कर्ज और फर्ज | एक कश्मकश – Update 52

कर्ज और फर्ज एक कश्मकश - Erotic Family Sex Story
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धीरे धीरे हम दोनों के बीच की ये कशिश और चाहत दोनों को एक दूसरे के करीब ले आयी. शायद कुदरत भी हमारे इस प्यार को आगे ले जाने में हमारी मदद कर रही थी.

रात के तकरीबन 9:30 बज चुके थे। बातों की मस्ती में हम दोनों इस तरह से खोए की समय का जरा भी पता ही नहीं चला। हाथ में पहनी हुई घडी पर नजर गई तो रिंकी के होश उड़ गए कब एक डेढ़ घंटे बीत गए उसे पता ही नहीं चला। उसे अब इस बात का डर था कि अगर ऐसे ही सिर्फ बातों में ही उलझे रहे तो मम्मी पूरी कंपनी (दादा-दादी) के साथ तब तक जाएगी और यह सुनहरा मौका उसके हाथ से निकल जाएगा।

 बारिश थी लेकिन अब धीरे धीरे से रुक रुक कर हो रही थी। मै प्यासी आंखों से अपनी बेटी को घूरे जा रहा था । और मेरा यह घूरना रिंकी को बेहद आनंद की अनुभूति करा रहा था। रिंकी समय को ऐसे गुजरने नहीं देना चाहती थी इसलिए वह हाथ में बंधी घडी की तरफ देखते हुए मुझ से बोली।

अरे पापा देखो तो बातों ही बातों में कब समय गुजर गया इसका पता ही नहीं चला 9:30 बज रहा है।

क्या बात कर रही हो रिंकी सच में 9:30 बज रहा है।

हां पापा आप भी देख ले (मेरी तरफ घड़ी दीखा़ते हुए)

हां रिंकी सच में समय का तो पता ही नहीं चला।

अब तो मम्मी की ट्रेन भी ना जाने कब से स्टेशन पर आ चुकी होगी और दादाजी भी स्टेशन पहुँच गए होंगे,,,,, लेकिन पापा सच बताना मुझ से बातें करते हुए ज्यादा मजा   इधर घर के एकांत में मेरे साथ आ रहा है कि नहीं।

हां रिंकी तुम सच कह रही हो तुझ से बातें करते हुए बहुत ज्यादा मजा आ रहा है,

तु शायद नहीं जानती कि मैं तुझसे ऐसी बातें क्यों कर रहा हूं मेरे अंदर यह सब बरसों से दबा हुआ है मैं यह सब बातें तेरी मम्मी से करना चाहता था और एक पति भी अपनी पत्नी से इसी तरह की बातें करता है मस्ती करता है लेकिन तेरी मम्मी तो मुझ पर ध्यान ही नहीं देती। रिंकी शायद तू नहीं जानती कि तेरी मम्मी मुझसे हमेशा कटी कटी से रहती है और मुझसे ठीक से बात भी नहीं करती इसलिए मैं हमेशा अपने दुखों को छुपा कर अपने चेहरे पर बनावटी हंसी लाकर दुनिया के सामने रहता हूं। (मै अपनी बेटी की चुचियों की तरफ देखता हुआ बोला)

(इतना सुनते ही रिंकी में थोड़ा सा अपने घुटनों को मोड़ा जिससे उसकी स्कर्ट पूरी तरह से उसकी कमर तक चली गई और उसकी सफेद रंग की पैंटी नजर आने लगी मेरी नजर सीधे अपनी बेटी की पैंटी पर चली गई और मै अपनी बेटी की सफेद पेंटिं को देखे कर एकदम से उत्तेजना का अनुभव करने लगा और मेरी सांसे तेज चलने लगी   हाथ अपने आप पेंट के ऊपर से लंड को जोर-जोर से मसलने लगा,,,, यह तो बड़ा ही काम उत्तेजना से भरपूर और एक जवान मर्द के लिए यह तो बेहद ही कामोत्तेजना और रोमांच से भरा हुआ नजारा था। रिंकी को भी आभास हो गया कि उसके पापा पेंटिं को देखकर एकदम उत्तेजित हो चुके है लेकिन वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली।

क्या बात कर रहे हो पापा क्या मम्मी तुमसे प्यार नहीं करती???

अगर करती होती तो क्या मुझे तुझसे इस तरह की बातें करने की जरूरत पड़ती। शादी के तीन महीने बाद ही तेरी मम्मी मुझे इस तरह अकेला छोड़कर नही जाती…. बेटी तेरी मम्मी ने पति और जॉब मे से सिर्फ  जॉब को चुना है और अपने पति से ज्यादा  अपनी जॉब को तबज्जो दे रही है।

इतना सुनते ही रिंकी इस बार अपनी हथेली को अपनी पैंटी पर रखकर हल्के हल्के से सहलाने लगी यह नजारा देखकर मुझ से बिल्कुल भी रहा नहीं गया और मै गर्म आहें भरते हुए इस बार ना चाहते हुए भी पैंट के ऊपर से ही अपने लंड को मुट्ठी में भर लिया और मैने उसके सामने अपना एक विचार रखा: “तुम जानती हो बेटी जब हम दोनो इस बारे में बात नही करते थे तो सब कुछ कितना आसान था, कोई भी परेशानी नही थी”

उसने राहत की लंबी सांस ली और उसके चेहरे पर मुस्कराहट छा गयी. मैने महसूस किया कि उसकी वो मुस्कराहट उन सब मुश्कुराहट से ज़यादा प्यारी थी जितनी मैने आज तक किसी भी औरत के चेहरे पर देखी थी. अपना बदन ढीला छोड़ते हुए उसने मुझे ज्वाब दिया : “हूँ, तुम्हारी इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ.

मैने उसके सुंदर मुखड़े और तराशे हुए होंठो को देखा. वो बहुत मोहक लग रही थी हालाँकि उसका बदन पूरी तरह से ढँका हुआ नही था. एक बात तो पक्की थी कि हमारे बीच बरफ की वो दीवार पिघल चुकी थी. हमारे बीच जो कुछ चल रहा था उस पर अप्रत्याशिस रूप से हम दोनो सहमत थे और हम दोनो जानते थे कि हम अपरिचित और वर्जित क्षेत्र में दाखिल हो चुके हैं.

मैं बहुत ही उत्तेजित था. मेरा लंड इतना अकड़ा हुया था कि मुझे दर्द महसूस हो रहा था. मैं उसे अपनी बाहों में भर लेना चाहता था और उसके जिस्म को अपने जिस्म के साथ दबा हुआ महसूस करना चाहता था. मैं उसके मम्मो को अपनी छाती पर रगड़ते महसूस करना चाहता था. मैं अपने हाथों से उसकी पीठ सहलाना चाहता था, उसकी गान्ड मसलना चाहता था. मैं उसके होंठो में होंठ डाल कर खुले दिल से चूमना चाहता था और चाहता था कि वो भी मुझे उतनी ही हसरत से खुल कर चूमे.

हम वहाँ चुपचाप बैठे थे, मेरी नज़र उस पर जमी हुई थी और उसकी नज़र फर्श पर जमी हुई थी. मेरा कितना मन था कि मैं जान सकता उसके दिमाग़ में उस वक़्त क्या चल रहा था. वो अपने विचारों और भावनाओ में ध्यांमग्न जान पड़ती थी जैसे मैं अपने विचारों में था. वो बीच बीच में गहरी साँसे ले रही थी ताकि खुद को शांत कर सके. मुझे नही मालूम था अब हमे क्या करना चाहिए.

यह देखकर रिंकी प्यार से बोली….

 पापा “अब?…….अब क्या?” वो बोली.

हूँ, ….मैं भी यही सोचे जा रहा था: अब क्या? अब इसके आगे बढ़ने की हमारी क्या संभावना थी? सामान्यतः हमारा आगे बढ़ने वाला रास्ता स्पष्ट था मगर हमारे बीच कुछ भी सामने नही था. सबसे पहले हम नामुमकिन के मुमकिन होने के इच्छुक थे और अब जब वो नामुमकिन मुमकिन बन गया था, हम यकीन नही कर पा रहे थे कि यह वास्तविक है, सच है. हम समझ नही पा रहे थे कि हम अपने भाग्य का फ़ायदा कैसे उठाएँ, क्योंकि हमारे आगे बढ़ने के लिए कोई निर्धारित योजना नही थी.

अंत में मैने पहला कदम उठाने का फ़ैसला किया. एक गहरी साँस लेकर, मै दृढ़ निस्चय के साथ उस तरफ को बढ़ा जिसके नज़दीक उसकी कुर्सी थी. वो संभवत उस किनारे पर मेरा इंतेज़ार कर रही थी, मै धीरे धीरे रिंकी के बिल्कुल पास पहुंच गया, इतने पास की रिंकी के कच्चे बदन की मादक खुशबू मेरे नथूनों में घुसने लगी,  और अपने हाथ उसकी ओर बढ़ा दिए. यह मेरा उसके “अब क्या?” का जवाब था.

वो पहले तो हिचकिचाई, मेरे कदम का जबाव देने के लिए वो अपनी हिम्मत जुटा रही थी. धीरे धीरे उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए और मेरे हाथों में दे दिए. वो हमारा पहला वास्तविक स्पर्श था जब मैने उसे हसरत से छुआ था, हसरत जो उसके लिए थी और उसके जिस्म के लिए थी. उसने इसे स्वीकार कर किया था बल्कि परस्पर मेरी हसरत का जबाव उसने अपने स्पर्श से दिया था. उसके हाथ बहुत नाज़ुक महसूस हो रहे थे. बहुत नरम, खूबसूरत, छोटे छोटे से हाथ थे मेरी बेटी के और मेरे लंबे हाथों में पूरी तरह से समा गये थे.

हमारा स्पर्श रोमांचक था ऐसा कहना कम ना होगा, ऐसे लग रहा था जैसे एक के जिस्म से विधुत की तरंगे निकल कर दूसरे के जिस्म में समा रही थी. यह स्पर्श रोमांचकता से उत्तेजना से बढ़कर था, यह एक स्पर्श  मात्र नही था, उससे कहीं अधिक था. हम ने उंगलियों के संपर्क मात्र से एक दूसरे से अपने दिल की हज़ारों बातें को साझा किया था. हमारे हाथों का यह स्पर्श पिछली बार के उस स्पर्श से कहीं अधिक कामनीय था. मैने अपनी उँगुलियों को उसकी हथेलियों पर रगड़ा. वो अपनी जगह पर स्थिर रहने का प्रयास कर रही थी क्योंकि उसका जिस्म हल्के हल्के झटके खा रहा था.

मैं उसकी उंगलियाँ उसकी हथेलियों की बॅक को अपने अंगूठो से सहला रहा था. वो गहरी साँसे ले रही थी और मैं उसके जिस्म को हल्के से काँपते महसूस कर सकता था. उसके खामोश समर्पण से उत्साहित होकर मैने उसके सामने खड़े होने का फ़ैसला किया. मैं अभी भी उसके हाथ थामे हुए था, सो मेरे उठने के समय उसके हाथ भी थोड़ा सा उपर को उठे जिस कारण उसका बदन भी थोड़ा उपर को उठा. उसने इशारा समझा और वो भी उठ कर खड़ी हो गयी. अब हम एक दूसरे के सामने खड़े थे; हाथों में हाथ थामे हम एक दूसरे की गहरी सांसो को सुन रहे थे.

मगर जैसा सामने आया वो खुद अपनी भावनाओ को दबाए हुए थी, एक बार जब  वो मेरी ओर बढ़ी. उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन में डालने के लिए उपर उठाई. मैने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेट दीं और उसे अपनी ओर खींच कर पूर्ण आलिंगन में ले लिया. हमारी गर्दने आपस में सटी हुई थी, हमारी छातियाँ पूरे संपर्क में थी और मेरी बाहें उसे थोड़े ज़ोर से अपने आलिंगन में लिए हुए थी. मैं उसे कस कर अपने से चिपटाये हुए था. उसने ज़रूर मेरे आलिंगन में मेरे जिस्म की गर्मी महसूस की होगी.

जब हम इतनी ज़ोर से आलिंगंबद्ध हो गये थे तो कुदतरन हमारे होंठो का मिलना भी लाज़मी था. मैने अपनी जीभ अपने होंठो पर रगड़ उन्हे अच्छे से गीला कर लिया. जैसे ही मैने अपना सर पीछे को खींचा ताकि हमारे चेहरे आमने सामने हों, उसका मुख मेरी ओर आया और मेरा मुख उसकी ओर बढ़ गया. मैने अपनी भावनाएँ बहुत दबा कर रखी थी मगर अब उन्हे उभरने का मौका दे दिया था. मैने अपने होंठ अपनी बेटी के होंठो पर रखे और उन्हे थोड़ा सा खोल कर उसके निचले होंठ को अपने होंठो में ले लिया.

मैं नही जानता कैसे मैं उस अदुभूत एहसास को लफ़्ज़ों में बयान करू, वो एहसास जब मेरी बेटी ने मेरा उपर का होंठ अपने होंठो में ले लिया और मुझे हल्के से चूमा. उसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों की तरह नाज़ुक थे. मैने उन्हे पहले ऐसे नही महसूस किया था. फिर उसने अपना मुख नीचे को किया और मेरा निचला होंठ अपने होंठो में लेकर मुझे फिर से चूमा. उसके होंठ मेरे होंठो पर फिसलने लगे, वो अपने पीछे मीठे मुखरस की लकीर सी छोड़ते जाते क्योंकि मेरे होंठ उसके दाँतों को स्पर्श कर रहे थे. मैने उसका उपर का होंठ अपने होंठो में भर लिया और उस पर अपने होंठ घूमाते हुए उसे धीरे धीरे चूसने लगा., उसके होंठ को अपने मुख में सहलाने लगा.

चुंबन इतना लंबा था कि हम एक दूसरे की मिठास को अच्छे से चख सकते थे. हमारे जिसम खुद ब खुद और ज़ोर से एक दूसरे से सट गये थे. मैने अपना अकड़ा लंड उसके जिस्म पर दबाया, और इस बार मैने यह जानबूझकर किया था; वो पीछे ना हटी. मगर उसने अपना जिसम भी मेरे लंड पर प्रतिकिरिया में दबाया बहरहाल कम से कम वो अपनी जांघो पर मेरे लंड को अच्छे से महसूस कर रही थी.

मगर चुंबन को ख़तम तो होना ही था, जब हम अपनी भावनाएँ खुल कर एक दूसरे से बयान कर चुके थे. उसने अपना सर मेरी छाती पर टिका दिया और मैं उसे नर्मी से बाहों में थामे खड़ा रहा. एक लंबी खामोशी छा गयी थी और हम दोनो एक दूसरे को थामे खड़े थे.और हमारे बीच दूरी बहुत कम थी. उसने अपने हाथ उपर किए और अपने बाल सँवारने लगी. मैं उसे अपने बाल सँवारते देख रहा था साथ ही मेरा ध्यान उसके मम्मो पर था जो बाहें उपर होने के कारण आगे को उभर आए थे. वो इतनी कामुक लग रही थी कि मैं आगे बढ़कर उसे फिरसे अपनी बाहों में भर लेना चाहता था. मगर मुझे किसी अंजान शक्ति ने रोक लिया, एसी शक्ति जिसको शायद मैं कभी स्पष्ट ना कर सकूँ.

उसने अपने बाल सही किए और फिर उसने अपनी निगाहें सही की. फिर उसने मेरा चेहरा अपने दोनो हाथों में थामा और धीमे से मेरे होंठो पर चूमा. उसने उस चुंबन को कुछ देर तक खींचा और फिर मुझे “गॉडगिफ्ट” कहा. और आख़िरकार कुछ समय पश्चात, जो कि अनंतकाल लग रहा था वो धीरे से फुसफसाई: पापा बाहर बारिश कम हो गयी है, मम्मी कभी भी आ सकती है….“क्या अभी यह संभव है” ????

वो इतने धीरे से फुसफसाई थी कि मैं उसके लफ़्ज़ों को ठीक से सुन भी नही पाया था.उसके सवाल का जवाब देने की वजाय  मैं कुछ नही बोला.मैं उस सवाल का जबाब नही देना चाहता था.

फिर से एक चुप्पी छा गयी जब वो मेरे जबाव का इंतेज़ार कर रही थी. जब मैने कोई जबाव नही दिया तो उसने मेरी ओर नज़र उठाकर देखा और इस बार अधीरता से पूछा: “पापा बाहर बारिश कम हो गयी है, मम्मी कभी भी आ सकती है….“क्या अभी यह संभव है” ?????

मैं बहुत उत्तेजित होता जा रहा था, मेरी नसों में दौड़ता खून उबलने लगा था क्योंकि मेरा मन उस समय बहुत सारी संभावनाओ के बारे में सोच रहा था. उसने लगभग सब कुछ सॉफ सॉफ कह दिया था और अपनी भावनाओं और हसरतों को खुले रूप से जाहिर कर दिया था. अब मेरी तरफ से संयत वर्ताव उसके साथ अन्याय होता. मैने उसकी आँखो में झाँका और अपनी नज़र बनाए रखी. अपने लफ़्ज़ों में जितनी हसरत मैं भर सकता था, भर कर मैने कहा: “तुम्हे कैसे बताऊ बेटी, मेरा तो रोम रोम इसके संभव होने के लिए मनोकामना कर रहा है।

हम दोनो फिर से चुप हो गये थे. उसकी घोषणा और मेरी स्वीकारोक्ति की भयावहता हम दोनो को ज़हरीले नाग की तरह डस रही थी. हम यकायक बहुत गंभीर हो गये थे. सब कुछ खुल कर सामने आ चुका था और हम एक दूसरे से क्या चाहते थे इसका संकेत सॉफ सॉफ था मगर हम फिर भी चुप चाप थे, दोनो नही जानते थे आगे क्या करना चाहिए.

खामोशी इतनी गहरी थी कि आख़िरकार जब उसने मेरी ओर देखा तो मैं उसके जिस्म की हिलडुल को भी सुन सकता था. उसके चेहरे पर वो अजीब भाव देख सकता था, डर और कामना, उम्मीद और आतंक का मिला जुला रूप था वो. उसने हमारी दूबिधा को लफ़्ज़ों में बयान कर दिया;

“पापा बाहर बारिश कम हो गयी है, मम्मी कभी भी आ सकती है….“क्या अभी यह संभव है” ????? ये एक ऐसा सवाल था जो वो मुझसे ज़यादा खुद से कर रही थी इसलिए मैने कोई जबाब नही दिया. असल मैं मेरे पास उस सवाल का कोई जबाब था ही नही. फिर से खामोशी छा गयी और फिर वो अलग हो गयी… . ……!

जारी है……

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डियर सभी रीडर जो कहानी के पात्रों को महसूस करते है…. आप ही कहानी में वास्तविक दृश्य, हालातों को देखते हुए बताइये अपनी बेटी रिंकी के इस सवाल के वाद प्रोफेसर अरुण को क्या करना चाहिए कहानी का राइटर नही चाहता इस बार आप सभी KLPD का तमगा या टैग दे ……….🙏😜🤣✍️

 ““पापा बाहर बारिश कम हो गयी है, मम्मी कभी भी आ सकती है….“क्या अभी यह संभव है” ?????

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