जैसा की अभी तक आपने पढा सुमन दीदी अपनी उँगली व जुबान से मैने ऐसे ही दो बार रसखलित करवा दिया था जिससे वो एकदम निढाल होकर बदहवास हो गयी थी।
सुमन दीदी अब गिरने ही वाली थी की मैंने उठकर उन्हे सहारा देकर थाम लिया। सुमन दीदी ने भी बदहवास सो होकर अब मेरे ऊपर अपने शरीर का पूरा भार डाल दिया था इसलिये उनकी इस बदहवासी का फायदा उठाकर मै उन्हे अपने बिस्तर पर ले आया।
सुमन दीदी को बिस्तर पर लाकर मैने पहले तो उनके पैरों में फंसी सलवार व पेंटी को उतार कर उन्हे नीचे से पुरा नँगा किया। फिर खुद भी अपने सारे कपङे उतारकर पुरा नँगा हो गया….
नँगा होकर एक बार फिर से मैने अब धीरे धीरे सुमन दीदी के गालों पर चूमना शुरू कर दिया..मेरे चुमने से सुमन दीदी के बदन में पहले तो हल्की चेतना सी आई, फिर अचानक से उठकर वो बिस्तर पर बैठ गयी..
तभी शायद उन्हे अपनी नंगी अवस्था का अहसास भी हुवा, जिससे वो अब अपने कपड़े तलाश करने के लिये बिस्तर पर जल्दी जल्दी इधर उधर अपना हाथ चलाने लगी…
अब सुमन दीदी के कपड़े मुझे ही नहीं पता था की उतारकर मैंने कहाँ फैँक दिये थे, उपर से ड्राईंगरूम में इतना अन्धेरा था की हाथ तक दिखाई नहीं दे रहा था फिर सुमन दीदी को उनके कपड़े आसानी से कैसे मिल जाते..?
सुमन दीदी अन्धेरे में ऐसे ही बिस्तर अपना हाथ चला रही थी की तभी उनका एक हाथ अब मेरे उत्तेजित लण्ड आ पर लगा…
सुमन दीदी का मेरे मेरे लण्ड पर हाथ लगना.. अब मेरे लिये तो ये काफी सुखद था मगर सुमन दीदी ने अपने हाथ को ऐसे झटका जैसे की उन्होने कोई बिजली की तार को ही छू लिया हो…
शरम के मारे उन्होंने अब तुरन्त बिस्तर पर हाथ चलाना बन्द कर दिया और अपने हाथो को समेटकर मुझसे दूर होकर बैठ गयी।
सुमन दीदी को पता था की मै उन्हें पहचान रहा हुँ और उनके साथ ये सब जानबूझकर किया है मगर फिर भी वो कुछ बोल नहीं रही थी। वो अभी भी वैसे ही शर्मा रही थी या फिर पता नही डर रही थी।
अन्धेरे में कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था बस सुमन दीदी का साया ही नजर आ रहा था जो की मुझसे अब थोड़ी सी दूर होकर बिस्तर पर बैठी हुई थी।
वो ना तो कुछ बोल नहीं रही थी और ना ही कोई हरकत कर रही थी, बस चुपचाप बैठी हुई थी।
अब काफी देर तक भी सुमन दीदी ऐसे ही बैठी रही तो मैं ही धीरे से खिसक कर उनके पास हो गया…
सुमन दीदी के नजदीक होकर मैने अब पहले तो उनका हाथ पकड़कर थोड़ा सा अपनी तरफ खींचा, फिर धीरे से उन्हे अपनी बाँहों में भर कर बिस्तर पर लुढ़क गया।
सुमन दीदी अब मेरे ऊपर थी और मैं उनके नीचे। मेरे शरीर पर तो कोई कपड़ा था ही नही, सुमन दीदी भी नीचे से बिल्कुल नंगी थी। इसलिये उनकी नर्म मुलायम जाँघो को अब मेरा उत्तेजित लण्ड ने सीधा अपनी कठोरता का अहसास करवाया….
किसी लोहे ही राङ की तरह तपते मेरे उत्तेजित लण्ड का स्पर्श होते ही सुमन दीदी अब थरथरा सी गयी। वो एक बार तो मेरे उपर आई फिर हल्का सा कसमसाकर तुरन्त मुझ पर से नीचे उतर गयी।
वैसे तो वो शायद अब बिस्तर पर से ही उठने की कोशिश कर रही थी। मगर तब तक मैंने उन्हे फिर से पकङकर अब अपनी बगल में खींच लिया और अपने एक पैर व शरीर के भार से दबाकर अपने होठो को सीधा उनके होठो से जोङ दिया…
सुमन दीदी अब भी कुछ बोल नही रही थी। बस पहले के जैसे ही कसमसा ही रही थी इसलिये होठो को चुशते चुशते ही मैने अपना एक हाथ भी अब फिर से उनकी नँगी चुत की तरफ बढा दिया…
मगर इस बार मेरा हाथ सुमन दीदी की चुत तक पहुँचने से पहले ही उन्होने अपनी जाँघो को जोरो से भीच लिया.. सुमन दीदी ने अपनी चुत का रास्ता तो बन्द कर दिया था इसलिये मैने अब उनकी चुँचियो के रास्ते आगे बढ़ने की सोची..
वैसे भी मैने सुमन दीदी की चुँचियो को बस रगङा, मसला ही था पर अभी तक उनसे प्यार नही किया था। इसलिये सुमन दीदी की चुँचियो से प्यार करने के लिये मै अब उनके होठो को छोङकर थोङा सा नीचे उनकी चुँचियो पर आ गया…
नीचे होकर मैने अब पहले तो ऐसे ही दोनो चुँचियो पर मुँह सा मारा फिर उनके सुट के निचले सिरे को पकड़कर उसे धीरे धीरे ऊपर उठाना शुरु कर दिया…
जैसे की मैने पहले ही बताया था सुमन दीदी यहाँ कपङे लेकर नही आई थी इसलिये वो मेरी भाभी के ही कपङे पहनती थी जो की उन पर थोङा ढीले पङते थे।
सुट ढीला ही था इसलिये वो आसानी से चूचियों के ऊपर तक उठता चला गया। उनकी ब्रा को तो मैने पहले ही उपर उठा रखा था इसलिये सुट के उपर होते ही मेरा मुँह अब सीधा नँगी चूचियाँ पर जा लगा…
हल्की पसीने और सुमन दीदी के बदन की सौँधी सौँधी सी महक आ रही थी उनकी चुँचियो से। वैसे अन्धेरे मे कुछ दिखाई तो नही दे रहा था मगर सुमन दीदी की साँसो के साथ उपर नीचे होती चुँचियाँ मेरी अब गर्म गर्म साँसें के गीरने से और भी जोरो से उपर नीचे होना शुरू हो गयी थी…
सुमन दीदी की एक चुँची को मैने अब पहले तो हाथ से दुलार कर उसे प्यार से सहलाया… फिर होंठों से उसके एक निप्पल को हल्के से छू सा लिया
मेरे गर्म गर्म होठो के स्पर्श से सुमन दीदी के जिस्म में अब एक तनाव सा पैदा हो गया था इसलिये उन्होंने हल्का सा कसमसाकर अपने बदन को कङा कर लिया…
मगर मैं अब रूका नहीं, मैने होंठों से उसके निप्पल को एक बार तो चूम ही लिया जिससे सुमन दीदी के पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई जिसे मैंने भी स्पष्ट महसूस किया।
मैंने सुमन दीदी के निप्पल को बस अब एक बार ही चूमा फिर धीरे से अपनी ज़ीभ को बाहर निकाल कर उसको ज़ीभ से सहलाना शुरु कर दिया..
अब जैसे जैसे मेरी ज़ीभ उसके नर्म निप्पल को सहलाने लगी, वैसे वैसे ही सुमन दीदी के बदन में बेचैनी सी होना शुरु हो गयी…
वैसे भी सुमन दीदी कुँवारी थी और उसके साथ ये सब कुछ पहली बार हो रहा था इसलिये अपने बदन के साथ हो रही इस छेड़-छाड़ को वो बर्दाश्त तो नहीं कर पा रही थी मगर शर्म के कारण कुछ बोल भी नहीं पा रही थी।
मै भी अब कुछ देर तो ऐसे ही निप्पल से छेङछाङ करता रहा। फिर आहिस्ता से उसे अपने मुँह मे भरकर जोरो से चुश भी लिया। जिससे चुँची की चिकनाई मेरे मुँह मे अब घुलती चली गयी और सुमन दीदी के मुँह से एक हल्की आह्ह्ह.. सी निकल गयी।
सुमन दीदी मेरा विरोध नहीं कर रही थी वो बस मेरी हरकतों से बचने का प्रयास कर रही थी इसलिये मै दोनो चुँचियो को बारी बारी से एक हाथ से मिचता तो दुसरी को चुसता चला गया जिससे दोनो चुँचियो के निप्पल तन कर एकदम कङे होते चले गये।
सुमन दीदी की चुँचियो को पीते पीते मै अपना एक हाथ अब फिर से उनकी चुत पर भी ले आया था।
उन्होने अब भी जाँघो को भीँचा हुव था मगर मैने अब हाथ का दबाव बनया तो सुमन दीदी ने भी हल्का सा जाँघो को खोल दिया..
सुमन दीदी की चुँचियो को पीते पीते मेरा एक हाथ अब उनकी चूँची को मसल रहा था तो दूसरा उनकी जांघों के बीच उनकी चुत को भी रगङने लगा…
इस दोहरे तीहरे हमले को सुमन दीदी अब ज्यादा देर तक सहन नहीं कर सकी और जल्दी ही उसकी फिर से सांसें गर्म व गहरी होती चली गयी.. चूँचियों के निप्पल तन कर अब पत्थर हो गये तो जांघो का दयरा भी बढ गया..
सुमन दीदी अब फिर से उत्तेजित होने लगी थी इसलिये मैने भी देर ना करते उनकी चुँचियो को तो छोङ दिया और धीरे से उठकर एक बार फिर से अपने प्यासे होंठों को उनकी गीली चुत के होठो से जोङ दिया….
सुमन दीदी तो अब अपने पैरों को समेटकर दोहरी ही हो गई और “इईईई…श्शशश… अआआ… हहहह…” की आवाज निकालते हुवे मेरे सिर को दोनों जांघों के बीच कस के दबा लिया….
हालांकि सुमन दीदी ने अब एक बार तो मेरे सिर को पकड़ने का प्रयास भी किया था मगर तब तक उनकी चुत पर सेन्ध लग गयी थी।
मेरे होंठों ने उनकी चुत की कोमल फांकों को चूमना शुरू कर दिया था इसलिये सुमन दीदी का ये प्रयास हल्का पड़ गया और वो बस अब कसमसाकर रह गई।
मैंने भी अब सुमन दीदी की चुत को एक दो बार तो चुमा। फिर जीभ निकालकर चुत की फाँको के अन्दर के भाग को चाटना शुरु कर दिया जिससे कुछ ही देर मे वो एक बार फिर कामरश से भर आई और धीरे धीरे अपने आप ही सुमन दीदी की जांघें अब फैलती चली गयी।
मैं भी अब खुलकर सुमन दीदी की चुत से खेलने लगा। कभी उसे होंठों से चूम लेता, तो कभी जीभ निकाल कर पूरी चुत को ही चाट लेता…!
और कभी कभी तो जीभ को नुकीला करके प्रवेश द्वार में ही घुसा देता जिससे सुमन दीदी जोर से सिसक पड़ती और नितम्बों को ऊपर हवा में उठाकर अपनी चुत को ही मेरे मुंह पे दबा देती।
तब तक बाहर भी बारीश होना सुरु हो गयी थी। इधर सुमन दीदी की चुत मेरे मुँह पर बरशकर मेरी प्यास बुझा रही थी तो उधर बाहर भी बदलो ने बरश कर जमीन की प्यास बुझानी शुरु कर दी थी।
सुमन दीदी अब पुरी तरह से उत्तेजित हो गयी थी इसलिये वो खुद ही अब अपनी चुत को मेरे मुँह पर घिसने लगी थी। सुमन दीदी तो शायद अब यही सोच रही थी की मैं पहले के जैसे उन्हे मुँह से ही रस स्खलित करवा दूँगा मगर मेरे दिमाग तो अब कुछ और ही चल रहा था…
मै अब कुछ देर तो ऐसे ही सुमन दीदी की चुत को चुश चुशकर और चाटकर उन्हे मजा देता रहा। फिर चुत को छोङकर धीरे से उनके ऊपर जाके लेट गया
मेरे अब सुमन दीदी के उपर आते ही मेरे शरीर के भार के कारण उनके मुँह से एक हल्की “ऊऊह्ह््ह्…” की आवाज तो निकली पर इसके आगे उन्होंने कुछ कहा नही। वो बस वैसे ही अपना मुँह एक तरफ किये लेटी रही।
सुमन दीदी का मखमली बदन अब मेरे नीचे था और मै उनके उपर जिससे मेरा उत्तेजित लण्ड अब सीधा सुमन दीदी की नँगी चुत को छू रहा था। मैं पहले ही काफी उत्तेजित था उपर से लण्ड पर अब नंगी चुत की गर्माहट पाकर तो मैं अपने आप में नहीं रहा…
सुमन दीदी अब अपनी चुत पर मेरे लण्ड के स्पर्श से थोङा बहुत कसमसा तो रही थी मगर मैं उन्हे ऐसे ही अपने नीचे दबाये रहा और एक हाथ से अपने लण्ड पकङकर पहले तो उसे चुत के प्रवेशद्वार पर लगाया फिर सीधा ही एक जोर से धक्का लगा दिया…
अब एक तो कुवाँरी चुत के साथ मेरा ये पहला अनुभव था उपर से सुमन दीदी भी शायद कुछ ज्यादा ही कसमसा रही थी इसलिये मेरे अब धक्का लगाते ही…
सुमन दीदी..”अआआ..हहह उम्म्ह… अहह… हय… याह… अआउऊच…करके जोरो से चीख पङी और मेरा लण्ड चुत के प्रवेश द्वार से फिसल कर सीधा उपर चुत की लाईन मे निकल गया।
सुमन दीदी की ये चीख इतनी जोरो की थी की अगर बाहर बारिश का शोर नहीं होता तो शायद उनकी ये चीख मेरे मम्मी पापा को भी सुनाई दे जाती, इसलिये मैंने अब जल्दी से एक हाथ से सुमन दीदी का मुँह दबा लिया और कुछ देर के लिये कोई हरकत नहीं की।
मुझे ये तो पता था की कुँवारी चुत सख्त होती है इसलिये पहली बार जब उसमे लण्ड प्रवेश होता है तो दर्द होता है। मगर यह नहीं पता था की उसमे लण्ड इतनी आसानी से भी नहीं जाता उपर इतना अधिक दर्द होगा की सुमन दीदी चीख ही निकल जायेगी…
खैर सुमन दीदी का मुँह मैंने दबा रखा था मगर वो अब भी गुगुँगुँ… गूँगूँगूँ… कर रही थी। इसलिये मैं अब वैसे ही उनके उपर लेटा रहा और उनकी गर्दन व गालों को फिर से चूमना चाटना शुरु कर दिया…
सुमन दीदी के गर्दन व गालो को चुमते चाटते मै अपने लण्ड को भी दूसरे हाथ से उनकी चुत के प्रवेशद्वार पर घिस रहा था जिसका असर अब सुमन दीदी पर हुवा…
मेरे लण्ड के चुत पर घीसने से सुमन दीदी अब शाँत पङ गयी थी। वैसे भी सुमन दीदी की चुत प्रेमरस से भीग कर इतनी चिकनी हो रखी थी की मेरा लण्ड अब अपने आप ही चुत की दरार में फिसल रहा था।
मेरा लण्ड चुत के उपरी छोर से लेकर नीचे चुत के प्रवेशद्वार तक चल रहा था। सुमन दीदी पहले से ही काफी उत्तेजित थी फिर मेरे अब उनकी चुत पर लण्ड के घिसने से उन्हे फिर से मझा आने लगा और उसका असर अब ये हुवा की सुमन दीदी के मुँह से फिर से हल्की-हल्की आहें सी निकलना शुरु हो गयी…
सुमन दीदी की चुत तो अब इतनी गर्म हो गयी थी मानो वो अन्दर ही अन्दर सुलग उठी हो। मुझे तो लग रहा था शायद वो फिर से रसखलन कगार पर पहुंच गयी थी क्योंकि मेरे लण्ड के साथ साथ वो अब खुद ही कमर को हिला हिलाकर अपनी चुत को मेरे लण्ड पर घीसने कोशिश सी करने लगी थी।
हालांकि कभी कभी जब लण्ड चुत की फाँको के बीच प्रवेशद्वार मे अटक जाता तो सुमन दीदी अपने बदन को कङा करके उपर की ओर उकस सी जाती मगर मुझे अब रोकने का प्रयास नही कर रही थी।
शायद वो जल्दी से जल्दी चरम पर पहुँचना चाह रही थी। इसलिये मैने अब उनके इन्हीं पलों का फायदा उठाने की सोची और एक बार फिर अपने लण्ड को चुत के मुँह पर लगाके एक जोर दार धक्का लगा दिया…
और अबकी बार… अबकी बार मुझे सफलता मिल भी गयी क्योंकि एक तो सुमन दीदी की चुत का प्रवेशद्वार कामरस से भीग कर बिल्कुल चिकना हो गया था, उपर से सुमन दीदी स्खलन के कगार पर थी जिससे उनका प्रवेशद्वार काफी फैल व सिकुड़ रहा था।
इसलिये अबकी बार मैने जैसे ही धक्का मारा मेरे लण्ड का सुपाङा सुमन दीदी की कौमार्य को भेद कर सीधा चुत में उतर ही गया…
अब सुमन दीदी के मुँह को मैंने वैसे तो एक हाथ से दबा रखा था, मगर फिर भी वो “उऊऊऊ… ह्हुहुहु… उऊऊ… उऊऊऊ… ऊऊ… उऊऊ… उऊऊऊ…” की आवाज मे जोरो से कराह उठी और दोनों हाथों से मेरी कमर को कसके पकड़ लिया।
मैने जैसा की पहले भी बताया था मेरी भाभी व रेखा भाभी के साथ मै काफी बार सम्बन्ध बना चुका था मगर किसी कुवाँरी लङकी के साथ मेरा ये पहला अनुभव था।
कुवाँरी लङकी के साथ पहली पहली बार कैसे चुदाई करते है उस समय मुझे बिल्कुल भी नही पता था। वो कहते है ना “अनाङी को चोदना मतलब चुत का सत्यानाश” वो ही हाल कुछ मेरा था। इसलिये सुमन दीदी का ध्यान किये बैगर ही मैंने अब उसी हालत में एक धक्का और लगा दिया….
वैसे अब ज्यादा तो नहीं मगर फिर भी लगभग मेरा एक चौथाई लण्ड सुमन दीदी की चुत में समा गया था जिससे वो जोरो से छटपटा उठी। उनके दोनों हाथ अब मेरी कमर में जैसे धंस से गये और उन्होने मुझे जोरो से पीछे की तरफ धकेलना शुरु कर दिया…
सुमन दीदी के धकेलने से अब एक बार तो मैंने भी अपने लण्ड को थोड़ा सा बाहर खींच लिया जिससे उन्हे कुछ राहत मिल गयी, उनके हाथों की पकड़ भी कुछ हल्की हो गयी थी मगर लण्ड के पूरा बाहर निकलने से पहले ही मैंने अब फिर से एक जोरदार धक्का लगा दिया…
इस बार मेरा आधे से ज्यादा लण्ड सुमन दीदी की चुत में उतर गया था जिससे वो अब जोरो से “उऊऊऊ… हहूहूहूहू… अँगुगुगु… गूऊगूऊगूऊऊ… करके बुरी तरह छटपटाने लगी।
सही में सुमन दीदी की कुंवारी चुत इतनी तंग व सख्त थी की मुझे तो ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरे लण्ड को किसी ने अपनी पूरी ताकत से मुट्ठी में भींच लिया हो..मेरा लण्ड सुमन दीदी की सँकरी गुफा मे फँस सा गया था जिससे मुझे भी अपने लण्ड के सुपाङे में दर्द का अनुभव हो रहा था।
मुझे अपने लण्ड के पास व जांघों पर काफी गीलापन सा भी महसूस हो रहा था। उस समय तो मैं ये ही समझ रहा था की ये सुमन दीदी की चुत का रस होगा मगर बाद में मुझे पता चला की ये चुतरस नही बल्कि सुमन दीदी का कौमार्य था जो टूट कर खून के रूप में बह रहा था।
सुमन दीदी की छटपटाहट देखकर मुझे उन पर तरस तो आ रहा था मगर ये सब उन्हे कभी ना कभी तो सहना ही था। सुमन दीदी बुरी तरह से छटपटा रही थी इसलिये मैंने अब अपने लण्ड को ज्यादा घुसाने की कोशिश नहीं की मगर जितना मेरा लण्ड चुत में घुसा हुवा था, मैंने उतनी ही दूरी के धीरे धीरे धक्के लगाने शुरु कर दिये जिससे सुमन और भी ज्यादा छटपटाने लगी।
धक्के लगाते हुवे ही मै अब सुमन दीदी के गालों को चूम चाट कर और हाथ से उनके बदन को सहलाकर उन्हे सांत्वना भी देने की कोशिश कर रहा था मगर फिर भी सुमन काफी छटपटा रही थी और मुझे रोकने की अपनी पूरी कोशिश कर रही थी।
सुमन दीदी ने मेरी कमर को भी अपनी पूरी ताकत से पकड़ रखा था ताकि मैं धक्के ना लगा सकूँ मगर फिर भी मै अपने कुल्हो को ही धीरे धीरे उपर नीचे करके धक्के लगाता रहा जिससे कुछ ही देर में मेरे लण्ड ने धीरे धीरे करके उनकी संकरी चुत में अपनी जगह बना ली।
सुमन दीदी का दर्द भी अब कुछ कम हो गया था इसलिये वो कुछ शांत पड़ने लगी। सुमन दीदी के कुछ शांत होने पर मैंने अब अपना हाथ उनके मुँह से हटा लिया और उसकी जगह उनके होंठों को अपने मुँह में भरकर बन्द कर उनका मुँह फिर से बन्द कर दिया…
सुमन दीदी ने अपनी गर्दन हिला कर होंठों को छुड़ाने की कोशिश तो की मगर मैंने जिस हाथ से उनके मुँह को दबा रखा था, उसी हाथ से उनके सिर को पकड़कर अब अपनी जीभ को भी उनके होंठों के बीच घुसा दिया…
सुमन दीदी अब फिर से कसमसाने लगी थी। दर्द के मारे उन्होने अपने दाँत भीँच रखे थे मगर उनके होठो को चुशते चाटते मैने अपनी जीभ को उनके मुँह मे अब ठेले रखा..
कुछ देर ऐसे ही मै सुमन दीदी के होंठों को चूमता चाटता रहा, साथ ही दूसरे हाथ से उनके बदन को भी सहलाता रहा जिससे धीरे धीरे सुमन दीदी का यौन तन्त्र भी प्रभावित हो गया और दर्द की अवहेलना करके वो फिर से उत्तेजित होने लगी।
मेरा अब वो इतना विरोध नहीं कर रही थी बस थोड़ा बहुत कसमसा ही रही थी, फिर कुछ देर बाद तो वो भी बन्द हो गया और उन्होने अपने बदन को ढीला छोड़ दिया।
सुमन दीदी को शायद अब मजा आने लगा था क्योंकि उनकी सांसें अब फिर से गर्म व गहरी होने लगी थी। उनके जो हाथ अभी तक मेरी कमर को पकड़े हुए थे वो भी अब मेरी पीठ पर आ गये थे और धीरे धीरे मेरी पीठ पर रेंगने से लगे थे।
सुमन दीदी को देख मैंने भी अब अपने धक्कों की गति को थोड़ा सा बढ़ा दिया जिससे उनके मुँह से अब हल्की हल्की कराहे सी फ़ूटना शुरु हो गयी और नीचे से उनके नितम्बो ने भी हल्की हल्की झुम्बीस सी करनी शुरु कर दी…
सुमन दीदी अब पुरी तरह से उत्तेजित हो गयी थी क्योंकि पहली बार, अब पहली बार वो मेरी जीभ को भी हल्का हल्का अपने होंठों के बीच दबाने लगी थी।
मैंने भी अब अपनी जीभ को थोड़ा जोर से उनके मुँह में दबा दिया जिससे सुमन दीदी पहले तो हल्का सा कसमसाई मगर फिर धीरे से उसने भी अपने दाँतो को खोल दिया..
अब मै तो था ही इस मौके की फिराक मर, मैने भी अपनी पुरी जुबान उने मुँह मे उतार दिया जिसे सुमन दीदी ने भी अब कभी कभी हल्का हल्का सा चूसना शुरु कर दिया…
सुमन दी ने अपनी टांगो को भी अब उपर उठाकर मेरे पैरों पर रख लिया था और मेरे साथ साथ ही वो भी अपनी कमर को धीरे धीरे हिलाने लगी थी। अब सुमन दीदी को मजा लेते देख मैने भी धीरे धीरे अपने धक्कों की गति के साथ साथ उनका माप बढ़ा दिया..
मेरा आधे से ज्यादा लण्ड सुमन दीदी की चुत में तो था मगर अभी भी एक चौथाई बाहर था इसलिये प्रत्येक धक्के के साथ मै अब धीरे धीरे उसे भी अन्दर घुसाने लगा…
अब हर बार मेरा लण्ड पूरा बाहर आता और पूरे वेग से अन्दर प्रविष्ट होता। और हर प्रहार में पिछली बार के मुकाबले अब ज़्यादा अन्दर जा रहा था जिससे मेरे हर एक धक्के के साथ सुमन दीदी भी अब उऊऊ… हूहूहूहू… उऊऊ… हूहूहूहूहू… करने लगी…
वैसे तो इतनी देर में मेरा लण्ड सुमन दीदी की चुत में पूर्णतया घर कर गया होता पर सुमन दीदी की नयी नवेली चुत बहुत अधिक तंग थी जो की मेरे लण्ड को कुछ ज्यादा ही घर्षण प्रदान कर रही थी, मगर इस घर्षण से उस समय मुझे जो मजा मिल रहा था उस आनन्द की कोई सीमा नहीं थी।
सुमन दीदी भी अब खुलकर मेरा साथ दे रही थी। क्योंकि उन्होने अपनी टांगों से मेरी दोनो जाँघो को घेरकर मेरे धक्को की ताल से ताल मिला ली थी और मुँह से अद्भुत आवाजें निकालकर मेरा जोश बढाये जा थी।
सुमन दी के मुँह को मैंने अपनी जीभ व होंठों से बन्द कर रखा था मगर फिर भी वो “उहऊऊ… उहऊऊ… उहऊऊ… उहूऊ…” करके जोर से कुहक सी रही थी और उनकी इस कुहक से वो पूरा कमरा अब गुँज सा रहा था।
सुमन दीदी की सांसें भी काफी तेज हो गई थी तो उन्होने मेरे होंठों व जीभ को भी अब जोरो से चुसना चाटना शुरु कर दिया था। अब सुमन दीदी का साथ पाकर मैंने भी अपना पौरुष दिखाने की सोची और अपने धक्को की गति को और भी तेज कर दिया..
मैने अब अपनी पुरी तेजी व ताकत से धक्के लगाने शुरु कर दिये थे जिससे मेरे साथ साथ अब सुमन दीदी ने भी तेजी से अपने कूल्हे उचकाने शुरु कर दिये, एक निश्चित लय और ताल के साथ हम दोनों ही ये धक्कमपेल कर रहे थे जैसे हम दोनों में कोई होड़ सी मच गयी हो…
बाहर बारिश से मौसम सर्द हो गया था मगर फिर भी हम दोनों के शरीर पसीने से भीग गये थे। हमारी सांसें भी अब फ़ूल आई थी मगर फिर भी हम दोनो मे से कोई भी हार मानने को जैसे तैयार नही था…
सुमन दीदी का तो मैने पहले भी दो बार रसखलित करवा दिया था इसलिये उसकी मंजिल अभी दुर थी मगर मेरा आत्म नियंत्रण अब अपनी सीमा के समीप पहुँच रहा था।
मैने अपने आप को बहुत देर से संभाला हुआ था मगर अपने स्खलन के पहले मैं अब सुमन दीदी को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाना चाह रहा था इसलिये तेजी से धक्के लगाते हुवे मैंने अब अपने दोनों हाथों से उसके संवेदनशील अंगों को भी रगड़ना मसलना शुरु कर दिया…
मैं अपने दोनों हाथ सुमन दीदी के कुल्हो पर ले आया और उन्हें कूल्हों के नीचे से घुसाकर सुमन दीदी को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया। अब तेजी से धक्के लगाते हुए मैं सुमन दीदी के कूल्हों को भी मसल रहा था, साथ ही नीचे से उनके गुदा द्वार को भी उंगलियों से सहलाने लगा।
अब तो सुमन दीदी जैसे पागल ही हो गयी। क्योंकि मेरे साथ जोरों से अपने कूल्हे उचकाते हुवे वो अब मेरी जीभ व होंठों को नोचने काटने लगी… और फिर कुछ ही देर बाद अचानक उनका पुरा बदन थरथरा गया…
वो अब बड़ी ही जोर जोर से…..
“इईई…श्श्श… अआआ… ह्हहाहाँ…
इईईई… श्शश्श…अआआ… ह्हहाहाँहा….
इईईई… श्शशश… अअआआ… ह्हहाहाँहा….”
की किलकारियां सी मारते हुवे बेल की तरह मुझसे लिपटती चली गयी और उनकी चुत से एक धारा सी फूटी जो की मेरे लण्ड को नहलाती चली गयी…
अब कुछ देर ऐसे ही सुमन दीदी मुझसे लिपटे लिपटे अपनी चुतरस से मेरे लण्ड को प्यार की सेक देती रही। फिर जब उनका सार प्रेमरश खत्म हो गया तो धम्म से बिस्तर पर ऐसे गिर गयी जैसे की वो मूर्छित हो गयी हो।
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सुमन दीदी का ये कामोन्माद देख कर अब मेरा नियंत्रण भी टूट गया और तीन चार संपूर्ण वार के साथ ही मैंने भी मोक्ष की प्राप्ति कर ही ली। मैने एक “आह्ह्..” के साथ अब अपनी सारी कामनाएं सुमन दीदी की चुत में ही उड़ेल दी और फिर थक कर खुद भी उनके उपर ही गिर गया।
काफी देर तक हम दोनों अब ऐसे ही पड़े रहे फिर धीरे धीरे सुमन दीदी में हल्की सी चेतना आई, उन्होने दोनों हाथों से धकेल कर पहले तो मुझे अपने ऊपर से नीचे गिराया फिर उठ कर बिस्तर पर बैठ गयी।
मैं समझ गया की सुमन दी को अब क्या चाहिये..? अन्धेरे में कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था मगर फिर भी धीरे धीरे हाथों की सहायता से मैं अलमारी तक पहुंचा और टॉर्च निकाल कर जला ली।
टॉर्च की रोशनी होते ही सुमन दीदी जल्दी से अपने हाथ पैर समेट कर बैठ गई मगर फिर भी उनकी हालत स्पष्ट नजर आ रही थी, उसकी दोनों जांघें खून से लथपथ थी तो बिस्तर पर भी काफी खून गिरा हुआ था।
खैर टॉर्च की सहायता से मैंने अब सुमन दीदी के कपड़े तलाश कर उन्हे दे दिये। अब कपङे मिलने पर भी सुमन दीदी ने उन्हा पहना नही। वो उन्हे पहने की बजाय वही लेकर बैठ गयी…
मैंने अब उनसे पूछा तो, उन्होने कुछ बताया तो नहीं मगर मेरे हाथ से उस टॉर्च को छिनकर उसे बन्द करके रख दिया.. टाॅर्च के बन्द होते ही सुमन दीदी ने अब जल्दी से अपने कपङे पहने और चुपचाप बाहर चली गयी।
शायद वो नंगी थी इसलिये शरमा रही थी। खैर सुमन दीदी जाने के बाद मैने भी अपने कपङे पहने और सो गया।
अब इसके बाद तो सुमन दीदी जब तक हमारे घर में रही तब तक मैंने काफी बार उनसे सम्बन्ध बनाये।पहले तो एक दो बार उन्होने मना किया मगर फिर बाद मे तो वो खुद ही मौका पाकर मेरे पास आ जाती। इसमे मेरी भाभी ने हमारा बहुत साथ दिया।
मेरा व सुमन का रिश्ता इतना गहरा हो गया था की सुमन दीदी जब वापस गाँव जाने लगी तो जोर से रो पड़ी, हालत तो मेरी भी कुछ ऐसी ही थी मगर…?
समाप्त !!
