कर्ज और फर्ज | एक कश्मकश – Update 86

कर्ज और फर्ज एक कश्मकश - Erotic Family Sex Story
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मैं अपने और रिंकी के कमरे से होकर मम्मी के कमरे में गया, पर वो वहाँ नही थी. शायद वो रसोई में थी. मैं रसोई की और गया देखा मम्मी वहीं थी और एक कुर्सी पर बैठी हुई थी, कुसुम भी पास खड़ी हुयी थी मेरी ओर उसकी पीठ थी. मैने रसोई की ओर जाते हुए मम्मी को पुकारा मगर वो सिर्फ तीन शब्द ही बोली…! 

“वो चली गयी….,.,…….”

उन्होंने पीछे मुड़कर भी नही देखा. मैं थोड़ा हैरान था, ये मम्मी को अचानक क्या हो गया. 

मै अंजान बनते हुए बोला.. कौन चली गई??? 

तेरी लाडो रानी… मम्मी ने टोंट मारा.. 

लेकिन तुम्हारी लाडो रानी तो मौजूद हैं. ये क्यों रुक गयी, ये भी चली जाती ??? मैने भी जानबूजकर कुसुम की ओर व्यंग भरा कटाक्ष किया.

 ‘तुम्हारी छाती पर मूंग दलने के लिए.’

कुसुम ने ऊंचे स्वर में एकदम से पलट कर जबाब दिया….! 

अरे बस करो तुम दोनों बेबजह की जिरह …… अरुण बेटा जाकर हाथ मुह धो मै खाना परोसती हू. मम्मी ने तुरंत मामला शांत करवा दिया.

आधी रात गुज़र चुकी थी. दीवार से टेक लगाए बेड पर बैठा मैं कमरे के गहरे अंधेरे में खुद को छुपाने की कोशिश कर रहा था. रोशनी अब आँखो को चुभती थी, उजाला उस भयानक सच्चाई की तकलीफ़ को और बढ़ा देता. अंधेरे में अपनी तन्हाई में, उस अकेलेपन में, रिंकी के साथ बिताए एक एक पल को मैं याद कर रहा था. वहीं दिल में दर्द की लहरें उठ रही थी. मुझे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी. लगता था जैसे अंदर कुछ टूट रहा था. मेरी बेटी के साथ मेरे रिश्ते में कुछ भी ग़लत नही था. 

अगली सुबह मै वक्त से आधे घंटे पहले नौकरी के लिए जाने वाला था कि मेरे पिताजी की पीछे से आवाज आई. 

अरुण.. जरा मुझे बैंक तक छोड़ दोगे…?? 

मैने हाँ मे उन्हें स्वकीर्ति देदी. वो और मै एक साथ बाइक पर निकल गये. चूंकि बैंक को खुलने मे अभी काफी वक्त था तो पिताजी बोले अरुण अगर देर ना हो रही हो तो एक एक चाय पी ले.

हम दोनों बाप बेटे चाय वाले की रेहड़ी पर चाय की चुस्किया लेने लगे. चुस्किया लेते हुए अचानक पिताजी बोले.

अरुण मै तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूँ, मानना या ना मानना तुम्हारी मर्जी तुम परिपक्व हो चुके अच्छा बुरा दोनों की समझ रखते हो.

मैंने प्रश्नवाचक नजरों से पिताजी की तरफ देखा और बोला आप जो भी कहना चाहते है, निश्चित ही मेरे अच्छे के लिए ही होगा आप खुल कर बताइये.

अरुण तेरी शादी को एक साल होने वाला है, और मेरी शादी जितनी तेरी उम्र है उससे एक साल ज्यादा पुरानी हो चुकी हैं. बेटा इस हिसाब से मै तेरा सीनियर हू. तू मुझे एक बात बता तेरी माँ कैसी माँ है…??? 

अच्छी.. मैने धीरे से कहा.

सिर्फ अच्छी…??? पिताजी ने फिर से जोर दिया.

बहुत अच्छी. मेरी माँ ‘बहुत अच्छी माँ’ है.. मैने मुस्कुरा कर कहा.

अरुण तेरी माँ ने ‘अच्छी’ से ‘बहुत अच्छी’ तक का सफर इतनी आसानी से तय नहीं किया है, बहुत बलिदान दिया है. तेरी माँ और मेरी उम्र में एक दशक (दस साल) से ज्यादा का अंतर है, और इस अंतर को सहज रूप से स्वीकार करना किसी भी स्त्री के लिए आसान नहीं होता है. बड़े उम्र के पुरुषों के साथ ब्याही गई स्त्रियों को भी अपनी उम्र से अधिक बड़ी हो जाना पड़ता है. अपनी इच्छाओं अपने सपनों और अपनी कामनाओं की छाती,पेट, कमर, सिर और पैर को रौंदकर चढ़ना पड़ता है उम्र की सीढ़ियों को. स्त्री का बडी उम्र के पुरुष की ब्याहता होना अपनी ही उम्र के भीतर रहकर उसे उम्र के कांटे को बराबर रखने के लिए दबानी पड़ती है अपनी मुस्कुराहट, आंखों की चमक और अपना अस्तित्व और देखते ही देखते वो बड़े उम्र के पुरुष से पहले ही हो जाती है बूढ़ी …,,,!!!!

अरुण विवाह के वक्त कुंडली में मिलाये गये गुण का कितना महतव् होता है मुझे नही पता, लेकिन विवाह पश्चात पति पत्नी का समगुणी-सद्गुणी होना बहुत जरूरी होता है.

सुनीता (मेरी माँ नाम) को हमेशा यह भरम बना रहता था कि उसके पति ने यानी मैंने जवानी के दिनों में बड़े गुल खिलाये होंगे ।

एक बार यदि भरम का कीड़ा मन मे बैठ जाये तो कितनी भी खुदाई निराई गुड़ाई कर लो बाहर निकलता ही नहीं जब-तब काटता कचोटता ही रहता है , जिसकी वजह से उसे खुजली मचती रहती थी ।

उसकी एक दिक्कत यह भी थी कि मौसमानुसार यदि ज़रा छेड़छाड़ शुरू करो तो वो फ़्लैश बेक में चली जाती।

एक शाम बादल कुछ ज़्यादा ही गहरा गए थे , मैने भी ठान ली कि कीड़े को मार कर ही रहूंगा ।

जैसा कि होना था हाथ पकड़ते ही बोली , ‘ बताइए न कॉलेज में कोई थी क्या ?’ और मैं भी बादलों की ओर मुंह उठा कर बोला , ‘ अरे क्या छेड़ दिया तुमने भी , बहुत कुछ हुआ उन दिनों ..! ‘

बस फिर क्या बगल से उठ कर सामने आ बैठी और उसका पूरा चेहरा ही मानो प्रश्रचिन्ह ही बन गया !

मैं भी इत्मीनान से शुरू हो गया ।

” सुनो , उस वक़्त एक ही बात समझ में आयी कि लड़कियां अजीब ही होती हैं इनको समझना नामुमकीन है , जितना दूर रहो उतना ही अच्छा !”

” क्या हुआ था सब सुनना है मुझे ?” तेरी माँ ने फौरन पालथी मार दर्शा दिया कि आप बोलो मैं सब सुनूँगी , मैं भी यही चाहता था और शुरू हो गया !

” अब तुम तो जानती हो कि मैं न तो गाता बजाता हूँ न स्केच बनाता हूँ न शायरी नज़्म कविता कहानी ही लिखता हूँ और न ही सुपर स्मार्ट या इंटेलिजेंट ही हूँ , यानी मुझमें कोई भी गुण न था न है और यह बात मैंने कभी किसी भी लड़की से नही छुपाई !

पहली लड़की ने मुझसे बातचीत करने की पेशकश की पर मेरी ये बातें सुनते ही बोली कि तुम में कोई भी गुण ही नही है , तुम से मुझे कोई बात नही चलानी तुम मेरे जैसे नही !

दूसरी लड़की बोली कि भाड़ में जाये सानू की फर्क पेंदा , रुपया पैसा तगड़ा कमाओ बस मेरे लिए वही बहुत है ।

तीसरी लड़की बोली तुम्हे गुण सिखाना मेरे बायें हाथ का खेल है तुम्हे मेरे जैसा बना ही लूंगी !

चौथी बोली कि तुम बेकार चक्कर मे न पड़ो , मैं जो जैसा कहूँ वही करते चलना बस !

सुनीता यह तो समझ गयी कि इन चारों संग मेरी कहानी चली नही ! पूछ ही ली कि बताइए आपने मुझसे ही शादी क्यों कि ?

मैं इतना ही बोला , ” सुनीता , एक तुम ही थी जिसने मुझ से कहा कि आप जैसे हैं वैसे ही मुझे चाहिए कुछ भी बदलने की ज़रूरत नही ! मेरी सोच भी यही थी और तुम मेरे जैसी ही निकली ! “

बात सुनते ही वो सामने से उठी और झट से मेरी बगल में आ सटी ! मेरा यही एकमात्र सटने का पसंदीदा गुण उसने भी उठा लिया है और चाहिए भी क्या ?

जब मन एक हों तो गीत संगीत रंग चित्र कविताएं शेरो शायरी खुद ब खुद निकलने लगते है , हम दोनों समगुणी भी हैं और सद्गुणी भी ।

शायद तुझे पता नही है बेटा.. तेरा और बहु का रिंकी को अचानक से भेज देने के फैसले पर मै कुछ क्यो नही बोला क्योकि जब शादी के वक्त रिंकी को साथ रखने की बात चली थी, उस बात से तेरी माँ और मै कतयी सहमत नहीं थे, लेकिन तेरी और बहु की खुशी के लिए हम चुप रहे और कल जब बहु ने उसे वापस भेज दिया तब भी हम चुप रहे.

लेकिन मै अपने अनुभव से इतना समझ सकता हूँ कि बहु ने ये फैसला क्यो लिया,  अरुण प्रेमिका का पत्नी हो जाना एक घटना है, और पत्नी का प्रेमिका हो जाना एक अधिद्वित्य घटना है, बहु तुझे एक प्रेमिका की तरह प्यार करती हैं. और तेरा प्यार किसी के साथ बटता हुआ नही देख सकती. चाहे उसकी खुद की सगी बेटी क्यो ना हो.

बेटा मर्द का क्या है वह तो हमेशा वही चीजों के पीछे दौड़ता है जो उसे अच्छी लगती है । तेरी हालत उस मृग की तरह है जो उस कस्तूरी की सुंगन्ध के लिए यहा वहा भटकता रहता है, जो स्वयम उसकी नाभि मे मौजूद होती हैं. तेरी प्रेमिका तेरे घर में है और तू क्यू बेवजह यहा वहा भटक रहा है. खुश नसीब है तू जो समगुणी-सद्गुणी और इतना प्यार करने वाली पत्नी मिली है….! 

अभी तो वक़्त है खुद की गृहस्थी बसाने का, ध्यान दो वर्ना कुछ भी हासिल नहीं कर पाओगे ।” 

मै अभी सिर झुकाए वहां बैठा था । 

“अब जाओ, इतना ही कहने को तुम्हारे साथ मे आये थे । अभी समझ आ जाए तो अच्छा है वर्ना बाद में सिवाए पछताने के कुछ कर नहीं पाओगे ।” 

मै कुछ नहीं बोला बस पापा को जाते हुए देख रहा था । 

”बेटा पिता की बातों को समझ गया था ये देख कर पिता को अच्छा लगा । बेटा आगे क्या करेगा ये तो पता नहीं, लेकिन अब से अपनी पत्नी की इज़्ज़त ज़रूर करेगा ये पक्का है.”

शाम को नौकरी से वापस आने के बाद मैंने घर में प्रवेश किया, कुसुम किचिन् मे मौजूद थी और मेरे माता पिता हॉल मे बैठे थे.

मैने स्टाइल में बाइक की चाबी उछाली , और कहा, “मुझे बहुत भूख लगी है। क्या पका है?

सोफे पर बैठ कर अपने जूते उतार रहा था तभी कुसुम की रोमांटिक आवाज आई। 

I LOVE YOU!

मैं चौंक गया अपनी बीवी कुसुम को ध्यान से देखा। उसकी काजल भरी आँखों में प्यार था। काले बाल लहरा रहे थे। उसके गुलाबी होठों पर मुस्कान थी। शादी को एक साल होने को आया था मगर कुसुम ने कभी अपने सास ससुर के सामने इस तरह खुलेआम इतनी जोर से कभी  I Love you नहीं कहा था मगर ख्याल आया के चलो बोली है तो में भी इंग्लिश में ही जवाब दे दूँ मैंने अपनी बीवी कुसुम से भी ज्यादा प्यार से, और भी रोमांटिक अंदाज में कहा …… 

 “I LOVE YOU TOO”

अचानक मेरी बीवी के लहजे मे से रोमांस छू हो गया और मुस्कान उसके होठों से निकल गई और आंखें सिकुड़ गईं। उसने कर्कश स्वर में कहा, “मैं कब से कह रही  हूं कि अपने कानों का इलाज कराओ कभी उनमें सीटी बजती है। कभी पटाखे बजते हैं। कभी संगीत बजता है।”

वैसे Love you Too का शुक्रिया, लेकिन में ने I Love you नहीं कहा था !

आप ने पूछा, क्या पकाया है?

मैंने कहा था, आलू…!

इस बात पर सबके चेहरे पर हंसी खिल गई । 

शाम को बाकी लोगों ने भी खाना खा लिया था और अपने अपने रूम में चले गए, कुसुम ने बर्तन साफ किये और बाकी छोटा मोटा काम खत्म करके बेड रूम में आ गयी,

और मुझे देख कर वो दरवाजे पर ठिठक गई, हम दोनो की नजर मिली और उसकी आंखे भीग गई……वो हल्के पैरो से चलते हुए मेरे पास आई मैं अपनी जगह पर खड़ा उसे अपनी ओर आते देख रहा था,दोनो की नजर बस एक दूसरे की नजरो में ही खोई थी ,उसके पायल के छोटे से घुंघरू हल्के हल्के से आवाज कर रहे थे,जैसे जैसे वो मेरे पास आती वो आवाज थोड़ी और बढ़ रही थी ,

इतने दिनों तक जिस पल का इंतजार और अचानक ही जब वो सामने हो ……..दिल की धड़कने भी थोड़ी बढ़ ही जाती है ,वो आकर मेरे सामने खड़ी हो गई ,हम एक दूसरे को देखने के सिवा और कुछ भी नही कर रहे थे,उसका चहरा मेरे चहरे के पास आया और हमारे होठ मिल गए,मेरे हाथ अनायास ही उसके बालो में फसकर उसके चहरे को अपनी ओर खिंच रहे थे,और मेरी जीभ उसके होठो से अंदर किसी अस्तित्व की तलाश में जा चुके थे……..

‘चुम्बन की दीर्घता संभोग की गहनता से अधिक रोमांटिक होती है। संभोग संतोष प्रदान कर सकता है किंतु आत्मतोष का साधन होंठो की गुलजार गलियां हैं।’

हम काफी देर तक युही एक दूसरे से लिपटे हुए बस एक अहसासों की दरिया में डुबकी लगा रहे थे,पूरी दुनिया जैसे खो चुकी थी और समय कि कोई सीमा नही थी ,समय मानो खो गया था…..

आज हम दोनो की पूरे एक महीने से दबी वासना बाहर निकल चुकी थी और दोनो ही जानते थे कि अगर ये वासना शांत न कि तो दोबारा कहीं कुछ गलत न हो जाये,

“ओह जान तुम तो किसी भी मर्द को अपना गुलाम ही बना दोगी..”

मेरे मुह से यही निकला जब मैंने कुसुम की योनि में अपना वीर्य उड़ेल दिया …

मैं थका हुआ उसके ऊपर पड़ा हुआ था वही वो मेरे सर को सहलाती हुई शांत पड़ी थी,जब मैंने उसकी आंखों में देखा तो वो उसकी आंखों में एक अजीब सी हलचल थी और होठो पर एक कातिल मुस्कान…

“सच में मैं किसी भी मर्द को अपना गुलाम बना सकती हु..”

कुसुम की बात से मेरे भी होठो पर एक मुस्कान खिल गई ..

“मुझे तो बना ही चुकी हो …”

वो हल्के से हँसी ..

“अच्छा,लेकिन मुझे तो लगता है की मैं आपकी गुलाम बन चुकी हु ,आपके प्यार के आगे मेरी हुस्न की क्या मजाल है,जब से हमारी शादी हुई है आपके प्यार की काशिस् ने मुझे अपना गुलाम ही बना दिया है…”

उसकी आंखों से छलकती हुई सच्चाई की बूंदों को मैंने अपने होठो में भर लिया …

“तुम्हारे हुस्न और सच्चाई ,तुम्हारी ये प्यारी सी आंखे और भरे हुए होठो से छलकते हुए रस के प्याले ,किसी भी मर्द को पागल बना देंगे….तुम जब हंसती हो तो लगता है की चांद खिल गया है,तुम्हारा रूठा हुआ चहरा भी इतना प्यारा है की दिल करता है अपना सब कुछ तुम्हारे कदमो में रख दु …”

मेरी आवाज में कुसुम के लिए बस प्यार ही प्यार था..

और उसके आंखों में आंसू ,जिसे मैं अपने होठो से हल्के हल्के से चूम रहा था,

” कुसुम सुनो,कहाँ खोई हो ?

मुझे तुमसे कुछ बात भी करनी है”

“सुनो जी मुझे भी आपसे कुछ बात करनी है”

“अच्छा पहले तुम बताओ” 

“नही पहले आप कहिए, क्या कहना चाहते हो”

कुसुम हमारी शादी को कुछ हफ़्तों मे एक साल हो जायेगा. लेकिन हम एक दूसरे को कभी समझ ही नही पाए। या शायद समझने को कोशिश ही नही कर पाए। लेकिन इन पेन्तीस दिनों ने मुझे ये अहसास करवा दिया है कि तुम्हारे बिना तो मैं बिल्कुल जीरो हूँ। तुम्हारा आसपास होना ही मुझे पूर्ण कर देता है। तुम हो तो मैं हूँ, तुम नही तो मैं कुछ भी नही। अब जाके अहसास हुआ है कि इस पति पत्नी के रिश्ते की अहमियत क्या होती है। क्या तुम मुझे माफ़ कर सकोगी। शायद ये कहने में मैंने बहुत देर कर दी लेकिन सच मे कुसुम मुझे अब तुमसे प्यार हो गया है।”

“इतना ही प्यार करते हो तो उसे साफ साफ मना क्यो नही करते….”

उसकी इस बात से मैं सकपका गया,

ना जाने क्यो लेकिन उसकी ये बात मुझे अच्छी लग रही थी, ऐसी है मेरी बीवी कि उसे मेरे सिवा किसी और की (अपनी कोख से जनमी बेटी) फिक्र ही नही…! 

मेरे होठो में हल्की मुस्कान तैरने लगी …

मैने कुसुम के हाथ को अपने हाथ मे ले लिया और बोला,मेरे जीवन में सिर्फ तुम ही एक लड़की हो , ट्राई सब पर किया लेकिन कभी कोई लड़की पटी ही नही……. उसने झूठे गुस्से से मुझे मारा ..

“अच्छा अब तुम बताओ तुम क्या कहना चाहती हो’

मेरी बातें सुन कर कुसुम की तो जैसे बोलती ही बन्द हो गयी थी। जिस बात को सुनने के लिए उसने इतने दिन इंतजार किया आज उसको सुनकर उसकी आँखों से गंगा यमुना बह निकली। उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया और बहुत देर तक मेरा कंधा अपने आंसुओं से भिगोती रही।

आखिर वो भी तो यही कहना चाहती थी अपने पति प्रियतम से..!!!

वो मुझसे लिपट गई और मैं उससे,जिस्म में कोई आग तो नही थी बस अहसास था एक दूसरे के होने का अहसास…मैं उसके बालो को हल्के हल्के ही सहला रहा था वही वो आंखे बंद किये मेरे कंधे पर ही लेटी थी…हमारे रिश्ते में आगे क्या होने वाला था इस बात की गारेंटी दोनो में कोई नही दे सकता था, 

जारी है….. ✍🏻

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