कर्ज और फर्ज | एक कश्मकश – Update 46

कर्ज और फर्ज एक कश्मकश - Erotic Family Sex Story
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मै रास्ते भर सोचता रहा कि मुझे और कुसुम हम दोनों के हिस्से में वफा के नाम पर शादी के सिर्फ सात फेरे आये है।

मेरे सवालो का जवाब तो सिर्फ कुसुम ही दे सकती थी….. मैं मिश्रा के पास गया तो था शांति के लिए और ले आया कई सवाल, हा जैसे मुझे किसी तांत्रिक बाबा से गुरु मन्त्र मिल गया था,आँखे बंद करो और देखो की क्या हो रहा है,अपने अंदर झाको वही हर सवाल का जवाब है.. मैंने तय किया कि मोबाइल व्हाट्स अप में बस देखूंगा जो चल रहा है, कुसुम को इसका आभास भी नहीं होने दूंगा।

खुद से सवाल जबाब करते हुए मै अपने घर पहुँच गया। बाइक साइड स्टैंड पर खड़ी कर घर में घुसने वाला ही था कि घर के अंदर से बाहर निकलते हुए पापा ने मुझसे पूछा…. अरुण बेटा आज इतनी देर कैसे लगा दी वापिस आने में….????

पापा मै अपने पुराने दोस्त ज्ञान प्रकाश के घर गया था…. बहुत दिनों से वो मिलने को बुला रहा था…  मैने हँस कर पापा को जबाब दिया।

बेटा शादीशुदा आदमी का अर्थ है, कि अपनी आजादी को आधा और जिम्मेदारियों को दुगुना करना। बिना मेहनत के एक पली हुयी जवान बेटी के बाप बन कर तुम क्या सोच रहे हो…. तुम एक पूर्ण पिता का दर्जा पा चुके हो….??? तुम्हे अपनी बेटी के बदलते रंग ढंग नही दिख रहे है…??? तुम्हारी बेटी किस तरह के कपड़े पहनकर घर बाजार में आती जाती है… अगर उसे ठीक से सभाल नही पा रहे हो तो उसके हाथ पीले कर उसको विदा कर दो। इसलिए अगर दोस्ती यारी से फुर्सत मिल जाये तो अपने पिता होने के साथ साथ अपनी बेटी की जिम्मेदारियों पर ध्यान दें….  पापा मुझे ताना देकर बोले।

ऐसा क्या हो गया पापा….??? जो पापा इस तरह मुझे बेटी की जिम्मेदारियों पर ध्यान देने की बातें कर रहे है। मेरी कुसुम शास्त्र में डूबी हुई तंद्रा टूटी और मै वर्तमान के वास्तविक रूप में वापस आया…. कही सुबह सुबह जो मेरे और रिंकी के बीच बाप बेटी के रिश्ते की मर्यादा टूटने की कगार पर आ पहुची थी… उसका पता पापा को तो नही चल गया….????

नही नही उन्हें पता नही चला होगा…. लेकिन कब तक उनसे छिपा रहेगा, और जिस दिन उन्हे पता चलेगा तो फिर क्या होगा….???? नही अब मै ऐसा कोई काम नही करूँगा जिससे मुझे अपने पापा से नजरे मिलाने में भी शर्म आये…. कितना गर्व है उन्हे मुझ पर….!

 मै ये सोचता हुआ घर के अंदर दाखिल हो गया। रिंकी बिटिया किचिन में खाना बना रही थी। मैंने ठान लिया कि अब जितना हो सके मै अपनी बेटी से दूरी बना कर रखूँगा। मै आज शाम खाना खाने भी नही गया।

‘इंसान सोच कुछ भी ले, लेकिन होना वही है जो उसकी तकदीर में लिखा होता है।’ रात के साढ़े नौ बज गये, उधर रिंकी ने एक थाली में खाना लिया और पापा के कमरे की तरफ चल दी। कमरे का दरवाजा खटखटाने के बाद वह अंदर आई तो देखा पापा की आँखे बंद थी।

खाने की थाली मेज पर रख रिंकी मेरे बगल में बैठी और पूछा- क्या हुआ पापा, आप बिना खाना खाये सो क्यों रहे हैं?

“मुझे माफ़ कर दो बेटा, आई एम सॉरी!” कहते हुए मेरी आवाज रुवासी हो गयी और आँखों में आँसू भर आये।

अपने बाप को इस तरह रोता देख रिंकी का दिल टूट गया। उसने मुझे गले लगाते हुए कहा- रोइये मत पापा, आपकी अकेले की गलती नहीं है। मेरी भी उतनी ही गलती है। सुबह सुबह जो हुआ वो अपराध नही था, आपके होंठो पर मेरे होंठ कोई अपवाद नही था। जबसे छुआ है आपके होंठो ने मेरे होंठो को तब से मेरे होंठो पर कोई स्वाद नही था।

अपनी साँसे संभालते हुए मै बोला- तुम मेरी बेटी हो, नादान हो, मासूम हो, छोटी हो, मुझे तो कंट्रोल करना चाहिए था। सब मेरी गलती है।

“नहीं पापा, मैं छोटी नहीं हूँ। 18 वसंत पार कर चुकी हूँ और सब समझती हूँ।” बाप को समझाते हुए बेटी बोली- मैं जानती हूँ कि मम्मी के यु आपको अकेला छोड़ कर नौकरी कर लेने के डिसीजन के बाद आप कितने अकेले हो गए हो, आप मम्मी को बहुत याद करते हो न! मैं ये भी जानती हूँ कि मैं दिखने में बिल्कुल मम्मी जैसी हू और आपको मम्मी की याद दिलाती हूँ। इसीलिए ये सब हुआ। इसमें किसी की कोई गलती नहीं है। गलती हमारे तन्हाई से झूझते वक़्त की है बस!

रिंकी के मुँह से ऐसी बातें सुन के मुझ को थोड़ा सब्र हुआ।

मेरे आंसू पोंछते हुए रिंकी उठी और बेड पर चढ़कर मेरी गोद में बैठ गयी। दोनों पैर मेरे दोनों तरफ निकाल कर मेरे तरफ मुँह कर के उसने मुझे अपने सीने से लगा लिया और बोली- आप रोया मत करो पापा, मैं आपको रोते हुए नहीं देख सकती। मम्मी के जाने के बाद आपने मेरा जैसा ख्याल रख रहे है। अब मैं भी आपका ख्याल रखूंगी। आपने मेरे लिए पापा की कमी पूरी की। अब मैं आपकी मम्मी की …………..…”

इतना कह कर रिंकी के शब्द थम गए।

मै भी पीछे हट कर रिंकी के मुँह की तरह देखने लगा।

“ये क्या कह रही हो बेटा, ये सही नहीं है।” तुम अपनी मम्मी की जगह नहीं ले सकती… मै उम्र में तुमसे बड़ा हू….!

“सही तो इस तरह घुट घुट के जीना भी नहीं है पापा!” रही बात उम्र में बड़े होने की तो आप ज्यादा प्यार कर लेना… मेरी उम्र कम है तो मै कम प्यार कर लूंगी। एक मासूम सी मुस्कुराहट देती हुई वो बोली।

“अरे … किसी को पता चला तो ज़माना क्या कहेगा?”

“आप अपने और मम्मी के बीच की बातें किसी को बताते हो ?”

“नहीं बेटा, क्यों?”

“जब आप नहीं बताओगे, मैं नहीं बताऊंगी तो ज़माने को क्या पता चलेगा पापा?”

मैंने रिंकी का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया और कहा- सच में इतना प्यार करती है तू अपने पापा से?

“जितना मम्मी आपसे करती है उतना ही और वैसा ही!”

यह सुन कर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी और मैंने आगे बढ़ कर अपनी बेटी का माथा चूम लिया- “लेकिन मैं तुझे तेरी मम्मी के हिस्से का प्यार नही कर पाऊंगा बेटा”। हाँ ये भी सच है तू अपनी मम्मी से ज्यादा खूबसूरत और समझदार है बेटा!

“ओह!” वो थोड़ी निराश लगी, कम से कम मुझे तो ऐसा ही जान पड़ा. कहने के लिए और कुछ नही था, मगर वो अभी जाना नही चाहती थी. वो बेड के किनारे पर रखी कुर्सी पर बैठ गयी और टेबल पर से एक मॅगज़ीन उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी. मैं रिंकी के प्यार से परोस कर लाई हुई खाने की थाली उठा कर हाथो में संभालने लगा, और वो चुपचाप मॅगज़ीन में खोई रही.

भले ही हम दोनों रिश्ते में एक दूसरे के बाप बेटी लगते थे लेकिन हम दोनों थे तो विपरीत सेक्स वाले. विपरीत सेक्स में आकर्षण हो जाना तो आम सी बात है. मगर यहां पर देखने वाली बात ये भी थी कि प्यार को अक्सर अंधा कहा जाता है. प्यार को दिखाई नहीं देता कि कौन सी राह ठीक है और कौन सी नहीं.

जिस तरह से एक साथ में आग और तेल साथ सुरक्षित नहीं रह सकते, इन दोनों के साथ रहने से दुर्घटना होने का खतरा हमेशा बना रहता है. मेरे और रिंकी के साथ भी ऐसा ही हो रहा था. दोनों के दिलों में एक दूसरे के लिए मोहब्बत की चिंगारी सुलग चुकी थी. दोनों के दिल में प्यार के दीये जल उठे थे.

इसी दौरान एक ऐसी घटना घट गयी कि बाकी जो थोड़ी बहुत कसर रह गयी थी हम दोनों के रिश्ते में वो भी फिर पूरी हो गयी.

मै अपनी बेटी के प्यार से सजा कर लाई गई खाने की थाली को मेज से उठा कर जमीन पर रख खा रहा था . रिंकी कुर्सी के ऊपर बैठी थी और मै नीचे बैठा हुआ था. उस वक्त रिंकी मैगजीन देखने में बिजी थी. इसी बेखयाली में उसकी स्कर्ट उठ गयी.

उस लम्हा इत्तेफाक भी ऐसा था कि उसी वक्त मेरी नजर रिंकी की जांघों के बीच में ऊपर की ओर चली गयी. मेरी नजर सीधी अपनी बेटी की छोटी सी और प्यारी सी सफेद पैंटी में उभरी हुई चूत पर चली गयी.

ये देख कर मेरा दिल धक्क से रह गया. वाह … क्या खूबसूरत नजारा था मेरी आंखों के सामने. उसकी पैंटी में धुंधली सी चमक रही चूत के ऊपर मुलायम से झांट भी आ गये थे. उसकी चूत की अगल बगल में उसकी रेशमी झांटों ने अपना डेरा जमाया हुआ था.

रिंकी की चूत की दोनों फांकें आपस में चिपकी हुई थी. उसकी चूत की दोनों फांकें बिल्कुल ही बेदाग थीं. ये देख कर मेरे के दिल में तूफान सा उठने लगा. मै बहुत ज्यादा एक्साइटेड हो गया था. अब मै जान बूझ कर खाना खाने में ज्यादा से ज्यादा समय लगाने की कोशिश कर रहा था.

ज्यादा समय लेने का यही कारण था कि मै रिंकी के जनकलोक (धुधली सी चूत) का दर्शन इसी तरह से करता रहु. मुझको अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि मेरी बेटी की जवानी से यौवन की खुशबू अब आसपास में फैलने लगी है. उसी यौवन का एक फूल, उसकी धुधली सी चूत, के दर्शन करके मैं अचम्भे में था.

मेरा 7 इंच लम्बा लंड मेरी बरमूडा में उछल-फांद कर रहा था. मेरा लंड पूरी तरह से अकड़ कर तन गया था. कुदरत ने भी ये दोनों चीज बहुत ही कमाल बनाई हैं. लंड और चूत ये दो ऐसे अंग हैं जो एक दूसरे की झलक पल भर भी पा लें तो तुरंत मचलने लगते हैं.

तभी रिंकी बोली- पापा  सेव भाजी शायद अच्छी नही बनी इसलिए आप बेमन से जबरदस्ती धीरे धीरे खाना खा रहे है…..

इतना कह कर रिंकी ने अपनी स्कर्ट को नीचे करके अपने पैरों को मोड़ लिया. आज की इस घटना ने आग में घी का काम किया.

मै भी एक मर्द था. इस छोटी सी घटना ने मेरी सोच को एक दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था. मुझको असमंजस और दुविधा ने ऐसा जकड़ लिया था कि मुझको कोई रास्ता दिखाई ही नहीं दे रहा था. समझ नहीं आ रहा था कि मै आखिर करू तो क्या करू.

कुछ देर बाद मैने उसे मॅगज़ीन वापस रखते सुना. “ठीक है, मैं चलती हूँ” वो खड़ी होकर बोली.

मैने अपनी नजरे उसके चेहरे की ओर घुमा ली और कहा, “मेरा खाना लगभग ख़तम हो चुका है बेटी, अगर तुम चाहो तो थोड़ी देर हम मोबाइल में फिल्म देख सकते हैं”

“नही, नही. पापा आप आराम करो” उसने जबाब दिया और मेरी तरफ आई. अब यह हिस्सा कुछ अर्थ लिए हुए था.

शायद मेरा ये कहना कि “मै उसकी मम्मी (कुसुम) के हिस्से का उससे प्यार नही कर पाऊंगा” ये जबाब पाकर वो थोड़ा निराश हो गयी थी, मगर जब वो मुझसे विदा लेने के समय चुंबन लेने आई तो मैने उसके हाव भाव में एक निस्चय देखा और इस बार मेरे मन में कोई संदेह नही था जैसे ज़ुबानी विदा की जगह वो चुंबन लेकर कोई बात जताना चाहती थी.

अंत मैं वो बोली, “मुझे सोना चाहिए पापा ! रात बहुत हो गयी है”

” ओके” मैने जबाब दिया और अपने सूखे होंठो पर जल्दी से जीभ फेरी. वो मेरी ओर नही देख रही थी जब मैने अपने होंठो पर जीभ फेरी. मैने फिर से चार पाँच वार ऐसे ही किया ताकि होंठ अच्छे से गीले हो जाएँ. मैं होंठो से लार नही टपकाना चाहता था मगर उन्हे इतना गीला कर लेना चाहता था कि वो उस गीलेपन को, मेरे रस को महसूस कर सके. उसके बाद मैने खुद को उसकी प्रतिक्रिया के लिए तैयार कर लिया.

मेरा दिल बड़े ज़ोरों से धड़कने लगा जब वो मेरे बेड की ओर आई. मैं थोड़ा सा आगे जो झुक गया ताकि उसको मेरे होंठों तक पहुँचने में आसानी हो सके. मैं खुद को संयत करने के लिए मुख से साँस लेने लगा जिसके फलसरूप मेरे होंठ कुछ सूख गये. मैने जल्दी जल्दी जीभ निकाल होंठो पर फेरी ताक़ि उन्हे फिर से गीला कर सकूँ बिल्कुल उसके चुंबन से पहले, मुझे नही मालूम उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था या नही.

जब बेटी के होंठ मेरे होंठो से छुए तो मेरी आँख बंद हो गयी. मेरा चेहरा आवेश में जलते हुए लाल हो गया था. मुझे अपनी साँस रोकनी पड़ी, क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरी भारी हो चुकी साँस उसके चेहरे पर इतने ज़ोर से टकराए.

होंठो के गीले होने से चुंबन की सनसनाहट बढ़ गयी थी. यह वो रोज रात वाला आम सा, लगभग ना मालूम चलने वाला होंठो का स्पर्श नही था. आज मैं हमारे होंठो के स्पर्श को भली भाँति महसूस कर सकता था, और मुझे यकीन था उसने भी इसे महसूस किया था.

वो धीरे से ‘गुडनाइट’ फुसफुसाई और अपने रूम में जाने के लिए मूड गयी. उसकी ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नज़र नही आई थी हालाँकि मुझे यकीन था वो अपने होंठो पर मेरा मुखरस लेकर गयी थी. कुछ भी ऐसा असाधारण नही था जिस पर मैं उंगली रख सकता. ऐसा लगता था जैसे हमारा वो चुंबन उसके लिए बाकी दिनो जैसा ही आम चुंबन था. कुछ भी फरक नही था. मैं उसे अलग बनाना चाहता था, और उम्मीद लगाए बैठा था कि उसका ध्यान उस अंतर की ओर जाएगा मगर नही ऐसा कुछ भी नही हुआ. अब निराश होने की बारी मेरी थी. जितना मैं पहले आवेशित था अब उतना ही हताश हो गया था.

मैने किसी सकरात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया की आशा की थी. अपने बेड पे लेटा हुआ मैं उस रात बहुत थका हुआ, जज़्बाती तौर पर निराश और हताश था. मैं किसी नकारात्मक प्रतिक्रिया को आसानी से स्वीकार कर लेता मगर कोई भी प्रतिक्रिया ना मिलने की स्थिति के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नही था. उस रात जब मैं नींद के लिए बेड पर करवटें बदल रहा था, तो मेरा ध्यान अपने लंड पर गया जो मेरे जोश से थोड़ा अकड़ा हुया था इसके बावजूद कि बाद में मुझे निराशा हाथ लगी थी.

कहते है जब ब्याह हो जाता है तो पोर्न देखने की आदत खुद ब खुद छूट जाती है, यही हाल मेरा था। करवटे बदलते हुए जब मै थक गया और रिंकी के इस व्यवहार से निराश होकर मैंने अपनी बीबी कुसुम की ओर ध्यान दिया। मैंने अपने मोबाइल में उसका व्हाट्स अप खोल कर अपनी पत्नी कुसुम के मोबाइल मैसेज देखने लगा…. देखा तो कुछ msg आये थे .मैंने उसे खोला तो ये शर्मा जी के msg थे…

“ कुसुम जी आज आओ ना मेरे साथ लंच करने ”

“ कुसुम जी जवाब क्यो नही दे रही हो”

“क्या हुआ गुस्सा हो क्या”

“क्या हुआ”

“अगर मुझसे कुछ गलती हुई है तो मुझे माफ़ कर दो”

इतने msg तो कुसुम ने पढ़ लिए थे ,पर कोई भी रिप्लाई नही था, लेकिन एक और नंबर से कुछ msg आये थे नाम था

संजय…

 ये साला अब भी लगा हुआ है लाइन में , अगर मैं उसे खोलता तो कुसुम को पता चल जाता इसलिए मैंने उसे नही छेड़ा बस जो आखिरी msg था वो दिखा रहा था,

कॉल मी डियर….

चलो एक बार कुसुम के पढ़ने के बाद मैं पढ़ लूंगा…..

”मेरे माथे पर पसीना था… मन ही मन कुसुम को कुछ कोसता उससे पहले ही कुसुम का वीडियो काल आ गया।

हैलो — वीडियो काल पर मैं उदासीन ही रहा, लेकीन कुसुम से मेरे चहरे के भाव न छुप पाए,

‘क्या हुआ जान ? ??

कुछ नहीं. …. मैंने आराम से जवाब दिया

कुछ खोये से लग रहे हो सब ठीक तो है ना उसने अपने आधे चेहरे पर छाई हुई बालो की छटा को समेटते हुए और अपनी लटो से खेलते हुए पूछ लिया……????

हा सब ठीक ही तो है, मैं एक शून्य में देखता हुआ जवाब दिया,

नहीं मैं आपको खूब समझती हु, आप कुछ तो छुपा रहे हो मुझसे, बताओ ना, ‘उसने जोर दिया और अपने होंठो पर लगी डार्क सुर्ख लाल लिपिस्टिक दिखाते हुए अपना फ्लाइंग किस (उड़ता चुम्मन) छोड़ दिया,

तुम तो मुझे समझती हो पर क्या मैं तुम्हे समझता हु, ‘मेरे मन का द्वन्द सामने आ रहा था, मैंने मन ही मन एक फैसला कर लिया,

अच्छा बताओ तुम रात में किस किस के साथ चैट करती हो, कल रात को तुम तीन बजे तक online थी….???? तो हमको 11 बजे गुड नाईट काहे बोला..????

‘जैसा मैंने सोचा था उसके विपरीत वो चोंकी नहीं वो हसने लगी जैसे मैंने कोई मजाक कर दिया हो,

क्या तुम भी, कुछ भी, बोलते हो online थी, रात 12 बजे तक अपनी सासु से बातें कर रही थी, जानते हो वो बहुत अकेली और दुखी रहती है, और मुझे भी तो आपके बिना नींद नहीं आती, न रात में जल्दी, इसलिए घंटे दो घंटे ऑफिस के कुछ दोस्तों से गपशप कर रही थी।

कुसुम के बोलने का अंदाज ही ऐसा था की मेरे चहरे में एक मुस्कान उभर आयी, मुझे भी इस चीज का अहसास था की मेरा शक हमारे बीच के संबंधों पर भी असर डाल रहा है और मैं ऐसा होने नही देना चाहता था…

“अच्छा बताओ कौन से दोस्त है… क्या मै उनके बारे में जान सकता हूँ …”

“छोड़ो आप थके हुए लग रहे हो ,..”

“अरे बता भी दो ..”

“जब मूड अच्छा होगा तो बताऊंगी, वैसे भी मेरी किसी भी बात का कोई असर होना ही नही तो क्या फ़ायदा..”

“अरे यार तुम भी ..”

वो हँसी …….. और अपना मोबाइल चूमते हुयी बोली, “ मेरे सारे सोशल मीडिया के id पासवर्ड तो आप जानते ही हो ना , अब खुद ही पता कर लेना ..”

‘मैं बिलकुल स्तब्ध था की ये औरत इतनी चालाक और शातिर कैसे हो सकती है की चहरे पे जरा भी शिकन नहीं आया………मैं गुस्से में मानो फुट पड़ा,

रात के 2-3 बजे तुम गैर मर्दो से बातें करती हो, मेरे बिना नींद नहीं आती इसका क्या मतलब है, अगर किसी को ये बात पता चली तो जानती हो लोग क्या सोचेंगे, पागल हो तुम, इतना समझ नहीं है तुममे, और  दिन भर तो ऑफिस में उनके साथ रहती हो न फिर तुम्हे रात में भी उनसे हमदर्दी जतानी है…’

मैंने कभी कुसुम से इतने ऊचे आवाज में बात नही की थी, मेरा चहरा तप रहा था, और कुसुम की आँखे भी पनिया गयी, आज पहली बार मुझे उसके चहरे में आसू देख दुख भी हो रहा था, कुसुम ने अपने भरे नयन से मुझे देखा, भगवान इतना प्यारा भी किसी को न बनाये, डबडबाई आँखों पर से कुछ बूंद चहरे पर गिरे थे, अनायाश ही वो हुआ जिसका मुझे डर था मेरी आंखों में भी थोड़ा पानी आया मुझे खुद में आश्चर्य था। कि मैं ये क्यो कर रहा हु, लेकिन मैंने अपने आप को सख्त बनाये रखा, केवल बाहर से.. कुसुम को इतना तो समझ आ गया था की मैं उससे ज्यादा देर तक गुस्सा नहीं रह पाउँगा, वो सिसकिया लेती हुई और वो मेरी आंखों को ध्यान से देखने लगी ,

मैं कभी ऐसा फिर नहीं करुँगी जान माफ़ कर दो अब कभी रात में किसी से कोई भी बात नही करूँगी। ‘मेरे दिल में एक उमंग जगी थी… , मै… मै हो गयी थी। आपसे शादी से पहले जैसी मै कुसुम थी… जानते हो मैं कभी इतनी खुस नही थी जितना की अपने मुझे शादी के बाद बना दिया, मैं एक स्वकच्छन्द हँसी हँसने वाली जिसमे कोई राग द्वेष नही बिल्कुल निर्मल और अंतर्मुखी लड़की थी जिसे अपने इतनी आजादी दी की मैं अपने आप को एक्सप्लोर कर सकू,आप ने मुझे इतना बदला है, आपने ही सिखाया की शादीशुदा लड़की ऑफिस में wifi की तरह होती है, सिग्नल सबको मिलते है लेकिन हाथ में किसी के नही आती……. ! !

कितने अजीब चीज है ना की जो ताकत मेरे पास हमेशा से थी उसे मैं ही नही जानती थी ,अपने ही बतलाया की मैं कितनी सुंदर हु , और चाहूं तो क्या कर सकती हु, मैं अपने ऑफिस में बस एक क्लर्क हू लेकिन ऑफिस में आज बॉस से लेकर चपरासी तक मेरे इशारे पर नाचने से नही हिचकिचाते… आपने मुझे वो आजादी दी है जिसकी कल्पना हर लड़की अपने पति से करती है,और सबसे बड़ी बात इतना प्यार दिया है,आई लव यू जान, मैं आपके बिना अधूरी ही रहूंगी,और आपके सिवा किसी पर दिल आ जाए ये हो नही सकता,और बात जिस्मानी रिस्तो की है तो आज तक आपके सिवा किसी की नही हो पाई और ना ही हो सकती हू ,

लेकीन मैंने एक गलती कर दी मैं कभी ऐसा फिर नहीं करुँगी जान माफ़ कर दो अब कभी रात में किसी से कोई भी बात नही करूँगी।

तो कसम खाओ मेरी…….!

‘हा मैं कसम खाती हु,’

ये मेरी बहुत बड़ी गलती बनने वाली थी जिसका मुझे उस वक्त अंदाजा भी नहीं था,

मैंने प्यार से उसकी पनियाई आँखों में देखा मानो सब ठीक हो गया हो पर मैं भूल गया था की कुछ ठीक नहीं हुआ है, मैं अपनी मोबाइल की स्क्रीन पर उसकी पनियाई आँखों में देखते हुए अपनी प्यार की दुनिया में खो गया…पर…….. “ये सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं, मसरूफ मै बहुत हूं मगर बेखबर नहीं. ..?????

जारी है…….

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