क्या मेरी पसन्द अपने विचारों के अनुकूल स्त्री की नहीं है? क्या अपनी पसन्द की चीज को ढूंढना या पाना गलत है? नहीं, हम बाप बेटी बहके या भटके नहीं हैं, हमने तो अपनी-अपनी पसंद को हासिल किया है।
“कुसुम की व्यस्तता नौकरी में तरक्की होने के साथ साथ बढ़ती जा रही थी. कई बार अपने विभाग के साथ साथ दूसरे विभागों में भी जाना पड़ता था. कई बार बड़े अधिकारियों के प्रेशर को देख कर उसका मन करता नौकरी छोड़ दे. लेकिन उसकी महतावकानछा और आत्म विश्वास उस को नौकरी छोड़ने नहीं दे रहे थे. और फिर कुसुम का अपना बड़ा अफसर बनने का सपना भी उसे पूरा करना था. इसलिए अब उसकी लाइफ दिन प्रतिदिन ऑफिस की फाइलों के साथ उलझी हुई रहती थी.”
इस वक्त दिन के एक बज रहे थे हम बाप बेटी एक दूसरे के आगोश में नंगे जिस्म लिपटे हुए सुकून का अनुभव कर रहे थे वही दूसरी ओर उस वक्त कुसुम ऑफिस की फाइलों के साथ उलझी हुई थी तभी अचानक से उसके मोबाइल पर अज्ञात नम्बर से एक वॉइस काल आया.
फोन करने वाली लड़की ने अपना नाम श्रुति बताया… ! कुसुम ने उसे फोन करने के विषय में पूछा, तो वह हकलाते हुए बोली, ‘आंटी, मुझे आपकी बेटी रिंकी के बारे में कुछ बताना है’
अपनी बेटी रिंकी का नाम सुनते ही’ कुसुम का मन शंका से भर गया.
‘क्या बताना है..????
यही कि रिंकी पिछले एक महीने से ज्यादा समय से कॉलेज नही आई है और आपके पति और बेटी रिंकी शायद…’ बोलते बोलते वह रुक गई.
‘बोलो,’ अपनी बढ़ती हुई धड़कनों को काबू करते हुए कुसुम बोली.
‘आंटी, प्लीज, मेरा नाम मत लीजिएगा. उन का न, चक्कर चल रहा है,’ धीरे से उस लड़की ने कहा.
‘क्या?’ कुसुम कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गई. सारी जगह उसे घूमती सी प्रतीत हुई, फिर संभलती हुई बोली, ‘क्या बकवास कर रही हो, ये सब तुम्हे कैसे पता…??? कोई प्रूफ या सबूत है तुम्हारे पास..???
‘आंटी,’ घबराती हुई वह बोली.
‘तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारा नाम नहीं लूंगी,’ कुसुम के आश्वासन पर श्रुति ने एक
वॉइस रिकॉर्डिंग ऑडियो क्लिप जिसमे रिंकी उसे अपने पापा की प्रेम कहानी नमक मिर्च लगा कर बताती थी, wahtsup पर सेंड कर दिया.
पूरी ऑडियो क्लिप सुनने के बाद चिंतित, परेशान कुसुम इधर से उधर चक्कर लगा रही थी. कुसुम को बहुत बार शक भी हुआ. लेकिन उस की स्वयं की व्यस्तता, और अपने अरुण पर अथाह विश्वास ने, उस के विचारों को झटक दिया. उसने अपने पति के कॉलेज के एक-दो कलिग से फोन कर पूछा तो उन्होंने जबाब दिया कि प्रोफेसर अरुण साहब तो कॉलेज आते ही नहीं है.
दोपहर के 2 बजे बजने वाले थे कुसुम ने ऑफिस से हाफ डे की छुट्टी लेकर आखिर, मे निर्णय लिया कि वह खुद देखने जाएगी अपने पति और बेटी की वासना का नँगा नाच… . !
भरी दोपहरी मे अकेले ऑटो में दिमाग में चल रहे तूफान के साथ, वह कब अपने माँ के घर (मायके) के पास पहुंच गई, पता ही न चला. उसके पति अरुण की बाइक सुबूत के तौर पर वहां खड़ी थी.
ऑटो वाले को पैसे देते हुए वो बार बार गुस्से से इधर उधर देख रही थी कि सामने से कुसुम को अपने माँ बाप आते हुए दिखाई दिये बाप की आँखों पर काला चश्मा लगा देख समझ आ रहा था कि वो मोतियाबिंद का ओपरेशन करा कर आ रहे हैं. जैसे ही वो नजदीक आये तो कुसुम की माँ आंखें मलती हुई उससे बोली अरे कुसुम तू बेटी आ गयी जरूर ही अपने पिताजी को देखने आई होगी…????
‘मैं, उस आदमी को देखने आई हूं जो इस समय तुम्हारे घर में मौजूद है,’ तमतमाती हुई कुसुम बोली.
‘यहां तो कोई नहीं है,’ कुसुम की माँ ढीठता से बोली.
‘यह मोटर साइकिल किसकी है?’ दरवाजे पर अपने पति अरुण की खड़ी बाइक की ओर इशारा करती कुसुम ने तल्खी से पूछा.
‘मुझे नहीं पता,’ कुसुम की माँ अभी भी अपनी ढीठता पर कायम थी.
‘और कितना झूठ बोल कर सच छिपाओगी माँ?’ कुसुम चिल्लाती हुई बोली.
गुस्से से भरी विक्षिप्त सी कुसुम तब तक घंटी बजाती रही, जब तक कि दरवाजा न खुल गया.
थोड़ी देर में एक दरवाजा खुलने की आवाज आई. बदन पर अस्तव्यस्त से सिर्फ एक मात्र कपड़े “कुर्ते” को पहने हुए रिंकी बाहर निकली. यह कैसा शोर हो रहा है?,
मम्मी, आप?’ कुसुम को देखते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.
नफरत की निगाहों से रिंकी को घूरती हुई कुसुम उस कमरे की ओर जाने लगी जहां से रिंकी निकली थी. घबराई सी रिंकी ने उसे रोकने की असफल कोशिश की. कुसुम ने एक ओर उसे धक्का दे कर कमरे में घुस गई. जहाँ उसका पति प्रोफेसर साहब अरुण कुमार बिस्तर पर आराम से निर्वस्त्र बेखबर सो रहे थे. चादर एक ओर सरकी हुई थी.
‘अरुण,’ पूरी ताकत से कुसुम चिल्लाई.
आंखें मलता हुआ मै उठा. कुसुम को देख कर मै निहायत ही आश्चर्य से भर गया. सकपकाते हुए अपने को ढकने की कोशिश करने लगा.
‘नंगे तो तुम हो ही चुके हो, ढकने के लिए बचा ही क्या है?’ शर्ट मेरी तरफ फेंकती हुई हिकारत से कुसुम बोली और कमरे से बाहर आ गई.
रिंकी सिटपिटाई सी खड़ी हुई थी. थोड़ी देर में मै भी कपड़े पहन कर बाहर आ गया. आंखों में क्रोध की चिंगारी समेटे कुसुम थोड़ी देर मुझे ऐसे देखती रही, जैसे क्रोध की ज्वाला में भस्म कर देगी. लेकिन वह आग उगलती, इस से पहले ही मैने लड़खड़ाते स्वर में पूछा, ‘‘ऐसे क्यो देख रही हो तुम? कभी पहले नहीं देखा क्या मुझे?’’
‘‘देख तो महीनों से रही हूं. लेकिन मन में इंसानियत का भ्रम पाले थी. तुम्हारे अंदर का हैवान आज नजर आया है. दिल चाहता है या तो खुद मर जाऊं या तुम्हें मार डालूं. मैं ने कभी सोचा तक नहीं था कि तुम इतने जाहिल और कमीने निकलोगे.’’
‘‘ऐसा क्या किया मैं ने, जो इतना गुस्सा कर रही हो?’’ मैने कहा तो कुसुम गुस्से में बोली,
‘‘किया तो तुम ने वो है, जिसे करने से पहले हैवान भी कई बार सोचता है. मेरी कोख से जन्मी बेटी रिंकी को मेरी सौत बना दिया तुम ने. बिना यह सोचे कि इस का अंजाम क्या होगा?’’
मेरे पास उसकी बात का कोई जबाब नही था. वो बात ही कुछ ऐसी थी. कुछ नहीं सूझा तो मै हथियार डालते हुए बोला, ‘‘जो हुआ, वो हो गया. मैं खुद अपनी नजरों में गिर गया हूं. तुम मेरी पत्नी हो, जो चाहे सजा दे सकती हो.’’
कुसुम गुस्से में थी. आंखें अंगारे की तरह दहक रही थीं. वह मुझ को देख कर घृणा भरे स्वर में बोली, ‘‘तुम ने मेरी बेटी के साथ जो कुछ किया है, उस के लिए अगर तुम्हें मौत की सजा भी दी जाए तो वह भी कम है.’’
‘‘मेरी मौत से अगर तुम्हे शांति मिलती है तो मुझे मौत दे दो, लेकिन सोचो मेरी मौत से तुम्हारी मांग तो उजड़ ही जाएगी, रिंकी भी अनाथ हो जाएगी.’’
मेरी नीयत में बेशक फरेब था. लेकिन मैने जो कहा, वह सोलह आने सच था.
‘मेरी मौत के बाद न कुसुम की जिंदगी में कुछ बचता और न उस की बेटी रिंकी का भविष्य सुरक्षित रह पाता.’ मेरी बात सुन कर कुसुम सोच में डूब गई. उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था!
मै पास आ कर कुसुम का हाथ पकड़ कर बाहर जाने के लिए मुड़ा. तो कुसुम ने गुस्से से अपना हाथ झटक दिया. जाते जाते अपनी मां से कुसुम बोली, ‘शर्म नहीं आती तुम्हें, क्या ये सब देखने के लिए मैने तुम्हारे भरोसे रिंकी को यहा भेजा था, तुम्हारे ही घर में, तुम्हारे बिस्तर पर, तुम्हारी आँखों के सामने, तुम्हारी नातिन (पोती) मेरे आदमी (पति) के साथ सो रही है.’
‘ हमारे बारे में क्या बक रही है, अपने आदमी (पति) से पूछ,’ बेशर्मी से कुसुम की माँ ने जवाब दिया.
‘तो… यह है तुम्हारी औकात,’ मेरे ओर देखती व्यंग्य से कुसुम कह एक झटके में बाहर निकल गई.
‘कुसुम, कुसुम’ मै बोलता ही रह गया.
वक्त की निस्तब्धता और कालिमा ऑटो में बैठी कुसुम के अंतर्मन को भेद कर उस को तारतार कर रही थी. एक आंधी सी उस के अंदर उठ रही थी. जिस में उड़ा चला जा रहा था उस का मान-सम्मान, प्रेम और विश्वास. दर्द घनीभूत हो सैलाब बन कर उस की आंखों से बह निकला.
आज अपना ही घर कितना पराया सा लग रहा था. थोड़ी देर में मै भी घर पहुंच गया. मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कुसुम से कुछ बोलने की. मै सीधे बैडरूम में चला गया. कुसुम वहीं सोफे पर ढह गई. मस्तिष्क में उठा बवंडर रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. मन कर रहा था कि अभी जा कर अरुण को झकझोर कर पूछे ‘क्यों किया मेरे साथ ऐसा’. फिर सास ससुर का खयाल आते ही खामोश हो गई. आहत मन जोर से रोने भी नहीं दे रहा था. समय बहुत भारी लग रहा था. घड़ी में देखा शाम के 7 बज रहे थे.
एक मन कर रहा था कि भाग जाए यहां से. अपने पति के प्रति मन घृणा से भर गया. एक मन कर रहा था कि कभी उस की शक्ल न देखे. उसे समझ ही नहीं आ रहा था अपना दर्द किस को बताए, ससुर को… वह तो हार्ट पेशेंट है…..!
‘क्या हुआ बहू,’ असमंजस से भरी सास बोली.
‘कुछ नही,’ आंसूओं को पोंछ्ती हुई कुसुम बोली.
फिर रो क्यो रही हो…??? जो भी बात है बहू..; बताना तो पड़ेगा अपने सास ससुर को,
हां, यह सही कहा है….. मेरे पूज्य बापूजी (ससुर) ने समर्थन करते हुए कहा.
रोते रोते कुसुम ने उन्हें सारी बातें बता दीं. सास ससुर दोनों सन्न रह गए. अपने बेटे को धिक्कारते हुए और स्वयं अपने बेटे के इस कुकृत्य के लिए कुसुम से देर रात तक माफी माँगते रहे….!
दिल, दिमाग से टूटे शरीर को कब नींद ने अपनी आगोश में ले लिया, बेचारी कुसुम को पता ही न चला.
‘ बहु,’ सास अपने हाथों मे चाय की प्याली पकड़े उसे उठा रही थी. कुसुम एकदम से उठी. घड़ी सुबह के 8 बजा रही थी. समय देख कर कुसुम हड़बड़ा गई. बीते कल की बात याद कर एक बार लगा शायद कोई बुरा सपना देखा था. अगले ही पल सचाई का एहसास होते ही अपने सर को सास के काँधे में रख कर अपनी आगोश में भर कर जोरजोर से रोने लगी. हाल में बैठ कर अखबार पढ़ रहे ससुर साहब एकदम से घबरा गये. सास भी ‘कुसुम…कुसुम’ कहते रोने लगी.
काफी देर रोने के बाद जब मन हल्का हुआ तो अचानक याद आया कुसुम को कि 12 बजे औफिस में मीटिंग थी. उसने तुरंत फोन पर सूचित किया कि वह औफिस नहीं आ पाएगी. जो कुसुम घर से औफिस जाने के लिए बेचैन रहती थी, आज वही ऑफिस भी उस को काटता हुआ लग रहा था.
मन ही मन कुसुम एक घुटन सी महसूस कर रही थी, जो उस को अंदर ही अंदर से तोड़ रही थी. आखिर, उस ने अपने सास ससुर, को बुला कर अपना निर्णय सुना दिया तलाक लेने का……..????
इतना आसान नहीं यह सब. कैसे रहेगी अकेले.? हम समझाएंगे अरुण को… सास ससुर ने समझाया लेकिन वो नही मानी.
आखिर में घर में एक पंचायत बुलाई गई, उसमे कुसुम के माँ बाप, दीदी जीजा, रिंकी, भाई, एवम अन्य रिश्तेदारों सब को बुलाया गया.
शाम को पंचायत के शुरु होने से पहले ही मै कुसुम से हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा…!
‘क्यों किया तुम ने मेरे साथ विश्वासघात?’ मेरा हाथ छिटकते हुए आक्रोशित कुसुम चीख उठी.
‘तुम तो अपने जौब में इतनी मस्त रहती थीं, मेरे लिए तुम्हारे पास समय ही नहीं था, क्यो चली गई थी पति, घर-परिवार को छोड़ दो कोड़ी की नौकरी करने दूसरे शहर’ बेशर्मी से मै भी बोला.
मेरे तर्कों से हैरान हो कुसुम बोली. काश तुम्हे ये समझ आ गया होता ‘किस के लिए गयी थी, खुद के लिए या फिर अपने परिवार के बेहतर भविष्य बनाने के लिए.
पति-परिवार का नाम ना ही लो तो अच्छा है,…., एक पत्नी होने की जिम्मेदारी तूने समझी ही कब थी कुसुम….. ‘तेरा ही तो सपना है बड़ी अफसर बनने का,’
मै अपने बचाव में जितना गिरता जा रहा था, कुसुम उतना ही आहत होती जा रही थी. हम दोनों को लड़ते देख ‘अब स्थिति रिंकी के सामने बिलकुल ही स्पष्ट थी, न तो वो दोषी है और न ही पापा दोषी हैं। चरित्रहीन कोई नहीं है। एक-दूसरे के प्रति अरूचि, नापसंदगी और परिस्थितिजन्य लाचारी ने ही एक दूसरे से संबंध बनाने के लिए मजबूर किया है। जो लोग इन बातों को नहीं समझते, वे ही ऐसे संबंधों को गलत मानते हैं। ‘
सोचते सोचते अन्तः रिंकी के विचारों की श्रृंखला टूट गई।
और फिर रिंकी के होंठों से अनायास ही बोल फट पड़े- मै मम्मी को भी जानती हूं और पापा को भी जानती हूं। मुझे अच्छी तरह से याद है, मम्मी पहले ऐसी नहीं थी। मम्मी पापा को नजरअंदाज शुरू से ही करती आ रही है। आखिर कब तक वह अपने प्रति मम्मी की उदासीनता को ओढ़े रहते? कभी न कभी तो किसी न किसी से तो उन्हें जुड़ना ही था। मैं खुद की शुक्रगुजार हूं कि मैने पापा को समझा है और जिसने पापा की पीड़ा को और बढ़ने नहीं दिया है।
अगर पापा के जीवन में मै नहीं आई होती तो क्या पापा दिमागी रूप से पागल नहीं हो गये होते? इन अवैध संबंधों ने ही तो उन्हें यौनरोगी होने से बचाया है।’
जब प्रकृति के सारे कार्य समय से होते हैं तो फिर मनुष्य किसी का इंतजार कब तक करेगा। मै भी जवान हू, मुझे भी इंद्रिय-सुख चाहिए ही चाहिए। किसी को बदचलन या चरित्रहीन कहना जितना आसान है, उसको समझना उतना ही कठिन है।
मम्मी पापा के साथ रह भी रही है और अपने तरीके से जी भी रही है। पापा भी मम्मी के साथ रह रहे हैं और अपना जीवन भी जी रहे हैं। घाटे में कोई है तो वह मैं हूं। मुझे मम्मी-पापा की दोहरी जिन्दगी के साथ आये दिन समझौता करना पड़ता है।
मुझे डर है कहीं मैं भी दोहरी जिन्दगी जीने की आदी न बन जाऊं। मम्मी पापा का झूठा प्यार किसी दिन मेरे लिए धीमा जहर भी बन सकता है।’ रिंकी अभी और बोलती इतने में मेरे पूज्य बापूजी बोल पडे-
‘रिंकी……, तुम यहा से बाहर जाओ।
फिर तपाक से रिंकी उठी और इंसानियत, प्यार, विश्वास सब का गला घोंट कर भड़ाक से दरवाजा खोल कर घर से बाहर चली गयी.
उस के बाद तो कुछ भी सामान्य नहीं रहा. अभी पंचायत मे आये शामिल लोग और रिश्तेदार सोच ही रहे थे कि क्या फैसला करे कि…..????
‘अरुण तुम भी निकलो यहां से, मुझे तुम से अब कोई रिश्ता नहीं रखना,’ कुसुम ने भी अपना फैसला सुना दिया कुसुम पूरी तरह से अपना आपा खो चुकी थी.
‘यह मेरा भी घर है,’ मैने भी ऊंची आवाज में कहा.
‘मत भूलना मै इस घर में ब्याह कर आई हू, भाग कर नही आई हू, इसमें आधा हिस्सा मेरा भी है और मैं, चाहू तो तुम्हे अपनी बेटी के ब्लात्कार के केस में अभी जेल भिजवा सकती हू.’ क्रोध से कांपती हुई कुसुम बोली.
मैने बिना वक्त गंवाए अपना सामान पैक किया और बाहर निकल गया. सारे परिजन बेबसी से दर्शक बने खड़े रह गए.
जारी है…..??? ![]()

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