अध्याय – 16 —
दूरियाँ……नजदीकियां…… मजबूरिया
कोई सपने में भी नही सोच सकता है की मेरे और सुनीता के बीच इस आधे घण्टे के सफर में क्या हुआ। मेरी हालत थोड़ी अजीब सी थी. एक तरफ तो मैं घर नही जाना चाहता था क्योंकि जो आनंद मुझे सुनीता ने दिया था वो लफ़्ज़ों में भी बयान नही किया जा सकता था और मैं उस आनंद को एक सफर तक सिमट ना रखकर कयि दिनो बल्कि कयि हफ्तों तक खींचना चाहता था. मगर ऐसा संभव तो नही था.
“” ये रहस्य केवल रैलगाड़िया/मोटर गाड़िया ही जानती है… . . किस तन का टिकट कहाँ का था और कोनसा मन कोणसे स्टेशन पर उतर गया “””
सुनीता के जाने के बाद मै दोबारा से बस की भीड़ में तन्हा हो गया था और तभी अचानक से बस वाले ने सफर में सुनने वाला एक बेहद कर्णप्रिय गाना बजा दिया।
साजन मेरा उस पार है
मिलने को दिल बेकरार है
जिनकी चाहत में आखियाँ तरसी है
जिनसे मिलने को बरसो बरसी है
होने वाला उनक दीदार है
उनको भी मेरा इन्तजार है
होने वाला उनक दीदार है
उनको भी मेरा इन्तजार है
घूँघट मेरा जब उठाएँगे
इक दूजे में हम खो जाएँगे
कदमों में उनके ही संसार है
ये तो जन्मों-जन्मों का प्यार है
साजन मेरा उस पार है
मिलने को दिल बेकरार है।
इस गाने के बोल सुनकर मै अपनी मृग तृष्णा की निद्रा से जाग गया और मुझे मेरी बेटी रिंकी के कुछ दिन पहले भेजे गए बेहद कामुक्, मैसेज के शब्द मेरे अंतर्मन मे सुनाई देने लगे।
((पापा आज शाम होने को आयी थी। आज ना जाने क्यों मुझे घर में अकेला-अकेला लग रहा था। वो मौसम होता है ना, आंधी के बाद वाला। खुला आसमान, ठंडी हवा, आसमान का रंग हल्का सा केसरी, और मेरी मदहोशी और पागलपन को बढ़ता हुआ। मैं अकेली हूँ, मेरा मन अकेला है, मेरा शरीर अकेला है, और मैं अकेला नहीं रहना चाहती।मुझे अपनी धड़कन का बढ़ना महसूस हो रहा है। मानो कोई ज़ोर-ज़ोर से मेरे शरीर के अंदर से मेरे दिल के दरवाज़े को बजा रहा हो और चीख रहा हो, “आज, आज, आज, आज!” अभी जिंदगी में बहुत मोड़ और पड़ाव बाकी हैं पर मुझे पता नहीं आपको ये अपनी नादान रिंकी की फीलिंग्स पसंद आएगी या नहीं।
“” इतनी देर भी मत करना वापस लौटने में, कि चाबिया भी बेअसर हो जाये तालों पर “”
मेरा कौमार्य मुझसे कहता है की उठती है कसक आ जा…. दिल करे धक धक आ जा…. कब होगा मिलन आ जा… आजा सजन आजा….. मेरा दिल अकेला है और मेरा शरीर कुंवारा। पापा जिस दिन आप वापस आयेंगे आप मेरे दिल का स्पर्श करेंगे। अपना ख्याल रखियेगा। – आपकी राह देखती “रिंकी”…….,))
अब मुझे घर जाने की जल्दबाज़ी भी हो रही थी, मुझे ना जाने क्यों रिंकी की बहुत चिंता हो रही थी. वो कितने रात से अकेली थी. मै और कुसुम (पति पत्नी) जब जिस्मानी मिलन मे संलग्न होते थे तो वो बेचारी शायद मेरी यादों में जल रही होती थी.
हालाँकि मेरी बेटी और मेरे बीच इस समय असलियत में बाप बेटी के सिवा और कुछ भी नही था. तो मेरा दिल ना जाने क्यों बैचैन होता जा रहा था. जब भी मुझे ख़याल आता कि जब मैं कल रात कुसुम के साथ कितना आनंदमयी समय बिता रहा था और मेरी बेटी रिंकी बिल्कुल तन्हा बिल्कुल अकेली सूने घर में मेरे आने की राह देख रही थी तो मेरे दिल पर आरी सी चल जाती.
रिंकी का चेहरा रह रहकर मेरी आँखो के सामने आ जाता और मुझे ऐसा लगता है जैसे मैने जिंदगी का जो सुख पाया है उसके बदले मुझे कोई भारी कीमत देनी है.
“” जिस प्यार में आतुरता है, तेजी है, छटपटाहट और बेचैनी है, वह प्यार कयामत लाकर ही रहेगा””
जैसे जैसे घर नज़दीक आता जा रहा था मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी. मैं अपने मन को तस्सली दे रहा था कि मेरी बेटी के साथ मेरे रिश्ते में कुछ भी ग़लत नही था और जो ग़लती मेने उससे दूरी बनाकर की थी उसे मैं आज एक ही दिन में दूर कर दूँगा, कि आज दिन और पूरी रात मैं उसे इतना प्यार करूँगा कि वो पिछले दिनो की तन्हाई भूल जाएगी, मैं उसे इतना प्यार करूँगा कि मुझे उसे छोड़ने के लिए बोलेगी तो भी उसे नही छोड़ूँगा. उसे इतना प्यार करूँगा, इतना प्यार करूँगा……..
तभी बस कंडेक्टर ने आवाज लगाई दर्पण कालोनी वाले बाहर निकल आये….. मै अपना बैग उठा कर बस से उतर गया। घर एकदम नजदीक था…… मैं तेज़ तेज़ कदम उठा रहा था. मेरी उस समय एक ही ख्वाहिश थी कि जल्द से जल्द अपनी प्यारी बेटी रिंकी का खूबसूरत चेहरा देख लूँ, तभी मेरे दिल को सकुन आने वाला था. मगर घर के दरवाजे पर पहुँचते ही मेरे पैर ठिठक गये. मुझे घबराहट होने लगी……..
जब मै घर में दाखिल हुआ तो देखा रिंकी घर पर नही थी. मेरे पापा ने बताया वो स्कूल गयी है…… ये सुनकर मेरे मुह से तेज आवाज में निकल पड़ा मगर इतनी सुबह सुबह स्कूल कौन जाता है, और वो भी ऐसे मौसम में?
मेरी तेज आवाज सुनकर पापा थोड़े सहम गये और धीरे से बोले अरुण बेटा क्या हुआ है, इस तरह क्यों नाराज हो रहे हो…. रही बात मौसम की वो तो एकदम सही है मगर सफर की थकान या फिर भूख से तेरा मूड जरूर खराब हो गया है। चल एक काम कर जल्दी से हाथ मुह धो ले, मै खाना लगाता हूं।
मुझे नही पता मुझे क्या हो रहा था…. अपनी बेटी की जुदाई कहिये या उसके
मैसेज के जरिये भेजे दर्द और प्यार भरे शब्दों ने मेरे अंदर भूचाल मचा दिया था….
मैने पापा को सॉरी कहा और हाथ मुह धोकर वापस उनके पास बैठ गया।
बेटा अरुण अब तुम्हारा मूड ठीक है,पापा ने बात शुरु करते हुए मुझसे पूछा??? मैने सर हिला कर उन्हे हाँ का इशारा किया….. कुछ देर शांत रहने के बाद पापा ने बड़े प्यार से पूछा बेटा………..तेरी मम्मी खुश तो है ना???
हा पापा…..मम्मी खुश है, लेकिन आप इस तरह क्यो पूछ रहे हो……??? मैने भी कम शब्दों में सवाल कर दिया। फिर वो थोड़े शांत से हो गये। और मुस्कुरा कर बोले बेटा
आज मै तुझे बता रहा हूँ उसको एक बाप बेटे के रिश्ते से नही एक दोस्त के रिश्ते से समझने की कोशिश करना वैसे भी जब बाप का जूता बेटे के पैर में आने लगे तबसे उनको मित्रवत बातचीत करनी चाहिए । तेरी मम्मी के साथ हमारी उम्र के अंतर का फ़ासला हमेशा से हमारी खुशियों के आगे एक दीवार बन कर खड़ा रहा है। तेरी मम्मी के साथ जब मेरी शादी हुयी तो उस समय मेरी उम्र 35 तेरी उम्र के लगभग और तेरी मम्मी की उम्र रिंकी बेटी के बराबर थी।
शादी के बाद उम्र का ये अंतर शादीशुदा जोड़ो के बीच भावनाओ का, विचारों का, सोच, पसंद- नापंसंद, का एक सामंजस्य ठीक से स्थापित नही हो पाता है। मेरी हमेशा से एक परिपक्व मैच्योर स्त्री से शादी करने की इच्छा थी। जिसकी तलाश में मेरी उम्र बढ़ती गयी….. लेकिन मुझे मेरी पसंद की हमउम्र परिपक्व स्त्री नही मिली। शायद उस जमाने में घरों में अधिक उम्र तक लड़किया कुवारी बैठाने का रिवाज नही था। फिर एक वक्त ऐसा आया तेरे दादाजी के रुतबा, अमीरी, मेरी सरकारी नौकरी के लालच में और तेरे नाना ने गरीबी के आगे समर्पण करते हुए अपनी जवान बेटी को मुझ जैसे उम्र में दुगुने आदमी के साथ ब्याह दिया।
लेकिन वो ये भूल गए उम्र का ये अंतर हम दोनों को कभी भी खुश नही रख पायेगा…. तेरी मम्मी जैसे जैसे बड़ी, परिपक्व, होती जा रही थी और मै बूढा होता जा रहा था। आज तेरी मम्मी भविष्य के हँसी सपने देख कर खुश होने की कोशिश करती है और मै अपने अतीत को याद कर खुश होता हु। भविष्य की कल्पना सिर्फ मैच्योर और अतीत की कल्पना सिर्फ बूढ़ा ही करता है।
ये तो तुझे भी अच्छे से पता है तेरी मम्मी से तेरे विचार, सोच, पसंद ना पसंद मुझसे बेहतर मिलती है और जो मुझे पसंद है वो तुम दोनों ने कभी पसंद नही किया। इसीलिए शायद अपने मन में बसे किसी हँसी सपने को पूरा करने के लिए वो बहू के साथ गयी है।
अपनी मम्मी को खुश रखना तेरा फर्ज है। मेरी तो उम्र 68-70 के आंकड़े को छूने वाली है। और तेरी मम्मी पचास के पास पहुँच गयी है। पचास का आंकड़ा बड़ा जादुई होता है, एक अलग ख़ूबसूरती होती है इसकी तजुर्बे की लकीरें माथे पे होती है
पर गाल अब भी गुलाबी होते है, बच्चों से बेफ़िक्री का आलम होता है, खुद के लिए जीने का मन करता है, रंग भरने लगते है अपने सपनों में, रंगने लगते बालों को जिंदगी की तरह गुनगुनाने लगते,आईने में मुस्कुराने लगते, नीला,पीला,चटकीला सब पहनने लगते, ये उम्र बहुत कुछ कहती है, ये दीपक की वो लौ होती है जो बुझने से पहले पूरा ज़ोर लगाती है, पूरी ताकत से कमज़ोर पर फैलाती है, और फ़िर ख़ुशी, ख़ुशी बुझ जाती है।
कभी कान लगा सुनना तुम अपनी मम्मी के मन की आवाज……कहती है मरने से पहले जी लेना…….मौका मिला है इसे ना खो देना
मैने उनकी बात खतम होते ही कहा…. पापा आपने कुसुम की राजीखुशी के बारे में मुझसे नही पूछा….. क्यों….????
पापा मुस्कुरा कर बोले बेटा तू मेरी तरह इतना भी नालायक नही है जो अपनी पत्नी को दुखी करे। ये मै इसलिए बोल रहा हूँ क्योकि मै तेरी मम्मी को वो खुशी कभी नही दे पाया जिस पर उनका हक था। अपनी मम्मी को मुझसे ज्यादा तू जानता हूँ, उन्हें मुझसे ज्यादा तेरे साथ रहने से खुशी मिलती है,
पापा मुझे खाने की प्लेट देते हुए बोले बेटा आज अपने पापा के हाथ की बनी हुई दाल रोटी बाप बेटे एक साथ बैठ कर खाते है और मै तुझे अपनी पुरानी यादे बताता हूँ। जिससे तेरी आने वाले जीवन में कब और कैसे निर्णय लेना है, उन निर्णयो को लेने में बहुत मदद मिलेगी।
दरसल मै भी पापा से मम्मी के बारे में बात करना चाहता था तो मैने सोचा ये मौका अच्छा है और मै पापा की बातें बड़े ही ध्यान से सुनने लगा।
मैने खाने का एक निवाला खाया, तो मजा ही आ गया मैने कहा आप तो कमाल का खाना बनाते हो।
पापा बोले बेटा मेरे लिए नया नही है मै जब अलग अलग शहरों में तेरी मम्मी से दूर नौकरी करता था तो नयी जगह और नयी पोस्टिंग में ये शुरू के कुछ दिन अपने को adjust करने में निकल जाते ! .बीबी बच्चों की याद तो आती थी पर उसका कुछ खास असर नहीं होता था .. काम की मसरूफियत में सब कुछ भूल जाता था ! अकेलापन कभी कचोटता नहीं .. सुबह जल्दी निकल जाता था और घर वापस आते काफी रात हो जाती थी …
और फिर जब धीरे धीरे मैंने वहां का काम संभाल लिया .. काम कम होता गया और मेरे पास समय की कमी या काम का बोझ नहीं रहा ! शाम को अब मैं घर जल्दी अ जाता था ..पर अकेलापन मानो पहाड़ जैसे लगता था .. बीबी और बच्चों की याद आती … समय काटे नहीं कटता .. उन दिनों मोबाइल जैसी सुवुधाएं भी नहीं थीं I STD कॉल से बात करना भी अपने आप में भारी मुसीबत होती थी …
मैं वहां का senior most ऑफिसर था इसलिए बाकि junior ओफ्फिसर्स से ज्यादा घूल मिल भी नहीं सकता .. शहर भी छोटा था , समय बीताने के कुछ और साधन भी नहीं थे ..बस ऑफिस , और घर और कभी कभी पिक्चर देख लेता था वहां के एक लौते हाल में !
एक दिन पड़ोस में एक नया परिवार आया था. एक औरत और तीसरी या चौथी में पढ़ने वाले 2 जुड़वां लड़के. मेरे ऑफिस में काम करने वाले रमेश बाबू उसी महल्ले में रहते थे. उन से ही पता चला था कि वह औरत विधवा है. हमारे ऑफिस में ही उस के पति काम करते थे. कुछ साल पहले बीमारी की वजह से उन का देहांत हो गया था. उन्हीं की जगह उस औरत को नौकरी मिली थी. पहले अपनी ससुराल में रहती थी, परंतु पिछले महीने ही उन के तानों से तंग आ कर यहां रहने आई थी.
‘‘बच कर रहना बड़े साहब, बड़ी चालू औरत है. हाथ भी नहीं रखने देती,’’ जातेजाते रमेश बाबू यह बताना नहीं भूले थे. शायद उन की कोशिश का परिणाम अच्छा नहीं रहा होगा. इसीलिए मुझे सावधान करना उन्होंने अपना परम कर्तव्य समझा.
सौजन्य हमें विरासत में मिला है और पड़ोसियों के प्रति स्नेह और सहयोग की भावना हमारी अपनी कमाई है. इन तीनों गुणों का हम पुरुषवर्ग पूरी ईमानदारी से जतन तब और भी करते हैं जब पड़ोस में एक सुंदर स्त्री रहती हो. इसलिए पहला मौका मिलते ही मैं ने उसे अपने सौजन्य से अभिभूत कर दिया.
औफिस से लौट कर मैं ने देखा वह सीढि़यों पर बैठी हुई थी.
‘‘आप यहां क्यों बैठी हैं?’’ मैं ने पूछा.
‘‘जी… सर… मेरी चाभी कहीं गिर कई है, बच्चे आने वाले हैं… समझ नहीं आ रहा
क्या करूं?’’
‘‘आप परेशान न हों, आओ मेरे घर में आ जाओ.’’
‘‘जी…?’’
‘‘मेरा मतलब है आप अंदर चल कर बैठिए. तब तक मैं चाभी बनाने वाले को ले कर आता हूं.’’
‘‘जी, मैं यहीं इंतजार कर लूंगी.’’
‘‘जैसी आप की मरजी.’’
थोड़ी देर बाद रचनाजी के घर की चाभी बन गई और मैं उन के घर में बैठ कर चाय पी रहा था. आधे घंटे बाद उन के बच्चे भी आ गए. पल भर में ही मैं ने उन का दिल जीत लिया.
रविवार को उन्हें ले कर मंडी की चाट खाने का तो जैसे नियम बन गया था. रचनाजी अब मेरी खूबसूरत रचना हो गई थीं. अब किसी भी फैसले में रचना के लिए मेरी अनुमति महत्त्वपूर्ण हो गई थी.
हमारे देश में आये दिन महापुरुषो की जनम जयंतिया तो होती ही रहती है. इन्ही जनम जयंती की वजह से हमारे ऑफिस में भी 2 दिन की छुट्टी थी, इसलिए उस दिन मैं घर पर ही था. अमूमन छुट्टी के दिन मैं रचना के घर ही खाना खाता था. परंतु उस रोज बात कुछ अलग थी. घर में दोनों बच्चे नहीं थे.
‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं रचना?’’
‘‘अरे सर अब क्या आप को भी आने से पहले इजाजत लेनी पड़ेगी?’’
खाना खा कर दोनों टीवी देखने लगे. थोड़ी देर बाद मुझे लगा रचना कुछ असहज सी है.
‘‘क्या हुआ रचना, तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’
‘‘कुछ नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है.’’
अपनी जगह से उठ कर मैं उस का सिर दबाने लगा. सिर दबातेदबाते मेरे हाथ उस के कंधे तक पहुंच गए. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं. हम किसी और ही दुनिया में खोने लगे. थोड़ी देर बाद रचना ने मना करने के लिए मुंह खोला तो मैं ने आगे बढ़ कर उस के होंठों पर अपने होंठ रख दिए.
उस के बाद रचना ने आंखें नहीं खोलीं. मैं धीरेधीरे उस के करीब आता चला गया. कहीं कोई संकोच नहीं था दोनों के बीच जैसे हमारे शरीर सालों से मिलना चाहते हों. दिल ने दिल की आवाज सुन ली थी, शरीर ने शरीर की भाषा पहचान ली थी.
उस के कानों के पास जा कर मैं धीरे से फुसफुसाया, ‘‘प्लीज, आंखें न खोलना तुम… आज बंद आंखों में मैं समाया हूं…’’
मै धीरे-धीरे रचना के ब्लाउज के बटन को खोलने लगा,,, और रचना भी अपने हाथों से मेरे पेंट के बटन को खोलकर उसके चेन को नीचे सरकाने लगी,, यही अदा रचना को मेरी नजर में तेरी मम्मी से अलग करती थी। क्योंकि रचना अच्छी तरह से जानती थी कि एक मर्द को खुश करने के लिए औरत को क्या करना चाहिए। मै रचना के ब्लाउज के सारे बटन खोल चुका था और ब्लाउज के ऊपर से ही उसके संतरों को दबा रहा था। रचना तो मेरी ईस हरकत की वजह से गरम हुए जा रही थी और उसके मुंह से लगातार सिसकारी की आवाज आ रही थी।
सससससहहहहहहह,,,,,,,,, आााहहहहहहहहह,,,,,,,, मेरे राजा ऐसे नहीं पहले मेरी ब्रा और ब्लाउज दोनों को निकाल दो और फिर मेरी चुचियों को मुंह में भर भर कर दबा-दबा कर पीअो,,,,,, रुको मै हीं निकाल देती हूं मेरे राजा,,,,,,( इतना कहने के साथ ही वह ब्लाउज को अपनी बाहों से निकाल सके और अपने दोनों हाथों की से ले जाकर ब्रा के हुक को खोल दी,,,,, और रचना ने ब्रा को भी निकाल फेंकी। ब्रा कोे बदन से दूर होते ही रचना की गोल-गोल नारंगीया मेरी आंखों में चमकने लगी,,, नंगी चूचियों को देख कर पागल सा हो गया और सीधे अपने मुंह को चुचियों के बीच डालते हुए बोला।।
ओह मेरी जान मेरी तो तुम्हारी यही अदा तो मुझे तुम्हारा दीवाना बना दि है। यही सब अदा तो मेरी बीवी में नहीं है तभी तो मुझे वह बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती।। क्योंकि खूबसूरती ही सब कुछ नहीं होती औरतों को अपने पति को कैसे खुश करना है यह भी आना चाहिए जो कि मेरी बीवी को बिल्कुल भी नहीं आता। मैं हूं ना मेरी जान मैं तुम्हें सारा सुख दूंगी,,,, (इतना कहने के साथ ही रचना अंडर वियर में तने हुए लंड को अंडरवियर के ऊपर से ही मसलने लगी,,,, और रचना की ईस हरकत पर मै गरम आहें भरने लगा।,,,)
रचना मस्त हुए जा रही थी,वो अपनी चूचियों को चुसवाते हुए धीरे से मेरी अंडर बीयर को नीचे सरकाई और हथियार को बाहर निकाल कर मुठीयाने लगी,,,, मैं भी एकदम से चुदवासा हुए जा रहा था।
धीरे-धीरे रचना ने मेरी शर्ट के सारे बटन को खोलते हुए घुटनों के बल बैठ गई मै कुछ समझ पाता इससे पहले ही रचना ने टनटनाए हुए लंड को अपने मुंह में भर कर चुसना शुरु कर दी।
आहहहहहह,,,,,, रचना,,,, ( मैं एकदम से उन्माद मैं भर चुका था आंखें सुख की अनुभूति करते हुए बंद होने लगी। रचना को तो जैसे कोई आइसक्रीम कौन मिल गई हो इस तरह से ऊसे मुंह में भर कर चुसे जा रहीे थी। रचना कि यह अदा मुझ को पागल किए जा रही थी । यही सब बातों की वजह से तेरी मम्मी दूसरी औरतों से बिल्कुल अलग थी और जिस प्रकार से रचना अपनी अदाओं से मुझ को संपूर्ण रूप से संतुष्टि प्रदान कर रही थी यही अदा मै तेरी मम्मी में देखना चाहता था।
हम दोनों कामातूर हो चुके थे रचना की सांसे ऊपर-नीचे हो रही थी मैने एक पल भी रुके बिना रचना की बाहों को पकड़कर उपर की तरफ उठाया और उसे बेड पर बिठा दिया,,,, बेड पर बैठते ही रचना को समझ में आ गया कि उसे क्या करना है इसलिए उसने झट से अपनी साड़ी को धीरे-धीरे सरकाते हुए अपने कमर तक चढ़ा ली और अपनी जांघों को फैला दी। यह नजारा देख कर एकदम कामातुर हो गया मुझसे रहा नहीं गया और घुटनों के बल बैठ कर. रस से भरी रसमलाई को देखकर अपना मुंह सीधे उस रसमालाई में डाल दिया,,, और जीभ से नमकीन रस को चाटना शुरू कर दिया। रचना तो पागल हुए जा रही थी उसके बदन में उन्माद का संचार बड़ी तेजी से हो रहा था। और साथ ही वह अपने दोनों हाथ से मेरा सिर पकड़कर उसका दबाव अपनी जांघों के बीच बढ़ा रही थी।
रचना एकदम से चुदवासी हो चुकी थी ।
मेरी प्यासी बुर तड़प रही है तुम्हारे लंड के लिए, उसकी काम ज्वाला और ज्यादा भड़क चुकी थी। एेसे मादक माहौल में रचना की गंदी बातें माहौल को और ज्यादा गर्म कर देती थी और यही बात मुझ को बेहद प्यारी लग रही थी जो कि एसी ही उम्मीद मै तेरी मम्मी से करता था लेकिन तेरी मम्मी नें कभी भी ऐसे उत्तेजक मौके पर गंदी बातें कभी भी नहीं की।
रचना को तड़पती देखकर मै उतावला हो चुका था अपने लंड को दहकती हुई बुर में डालने के लिए इसलिए वह अपना मुंह उसकी रसीली बुर पर से हटा लिया और खड़ा हो गया। एक हाथ से अपना लंड पकड़ कर सीधे रचना के बुर पर टिका दिया,,,,, रचना की हालत खराब होने लगी और देखते ही देखते ही रचना कि बुर ने पूरे समुचे लंड को अपने अंदर उतार अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। रचना की तो हालत खराब होने लगी उसके मुंह से तो सिसकारीयो की जैसे की फुहार छूटने लगी हो,,,,,
ससससससहहहहहह,,,,, आााहहहहहह,,,,,, आहहहहहहह,,,,, मेरे राजा ,,,,, और जोर जोर से चोदो मुझे,,,,, आहहहह जोर से,,,,,, अपने लंड को मेरी बुर में पेलो,,,, मेरी बुर को पानी पानी कर दो,,, बस एेसे ही,,,,, आहहहहहहह,,,,,,,,,,,,
रचना की ऐसी गंदी बातें सुनकर मै जोर-जोर से रचना की चुदाई कर रहा था।
ओह रचना जैसा तुम खुल कर चुदवा रही हो वैसा मेरी बीबी कभी भी नही चुदवाती इसलिए तो मुझे मेरी बीवी से ज्यादा मजा तुमसे मिल रहा है इसलिए तो मैं तुम्हारा दीवाना हो चुका हूं। आाााहहहहहह मेरी रचना,,,, आहहहहहहह,,,,,,
दोनों की सांसे तेज गति से चल रही थी दोनों मस्त हो चुके थे धक्के पर धक्का लगाए जा रहा था,,,, और रचना भी धक्के का जवाब मुझ को अपनी बाहों में भींच कर दे रही थी। करीब 10 मिनट ही बीता होगा कि मेरी और रचना दोनों की साँसे तेज होने लगी और एक साथ दोनों का बदन अकड़ने लगा। और दोनों एक साथ झड़ गए,,,,,
न जाने कितनी देर हम दोनों एकदूसरे की बांहों में बंधे चुपचाप लेटे रहे दोनों के बीच की खामोशी को मैं ने ही तोड़ा, ‘‘मुझ से नाराज तो नहीं हो तुम?’’
‘‘नहीं, परंतु अपनेआप से हूं… आप शादीशुदा हैं और… मै विधवा’’
“”यह सच है, कितने रिश्ते बिना फेरों के भी होते हैं,
कुछ चोरी छुपे होते हैं ,और कुछ खुलेआम होते हैं।””
‘‘रचना, मेरी शादी महज एक समझौता है जो हमारे परिवारों के बीच हुआ था. बस उसे ही निभा रहा हूं… प्रेम क्या होता है यह मैं ने तुम से मिलने के बाद ही जाना.’’
‘‘परंतु… विवाह…’’
‘‘रचना… क्या 7 फेरे प्रेम को जन्म दे सकते हैं? 7 फेरों के बाद पतिपत्नी के बीच सैक्स का होना तो तय है, परंतु प्रेम का नहीं. क्या तुम्हें पछतावा हो रहा है रचना?’’
शायद आज मैं समाज के अनुसार चरित्रहीन हो गई.’’ रचना गंभीर मुद्रा में बोली।
फिर कई दिन बीत गए, हम दोनों के संबंध और प्रगाढ़ होते जा रहे थे. मौका मिलते
ही हम काफी समय साथ बिताते. एकसाथ घूमनाफिरना, शौपिंग करना, फिल्म देखना और फिर घर आ कर उसके बच्चो के सोने के बाद एकदूसरे की बांहों में खो जाना दिनचर्या में शामिल हो गया था. औफिस में भी दोनों के बीच आंखों ही आंखों में प्रेम की बातें होती रहती थीं.
बीचबीच में मैं अपने घर आ जाता और तेरी मम्मी के लिए और तेरे लिए ढेर सारे उपहार भी ले जाता. देखते ही देखते 2 साल बीत गए. अब तेरी मम्मी मुझ पर तबादला करवा लेने का दबाव डालने लगी थी. इधर रचना भी हमारे रिश्ते का नाम तलाशने लगी थी. मैं अब इन दोनों औरतों को नहीं संभाल पा रहा था. 2 नावों की सवारी में डूबने का खतरा लगातार बना रहता है. अब समय आ गया था किसी एक नाव में उतर जाने का.
रचना से मुझे वह मिला जो मुझे तेरी मम्मी से कभी नहीं मिल पाया था, परंतु यह भी सत्य था कि जो मुझे तेरी मम्मी के साथ रहने में मिलता वह मुझे रचना के साथ कभी नहीं मिल पाता और वह था सामाजिक सम्मान. यह सब कुछ सोच कर मैं ने तबादले के लिए आवेदन कर दिया.
‘‘तुम वापस जा रहे हो?’’
रचना को पता चल गया था, हालांकि मैं ने पूरी कोशिश की थी उस से यह बात छिपाने की. बोला, ‘‘हां. वह जाना तो था ही…’’
‘‘और मुझे बताने की जरूरत भी नहीं समझी…’’
‘‘देखो रचना मैं इस रिश्ते को खत्म करना चाहता हूं.’’
‘‘पर तुम तो कहते थे कि तुम मुझ से प्रेम करते हो?’’
‘‘हां करता था, परंतु अब…’’
‘‘अब नहीं करते?’’
‘‘तब मैं होश में नहीं था, अब हूं.’’
‘‘तुम कहते थे तुमहारी पत्नी मान जाएगी… तुम मुझ से भी शादी करोगे… अब क्या हो गया?’’
‘‘तुम पागल हो गई हो क्या? एक पत्नी के रहते क्या मैं दूसरी शादी कर सकता हूं?’’
‘‘मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी? क्या जो हमारे बीच था वह महज.’’
‘‘रचना… देखो मैं ने तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं की, जो भी हुआ उस में तुम्हारी भी मरजी शामिल थी.’’
‘‘तुम मुझे छोड़ने का निर्णय ले रहे हो… ठीक है मैं समझ सकती हूं… तुम्हारी पत्नी है, बच्चे हैं. दुख मुझे इस बात का है कि तुम ने मुझे एक बार भी बताना जरूरी नहीं समझा. अगर मुझे पता नहीं चलता तो तुम शायद मुझे बिना बताए ही चले जाते. क्या मेरे प्रेम को इतने सम्मान की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी?’’
तुम्हें मुझ से किसी तरह की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी.’’
‘‘मतलब तुम ने मेरा इस्तेमाल किया और अब मन भर जाने पर मुझे…’’
‘‘हां किया जाओ क्या कर लोगी… मैं ने मजा किया तो क्या तुम ने नहीं किया? पूरी कीमत चुकाई है मैं ने. बताऊं तुम्हें कितना खर्चा किया है मैं ने तुम्हारे ऊपर?’’
कितना नीचे गिर गया था मैं… कैसे बोल गया था मैं वह सब. यह मैं भी जानता था कि रचना ने कभी खुद पर या अपने बच्चों पर ज्यादा खर्च नहीं करने दिया था. उस के अकेलेपन को भरने का दिखावा करते करते मैं ने उसी का फायदा उठा लिया था.
‘‘मैं तुम्हें बताऊंगी कि मैं क्या कर सकती हूं… आज जो तुम ने मेरे साथ किया है वह किसी और लड़की के साथ न करो, इस के लिए तुम्हें सजा मिलनी जरूरी है… तुम जैसा इनसान कभी नहीं सुधरेगा… मुझे शर्म आ रही है कि मैं ने तुम से प्यार किया.’’
उस के बाद रचना ने मुझ पर मेरे सीनियर को एक हरेशमेंट का शिकायती आवेदन दिया.
पूरा महल्ला / ऑफिस रचना पर थूथू कर रहा था. वैसे भी हमारा समाज कमजोर को हमेशा दबाता रहा है… फिर एक अकेली, जवान विधवा के चरित्र पर उंगली उठाना बहुत आसान था. उन सभी लोगों ने रचना के खिलाफ सीनियर को शिकायते दी जिन के प्रस्ताव को उस ने कभी न कभी ठुकराया था.
बेहस् में रचना हार गई थी. सीनियर ने उस पर मुझे बदनाम करने का इलजाम लगाया. अपने शरीर को स्वयं परपुरुष को सौंपने वाली स्त्री सही कैसे हो सकती थी और वह भी तब जब वह गरीब हो?
रचना के पास न शक्ति बची थी और न पैसे, जो वह केस पुलिस थाने या कोर्ट ले जाती. उस शहर में भी उस का कुछ नहीं बचा था. अपने बेटों को ले कर वह शहर छोड़ कर चली गई. जिस दिन वह जा रही थी मुझ से मिलने आई थी.
‘‘आज जो भी मेरे साथ हुआ है वह एक मृगतृष्णा के पीछे भागने की सजा है. मुझे तो मेरी मूर्खता की सजा मिल गई है और मैं जा रही हूं, परंतु तुम से एक ही प्रार्थना है कि अपने इस फरेब की विरासत अपने बेटे में मत बांटना.’’
मैने भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने दिल पर पथतर रख कर एक सही निर्णय लिया जिसका नतीजा आज तुम देख ही रहे हो। बेटा अरुण मै तेरी मम्मी को ये सब खुल कर बता तो नही सकता था लेकिन उनसे माफी तो मांग सकता था और मैने उनसे माफी मांगी और उन्होंने मुझे माफ कर दिया और आज हम सब कितने खुश है।
पापा अपनी आँखों में आँसू भर कर बोले बेटा पत्नी की दूरियाँ कभी कभी मजबूरी में किस के साथ कब नजदीकियां बन जाये पता नही चलता है….. इसलिए तुम अब बहू की गैर मौजूदगी में जो भी निर्णय लेना बहुत सोच समझ कर लेना मै सिर्फ अपनी जिंदगी की पुरानी कहानी बता कर यही समझाने की कोशिश कर रहा हूँ…. .अंततः पापा खामोश हो गये।
पापा की कहानी सुनकर मै मन ही मन सोच रहा था पापा कह तो सही रहे है लेकिन एक सच रचना ने कहा था कि “”अपने फरेब की विरासत अपने बेटे में मत बांटना… लेकिन पापा फरेब की विरासत आपकी पत्नी और बेटे में बंट चुकी है.””
“”पापा ने मम्मी से माफी मांग कर अपना पल्ला झाड़ लिया था और खुश है, उसका दूसरा रूप मैने अभी कुछ दिनों में देखा है, मम्मी की वो इच्छा, काम वासना, उनके जिस्म की गर्मी, हवस की भूख को मैने महसूस किया है। “”
“”मै पापा की खुश फेहमी कि मम्मी बहुत खुश है, पापा के चेहरे की ख़ुशी को देखकर कुछ नही बोला और ना ही मै उन्हें शर्मिंदा करना चाहता था।””
अरुण बेटा क्या सोच रहे हो जो भी कहना सुनना है बेझिझक बोल सकते हो। तुम भी शादीशुदा एक बेटी के बाप हो तो फिर अपने बाप से इतना क्यों शर्मा रहे हो…?????
मैने आखिर अपने दिल की बात कहने का फैसला लिया और पापा से बोला अगर आप समझ पाये तो एक बात पूछना चाहता हू। हालांकि ये बात एक बेटे के लिए अपनी माँ के बारे में अपने बाप से पूछना कितनी सही है या गलत ये मै नही जानता लेकिन आप इजाजत दे तो पूछूँ…..????
पापा– पूछो बिना झिझके बेटा।
पापा अगर आप मम्मी को किसी के साथ……. आप समझ रहे है ना मै क्या कहना चाहता हूँ।
पापा समझ गये एक लंबी सांस लेते हुए बोले………
पहली बात तो ऐसा होना संभव नहीं है। लेकिन फिर भी यदि ऐसा कभी हो जाए तो पहले तो यह जानने की कोशिश करूँगा कहीं उसके साथ बलात्कार तो नहीं हो रहा? यदि ऐसा कुछ समझ आता है तो ऐसा करने वाले पर हमला कर सकता हूँ बिना परवाह किए कि वह मरे या बचे।
और यदि यह स्पष्टतयः समझ आ रहा हो कि वह स्वेच्छा से यह काम कर रही है, तो उसे उस वक्त डिस्टर्ब नहीं करूँगा। केवल दूर से देखूँगा। उसके आनंद को, उसके सुख को, महसूस करने का प्रयास करूँगा। सामने अपनी पत्नी को इस तरह देखकर मन में शायद कुछ जलन भी हो, लेकिन उस पर क्रोध नहीं आएगा, प्रेम ही आएगा।
मेरी पत्नी क्या खाए यह उसकी स्वतंत्रता है, क्या पहने यह भी उसकी स्वतंत्रता है, कहाँ जाए, किससे मिले, किसके साथ क्या करे यह भी उसकी स्वतंत्रता है। मेरी पत्नी मेरी सम्पत्ति तो नहीं है, मेरी गुलाम भी नहीं कि केवल वही करे जो मैं चाहूँ।
हाँ मेरी पत्नी इस स्वतंत्रता के साथ वह मुझसे बहुत प्रेम करती है। एक बार उसके मन में किसी के साथ ऐसा करने की इच्छा जताई थी, मैंने उसी क्षण उसे गले लगा, लिया बहुत प्यार से उसे कहा कि वह उसकी आजादी है, यदि कोई उसे बहुत अच्छा लगा और उसके साथ कुछ करने की इच्छा जागी तो मैं उसे नहीं रोकूँगा। उसने कुछ दिन उससे बातचीत जरूर की लेकिन बातचीत से आगे नहीं बढ़ी। कहीं मिलने का प्लान बन रहा था लेकिन वह नहीं गई।
आखिर पुरुष अपनी पत्नी को सम्पत्ति क्यों समझता है, इंसान क्यों नहीं? जिसकी अपनी इच्छाएँ भी हो सकती हैं। उसने कोई एक इच्छा पूरी कर ली तो क्या बिगड़ गया? उसका आनंद पति क्यों नहीं महसूस कर पाता? उसके आनंद में भयानक पीड़ा क्यों हो जाती है?
अरुण बेटा तुझे पता है बहू कुसुम ने दूसरे शहर में नौकरी की बात बताई थी तो मैने तुरंत उसको इजाजत दे दी थी इसका कारण मै तुम्हे बताता हूँ अक्सर जिन मर्दों के खुद के चरित्र खराब होते है वो हमेशा से अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करते है और यही शक करने की वजह से वो अपनी पत्नी को नौकरी करने से, आगे बढ़ने से, उन्हें खुल कर जीने से रोकते है या जलते हैं। मेरी बात हमेशा याद रखना कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है, तेरी बीवी कुसुम और मेरी बहू बहुत होनहार है उसकी तरक्की में कभी रोड़ा या टांग मत अड़ाना। उसे अपने सपने पूरे कर लेने दो।
जारी है………

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