था की सुरेश उनकी मदद करेगा की नही ,

“सुरेश क्या कर सकता है मुझे तो आरती की मदद चाहिए वो अगर हमारे साथ आ गई तो काम हो जाएगा,”

जग्गू को नही पता था की पुनिया क्या करने वाला है पर उसे उसपर पूरा भरोसा था,

इधर

ठाकुरो की हवेली में चहलपहल बढ़ गयी थी ,अजय को केशरगढ़ के राज परिवार का वारिस घोषित कर दिया गया था,इस हैसियत से उसे राजा घोषित किया गया उसका राज तिलक हुआ और एक बड़ी पार्टी की गई साथ ही परंपरा के अनुसार वो गरीबो में बहुत सा दान भी दिया. ,वहां के लोग अपने राजा को देखने को दूर दूर से आने लगे रोज ही अखबारों में तस्वीरे वगैरह कुल मिलाकर पूरे इलाके में बात का एक ही विषय था ,अजय का राजा बनना….

इससे उनको कोई आर्थिक मदद नही मिलने वाली थी पर एक सम्मान जो अजय और उसके परिवार का वहां था वो कई गुना बढ़ गया था,

हवेली की रंगत ही कुछ और हो चुकी थी और साथ ही समय पास आ रहा था सुमन और किशन की शादी का…सुमन अब हर दुख को छोड़कर बस किशन को अपना पति बनाने को बेताब थी ,कुछ ही दिनों में उनकी शादी थी ,बाली चाहता था की उससे पहले अजय और विजय की भी शादी हो जाय लेकिन उसे भी पता था की ये मुमकिन नही है,

वक़्त चलता चला गया और चुनाव को भी एक ही साल का समय बचा था,निधि और धनुष बड़े ही ताकत से चुनाव की तैयारी में लगे थे,वही अब अभिषेक निधि से दूर रहने लगा था उसे पता था की उसकी एक छोटी सी गलती उसे कही का नही रहने देगी….निधि को पहले तो ये अजीब लगा लेकिन फिर वो अपने काम में इतनी व्यस्त होने लगी की उसे इसकी सुध भी नही रहती थी………

उस रात बाली अपने कमरे में गया ,वो अब चम्पा के साथ ही सोया करता था,लेकिन अलग अलग बिस्तरों में ,इतने दिनों की दूरी अब भी नही भरी थी ,

“शादी की तैयारीया कैसे चल रही है …”

ऐसे तो वो दोनो बहुत ही कम बात किया करते थे पर जब से किशन की शादी फिक्स हुई थी वो कुछ चीजो के लिए बात कर ही लिया करते थे,

“ठीक है और ये बच्चे मुझे कुछ करने ही कहा देते है,अब तो इनकी ही चलती है अब मैं बुड्ढा हो गया हु “

बाली हँसते हुए कहा,

“आप भी ना अभी तो आप किसी जवान को भी मात दे दे …अभी भी तो वैसे ही है “

बाली की नजर सीधे चम्पा पर गई वो उसके बदन को ही घूर रही थी ,बाली से नजर मिलते ही उसकी नजर शर्म से झुक गई ,बाली को भी बड़ा अजीब सा लगा,ये सालो की दूरियां जिसने मन के जज़बातों को दफना दिया था,एक हल्की सी आहत ने उसे हिलोरे मारने पर मजबूर कर दिए था.,

दोनो ही चुप होकर सोने की कोशिस करने लगे वो अलग अलग बिस्तर में सोए थे ,चम्पा के दिल की धड़कन बाली तक पहुच रही थी लेकिन वो मूरत बना बस सोया हुआ था,की चम्पा उठी जैसे वो इस आग को बर्दास्त नही कर पाएगी उसके उठने की आहट से बाली भी उसकी ओर देखने लगा ,जैसे ही चम्पा बिस्तर से उठी उसका पल्लू नीचे गिर गया….

वो अभी बेफिक्र थी उसे लगा की हमेशा की तरह बाली दूसरी ओर मुह किया सोया होगा,लेकिन बाली की नजर सीधे ही उसके उजोरो पर गई,आज भी चम्पा की कातिल अदाएं वही थी जो सालो पहले हुआ करती थी,उसके उजोरो के मदमस्त पर्वत ब्लाउज के उस दर्रे से झांक रहे थे,वो मखमली जिस्म का वो हिस्सा बाली के मन को बहकाने को काफी था,सालो से किसी औरत के जिस्म का स्वाद उसे नही मिला था यही हाल कुछ चम्पा का भी था और दोनो एक दूसरे के सामने इस हालत में थे की वो कुछ कर भी नही पा रहे थे और किये बिना रहना भी मुस्किल हो रहा था…..

दूधिया रोशनी में चमकता हुआ चम्पा का जिस्म और उससे आने वाली वो मनमोहक खुशबू,उम्र के इस पड़ाव में वो उसका शरीर और भी गदरा गया था,भारी नितम्भ,उभरे उरोज ,और चहरे पर वही कातिलाना अंदाज,…

कभी वो कई लोगो का बिस्तर गर्म करती नही थकती थी,और उसके अदाओं ने ना जाने कितनो को पागल बना रखा था,दोनो ही एक दीवार से खुद को अलग पा रहे थे और उस दीवार को तोडना दोनो की हसरत थी,लेकिन ….

मजबूर आकांक्षाओं की दीवार एक ही चोट में धराशायी हो जाती लेकिन वो चोट पहले कौन लगाता,वो अपनी नजर झुकाए बालकनी में चली गई ,और हवा के हल्के झोको ने चम्पा को उस आग से कुछ आराम दिया,उसने अपने पल्लू के पर्दे को हटा कर अपनी उरोजों को सांस लेने के लिए खुला छोड़ा वो उसे मसल कर अपनी भावनाओ को सकून दे रही थी,

नीचे कलवा अभी अभी कुछ काम निपटा कर लौट रहा था,चम्पा के कमरे के नीचे एक सन्नटा होता था,वो जगह उनके बगीचे की थी,कलवा अपनी अकेली रातो में वहां आकर कुछ सकून के पल बिताया करता था,दोनो की नजरे मिली और कलवा भी उस काम की मूरत को देखता रह गया,,,…

चम्पा को अपने स्थिति का आभास कलवा के नजरो से ही हुआ और उसके चहरे पर शर्म की लाली खिल गई ,वो उसे देखकर हल्के से मुस्कुराई ,वो बहुत अच्छे दोस्त थे ,कलवा कभी चम्पा का आशिक हुआ करता था और ये बात चम्पा को भी पता थी,आज इतने दिनों बाद दोनो की वही भावनाएं फिर से जाग गई ,कुछ देर को ही सही लेकिन कलवा उसे वैसे ही घूर रहा था जैसे की वो पहले घूरा करता था और चम्पा की अदाएं कुछ टिस करती हुई कलवा तक पहुच रही थी,उसके चहरे पर शर्म ने एक मुस्कान की जगह ले ली थी जो की एक कामोत्तेजक मुस्कान थी,महिलाओं की ये मुस्कान किसी भी समझदार आदमी के दिमाग को बिगड़ देती है ,ये एक सिग्नल होता है की वो महिला आपमे उत्सुक है,

कलवा का दिल सालो बाद यू जोरो से धड़का था,और अचानक ही मानो दोनो को होश आया की वो ये क्या कर रहे है……

चम्पा ने अपने को झट से ठीक किया और नजर नीची कर अपने कमरे में चली गई वही कलवा को भी ये आभास हुआ और वो भी वहां से निकल जाना ही बेहतर समझा ….

चम्पा कमरे में दाखिल हुई तो उसने बाली को जागता पाया,वो अपने बिस्तर में बैठा किसी सोच में गुम था…

“क्या हुआ नींद नही आ रही आपको “

चम्पा जुबान में अचानक ही एक मीठापन आ गया था,कुछ ही देर पहले हुए सभी वाक्यो ने उसके योनि में कुछ रिसाव शुरू कर दिया था और अपने बिस्तर में लेटकर चादर के नीचे उसे शांत करना चाहती थी लेकिन अभी बाली जाग रहा था,और उस उत्तेजना ने उसमे एक हिम्मत ला दी वो सीधे बाली के बाजू में बैठ गई,और अपना हाथ बाली के हाथो में ले लिया ,

“पता नही कुछ अजीब लग रहा है..”

बाली मुड़ने वाला ही था की चम्पा ने बड़ी अदा से अपने पल्लू को नीचे गिरा दिया,बाली की आंखे सीधा उसके ब्लाउज़ के दरार पर पड़ी…और वो अपनी थूक गटक गया,

चम्पा की हिम्मत और बड़ी वो बाली के पैजामे से झांकते उसकी मर्दानगी को देखने लगी,जो तन कर किसी रॉड की शक्ल ले चुका था,इसके आभास ने ही उसे और उत्तेजित कर दिया ,और वो अपना हाथ बाली के बालो में ले आयी और उसे अपनी ओर खिंचने लगी ,इतना बलशाली बाली भी किसी कठपुतली की तरह उसके इशारों पर खिंचा चला गया और उसके सीने से जा लगा….

बाली की सांसे अब चम्पा के दरारों पर पड़ रही थी,जिससे दोनो ही जिस्मो की आग बढ़ती जा रही थी,अब बाली से भी सहन करना कठिन हो रहा था और वो अपने मुख को खोलकर थोड़ा नीचे जाता हुआ उसके खुले जगह पर अपनी जीभ लगा दिया..

चम्पा के लिए ये सहन करना कठिन था,वो बाली के सर को अपनी छाती पर जोरो से भिच ली..और वो दीवार टूट गई …वो संकोच की दीवार आगे क्या होने वाला था दोनो ही जानते थे और इस उमंग से ही दोनो के दिल की धड़कन तेज हो गई थी,बाली ने चम्पा की सहमति पा कर अपने हाथो और मुह को काम में लगा दिया वो धीरे धीरे बढ़ता हुआ उसके उजोरो को हर जगह से चाटने लगा और उसे निर्वस्त्र करने लगा चम्पा को भी अब ये कपड़े सुहा नही रहे थे,दोनो ही सालो के प्यासे थे और कब ये आग फुट जाय इसका कोई भी भरोसा नही था,बाली के अंदर का जानवर अब धीरे धीरे जागने लगा था,वो चम्पा के दूध को दुहने में आमादा था वो इतने जोरो से उसे निचोड़ रहा था की चम्पा को लगा की कही इनसे खून ना निकल जाय बाली अपनी जवानी में लौट गया था,वो चूसता मसलता,चम्पा के शरीर को तोड़ रहा था,और चम्पा की आहे पूरे सबाब में गूंज रही थी…

बाली ने आखिर चम्पा का वो आखरी वस्त्र भी निकाल फेका और खुद भी पूरी तरह निर्वस्त्र हो उसके उस गुफा में अपने लिंग को घुसाने लगा,दोनो ही इतने गर्म थे की कुछ ही धक्कों ने दोनो को तोड़ दिया और दोनो एक दूसरे को देख कर मुस्कुराने लगे….

जल्दी झरने का कोई दुख किसी को भी नही था क्योकि वो जानते थे की अब तो हर रात जवान होने वाली है ………..

“तुम बहुत ही कसी हुई हो ,जैसे जवानी में होती थी…”

बाली का प्यार पाकर चम्पा और भी खिल गई थी,उसने मादक अदा दिखाते हुए बाली को अपनी ओर खिंचा

“और आप वैसे ही जानवर है जैसे पहले हुआ करते थे,,..”

चम्पा की बात सुनकर बाली के अर्ध तने लिंग ने फिर से फुंकार मारी

“अब दिखता हु की जानवर किसे कहते है…”

दोनो का ठहाका पूरे कमरे में गूंज गया और बाली चम्पा के ऊपर सच में जानवरो जैसा झपटा…

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