कर्ज और फर्ज | एक कश्मकश – Update 62

कर्ज और फर्ज एक कश्मकश - Erotic Family Sex Story
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मै अपनी बीवी और बेटी के साथ अपने कमरे की तरफ चल दिया मेरे दिमाग में अपनी सालियों के साथ अगले दिन क्या और कैसे करना प्लानिग के घोड़े दौड़ रहे थे…….तभी मेरी सास ने रिंकी को आवाज देकर रोक लिया और उससे बोली रिंकी तुझे जूली मौसी ने अपने कमरे में बुलाया है, चल मेरे साथ अपने पापा मम्मी को आराम से सोने दे…… ये सुनते ही कुसुम ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए रिंकी को सास के साथ भेज दिया।

जैसे ही हम कमरे में गए तो मैंने तीन चार घंटों से अकड़े लौड़े की वजह से टट्टों में होते हुए दर्द से विचलित होकर अपनी लाइसेंसी बीवी कुसुम देवी की जम के चुदाई की. बेचारी को तीन बार चोदा. उसकी चूत से हमेशा की भांति जूस की ज़बरदस्त बरसात हुई. मैने हमेशा की तरह खूब दिल खोल के पिया वह अलौकिक रस. मैने तभी तो उसका नाम “रस मलाई” रखा है. मैने मन ही मन सोचा कि अगर कुसुम की बहने जूली और प्रीति भी रस निकालने की ऐसी ही चैंपियन हुई तो “सालीचोदन” करने में मज़ा आ जायगा. लंड ने भी फ़ौरन फुदक के अपनी सहमति जताई.

वैसे तो कुसुम चुदाई के बाद सोना चाहती थी लेकिन सालियों को चोदने, भोगने, चूसने के ख्यालों के कारण मैं बहुत अधिक भड़का हुआ था, तो मैंने उसको सोने नहीं दिया. पहली चुदाई के बाद जैसे ही उसको आंख लगी तो मैंने उसके घुटनों के पीछे जीभ फिराई. वो कूँ कूँ कूँ करके जग गई और झट से चुदाई को तैयार…….!

दूसरी चुदाई के बाद उसकी नींद लगते ही मैंने उसकी नाभि में जीभ फिराई तो उसका भी वही नतीजा निकला जो पहले निकला था. ऊँऊँऊँऊँऊँ… कुसुम देवी फिर से मचल गई चुदने के लिए. ह्म्म ह्म्म……

चुदाई में वह शोर भी बहुत मचाती है. ज़ोर ज़ोर से किलकारियां मारना, चोदन सुख में मदमस्त होकर आहें भरना और चीखें निकालना, बार बार मेरा नाम लेकर चिल्लाना, ज़ोर ज़ोर से धक्के ठोकने की गुहार लगाना उसकी आदत है. जब वह इतनी आवाज़ करती है तो मैं भी उत्तेजना से भर के मेरी “रस मलाई”… “रस मलाई” चिल्लाता हूँ, खासकर झड़ते समय तो और भी ज़्यादा……

अगली सुबह नोवेम्बर की मीठी मीठी गुलाबी सर्दी में, मैं तो 7 बजे ही कुसुम को सोता छोड़कर होटल की तलाश में ये सोच कर चल दिया कि कल शाम को जब मैंने अपनी साली जूली को किसी होटल में जाकर बात करने के लिए बोला तो उसने कोई जवाब नहीं दिया था, मतलब वो चुदने के लिए तैयार थी, और मेरे पास बस आज दिन का ही समय अपनी सालियों की चूत पर अपने लंड का ठप्पा लगाकर एक जिम्मेदार जीजा होने का फर्ज निभाने का……….

नोवेम्बर की गुलाबी सर्दी में रात को शादी के माहौल में सब लोग देर से ही सोये थे, इसलिए कोई भी जगा हुआ नहीं मिला. लॉन में जाकर पहले तो दो कप चाय पी और फिर बाहर निकल के एक रिक्शा पकड़ा. रिक्शा वाले से पूछा कि यहाँ नज़दीक कोई सस्ता से सस्ता और अच्छा सा होटल है क्या. वो बोला कि हाँ साहिब पास में ही राज टाकीज के पास होटल पुष्पांजलि है वहां ले चलूँ?

 मैंने कहा कि चल देखूं कैसा होटल है. . ??

गिर्राज बार एंड होटल उसका नाम था. जहाँ हम ठहरे हुए थे, वहां से रिक्शा से दस मिनट से भी कम के फासले पर एक बहुमंज़िला इमारत थी. रिसेप्शन पर जाकर पता किया तो रूम मिल सकते थे. किराया भी कोई ज़्यादा महंगा नहीं था, मात्र 300 रुपए…. मैंने रूम देखने को कहा तो उन्होंने एक रूम खोल कर दिखा दिया. रूम काफी अच्छा था. साफ सुथरा, अच्छा साफ़ बाथरूम और अच्छे साफ़ सफ़ेद तौलिये. मैंने रूम बुक करवा दिया, मिस्टर एंड मिसेज़ राजकुमार जैन के नाम से, और बोला कि ग्यारह बजे के करीब चेक-इन करेंगे. छोटे छोटे शहरों में कायदा अच्छा होता है, बड़े बड़े शहरों की तरह होटल में कमरा बुक करने के लिए कोई आइडेंटिटी प्रूफ, कोई एड्रेस प्रूफ नहीं देना पड़ता। बस नाम लिखो, कुछ एडवांस पेमेंट करो और रूम आपका.

वापिस आया तो साढ़े आठ बजे थे. कमरे में आया तो कुसुम महारानी गहरी नींद में थी. यह बहुत महत्वपूर्ण था. अगर जगी हुई होती तो वह ज़रूर पूछती कि इतनी सुबह सर्दी में कहाँ और क्यों जा रहे हो.

10 बजे तक लोग तैयार होकर नाश्ते के लिए जाने लगे थे. ” प्रोफेसर जी आप तैयार नहीं हुए” प्रीति के पति मेरे साढू साहब तो नए सूट बूट में ये कह कर मेरे कमरे में आकर शीशे में अपने बाल सवारने लगे…….. अपने तरीके से तो मैं तैयार हो ही चुका हूँ। अब इससे ज्यादा मैं कैसे तैयार हो पाऊं। गलती उनकी भी नहीं। ये मेरे ससुराल में मेरी शादी के बाद पहली शादी है। और ले देकर मैं यही अपनी शादी में पहना हुआ पुराना कोट पैंट आज दूसरी दफा पहन रहा हूँ। साढू साहब तो नए सूट बूट में ये कह कर चल भी दिये । पर मैं थोड़ा सोच में पड़ गया।

मेरे ससुर के मुझसे बड़े वाले दामाद बहुत पैसे वाले हैं। उनके पहनावें की तो बात ही कुछ और है। एक झलक देखा उनको अभी। किसी राजकुमार की तरह लग रहे थे। मैं आईने के पास खड़ा खुद को देख रहा था। इससे अच्छा मुझे आना ही नहीं चाहिए था। कुसुम और रिंकी को ही भेज देता सिर्फ। आखिर आज कल मेहगाई इतनी बढ़ गयी कि रिंकी के कपड़े और कुसुम की साड़ियां ही इतनी महँगी हो गई कि खुद के लिए बजट ही नहीं जम पाता।

तभी फिर से साढू साहब आ गए ” अरुण जी! मैं निकलता हूँ, आप भी जल्दी कीजिये, बाकी लोग भी रेड्डी हैं, आप सबको लेकर नीचे हॉल में पहुंचिए। वैसे आपकी अर्धागिनी कुसुम देवी जी नज़र नहीं आ रही?”

“हाँ मैं देखता हूँ” मैने उन्हे जबाब दिया।

ये बीवीया भी ना! मायके की शादी में आ जाने के बाद खुद में ही बिजी रहती है। खुद तो एक घंटे पहले ही तैयार हो गई थी। फिर से लगी होगी अपनी बहनों के साथ मेकअप में। झुंझलाहट में, मै कुसुम को ढूंढने नीचे उतर ही रहा था कि दरवाजे के किसी कोने से लग मेरे कोट का बाजू थोड़ा फट गया। अब क्या करूँ मैं?रही सही कसर भी..! मैं वहीं पड़े कुर्सी पर बैठ कुछ सोच ही रहा था कि तेज कदमों से मेरी तरफ ही कुसुम को आते देखा. . . .. !

“कहाँ चली गई थी तुम! कबसे ढूंढ रहा हूँ! यहाँ आते ही तुम्हारे तो तेवर ही बदल जाते हैं! सिर्फ अपना ध्यान है तुम्हें! सारी तैयारियां कर के दे दी तुम्हें फिर भी पता नहीं क्या..?” मैंने अपनी पूरी झुंझलाहट निकाल दी। पर मन हल्का नहीं हुआ। कुसुम को देख दिल भर आया। उसकी आँखों में आँसू जो उतर आए थें।

“माफ कर दो कुसुम! दरअसल ये पुराना कोट भी आज फट गया, झुंझलाहट में समझ नहीं आया..”  मैंने अपनी सफाई देनी चाही पर जुबान साथ नहीं दे रही थी। मैं गर्दन झुकाए खड़ा था।

“ये पहन लो तुम! और जल्दी चलो सब इंतज़ार कर रहे होंगे” कुसुम के हाथों में मेरे लिए नया कोट पैंट था।

“ये कहाँ से?”

“फिर वही बात पति की कमाई पर जितना हक पत्नी का होता है, उतना ही पत्नी की कमाई पर पति का होता…. वो अपनी मैचिंग और शृंगार के लिए जब मार्केट गयी थी तो मुझे ये कोट सूट पसंद आ गया था और मैने खरीद लिया था। “

“तो तुम्हारी मैचिंग, और शृंगार ..?”

“तुम इसे पहन लो तो..मेरी मैचिंग! और थोड़ा हँस दो तो..मेरा शृंगार..!’

उसने इतनी मासूमियत से कहा कि.. मेरी हँसी रुक नही रही थी….! मैं तो तैयार पहले ही हो गया था बस ये कुसुम ने जो अभी कोट दिया है उसे बदन पर डालना था. कुसुम भी तकरीबन तैयार हो ही चुकी थी. फिर हम रूम लॉक कर नीचे आ गये।

 नाश्ता बाहर लॉन में बढ़िया धूप में लगा था. प्रीति और मेरे साढू भी वहां मिल गए. प्रीति बहुत ही कामुक लग रही थी. एकदम सेक्स बम. उसने बड़े भड़कीले मैरून रंग की प्रिंट वाली पटियाला सलवार और हल्की गुलाबी शमीज़ डाल रखी थी. गले में गहरे गुलाबी रंग का दुपट्टा और पैरों में बेल बूटेदार, सुर्ख जयपुरी जूतियां… . … ।

“” शायद किसी से सही कहा है औरत जिस मर्द को प्रभावित करने के लिए महंगे कपड़े पहनती है असल में वो मर्द उस औरत को बिना कपड़ो के नँगा देखना चाहता है “”

नाश्ते के दौरान जैसे ही उसने मौका देखा तो मेरे पास आयी और बोली- तुम लोग कितना हल्ला गुल्ला करते हो… रात भर सोने नहीं दिया तुम दोनों के शोर ने… सारी दुनिया को पता लग गया होगा कि आप कुसुम को ” रस मलाई” कहते हैं.

मैंने हंसकर कहा- साली जी, आप क्यों जाग रही थी उस टाइम… आपको भी शायद साढू जी सोने नहीं दे रहे होंगे. अगर आप सोई होती तो शोर आपको कहाँ सुनाई पड़ता… और पता चल गया कुसुम का नाम तो चलने दो क्या फर्क पड़ता है…

प्रीति के चेहरे पर दुःख की एक गहरी छाया दौड़ गई. शायद मैंने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था. मौका देखते ही मैंने उसको बोल दिया कि होटल पुष्पांजलि बिलकुल पास में है वहां ग्यारह बजे मिलेंगे, दिल खोल के बहुत सी बातें करेंगे…….मैंने कहा- बाहर निकल के रिक्शा ले लेना, चार पांच मिनट में होटल आ जायगा. उसने सिर हिला दिया किन्तु बोली कुछ नहीं….और कुसुम के साथ अन्य महिलाओ के साथ गप्पे मारने चली गई।

वही सामने लगे मिठाईयों के काउंटर पर जब मेरी नजर रबड़ी से भरे डोंगे पर गयी तो खुद को रोक नही पाया क्योकि मुझे मीठा कुछ ज्यादा ही पसंद है, और उसी दिशा में चल दिया। इशारे से मैने अपने साढू को साथ चल कर खाने को कहा तो उन्होंने शुगर की बीमारी का केहकर पल्ला झाड़ लिया। और मै अकेले ही एक दोने में रबड़ी लेकर एक कोने में रखी कुर्सी पर बैठ कर बड़े मजे से रबड़ी खाने लगा।

उसी कोने में मेरे ठीक पीछे दो अधेड़ उम्र के सज्जन बैठे थे जो करीब 45 से 50 साल के आसपास के होंगे। “” दिल्ली के दो कमरों के फ्लैट में बूढ़ी मां और दो जवान बच्चों के बीच पति-पत्नी आखिर करे तो क्या करे और कहां करे? क्या उम्रदराज पति-पत्नी को रिश्तों को जीने का हक नहीं है, क्या ये गलत है?””

मैं उन दोनों की बातें सुनकर हाथ में रबड़ी का दोनां पकड़े कुर्सी पर बैठा-बैठा यही सुन रहा था।

पहला सज्जन अपनी व्यथा का बयान कर रहा था – यार, मम्मी बेड पर सो रही थी, हम दोनों पति पत्नी नीचे जमीन पर गद्दा डाले पड़े थे। रात को पत्नी का मन कर गया तो मैंने कहा सो जा, मम्मी क्या सोचेगी। इस उम्र में भी दोनों…दूसरे कमरे में भी हम दोनों नहीं जा सकते थे, वहां हमारे दोनों जवान बच्चे सो रहे थे।

इतना सुनते ही दूसरा सज्जन बोला- अरे भाई, इस उम्र में अच्छा नहीं लगता ये सब। भगवान में मन लगा। बच्चों की शादी की उम्र हो गई है। मेरे बच्चे जब से समझने लगे हैं, मैंने बीवी से कह दिया है कि तू बच्चों के साथ सोया कर। मैं अकेले सोऊंगा। अच्छा नहीं लगता यार, बच्चे क्या सोचेंगे, मम्मी पापा अभी भी साथ साथ….

तो क्या करूं। मेरे पास तो दो ही कमरे हैं। बीवी मेरी मानती नहीं, कहती है कि अकेले नहीं सोऊंगी। पहले सज्जन की बात सुनकर दूसरे सज्जन ने राय दी- तो भाई तू ऐसा कर, अपनी मम्मी को बच्चों के कमरे में शिफ्ट कर दे और तू पति पत्नी एक कमरे में रह।…पहला दोस्त बोला- लेकिन मेरे बच्चे कमरे में दादी के साथ रहना नहीं चाहते। कहते हैं कि दादी सोते सोते बड़बड़ाती रहती है, क्या करूं, बता?…

दूसरा सज्जन कहने लगा- तो भाई अब भगवान का नाम ले बस, इस उमर में यही अच्छा लगता है। मेरा भी मन करता है लेकिन क्या करूं, इस उमर में अच्छा भी नहीं लगता।

अपने हाथ में थामे रबड़ी के दोने में से रबड़ी को तो खतम होना ही था। खाली दोने को डस्टबिन में फेंक कर मै दूसरे कोने में लगे पानी के काउंटर की तरफ चल दिया। मैं आज के उम्रदराज पति पत्नियों की समस्या से पहली बार रूबरू हुआ तो बहुत सोच में पड़ गया कि हमारा समाज उम्र के आधार यह जज करने लगता है कि किस उम्र तक ये सब करना सही है, और किसी उम्र के बाद ये सब करना गलत। लेकिन सही गलत के पैमाने पर जज करने वाला यह समाज यह नहीं समझता कि अंदर ही अंदर कितनी समस्याएं आदमी और औरत दोनों झेलते हैं और किसी से कह भी नहीं पाते हैं। क्या उम्र के आधार पर संभोग या इटीमेसी को हम तय कर सकते हैं, क्या इसे सही या गलत कह सकते हैं? ऐसे लोगों को क्या भगवान के भजन में लग जाना चाहिए या फिर दूसरा रास्ता तलाशना चाहिए?

खैर सामाजिक चिंतन को खतम कर और पानी पीने के बाद मै कुसुम के पास चला गया मैंने इशारे से उसे बुला कर कहा कि यही पास में मेरा एक दोस्त रहता है प्रदीप शर्मा, मैं उससे मिलने जा रहा हूँ. वैसे भी शाम तक तो कुछ काम है नहीं. बारात आएगी 8 बजे, उसके पहले ही आ जाऊंगा. तुम आराम से अपनी चचेरी ममेरी बहनों से गप्पें मारो।

कुसुम ने कहा- ठीक है तुम जाओ अपने दोस्त के पास. मैं तो सोने जा रही हूँ… तुमने बहुत ही ज़्यादा तंग किया था रात भर… सारा बदन दुःख रहा है. दो चार घंटे नींद लूंगी तो ठीक रहेगा.

करीब पौने ग्यारह बजे मैं होटल जा पहुंचा और लॉबी में बैठ कर प्रीति का इंतज़ार करने लगा. पंद्रह बीस मिनट के बाद प्रीति आ गई.        

मैं उठकर उसके पास चला गया और उसको रूम में साथ ले चलने लगा. प्रीति ने कहा- अरे आपने तो रूम ले लिया… मैं तो समझी थी हम रेस्टोरेंट में बैठ कर बातचीत करेंगे.’

मैंने कहा- साली साहिबा जी जो बातचीत करनी है वह रेस्टोरेंट में नहीं हो सकती… उसके लिए तो कमरा ही चाहिए… रेस्टोरेंट में करनी होती तो वहीं कर लेते न… यहाँ क्यों आपको आने की तकलीफ देता. आइये रूम में चलिए.’

हम रूम की तरफ चल दिए जो कि फर्स्ट फ्लोर पर था. रास्ते में मैंने प्रीति से पूछा- आप क्या बहाना लगा के आईं होटल में? मैंने तो कुसुम से कहा कि एक दोस्त से मिलने जा रहा हूँ.

प्रीति ने हँसते हुए कहा- मैंने भी इनसे यही कहा कि मेरी स्कूल में साथ पढ़ी एक सहेली है जो पास में रहती है… उसको मिलना चाहती हूँ.

हम दोनों अपनी बहानेबाज़ी पर हँसते हुए रूम तक पहुँच गए. रूम नंबर 102 का लॉक खोल कर मैं अंदर घुसा फिर प्रीति को अंदर आने का इशारा किया.

प्रीति जैसे ही अंदर घुसी मैंने बिजली की तेज़ी से दरवाज़ा बंद करके उसको ज़ोर से आलिंगन में बांध लिया और अपने तपते होंठ उसके होंठों से लगा दिए. मैंने इतना कस के भींचा था और इतने ज़ोर से होंठ से होंठ चिपकाए थे कि प्रीति को शायद साँस घुटती महसूस हुई क्यूंकि थोड़ी देर मचलने के बाद उसको खांसी आ गयी. मैंने थोड़ी पकड़ ढीली की और होंठ हटा लिए.

उसने जल्दी जल्दी गहरी गहरी साँसें लीं और फिर बोली- यहाँ बातचीत करने बुलाया था या मेरा दम घोंटने को… और यह क्या हरकत की? कैसा मजाक है ये? अगर किसी को भनक भी पड़ गई तो क्या हशर होगा कुछ ध्यान भी है आपको… मेरी तो इज़्ज़त का जनाज़ा निकल जायगा… बताइये क्यों बुलाया था… और हाँ ज़रा दूर से…… ?? ?

जारी है ✍️

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