करीब एक घंटे बाद सब लंच पर मिले। कविता ने टॉप और डेनिम शॉर्ट्स पहना हुआ था। जबकि माया और ममता साड़ी में थी। तीनों मस्त लग रही थी। जय और सत्य बस अपनी किस्मत पर खुश थे। सबने खाना खाया और उस दिन कहीं बाहर का ट्रिप नहीं था, तो सब वापिस कमरों में चले गए। कमरे में आकर सब सो गए, क्योंकि रात में सब बहुत व्यस्त होने वाले थे।
एक ओर जहां माया और सत्य एक दूसरे की बांहों में सोए थे, वहीं दूसरी ओर ममता और कविता जय को अपने बीच लेकर सोईं हुई थी। शाम के तकरीबन सात बजे उनकी नींद खुली। अब सब फ्रेश हुए और आपस में बातें करने लगे। ममता बाथरूम में थी। जय और कविता बाहर कॉफ़ी पी रहे थे। कविता उसे देख बोली,” जय तुमको कॉफ़ी अच्छी लग रही है?
जय- हां, क्यों अच्छी तो है??
कविता- तुम चाहो तो और अच्छी बन सकती है??
जय- कैसे??
कविता उसके सामने आ गयी और हंसते हुए, अपनी टॉप उतार दी और अपनी नंगी चुच्चियाँ दिखाते हुए बोली,” अपनी दीदी की चुच्चियों की चुस्कियां लोगे तो और मज़ा आएगा।”
जय ने उसके शॉर्ट्स पैंटी के साथ जांघों तक कर दिया और बोला,” कॉफी के साथ, दीदी के रसीली बुर का नमकीन पानी मिलेगा तो और मज़ा आएगा।” और बुर को उंगलियों से टटोलकर, उसके बुर का पानी चख लिया। कविता तो यही चाहती थी, वो तो बेशर्मों की तरह खुलकर चुदवाने आई थी। उसने खुदको पूरा नंगा कर लिया, फिर जय को अपना बुर फैलाकर दिखाते हुए बोली,” बहन की बुर हाज़िर है, अपने चोदू भाई के लिए। यहीं चूसोगे, की हमको उठाके बिस्तर तक ले जाओगे।” जय ने कविता की ओर देखा, कविता की मांग में उसका सिंदूर था, बाल खुले हुए थे और उसके कमर तक लहरा रहे थे। आंखों में चुदने की प्यास, कांपते होंठ उसके छलकते जाम की तरह होंठों का सहारा ढूंढ रहे थे। गले में चुच्ची की गलियों में लटकता चमकता मंगलसूत्र। सुहागन होकर उसका ये रूप जय को पागल कर गया। उसने कविता को अपनी गोद में उठाया, कविता ने उसके चेहरे को पकड़ चूम लिया। जय के हाथ कविता के चूतड़ों पर टिके थे। जय ने बिस्तर पर कविता को पटक दिया और कविता मचलकर उसके गले में बांहे डाले थी। दोनों इस स्थिति में एक दूसरे को देख रहे थे। तभी ममता ने दरवाजा खोला, उसने सामने उन दोनों को देखा, तो देखती रह गयी। दोनों युवा नवविवाहित युगल को देख उसको सुकून मिला। आखिर हनीमून युवा लोगों के लिए है। उसने देखा, कविता बेहद खुश थी। और हो भी क्यों ना, उसके जीवन में शादी का पहला अनुभव था। अब तक तो, वो भी अधेड़ होकर, उनके साथ, खूब मज़े कर रही थी। पर उसे लगा कि ये वक़्त उन दोनों का है। उसने दरवाजा वापिस बंद कर दिया। उसने मन ही मन सोचा, कविता कितनी महान है, अपने भाई के लिए पहले शादी नहीं की, फिर जब शादी कर ली तो अपना सुहाग भी बांट लिया। यहां तक कि सुहागरात की सेज पर, जहां हर लड़की, अकेले ही पति के साथ विवाहित जीवन की पहली रात, गुजारती है, उसपर भी ममता अपनी बेटी के साथ थी। वो तो ये सब पहले भी कर चुकी थी, पर कविता को ये मौका, कभी नहीं मिला, की वो अकेले,जय के साथ वक़्त गुजारे। शादी को पूरे 15 दिन हो चुके थे। ममता की आंखों में आंसू आ गए, उसके मुंह से बस इतना निकला,” हमरी बच्ची…….जुग जुग जियो।”
उधर, माया अपना साया उठाके, सत्य से बुर के बाल साफ करवा रही थी। सत्य, उसकी झांठों को बिल्कुल साफ कर दिया। माया की बुर सालों बाद झांठों कि कैद से आज़ाद हुई थी।
सत्य- अब तुमको बिकिनी पहनना चाहिए। अब तुम्हारी बुर पर बालों का गुच्छेदार पहरा नहीं है।
माया लजाते हुए बोली,” हम बिकिनी पहनेंगे। सत्य तुम क्या बोल रहे हो?
सत्य- सच कह रहे हैं, ये देखो तुम्हारे लिए लाए हैं। उसने अलमारी से निकाल दिखाया। पीले रंग की, बेहद छोटी बिकिनी थी। ” कल तुमको समुद्र किनारे, इसीमें चलना है।”
माया उसको देख बोली,” ये तो बहुत छोटी है, इसमें तो सब दिख जाएगा। गाँड़ तो पूरा नंगा ही रहेगा, और चुच्ची का निप्पल ही किसी तरह ढकेगा। और बुर तो, बड़ी मुश्किल से ढकेगा। इससे अच्छा तो हम नंगी होकर चले जायेंगे।”
सत्य- तो वैसे ही चलो, क्या दिक्कत है।
माया उसके सीने पर हाथ मारते हुए बोली,” क्या बोलते हो भैया? अपनी दीदी को गोआ में नंगे घुमाओगे।”
सत्य- अरे दीदी, यहां आएं हैं तो लहँगा चोली, साड़ी साया सब छोड़ो। जैसा देश वैसा भेष। यहां हर दूसरी लड़की, ऐसे ही बीच पर घूमती है। सब अपने में मस्त रहते हैं। कोई तुम पर ध्यान भी नहीं देगा, सिवाय हमारे।
माया- अच्छा, ज़रा देखे तो, कैसे ध्यान दोगे।
और सत्य माया के साये को उठा उसकी जांघों के बीच बुर को जीभ से चाटने लगा। माया सिसकारियां मारने लगी।
माया सत्य के गोद में निर्वस्त्र बैठी थी। सत्य माया के सीने पर सर दबाए था, जिससे माया की स्पंज समान चुच्चियाँ दबी हुई थी। माया उसके सर को पकड़ अपने सीने से लगाये हुए थी। सत्य किसी बच्चे की तरह उससे चिपका था। अगर माया की चुच्ची में दूध होता, तो शायद माया उसे पिला भी देती। माया की मस्त चूतड़ों पर सत्य के पंजे कब्ज़ा जमाये थे। दोनों की सांसे भी टकड़ा रही थी। माया के बाल बिखरे हुए थे, और अव्यवस्थित होने के कारण वो और सुंदर लग रही थी। चुदाई के बाद कमरे में एक औपचारिक खामोशी थी, क्योंकि कामक्रीड़ा में दोनों थक चुके थे। सत्य माया की बांहों में खोया था। माया उसको सीने से लगाये, कुछ सोच रही थी। उसके जीवन में सत्य तीसरा मर्द था। थोड़ी देर बाद, माया को सत्य के खर्राटे की आवाज़ आई। वो उसे बांहों में लिए उसी तरह बिस्तर पर लेट गयी। सत्य की नींद हल्की खुली तो, वो उसे ” ससससस…. ससससस ” बोलकर थपकी देते हुए सुला दी। इस क्रम में माया उसके बगल में वैसे ही लेट गयी, जैसा भगवान ने उसे पैदा किया था। सत्य भी नंगा ही सो गया। उसके सोते ही माया बिस्तर से उठी और नंगी ही खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गयी। अभी अभी हुई चुदाई से उसके कामपिपासी नंगे बदन पर पसीने की बूंदे, समुंदर की प्यारी हवा के टकराने से विलीन हो रही थी। उसने, अपने चेहरे को खिड़की से बाहर निकाला, और पलकें उठाकर, चांद को निहारने लगी, जैसे किसीको ढूंढ रही हो
कमरे की बत्तियां बंद थी और बाहर चांदनी अपनी चादर फैलाये थी। माया का बदन भी उस चांदनी में नहा गया। उसकी जुल्फें हवा के साथ लहरा रही थी। माया चांद को लगातार निहारे जा रही थी। निहारते हुए अचानक उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसके होंठ कांपने लगे। उसने अपनी बांहे फैलाई जैसे किसीको गले लगाना चाहती हो। कांपते हुए होंठों से उसके मुंह से शब्द निकले,” र.. रवी… हमको माफ कर दीजिएगा, आज हम फिर आपके प्यार को अपने शारीरिक भूख के आगे नीचा दिखाए।”
तभी रविकांत की रूह जो उसकी बांहों में थी, बोल उठी,” माया, आंखें खोलो। हमने कभी तुमको इसके लिए गुनहगार नहीं ठहराया है। तुम हमारे ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत ख्वाब थी। तुम्हारा प्यार हमारे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सौगात था। और ये क्या कम है कि आज भी हमारे जाने के बाद, तुम उस प्यार के दिये को अपने मन मंदिर में जलाए हुए हो। तुम्हारे साथ बिताए हर लम्हा, इस दूसरी दुनिया में भी हमारे साथ रहते हैं।”
माया उसकी ओर देख बोली,” लेकिन, आपने जो हमारे साथ किया वो ठीक नहीं किया। हमको, यहां छोड़ गए, आपके बिना जीने के लिए। आपसे अलग एक पल भी सदी के समान होता है और अब तो आठ साल बीत चुके हैं। आपको क्या पता कि कैसे काटे हैं हम। आपका साथ पाने के लिए हम आपके भाई से शादी तक कर लिए।”
रवि- माया, तुम भी जानती हो कि रिश्ता तुम्हारे लिए ही भेजा था, पर तुम्हारे बाबूजी को ममता की शादी की जल्दी थी। उन्होंने जोर देकर हमारी शादी करवा दी। रही बात तुम्हारा साथ, छोड़ने की बात तो वो हम जीते जी तो क्या, मरने के बाद भी नहीं छोड़े हैं। ज़िंदगी और मौत तो भगवान के हाथ की बात है, उस पर किसका बस है। अगर तुम ज़िंदा हो तो इसके पीछे भी वजह होगी। शशि बेचारे को क्या पता, की उसकी बीवी उसके बड़े भाई की प्रेमिका थी।
माया गुस्से से बोली- बेचारा मत बोलिये उसे, उसीकी वजह से आज आप और हम साथ नहीं है। ये जानकर की आप बाप नहीं बन सकते, उसने हम दोनों बहनों को रख लिया। आपकी माँ की वजह से ये सब हुआ। वो तो चली गयी। और हम दोनों बहनों को सौतन बना गयी। आपकी मौत भी उसीके कारण हुई है।
रवि- नहीं, ऐसी बात नहीं है।
माया- झूठ मत बोलिये, आप हमेशा से उसको बचाते आये हैं। उस रात जब वो दारू पीकर आया और आपसे नदी के पास की ज़मीन के लिए बहस हुई। तब उसने आपको क्या कुछ नहीं कहा, आपको नपुंशक, वंशहीन और ना जाने क्या क्या बोला। आपकी आंखों का दर्द उस दिन सिर्फ हमको दिखा था। वो रात आपके साथ हमारी आखरी रात थी। सोए तो आपके साथ थे, पर उठे तो आपकी लाश के साथ। ब्रेन हैमरेज हो गया था आपको।” ये कहते कहते वो फफक फफक कर रोने लगी।
रवि- वो रात भूले नहीं भुलाती। “
और दोनों जैसे खो गए उस रात में……
बिस्तर पर माया शशिकांत के साथ लेटी थी। शशिकांत दारू पीकर सो चुका था। उसने उसको हिलाकर एक बार जांच की। फिर हौले से बिस्तर से उतरी। रात के अंधेरे में माया चोरी छिपे कमरे का दरवाजा खोलती है। कमरे की कुंडी बाहर से बंद करती है, और दांये बांए देखती है। वो धीरे धीरे चुपके से उस कमरे की ओर बढ़ती है, जहां रविकांत सोया था। ममता और बच्चे दूसरे कमरे में सोए थे। चूंकि उस रात लड़ाई जो हुई थी। माया दरवाज़े पर पहुंचकर गेट खटखटाई। अंदर से रवि बोला,” माया क्या तुम हो??”
माया- हाँ, आइस्ता बोलिये। दरवाजा खोलिए।
रवि ने दरवाजा खोला। माया अंदर घुस गई और फौरन दरवाजा बंद कर दिया। फिर रविकांत की ओर पलटी। रवि- तुमको यहां नहीं आना चाहिए था।” माया उसके सर को पकड़ लेती है और चुम्मों कि बौछार करने लगती है। रवि ने उसको नहीं रोका। हालांकि, वो रिश्ते में उसका जेठ था, पर पहले उसका प्रेमी था। माया ने पहले, रवि को बच्चे की तरह चेहरे को टटोला, फिर उसके कंधों को। फिर बोली,” आप ठीक है ना। हमको आपकी चिंता हो रही थी।” रविकांत मुड़कर बिस्तर की ओर जाने लगा। तो माया ने उसका हाथ थाम लिया और बोली,” आपने हमारे सवाल का जवाब नहीं दिया।” रविकांत ने उसकी ओर देखा और कमर में हाथ डालते हुए बोला,” आओ ना।”
दोनों बिस्तर की ओर चल दिये। बिस्तर पर रवि बैठ गया और माया सामने खड़ी हो गयी।
माया उसके चेहरे पर हाथ फेडते हुए बोली,” आप बहुत उदास हैं। हमसे आपका उदासी देखा नहीं जाता है। आपको उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।”
रवि- चलो, इस घर में कोई तो है, जो हमारा इतना ध्यान रखता है।
माया- हम आपके भाई की बीवी बाद में हैं, और आपकी प्रेमिका पहले। आपका सुख हमारा सुख है, और आपका दुख हमारा।” ये बोलकर वो उसके बगल में बैठ गयी। रवि उसकी ओर देख बोला,” थक गए हैं हम, माया । इस समाज से लड़ते लड़ते, लोगों को मनवाते मनवाते की ये तीनों बच्चे, हमारे हैं और उनका बाप रविकांत है। और घर में ये बात सबको पता होते हुए, भी इसकी चर्चा नहीं हुई थी। पर आज वो भी हो गया। अब तो भगवान बस मुक्ति दे दे इस जीवन से बस…..।”
माया- छी…. क्या बोलते हैं आप। आप बाप नहीं बन सके तो क्या हुआ?? बाप का फर्ज तो निभा रहे हैं। वो आपका खून, भले ही ना हो पर आप कर्म से उनके बाप हो। आइए हमारे बांहों में आइए।” कहकर माया ने रविकांत को अपने बांहे फैलाकर आने का इशारा किया। रवि उसकी ब्लाउज से झांकती, अधनंगी चुच्चियों पर सर रख दिया। माया ने उसको एक मां की तरह सांत्वना दी।” आप नपुंशक नहीं है, आपका तो लण्ड खड़ा होता है, आपका स्पर्म काउंट बस कम है। और इसलिए आप दीदी को बच्चा नहीं दे पाए। आप हमारे नज़र में मर्द है, नामर्द नहीं। काश हम आपकी पत्नी बनते। प्रेमी प्रेमिकाओं के बीच हमेशा से भगवान समाज के रूप में दीवार खड़ा कर देते हैं। दोनों का मिलन जल्दी नहीं होता या होता ही नहीं। फिर भी दोनों समाज के बंधनों को तोड़कर, मिलते रहते हैं। जैसे हम और आप इस वक़्त हैं। समाज ने हमको आपसे जेठ का रिश्ता जोड़ दिया है। पर ना तो हमने और ना कभी आपने इस रिश्ते को मान दिया है। हम तो आपकी प्रेमिका बैंकर सारा जीवन बिताना चाहते थे। पर आपने ही हमको अपने पास रखने जे लिए, अपने छोटे भाई से शादी करने को कहा। आपके साथ और आपके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए हमने ये भी कर लिया। पर आपको इस तरह देखते हैं तो, लगता है कि आपका सारा दुख हमको मिल जाये।”
रवि ने उसकी ओर देखा तो, माया ने उसके माथे को चूम लिया। रवि ने उसको पकड़कर उसके होंठ पर अपने होंठ रगड़ने लगा, ऐसा करते हुए उसने माया को बिस्तर के बीच ले आया। माया उसका भरपूर साथ दे रही थी। उसके होंठ और जीभ रवि के होंठों के साथ पकड़म पकड़ाई का खेल खेलने लगे। दोनों एक दूसरे में लीन थे, चुम्बन का कोई अंत ही नज़र नहीं आ रहा था। माया रवि को अपने ऊपर खींच रही थी, अपने बांहों से पकड़ उसको अपने अंदर समा लेना चाहती थी। रवि माया के होंठों पर बुरी तरह टूट चुका था। वो, उसके अधरों के यौवन का रसपान कर रहा था। कभी वो नीचे होता तो कभी माया। दोनों किसी बिछड़े प्यासे प्रेमी युगल की तरह, खो गए थे। तभी माया ने शशि के कपड़े उतार दिए, और खुदकी, ब्लाउज उतारने लगी। रवि ने उसका ब्लाउज उतारने में उसकी मदद की और, माया के सुडौल चुच्चियों को आज़ाद कर दिया। उसने माया की साड़ी को कमर से पकड़ा और उसका सूक्ष्म चीरहरण कर साड़ी को उसके जिस्म से अलग कर दिया। माया अब सिर्फ साया में थी। साया को खोलने की बजाय, उसने साया उठा लिया, और पैंटी, उताड़ फेंक दी। फिर रवि के मुंह के पास आकर, अपनी बुर को उसके मुंह पर रगड़ने लगी। रवि को बुर चाटना बड़ा अच्छा लगता था, माया की बुर से बेहिसाब नमकीन पानी चू रहा था। वो कमर हिलाकर, बुर रगड़ रही थी। रवि उसके चूतड़ थामे हुआ था।
माया की बुर के फांक के बीच रवि की जीभ, जब टकराती तो, उसके मुंह से आआहह निकल जाती। माया को ये एहसास पागल कर जाता था। फिर तो वो अपना बुर उसके चेहरे पर मलने लगी। उसकी कमर में एक चाल सी थी। रवि ने माया के बुर को अपने थूक से पूरा गीला कर दिया था। वो कभी कभी बीच में दांत भी गड़ा देता था। माया छटपटाती, पर अपने जेठ को कुछ नहीं, बोलती थी। उसे अपने साथ इतनी छेड़खानी अच्छी लगती थी। माया अपने बाल खोलने के लिए हाथ ऊपर की, और क्लिप निकाल दिया। उसकी जुल्फें, काली घटाओं सी रात में अंधेरा कर गयी। रवि ने बुर चाटने के साथ साथ उसकी नाजुक गाँड़ में उंगली, घुसा दी। गाँड़ में उंगली घुसना और बुर चटाई से, माया मदमस्त हो रही थी। माया की गाँड़, में रवि को उंगली करने में, बहुत मज़ा आता था। माया उसकी ओर देखी,” आप नहीं, सुधरेंगे ना। हमको इस तरह गाँड़ में उंगली करना आपको बहुत पसंद है।”
रवि- तुम्हारी गाँड़ है, बड़ी मस्त। इसको छेड़े बिना कैसे रह सकते हैं।
थोड़ी देर उसकी बुर चाटने के बाद, माया खुद उसके लण्ड पर बैठ गयी और लौड़ा, बुर में घुसाने लगी। रवि का लण्ड कड़क था, पर उतना नहीं। माया सब जानती थी। इसलिए वो, अपनी गाँड़, रवि की ओर कर दी और बोली,” हमारे गाँड़ में खूब उंगली कीजिये। हमको अपना लौड़ा चूसने दीजिए। तब आपका और सख्त हो जायेगा। देखिए ना हमारी नंगी गाँड़ को। कितने चिकने चूतड़ है, मुलायम सेब की तरह। आपके लिए। ” वो लण्ड को और कड़क होता महसूस की। फिर लण्ड चूसने लगी। रवि माया के गाँड़ में उंगली करते हुए, उसके नंगे चूतड़ों पर काटने के निशान भी छोड़ रहा था। उसकी उंगली माया की तंग, सिंकुड़ी, कसी हुई गाँड़ में रास्ता बनाके पूरी तरह भीतर घुस गई। माया की गाँड़, से वो खिलवाड़ कर रहा था। तभी उसने दूसरी उंगली भी घुसा दी। माया के मुंह में लण्ड की वजह से सिर्फ,” हहम्ममम्म….. बोल पाई। पर वो पीछे नहीं हटी। वो अपनी बुर भी सहला रही थी साथ में। थोड़ी ही देर में, बुर में लौड़ा घुसाने के लिए वो परेशान हो गयी। लौड़ा को चूसना छोड़, उसकी ओर उठके लपकी।
माया- आपके घोड़े को एक सवारी की जरूरत है। और चढ़ गयी अपना साया उठाकर। बुर की फांकों को फैलाकर लण्ड का सुपाड़ा अपनी बुर में माखन की तरह उतारती चली गयी। वो फिर झुककर, अपने जेठजी, की आंखों में देखते हुए, कमर हिलाकर, चुदने लगी। माया की चुच्चियाँ उसके जेठ के सीने से टकड़ाकर और कड़क और चूसने योग्य हो गयी थी। माया ने रवि को अपने मस्त मस्त चुच्चियों को उसके मुंह में घुसाने लगी। वो हंस रही थी। दोनों मज़े ले रहे थे।
माया- आप नामर्द नहीं है, जेठजी। आपका लौड़ा हमारा बुर को पेल रहा है।
आपको, औरत का दूध पीना चाहिए। उससे आपको ताक़त मिलेगा। अपनी बहू का दूध पियेंगे। चूस कर देखिए, आपके लिए चुच्ची में दूध है कि नहीं। काश हम आपको, अपना दूध पिला पाते। आपके सिवा किसी और का बच्चा हमारे पेट में पलेगा नहीं। हम माँ बनेंगे, तो सिर्फ आपके बच्चे का। हमको माँ बना दीजिए।
माया की ये बात सुनकर, रवि का रुकना मुश्किल था। वो बोल उठा,” माया हमारा चूने वाला है।” माया बोली,” इसीलिए तो हम ऊपर चढ़े हैं ताकि हम आपके साथ ही झड़े। माया तेज़ी से कमर हिलाने लगी। और दोनों एक साथ झड़ गए। दोनों बिस्तर पर निढाल हो गए। माया के बुर में ही रवि ने मूठ गिराया था, पर माया के माँ बनने की संभावना बिलकल नही थी। माया उसके ऊपर ही लेटी थी। दोनों हांफ रहे थे। कुछ देर ऐसे लेटने के बाद। माया बिस्तर से उठी और अपने जेठ के लिए पानी लाने गयी। वो नंगी ही कमरे में रखी पानी की सुराही से पानी ले आई। रवि उठकर बिस्टेर के सिरहाने पीठ टिकाकर, बैठ गया। माया उसकी ठुड्ढी पकड़ पानी पिलाने लगी। फिर वो उसकी छाती से चिपककर, उसके बगल में उसी तरह लेट गयी। तूफान थम चुका था। उसने रवि की ओर देखा,फिर बोली,” क्या सोच रहें हैं आप?
रवि,” तुमको हम माँ नहीं बना पाए।तुम्हारी इच्छा पूरा नहीं कर पाएंगे।”
माया- आपको इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं हैं। हम आपकी प्रेमिका बने, यही बहुत है।
रवि- ना तो तुमको बीवी ही बना पाए?
माया- अगर आप हमको रखैल समझते हैं, तो भी हम खुश हैं। मांग में सिंदूर हम रोज सिर्फ आपजे नाम से लगाते हैं। और इसमें सिर्फ आपका ही नाम रहेगा।”
रवि- ये तो तुम्हारा बड़प्पन है। माया क्या हम तुमसे कुछ मांगे तो दोगी?
माया- दिल जान सब तो आपको दे चुके हैं, और क्या दे सकते हैं आपको।
रवि- मज़ाक नहीं, वादा करो ना दोगी।
माया- आपकी कसम खाते हैं, आपकी खुशी के लिए सब मंज़ूर है।
रवि- तो हमसे वादा करो, अगर हमको कुछ हो गया, तो तुम जियोगी हमारे प्यार की खातिर। और इस दौरान तुमको प्यार करनेवाला, अगर कोई मिलेगा तो तुम उसके साथ खुशी खुशी रहोगी। हम जानते हैं कि तुम शशि की पहली पसंद नहीं हो। उसको ममता पसंद है। इसलिए हमारे बाद तुमको अगर कोई चाहनेवाला मिले, तो तुमको हमारी कसम है, तुम पीछे मत हटना।”
माया- ये क्या बोल रहे हैं आप ? हम सिर्फ आपके हैं। इस तन पर इस आत्मा पर सिर्फ आपका हक़ है।ये हमसे नहीं हो पायेगा। आपने हमको धर्मसंकट में डाल दिया है।
रवि- तुम हमसे बहुत छोटी हो। तुम्हारे अंदर सेक्स की जो भूख है, उसको सिर्फ एक मर्द ही शांत कर सकता है। शशि तुमको चोदता तो होगा, पर तुमको वो एहसास नहीं मिलता होगा। हमारे जाने के बाद तुमको, कोई ना कोई तो चाहिए।
माया- आप बार बार अपने जाने की बात क्यों कर रहें हैं। आप हमारे साथ ही रहेंगे। कुछ नहीं होगा आपको।” माया सजे गाल सहलाते हुए बोली।
रवि- तुम वादा करो बस।
माया- आप सो जाइये, रात बहुत हो गयी है। आपको आराम की जरूरत है। हम कल बात करेंगे।” माया ये कह कर बिस्तर से उठी और अपनी साड़ी फर्श से उठने लगी।
रवि उसका हाथ पकड़ बोला,” आज रात यहीं सो जाओ। हमको अपने बांहों में सुलाओ। माया मुस्कुरा पड़ी। उसने घड़ी की ओर देखा रात के 2 बज रहे थे। दो घंटे का समय था उसके पास। वो उसके पास लेट गयी और, उसे अपने नंगे सीने से लगाके, थपकियाँ देकर सुलाने लगी। जैसे माँ अपने बच्चे को सुलाती है। पर रवि को नींद नहीं आ रही थी। उसने माया से फिर कहा,” प्लीज वादा करो ना।” माया बोली,” अरे हमारे राजाजी आप आराम से सोइये अभी।” रवि बे जवाब दिया,” जब तक तुम वादा नहीं करती, तब तक हमको नींद नहीं आएगी। प्लीज कह दो।”
माया ,” ऊफ़्फ़, आप भी जिद्दी हैं। ठीक है वादा, अब खुश। अब सो जाइये।”
फिर रविकांत और माया आपस में सो गए। पर रविकांत शायद अब कभी नहीं उठने वाले था।
सुबह के चार बजे, माया उठी। उसने देखा भोर होनेवाली थी। वो झटपट उठी, और पहले अपने कपड़े पहन ली। साड़ी ब्लाउज सब पहनकर, वो सोते हुये रवि का माथा चूमने नीचे झुकी और बोली,” हम जा रहे हैं।” और उसको चूम ली। सामान्यतः ऐसे करने पर रविकांत जग जाता था। पर आज ने कोई हरकत नहीं की। माया को लगा वो नाटक कर रहा है। इसलिए उसने उसके होंठों पर चुम्मा दिया। पर फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उसने महसूस किया कि उसकी सांसें नहीं चल रही है। उसने उसके चेहरे को हिलाया तो, वो लुढ़क गया। वो अवाक रह गयी। ये तय था, की वो मर चुका था। वो वहां से रोते हुए चली गयी।
कुछ देर बाद घर के आंगन में उसकी लाश थी। ममता और कविता फूट फूट कर रो रहे थे। कंचन भी रोये जा रही थी। माया के आंसू तो सूख से गए थे। सिर्फ ममता ही समझ सकती थी, उसका ये हाल। पर वो खुद ही कहाँ संभल पाई थी।
वो दिन याद करके माया के आंसू बहने लगे। वो रोते जा रही थी। फिर बोली,” आपको दिया हुआ वादा हम आज भी पूरा कर रहे हैं। खुद को ज़िंदा रखे हुए हैं, बस आपके लिए। हमको प्यार दुबारा मिला तो, अपने भाई में ही।” तब तक वो अकेले, ही खिड़की से लगे चांद में रविकांत का चेहरा जाते हुए देख रही थी।
आपके जाने के बाद, हम रोज जलते हैं और शशिकांत के साथ होते हुए भी, उसके साथ सोते हुए भी, हम उससे बदला लेने की सोचते थे। आपकी मृत्यु का जिम्मेदार वही है, हम उससे बदला जरूर लेंगे। और हमारा भाई सत्य हमारी मदद करेगा उसको ही हथियार बनाएंगे।”
माया वैसे ही खड़ी बाहर निहार रही थी।
दरवाज़े पर दस्तक हुई, जय ने पूछा,” कौन है??
उधर से आवाज़ आई,” सर, रूम सर्विस, योर डिनर।”
कविता ने खुद को सफेद चादर से ढक लिया। और हड़बड़ाते हुए उठकर जल्दबाजी में बाथरूम में घुस गई। वो बाथरूम में घुसी तो, दरवाज़े की ओर ही देख रही थी। तभी उसे लगा कि उसके पैरों को किसीने पकड़ लिया। उसने झटके से नीचे देखा तो ममता उसके पैरों में गिरकर रो रही थी। कविता ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा फिर उसे उठाने की कोशिश की पर वो उसके पैर नहीं छोड़ रही थी।
कविता- माँ, ये क्या कर रही हो तुम? चलो उठो ना।
ममता- नहीं, दीदी हम आपके चरण की धूल के बराबर हैं। जो पाप हम किये हैं, उसके लिए माफी माँगना चाहते हैं।
कविता- क्या किया तुमने माँ? कौनसा पाप, कैसी माफी?
ममता- दीदी, कोई भी औरत अपने हनीमून पर अपनी सौतन को नहीं ले जाती। ये हनीमून तो आप दोनों का था पर हम बीच में आ गए। आपका हक़ पहले बनता है, जय पर। आप अपना हनीमून भी सौतन के साथ मना रही है। और हम बेशर्म चले भी आये, ये भी नहीं सोचा कि हम सौतन होने से पहले तुमदोनों की माँ भी है। अपने बच्चों के बीच, हम भी किसी बच्चे की तरह चले आये। यहां तो तुमदोनों का हक़ है।
कविता- माँ, हमारे पैर छोड़ो, हमको तुम्हारा पैर छूना चाहिए। और उल्टा तुम हमारा पैर छू रही हो। तुम हमसे बड़ी हो, और ये क्या आप आप बोल रही हो….उठो ना प्लीज…
ममता- नहीं, हम आपके माँ जरूर हैं, आपसे उम्र में बड़े हैं, पर आप हमसे बहुत बड़ी हैं सोच से। हमको माफ करेंगी की नहीं। तभी हम पैर छोड़ेंगे।
कविता- माँ, उफ्फ्फ अच्छा ठीक है, माफ कर देंगे पहले हमारी बात तो सुनो।
ममता- नहीं, पहले माफ करो।
कविता- अच्छा, ठीक है । उठो
ममता के कंधे पकड़के उसने उसको उठाया और फिर उसके आंसू पोछने लगी। फिर उसकी ओर देखा कविता बोली,” ये बताओ, तुम जय की बीवी हो और हम भी उसकी पत्नी हैं। उसने तो हमदोनों को अपनी जीवनसंगिनी बनाया है। हम दोनों को ही उसका खुशी का ध्यान रखना है। हम दोनों पर उसका समान अधिकार है। और जितना अधिकार हमारा उसपर है, उतना ही तुम्हारा भी है। वो भले ही हम दोनों को अभी भी माँ और बहन माने,पर हमको तो अब उसकी पत्नी बनकर रहना है। ये बात सच है कि उसने हमसे पहले शादी की पर, उसने तुम्हारे साथ भी सात फेरे ही लिए, और मांग में वही लाल सिंदूर डाला, और गले में वैसे ही मंगलसूत्र डाला। अब ये कौन तय करेगा, कि उसपर हममें से किसका अधिकार पहले या ज्यादा है?
ममता- तुम्हारा अधिकार पहला है, और ज़्यादा भी। आखिर तुम राज़ी नहीं होती, तो हमदोनो की शादी कैसे हो पाती?
कविता- शादी तो तुम दोनों कर चुके थे, खजुराहो में। और रहा बात राज़ी होने का, तो जय के साथ हमारी शादी की मंजूरी तूम ही दी थी। तो दोनों बराबर हैं।
ममता- पर……
कविता- पर…..वर….. कुछ नहीं। आजसे हमारा हमदोनों के पति के साथ हनीमून है। और हनीमून में पति को इंतज़ार नहीं कराते। चलो ना मज़ा करना है।” बोलकर वो जैसे ही ममता का हाथ पकड़ बाहर निकलने को हुई, तो देखा सामने, जय था। वो जय को देख मुस्कुराई और बोली,” चलो खाना खाते हैं।” उसने दोनों की ओर देखा, और बोला,” दोनों बाथरूम में क्या बातें कर रही थी? सब ठीक है ना।
कविता- आपकी दूसरी पत्नी, हमारी माँ को लगता है कि वो हमदोनों के बीच कबाब में हड्डी हैं, इस हनीमून पर। अब आप समझाइए इनको।”
जय- माँ ये क्या सोच रही हो तुम? तुमदोनों अब हमारे जीवन के हर हिस्से की बराबर की हक़दार हो। तुमको ये सब सोचना बंद कर देना चाहिए। तुम दोनों को अंतिम साँस तक….”
ममता और कविता दोनों ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया, और एक साथ बोली,” क्या अनाप शनाप बोलते हैं, आपको हमारी उम्र लग जाये।” जय ने उनका हाथ हटाकर, उन दोनों को अपने गले से लगा लिया। दोनों के माथे को चूम लिया और उसके होंठ बुदबुदाए,” भारतीय नारी” फिर मुस्कुराने लगा।
ममता और कविता ने बदले में उसके दोनों गालों को चूम लिया। जय बोला,” खाना आ गया है। लेकिन उसके पहले हमको नहाना है। क्या तुम दोनों हमको नहलाना चाहोगी? हम बहुत थक चुके हैं।”
ममता बोली,” आइए हुज़ूर हम दोनों मिलके अपने स्वामी को खूब मज़े से नहलायेंगी। क्यों कविता ?
कविता,”इसमें तो बहुत मज़ा आएगा। अपने पति का, भाई का हर अंग हम खुद अपने हाथों से साफ करेंगे। चलिए ना जल्दी से अंदर।
दोनों जय की बांह पकड़ अंदर ले गयी। अंदर टब में पानी भरा हुआ था। कविता ने जय का तौलिया निकाल दिया। उसको फिर टब में उतारने के लिए दोनों माँ बेटी ने अपने कंधे झुकाए। जय उनके कंधों पर हाथ रखके, आराम से टब में उतर गया। वो लेटने ही वाला था कि, कविता ने उसे रोक दिया। फिर ममता और कविता भी टब में उतर आई। ममता और कविता दोनों किनारों पर थी। फिर दोनों ने बेशर्मों की तरह हंसते हुए अपने बदन से कपड़े उतार फेंक दिए। जय दोनों की ओर बारी बारी से देख रहा था। दोनों ने बाल खोल दिये। दोनों अपने अपने किनारों पर खड़ी अपने नंगे बदन की कामुक नुमाइश में लगी थी।
जय ममता के चुच्चियों को देख पागल हो रहा था, तो उधर कविता अपने नन्हे बुर को मसलते हुए अटखेलियां कर रही थी। फिर उन दोनों ने उसे लेटने का इशारा किया। जय पानी के अंदर बैठ लेट गया। उसके लेटने के साथ दोनों, भी पीठ टब के किनारों पर टिका बैठ गयी। जय का सर ममता और पैर कविता की ओर था। उसका सर ममता की चूचियों पर टिक गया। पैर कविता की कोमल जांघों पर। कविता उसके पैर धोने लगी। ममता उसकी ओर कामुकता से देखते हुए, उसकी छाती रगड़ रही थी। जय के हाथ ममता के ममतामयी चूचियों पर शिकंजा कस हुए थे। वो उनमें से दूध निचोड़ने की कोशिश में लगा था। ममता ने बड़े प्यार से अपनी बांयी चुच्ची के चूचक को उसके होंठों के बीच दे दिए और बोली,” बहुत दिन हो गए ने बेटा सैयांजी, माँ का दूध पिये। पीलो बेटा, माँ का दूध। तब तो ताक़त आएगी और दोनों बीवियों को जमकर चोदोगे।” और मुस्कुराने लगी। जय मुंह से चूचक चूसते हुए, हंस पड़ा। ममता भी हंसते हुए, उसकी छाती पीठ सहला रही थी। नीचे कविता उसके तलवे रगड़ रही थी। जिससे उसे हल्की गुदगुदी भी हो रही थी। तीनों का बदन पानी में पूरी तरह भीग चुका था। ममता और कविता की नग्नता पानी में भीगने से और भी कामुक हो चुकी थी। वैसे उनमें कामुकता की कोई कमी नहीं थी, पर पानी में गीले होकर उनके उभार, चुच्चियाँ, गाँड़ और जांघें कामुकता की नई परिभाषा लिख रहे थे। भूरे चूचकों के कड़क होने से पानी की बूंदे मोतियों जैसे उस पर लटकी हुई थी। चुच्ची चूसते हुए वो कविता, की ओर देख रहा था। कविता की जवान कड़क, सुडौल, गोल चुच्चियाँ को इस तरह देख, उसका लण्ड खड़ा होने लगा। कविता इस बात से अंजान, किसी दासी की तरह, अपने छोटे भाई के पैरों को साफ कर रही थी। उधर ममता, अपने बेटे की छाती सहलाते हुए, दूसरे हाथ से उसके बाल भी सहला रही थी। कविता पैरों को साफ करते हुए अब जांघों तक आ पहुंची थी। उसकी नज़र जय के सलामी देते हुए लण्ड, पर पड़ी। वो देख, उसके होंठों पर मुस्कान तैर गयी। पर उसने उसे छुवा नहीं, बल्कि उसकी जांघों को रगड़ते हुए साफ करने लगी।
उधर ममता भी अब जय की पीठ पर अपने कोमल हाथों से सफाई कर रही थी। जय के लिए तो ये किसी राजा के हरम जैसा था। कविता और ममता भी उत्तेजित हो चुकी थी। हालांकि, कविता कुछ देर पहले ही जय से चुदी थी, पर इस माहौल में तो कोई भी कामुक हो जाये। तभी जय उठा और कविता की ओर बढ़ा, वो कविता के चुचकों पर बाज की तरह लपका।
दोनों चूचियों को भींचकर, चूचक मुंह में भर चूसने लगा। ममता ये देख, मुस्कुराई फिर जय के कमर और जांघों को धोने लगी। कविता उसे अपनी बांहों में भर ली और उसके माथे को चूमने लगी। ममता ने इस समय कविता की आंखों में जय के लिए जो प्यार देखा था, उसे देख वो सोचने लगी,” हाय रे दोनों की किस्मत, कविता जय को प्यार दीवानियों की तरह करती है, पर दोनों हमारे कोख से ही पैदा हुए और भाई बहन हुए। दोनों की किस्मत की एक ही माँ के बच्चे हैं, पर पैदा हुए थे एक दूजे के लिए।” दोनों बहुत ही खोए हुए थे। ममता की आंखों से आंसू गिर गए। वो जय के आंड़ औ लण्ड को सहलाने लगी। वो बड़े प्यार से लण्ड को घूर रही थी। तब जय को एहसास हुआ उसने ममता को लण्ड चूसने का इशारा किया। ममता बिना एक पल गवाए, झटके से लण्ड के फूले सुपाड़े को मुंह में धर ली। ममता लण्ड को पूरा मगन होकर चूसने लगी। जय आनंद के सागर में डूबा था, और ममता की बुर को अपने पैरों की उंगलियों से छेड़ रहा था।
ममता तो उसके अंगूठे को बुर में घुसता महसूस की तो उसपर बैठ गयी। जय के पैर की दो उंगलियां ममता की बुर में घुस चुकी थी। ये होते ही जय के हाथ कविता की बुर को टटोलने लगे। चुच्ची का मर्दन जैसे कविता के लिए काफी ही नहीं था, उसने खुद ही सिसकते हुए चूचियों को मसलना शुरू कर दिया। नीचे से बुर के अंदर जय की उंगलियां अंदर बाहर हो रही थी। दोनों की चुच्चियाँ चूस कर वो पूरा आनंद उठा चुका था। फिर जय ने ममता के बाल पकड़के अपने लण्ड से उठाया और कविता के भी बाल पकड़ बोला,” दोनों खड़ी हो जाओ। दोनों माँ बेटी कामुकता से लबरेज़ उसके इशारे पर खड़ी हो गयी। जय ने दोनों को पीछे घूमने को कहा ताकि दोनों की गाँड़ उसकी ओर हो। जय बोला,” चिपक कर खड़ी रहो। आआहह, हाँ शाबाश अब दोनों अपने कमर को झुका गाँड़ बाहर की ओर निकालो। दोनों के बुर और गाँड़ साफ दिखने लगा, क्योंकि दोनों ने अपने हाथों से चूतड़ों को फैलाया हुआ था। जय ने पहले ममता के बुर को जीभ से चाटा और कविता की बुर में उंगली घुसा दी। दोनों माँ बेटी के मुंह से लंबी सिसकारी निकल गयी। ईईसससससससस…….. उनके मुंह से लगातार सिसकारियां निकल रही थी। जय ममता की बुर में भी उंगली घुसाए था। दोनों के भीगे बुर से मादक गंध आ रही थी।
वो बुर की गीलेपन का सहारा लेकर उंगलियां बार बार घुसा के निकाल रहा था। वो दोनों इसका बड़े अच्छे से आनंद उठा रही थी। कभी कविता की बुर जय की जीभ का शिकार होती तो कभी उसकी माँ की बुर। पर दोनों ही उसका भरपूर सहयोग कर रही थी। बुर के पानी को वो चूसकर कामुकता का जाम पी रहा था। तब जय ने उनकी भूरी सिंकुड़ी कली के जैसे गाँड़ की सिंकुड़ी छेद पर गयी। जय ने उनके अंदर भी मोटी वाली उंगलियां घुसा दी। दोनों का सिसकना अब अचानक आहों में बदल गया। अपनी नन्हें छेदों में हमले से उनको थोड़ा दर्द हुआ, पर कुछ बोला नहीं। बल्कि दोनों एक दूसरे के चेहरे की ओर देख एक दूसरे के चेहरे को सहला रही थी। जय का हमला अब तेज हो रहा था। दोनों के छेदों को बरी बारी से चूसते हुए, वो उंगलियों को बुर और गाँड़ में तेज़ी से अंदर बाहर करने लगा। क्या स्वाद था! वो औरत के इस स्वाद का दीवाना था। उसकी लप्लापायी जीभ कभी गाँड़ के छेद के भीतर घुसती तो कभी बाहरी सिंकुड़ी सतह को चूसती। ऐसे करने से उन दोनों की कमर मस्ती में डोलने लगी थी। कभी भीगी बुर से रिसते पानी से वो अपनी प्यास बुझाता तो कभी बुर पर अपनी लार लगाता। तीनों एक दम मस्ती में डूबे थे। असली काम क्रीड़ा का असल आनंद ले रहे थे। गाँड़ और बुर से अंदर बाहर होती उंगलियां बहुत कामुक लग रही थी, और उससे भी कामुक उनकी आँहें थी। जय का लण्ड अब तनकर लोहा हो चुका था। ममता और कविता भी बुर में लण्ड लेने को मचलने लगी थी। जय ने ममता को झुकाया, ममता दीवार पकड़ झुक गयी। जय ने लण्ड सीधा अपनी जन्मस्थली में घुसा दिया, जिससे शायद बहुत जल्दी उसका बच्चा जन्म लेनेवाला था।
ममता- उफ़्फ़फ़, आआहह, हे भगवान ऊयईई….
जय- आआहहहहह…. ममता तुम्हारा बुर तपता हुआ भट्ठी है। पूरे लण्ड को तुम्हारे बुर की गर्मी का एहसास हो रहा है। तुम्हारे बुर में एक नयापन लग रहा है।
ममता- बेटा सैयांजी, आज आपने हमको हमारे नाम से बुलाया है, और हमको आपकी पत्नी होने का एहसास हुआ है। इसी तरह हमको चोदिये। अपने लण्ड से बुर को छितरा दीजिए। बुर टाइट करने के लिए कविता ने एक क्रीम दिया था, वही लगाए हैं। इसलिए आपको नयापन का एहसास हो रहा है। हमको खुद बुर में लण्ड होने का एहसास पहली रात जैसा हो रहा है। इस औरत को बिल्कुल जवान लड़की की तरह महसूस हो रहा है। कविता तुम्हारा धन्यवाद।” कविता की ओर मुड़कर बोली।
कविता उन दोनों को कामुकता से देखते हुए बोली,” अरे हमारी सौतन माँ, अब तो उसका इस्तेमाल सीख गई ना। अब खूब चुदवाओ अपने बेटे के लण्ड से। तुमको तो इस बार जय, अपने बच्चे की माँ बना देगा। और हमको एक भाई मिलेगा या भतीजा।”
ममता- ऊँह…ऊँह…ऊऊ आ… हां हमको तो बच्चा चाहिए। हमारे बच्चे का बच्चा। तुमको भी तो बच्चा पैदा करना होगा।
कविता- माँ, हमको बच्चा अभी 2- 3 साल नहीं चाहिए। अभी तो खूब मस्ती करना है।
जय-अरे अभी तो हमको सेक्स का मज़ा लेने दो। बच्चा ठहरेगा, तो दोनों पेट फुलाकर बैठ जाओगी।
कविता- तभी तो, हम तीन साल का समय मांग रहे हैं। जब माँ प्रेग्नेंट होगी, तब तुम हमको चोदना।
जय- आआहह…. आह… आह… क्या मस्त बीवियां पाए हैं हम। मौज मस्ती के लिए तुमदोनों एकदम तैयार रहती हो।
ममता- उफ़्फ़फ़…. ऊँह.. यही तो पत्नी का काम है। पति के साथ हनीमून पर मौज मस्ती करना।
जय- सही कहा तुमने ममता। तुम अब पहले से ज्यादा खुल गयी हो और नटखट भी।
कविता- माँ की आदत है खाने में मसाला तेज डालने की।
ममता- अच्छा इधर आ तो। अभी बताती हूँ मसाला तेज़ कैसे होता है।
ये बोलकर ममता कविता को चुम्मा लेने लगी। बहुत ही तेज चुम्मा।
जय ये देखकर पागल हो उठा। उसने ममता की गाँड़ पर पांच छह थप्पड़ जड़ दिए। ममता की गाँड़ लाल हो गयी। वो सिसकारी मारती हुई, कविता को चूम रही थी, पर उसने ऊफ़्फ़ नहीं की। जय ममता की बुर को हुमच हुमच कर चोद रहा था। वो करीब 10 मिनट तक, ममता की बुर का फैलाव बढ़ा रहा था। उधर उन दोनों का चुम्बन टूटते ही, कविता बोली,” हमारी बुर को भी तो चोदोगे ना, इस लण्ड पर हमारी बुर का हक़ है। खाली अपनी माँ की ही बुर चोद रहें हैं।”
जय कविता के गाल पर एक तमाचा मारा और बोला,” साली, कुत्ती की बच्ची, अभी अभी तो चोदा था, तुम्हारी बुर को। बहुत ज़्यादा बुर चोदवाने के लिए मचल रही हो। पहले तुम्हारे माँ को चोदेंगे, फिर तुमको।”
कविता अपना गाल सहलाते हुए बोली,” छब्बीस साल की हो गए हैं। अब तक हमको तीन बच्चों की माँ बन जाना था। लेकिन ले देकर अब एक लौड़ा मिला है, वो भी अपने सगे भाई का। सारा कसर पूरा करेंगे।” ये बोलकर वो जय का लण्ड पकड़ ली, और निकालकर अपने बुर में घुसा ली।
कविता- अब हमारे बुर की खबर लो, अपने लण्ड से।”
ममता- चोदो बेटा, हमारी बेटी को चोदो। अपनी दीदी को चोदो। हम माँ बेटी को अदल बदल कर चोदो। हाय रे औरतों की बुर, क्या क्या करवाती है? माँ से बेटी, भाई का लौड़ा छीन अपने बुर में पेलवाती है। हमारी बेटी को, लण्ड की कमी मत होने देना।” ममता जय का हाथ थाम बोली।” ये हमारी बच्ची अब आपके, पल्ले बांध दी है, जमाईजी।”
जय- ममता तुम और तुम्हारी ये बेटी, हमारी मस्त छिनालों की तरह रहना सिख जाओ। दोनों को कोई कमी नहीं होने देंगे। तुम तो हमारी सास और माँ दोनों हो।
कविता- अरे भैया सैयांजी, अपनी इस बीवी को तो पेलो। कबसे बुर में लण्ड घुसा झुके हुए हम।
जय कविता की बात सुन उसकी कमर को पकड़ ताबड़तोड़ धक्के मारने लगा। कविता के मुंह से आँहें निकलने लगी। उसकी चूचियों और गाँड़ में धक्कों की वजह से थिरकन होने लगी। उसका नंगा शरीर भीगने की वजह से, चमक रहा था। जय उसके चूतड़ों को दबोचे हुए, धक्के मार रहा था। इस तरह दोनों माँ बेटी, झुके हुए दीवार से चिपकी हुई, अपना नंगा नारीत्व लुटा रही थी। जय लगातार चोदते हुए उन दोनों की काम पिपासा शांत कर रहा था। इस क्रम में उसने कविता की गाँड़ में उंगली भी घुसा दी।
कविता बोली,” हाँ, आआहह…. तुम्हारा लण्ड बुर में और उंगली गाँड़ में एक साथ हो तो क्या मज़ा आता है…आआ…. उई… अमामाँ ये क्या गाँड़ के भीतर चिकोटी काट रहे हो, आह दर्द हो रहा है।
जय अपनी दो उंगलियां उसकी गाँड़ में घुसाए था। उसे अंदर गुदा मांस की सतह छेड़ने में मज़ा आ रहा था। जय ने तभी उसको पकड़के चिकोटी काट ली। उसे कविता को इस तरह छेड़ने में बड़ा मजा आ रहा था। कविता को दर्द तो हुआ, पर उसे भी इसमें मज़ा आ रहा था। फिर जय ने लण्ड निकालकर ममता के खुले मुंह में दे दिया। कविता को उसकी गाँड़ से उंगली निकाल उसे ही चटवाने लगा। कविता पूरे लगन से चटखारे ले लेकर उसका स्वाद लेने लगी। वो किसी भूखी भिखारन की तरह लग रही थी, जिसे कोई आइस क्रीम दे दिया हो। जय की उंगलियों पर लगे अपने गाँड़ के रस को चट कर गयी। उधर उसकी माँ जय के भीगे लण्ड को चूस रही थी जो कविता के बुर के पानी से भीगा हुआ था। जय उन दोनों की भूखी नज़रों की तत्परता देख मंत्रमुग्ध हो गया।
कविता- ऐसे क्या देख रहे हो?
जय- कुछ नहीं।
जय ने फिर ममता की बुर में लण्ड पेल दिया। इस बार उसने ममता को घोड़ी बनाया। उसका आधा शरीर पानी मे डूबा हुआ था। बुर तक पानी का स्तर था। जय के लण्ड का निचला आधा हिस्सा, पानी में डूबा था। धक्का मारने की वजह से पानी छलक कर बाहर गिर रहा था। कविता अपने बुर को फैलाये हुए अपने भाई को अपना बुर चखने के लिए परोस दी थी। जय उसकी बुर को चाट रहा था। एक तरफ माँ की बुर चोद रहा था और दूसरी ओर अपनी दीदी की बुर चाट रहा था। ममता और कविता की आँहें पूरे बाथरूम की दीवारें फाड़कर बाहर आना चाहती थी। इस तरह ना जाने कितने देर तक वो ममता को चोद रहा था। ममता तब तक दो बार झर चुकी थी, और कविता बुर चटाते हुए, लगभग मूतते हुए झड़ी थी। अंत मे जय के अंदर का सैलाब फूट पड़ा।
जय- दोनों सामने बैठ जाओ, हमारा निकलने वाला है। पीना चाहती हो ना हमारा मूठ।
कविता झटपट बैठते हुए बोली,” यही तो पीना चाहते हैं हम। आज हम दोनों आपका कीमती मूठ पीकर, ही खाना खाएंगे।” और मुंह खोलकर जीभ बाहर निकाल ली।
ममता- ये इसीका आईडिया है, की हम दोनों अबसे रोज़ आपके मूठ का सेवन करें। ये हमारे लिए पौष्टिक, है। अगर हम दोनों गर्भवती भी रहेंगे तो, भी मूठ पीते रहेंगे।
जय- ये तो तुम दोनों के लिए ही है। जितना चाहो निकालो और पीओ। ये लो रानी.. आ गया तुम दोनों के लिए स्वादिष्ट पौष्टिक आहार…आआहह
जय के लण्ड से मूठ की मोटी गढ़ी 8-9 धार निकली, जो कविता के मुंह में भर गया। ममता मुस्कुराई और कविता को चूमने के लिए आगे बढ़ी। कविता ने पूरा का पूरा मूठ, ममता के मुंह में भर दिया, चुम्बन के दौरान। दोनों एक दूसरे को पकड़ चूम रही थी। फिर ममता ने भी ऐसा ही किया। फिर दोनों ने आधा आधा हिस्सा बांट लिया और जय को दिखाके पी गयी।
जय उनकी ओर देखा और बोला,” तुम दोनों को मूठ पीना बहुत पसंद है ना? तुमदोनों जब चाहो, इसे पी सकती हो। ये तुम्हारा है कितना प्यारी लगती हो दोनों जब मेरा मुठ पीती रहती हो।”
ममता- यही तो हम औरतों का असली सम्मान है। चुदाई के बाद औरत को ये मूठ पीने को मिल जाये तो, उसका चुदना सफल हो जाता है। ये हमारी फसल है, जिसे चुदाई के बाद काटा जाता है।
कविता- ये औरतों के बीच की बातें हैं। आप नहीं समझेंगे। जाइये आप अब हम दोनों को नहाने दीजिए।
जय हंसता हुआ बोला,” जाऊंगा पर हमको अभी मूत लग रहा है। चलो दोनों बाहर आओ। पहले हमारे मूत से नहा लो।”
दोनों को टब से बाहर निकालकर,घुटनों पर बिठाके, जय उनके ऊपर हंसते हुए मूतने लगा। जय की मूत की धार उनके गोर मुखड़े पर बरसने लगी। गर्म मूत से पूरा बदन गीला होने लगा। जय उन दोनों के चेहरे पर बार बार पीली धार मार रहा था। दोनों आंखें मूंदे हुए, अंदाज़ा लगती की मूत की धार किधर से आएगी। उन दोनों का सारा मेक अप धुल चुका था। देखते ही देखते दोनों पूरी गीली हो गयी। जय की धार को दोनों ने कई बार पिया भी, पर उबकाई के साथ। कभी मूत की धार उनके आँखों पर बरसता, तो कभी गालों पर, कभी होंठों पर, कभी गर्दन पर, कभी पूरे जिस्म पर, कभी माथे पर। दोनों को मूत से नहलाने के बाद, जय फिर उनपर थूक दिया।
कविता और ममता मुस्कुराती रही। फिर जय बाहर निकल आया और दोनों माँ बेटी अंदर नहाने लगी।
गोवा में जय ममता और कविता हनीमून का असली मज़ा देता है।दोनों को होटल के कमरे में तो पेलता ही है साथ मे समुंदर की लहरों में भी एकांत में ले जाकर दोनों की जबरदस्त चुदाई करता है।दिन के समय खुले आकाश के नीचे अपनी सगी माँ और बहन को अपनी बीबी बनाकर शायद ही किसी ने चोदा होगा।
इधर माया सत्य से होटल में अपनी गाँड़ मरवा रही है।वह कुतिया बनी हुई है और सत्य उसकी गाँड़ मार रहा है।कुछ देर बाद माया झड़ जाती है और सत्य भी उसके गाँड़ में झड़ जाता है।
तभी फोन बजता है और कंचन की घबराई हुई आवाज़ आती है। माँ डैड का एक्सीडेंट हो गया है आप जितना जल्दी हो सके हॉस्पिटल आ जाओ। सत्य माया को लेकर गोवा से माया के घर चल देते है लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था।हॉस्पिटल में शशिकान्त की मौत हो जाती है। माया और सत्य जब पहुँचते है तो कंचन का रो रोकर बुरा हाल था।सभी दुखी मन से शशिकांत का अंतिम संस्कार करते है।
कुछ दिन बाद सबकुछ नार्मल हो जाता है और माया और सत्य कमरे में सेक्स कर रहे है ।कंचन अपनी सहेली के घर गई हुई है लेकिन सहेली के नही होने पर वह लौट आती है और अपने माँ और मामा को सेक्स करते देखने लगती है और उनकी बातें सुनने लगती है।
माया-अब तो मुझे कंचन की बड़ी चिंता है उसकी शादी की और तेरी शादी की भी………….
तभी माया को कुछ याद आता है और बोलती है कि सत्य क्या तू मेरी एक बात मानेगा।
सत्य-बोलो दीदी। मैं तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता हूँ।
माया-तू कंचन से शादी कर ले। फिर हमलोग यहाँ से सबकुछ बेच कर जय ममता और कविता की तरह एक साथ रहेंगे।
सत्य-(कुछ सोचकर) मैं तैयार हुँ दीदी लेकिन एक शर्त पर की आपको भी मुझसे शादी करनी होगी और कंचन को तैयार करने की जिम्मेदारी भी आपकी होगी।
माया-ठीक है।मैं ममता से बात करती हुँ।ममता कविता और जय मिलकर ये काम कर सकते है क्योंकि कविता और कंचन काफी क्लोज है और जब कंचन को कविता जय और ममता के बारे में पता चलेगा तो वह जरूर राज़ी हो जाएगी।
कंचन सभी राज़ जान जाती है कि कैसे जय अपनी माँ और बहन से शादी करके मज़े कर रहा है।उसकी भी चूत गरम हो जाती है।अपने मामा का लंड उसे भी पसंद आ जाता है।
माया ममता से बात करती है और फिर तीनों ममता के घर दिल्ली के लिए रवाना हो जाते है।
सबके समझाने पर कंचन अपने मामा सत्य के साथ शादी करने को राजी हो जाती है।
फिर सत्य कंचन और माया से शादी कर लेता है और जय कविता और ममता के घर के पास एक घर लेकर रहने लगते है।
ममता का पेट धीरे धीरे फूलने लगता है।उसके पेट मे जय का बच्चा पल रहा है।कुछ दिन बाद जय सिर्फ अपनी एक बीबी कविता को ही रंडियों की तरह पेलता है ममता सिर्फ कभी कभार उसका लण्ड चूसती है।
नौ महीने बाद जय को अपनी माँ ममता से एक लड़का होता है जिसे सभी बहुत प्यार करते है।इधर कंचन भी माँ बननेवाली है।सत्य भी कंचन और माया को एक ही विस्तर पर मज़े से चोदता है।
The end

