अपडेट…………..《 07 》
अब तक,,,,,
विराज के मोबाइल पर किसी का काॅल आया। उसने मोबाईल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा तो होठों पर एक अजीब सी मुस्कान उभर आई।
“मैं आ गया हूॅ।” विराज ने कहा__”और अब मैं तैयार हूॅ उस काम के लिए, बोलो कहाॅ मिलना है?””
“__________________”
“ठीक है फिर।” विराज ने कहा और फोन काट दिया। ‘अजय सिंह बघेल अब अपनी बरबादी के दिन गिनने शुरू कर दे क्योकि अब विराज दि ग्रेट का क़हर तुम पर और तुमसे जुड़ी हर चीज़ पर टूटेगा’
अब आगे……..
उस ब्यक्ति का नाम जगदीश ओबराय था। ऊम्र यही कोई पचपन(55) के आसपास की। सिर के नब्बे प्रतिशत बाल सिर से गायब थे। शरीर भारी भरकम था उसका किन्तु उसे मोटा नही कह सकते थे क्योकि कद की लम्बाई के हिसाब से उसका शरीर औसतन ठीक नजर आता था। भारी भरकम शरीर पर कीमती कपड़े थे। गले में सोने की मोटी सी चैन तथा दाएं हाॅथ की चार उॅगलियों में कीमती नगों से जड़ी हुई सोने की अॅगूठियाॅ। इसी से उसकी आर्थिक स्थित का अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह निहायत ही कोई रुपये पैसे वाला रईश ब्यक्ति था।
“तो तुम तैयार हो बरखुर्दार?” जगदीश ओबराय ने कीमती मेज के उस पार कीमती सोफे पर बैठे विराज की तरफ एक गहरी साॅस लेते हुए पूछा।
“जी बिलकुल सर।” विराज ने सपाट स्वर में कहा।
“तुम हमें सर की जगह अंकल कह सकते हो विराज बेटे।” जगदीश ने अपनेपन से कहा__”वैसे भी हम तुम्हें अपने बेटे की तरह ही मानते हैं। बल्कि ये कहें तो ज्यादा अच्छा होगा कि तुम हमारे लिए हमारे बेटे ही हो।”
“आप मुझे अपना समझते हैं ये बहुत बड़ी बात है अंकल।”विराज ने गंभीर होकर कहा__”वर्ना अपने कैसे होते हैं ये मुझसे बेहतर कौन जानता होगा?”
“इस युग में कोई किसी का नहीं होता बेटे।” जगदीश ने कहा__”हर इंसान अपने मतलब के लिए रिश्ते बनाता है और रिश्तों को तोड़ता है। हम भी इसी युग में हैं इस लिए हमने भी अपने मतलब के लिए तुमसे एक रिश्ता बना लिया। ये आज के युग की सच्चाई है बेटे।”
“आपके मतलबीपन में एक अच्छाई है अंकल।”विराज ने कहा__”आप अपने मतलबीपन में किसी का अहित नहीं करते हैं और न ही किसी को तकलीफ देकर खुद के लिए कोई खुशी हासिल करते हैं।”
“ये तुम्हारा नज़रिया है बेटा।” जगदीश ने कहा__”जो तुम हमारे बारे में ऐसा बोल रहे हो। मगर सोचो सच्चाई तो कुछ और ही है, हम जो करते हैं उससे भी तो सामने वाले को तकलीफ होती है फिर भले ही वह खुद कोई देश समाज के लिए किसी अभिशाप से कम न हो।”
“बुरे लोगों को मार कर या उन्हें तकलीफ देकर अच्छे लोगों को खुशिया देना कोई अपराध तो नहीं है।”विराज ने कहा।
“ख़ैर, छोड़ो इन बातों को।” जगदीश ने पहलू बदला__”हम अपने मुख्य विषय पर बात करते हैं।”
“जी अंकल।” विराज ने अदब से कहा।
“हमने सारे कागजात तैयार करवा दिये हैं बेटे।” जगदीश ने बड़ी सी मेज पर रखे अपने एक छोटे से ब्रीफकेस को खोलते हुए कहा__”तुम एक बार खुद देख लो। फिर हम आगे की बात करेंगे।”
“इसकी क्या जरूरत थी अंकल।” विराज ने कहा।
“जरूरत थी बेटे।” जगदीश ने कहा__”इतने बड़े बिजनेस एम्पायर को हमारे बाद सम्हालने वाला हमारा अपना कोई नहीं है। तुम तो सब जानते हो कि एक हादसे ने हमारा सब कुछ तबाह कर दिया था। हम नहीं जानते कि हमारे साथ ईश्वर ने ऐसा क्यों किया? हमने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा…हाॅ शायद ये हो सकता है कि हमारे पिछले जन्मों में किये गए किन्हीं पापों का ये फल मिला है हमें।”
विराज कुछ न बोला, बस देखता रह गया उस शख्स को जिसके चेहरे पर इस वक्त ज़माने भर का ग़म छलकने लगा था।
“तुम हमारी कंपनी में दो साल पहले आए थे।” जगदीश ओबराय कह रहा था__”तुम्हारे काम से हर कोई प्रभावित था जिसमे हम भी शामिल थे। कंपनी की जो ब्राॅच अत्यधिक नुकसान में चल रही थी वो तुम्हारी मेहनत और लगन से काफी मुनाफे के साथ आगे बढ़ गई। तुमने उन सभी का पर्दाफाश किया जो कंपनी को नुकसान पहुॅचा रहे थे और मज़े की बात ये कि किसी को पता भी नहीं चल पाया कि किसने उनका भंडाफोड़ कर दिया।” जगदीश ने कुछ पल रुक कर एक गहरी साॅस ली फिर बोला__”हम तुमसे बहुत प्रभावित थे बेटे और बहुत खुश भी। हमने तुम्हारे बारे में अपने तरीके से पता लगाया और जो जानकारी हमें मिली उससे हमें बहुत दुख भी हुआ। हमें तुम्हारे बारे में सब कुछ पता चल चुका था। हम जान चुके थे कि सबके सामने खुश रहने वाला ये लड़का अंदर से कितना और क्यों दुखी है? हमारा हमेशा से ही ये ध्येय रहा था कि हम हर उस सच्चे ब्यक्ति की मदद करेंगे जो अपनो तथा वक्त के द्वारा सताया गया हो। हमने फैसला किया कि हम तुम्हारे लिए कुछ करेंगे। हम एक ऐसे इंसान की तलाश में भी थे जिसे हम खुद अपना बना सकें और जो हमारे इतने बड़े बिजनेस एम्पायर को हमारे बाद सम्हाल सके।”
“आज के समय में किसी ग़ैर के लिए इतना कुछ कौन सोचता और करता है अंकल?” विराज गंभीर था बोला__”जबकि आज के युग में अपने ही अपने अपनों का बुरा करने में ज़रा भी नहीं सोचते या हिचकिचाते हैं। मेरे साथ मेरे अपनों ने जो कुछ किया है उसका हिसाब मैं सिर्फ अपने दम पर करना चाहता था अंकल।”
“हम तुम्हारी हिम्मत और बहादुरी की कद्र करते हैं बेटे।” जगदीश ने कहा__”लेकिन ये हिम्मत और बहादुरी बिना किसी मजबूत आधार के सिर्फ हवा में लाठियाॅ घुमाने से ज्यादा कुछ नहीं होता। तुम जिनसे टकराना चाहते हो वो आज के समय में तुमसे कहीं ज्यादा ताकतवर हैं। उनके पास ऊॅची पहुॅच तथा किसी भी काम को करा लेने के लिए रुपया पैसा है। जबकि तुम इन दोनो चीज़ों से विहीन हो बेटे। किसी से जब भी जंग करो तो सबसे पहले अपने पास एक ठोस और मजबूत बैकप बना के रखो जिससे तुम्हारे आगे बढ़ते हुए कदमों पर कोई रुकावट न आ सके।”
विराज कुछ न बोला जबकि जगदीश ने उसके चेहरे पर उभर रहे सैकड़ों भावों को देखते हुए कहा__”हम जानते हैं कि तुम खुल कर पूरी निडरता से उनका मुकाबला करना चाहते हो वो भी उनके ही तरीके से। कुछ चीज़ें अनैतिक तथा पाप से परिपूर्ण तो हैं लेकिन चलो कोई बात नहीं। तुम सब कुछ अपने तरीके से करना चाहते हो मतलब ‘जैसे को तैसा’ वाली तर्ज पर।”
“मैं आपके कहने का मतलब समझता हूॅ अंकल।” विराज ने अजीब भाव से कहा___”और यकीन मानिये ये सब करने में मुझे कोई खुशी नहीं होगी पर फिर भी वही करूॅगा जिसे आप अनैतिक और पाप से परिपूर्ण कह रहे हैं। आज के समय में जैसे को तैसा वाली तर्ज पर अमल करना पड़ता है अंकल तभी सामने वाले को ठीक से समझ और एहसास हो पाता है कि वास्तव में उसने क्या किया था।”
“खैर छोड़ो इन बातों को।” जगदीश ने पहलू बदला__”ये बताओ कि उनके खिलाफ तुम्हारा पहला कदम क्या होगा?”
“मेरा पहला कदम उनके उस ताकत और पहुॅच का मर्दन करना होगा जिसके बल पर वो ये सब कर रहे हैं।”विराज ने कठोर स्वर में कहा।
“तुम्हारी सोच ठीक है।” जगदीश ने कहा__”मगर हम ये चाहते थे कि तुम वैसा करो जिससे उन्हें ये पता ही न चल सके कि ये क्या और कैसे हुआ?”
“पता तो ऐसे भी न चलेगा अंकल।” विराज ने कहा__”आप बस वो कीजिएगा जो करने का मैं आपको इशारा करूॅ।”
“ठीक है बेटे।” जगदीश ने कहा__”वही होगा जो तुम कहोगे। हम तुम्हारे साथ हैं।” कहने के साथ ही जगदीश ने विराज की तरफ एक कागज बढ़ाया__”इस कागज पर साइन कर दो बेटे और अपने पास ही रखो इसे।”
“इस सबकी क्या जरूरत है अंचल?” विराज ने कागज को एक हाॅथ से पकड़ते हुए कहा।
“हमारे जीवन का कोई भरोसा नहीं है बेटे।” जगदीश ने कहा__”दो बार हमें हर्ट अटैक आ चुका है, अब कौन जाने कब अटैक आ जाए और हम इस दुनियाॅ से……”
“न नहीं अंकल नहीं।” विराज तुरंत ही जगदीश की बात काटते हुए बोल पड़ा__”आपको कुछ नहीं होगा। ईश्वर करे आपको मेरी उमर लग जाए। आप हमेशा मेरे सामने रहें और मेरा मार्गदर्शन करते रहें।”
“हा हा हा बेटे तुम्हारी इन बातों ने हमें ये बता दिया है कि तुम्हारे दिल में हमारे लिए क्या है?” जगदीश के चेहरे पर खुशी के भाव थे__”तुम हमें यकीनन अब अपना मानने लगे हो और हमें ये जान कर बेहद खुशी भी हुई है। एक मुद्दत हो गई थी अपने किसी अज़ीज़ के ऐसे अपनेपन का एहसास किये हुए। तुम मिल गए तो अब ऐसा लगने लगा है कि हम अब अकेले नहीं हैं वर्ना इतने बड़े बॅगले में तन्हाईयों के सिवा कुछ न था। सारी दुनिया धन दौलत के पीछे रात दिन भागती है बेटे वो भूल जाती है कि इंसान की सबसे बड़ी दौलत तो उसके अपने होते हैं।”
“ये बातें कोई नहीं समझता अंकल।” विराज ने कहा__”समझ तथा एहसास तब होता है जब हमें किसी चीज़ की कमी का पता चलता है। जिनके पास अपने होते हैं उन्हें अपनों की अहमियत का एहसास नहीं होता और जिनके पास अपने नहीं होते उन्हें संसार की सारी दौलत महज बेमतलब लगती है, वो चाहते हैं कि इस दौलत के बदले काश कोई अपना मिल जाए।”
“संसार में हमारे पास किसी चीज़ का जब अभाव होता है तभी हमें उसकी अहमियत का एहसास होता है बेटे।” जगदीश ने कहा__”हलाॅकि दुनियाॅ में ऐसे भी लोग हैं जिनके पास सब कुछ होता है मगर वो सबसे ज्यादा अपनों को अहमियत देते हैं, धन दौलत तो महज हमारी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का जरिया मात्र होती है।”
विराज कुछ न बोला ये अलग बात है कि उसके चेहरे पर कई तरह के भाव उभरते और लुप्त होते नज़र आ रहे थे।
“हम चाहते हैं कि।” जबकि जगदीश कह रहा था__”तुम अपनी माॅ और बहन के साथ अब हमारे साथ इसी घर में रहो बेटे। कम से कम हमें भी ये एहसास होता रहेगा कि हमारा भी अब एक भरा पूरा परिवार है।”
“मैं इसके लिए माॅ से बात करूॅगा अंकल।” विराज ने कहा।
“हम खुद चल कर तुम्हारी माॅ से बात करेंगे बेटे।” जगदीश ने गंभीरता से कहा__”हम उससे कहेंगे कि वो हमें अपना बड़ा भाई समझ कर हमारे साथ ही रहे।”
“आप फिक्र न करें अंकल।” विराज ने कहा__”मैं माॅ से बात कर लूॅगा। वो इसके लिए इंकार नहीं करेंगी।
“ठीक है बेटे।” जगदीश ने कहा__”हम तुम सबके यहाॅ आने का इंतज़ार करेंगे।”
कुछ देर और ऐसी ही कुछ बातें हुईं फिर विराज वहाॅ से अपने फ्लैट के लिए निकल गया। विराज ने अपनी माॅ गौरी से जगदीश से संबंधित सारी बातें बताई, जिसे सुन कर गौरी के दिलो दिमाग में एक सुकून सा हुआ।
“आज के समय में इतना कुछ कौन करता है बेटा?” गौरी ने गंभीरता से कहा__”मगर हमारे साथ हमारे अपनों ने इतना कुछ किया है जिससे अब आलम ये है कि किसी पर भरोसा नहीं होता।”
“जगदीश ओबराय बहुत अच्छे इंसान हैं माॅ।” विराज ने कहा__”इस संसार में उनका अपना कोई नहीं है, वो मुझे अपने बेटे जैसा मानते हैं। अपनी सारी दौलत तथा सारा कारोबार वो मेरे नाम कर चुके हैं, अगर उनके मन में कोई खोट होता तो वो ऐसा क्यों करते भला?”
“ये क्या कह रहे हो तुम?” गौरी बुरी तरह चौंकी__”उसने अपना सब कुछ तुम्हारे नाम कर दिया?”
“हाॅ माॅ।” विराज ने कहा__”यही सच है और इस वक्त वो सारे कागजात मेरे पास हैं जिनसे ये साबित होता है कि अब से मैं ही उनके सारे कारोबार तथा सारी दौलत का मालिक हूॅ। अब आप ही बताइए माॅ…क्या अब भी उनके बारे में आपके मन में कोई शंका है?”
“यकीन नहीं होता बेटे।” गौरी के जेहन में झनाके से हो रहे थे, अविश्वास भरे लहजे में कहा उसने__”एक ऐसा आदमी अपनी सारी दौलत व कारोबार तुम्हारे नाम कर दिया जिसके बारे में न हमें कुछ पता है और न ही हमारे बारे में उसे।”
“सब ऊपर वाले की माया है माॅ।” विराज ने कहा__”ऊपर वाले ने कुछ सोच कर ही ये अविश्वसनीय तथा असंभव सा कारनामा किया है। जगदीश अंकल इसके लिए मुझे बहुत पहले से मना रहे थे किन्तु मैं ही इंकार करता रहा था। फिर उन्होंने मुझे समझाया कि बिना मजबूत आधार के हम कोई लड़ाई नहीं लड़ सकते। उन्होंने ये भी कहा कि उनकी सारी दौलत उनके बाद किसी ट्रस्ट या सरकार के हाॅथ चली जाती। इससे अच्छा तो यही है कि वो ये सब किसी ऐसे इंसान को दे दें जिसे वो अपना समझते भी हों और जिसे इसकी शख्त जरूरत भी हो। मैं उनकी कंपनी में ऐज अ मैनेजर काम करता था, वो मुझसे तथा मेरे काम से खुश थे। उनके दिल में मेरे लिए अपनेपन का भाव जागा। उन्होंने मेरे बारे में सब कुछ पता किया और जब उन्हें मेरी सच्चाई व मेरे साथ मेरे अपनों के किये गए अन्याय का पता चला तो एक दिन उन्होंने मुझे अपने बॅगले में बुला कर मुझसे बात की।”
“तुमने ये सब मुझे पहले कभी बताया क्यों नहीं बेटा?” गौरी ने विराज के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा__”इतना कुछ हो गया और तमने मुझसे छिपा कर रखा। क्या ये अच्छी बात है?”
“आपने भी तो मुझसे वो सब कुछ छुपाया माॅ।” विराज ने सहसा गमगीन भाव से कहा__”जो बड़े पापा और छोटे चाचा लोगों ने आपके और मेरी बहन के साथ किया। मेरे पिता जी की मौत कैसे हुई ये छुपाया गया मुझसे। मगर मैं सब जानता हूॅ माॅ, आपने भले ही मुझसे छुपाया मगर मैं सब जानता हूॅ।”
“क् क् क्या जानते हो तुम?” गौरी हड़बड़ा गई।
“जाने दीजिये माॅ।” विराज ने फीकी मुस्कान के साथ कहा__”अब इन सब बातों का समय नहीं है, अब समय है उन लोगों से बदला लेने का।”
“जाने कैसे दूॅ बेटा?” गौरी ने अजीब भाव से कहा__”मुझे जानना है कि तुम्हें ये सब कैसे पता चला?”
“इतना कुछ हो गया।” विराज कह रहा था__”एक हॅसता खेलता संसार कैसे इस तरह तिनका तिनका हो कर बिखर गया? मैं कोई बच्चा नहीं था माॅ जिसे इन सब बातों का एहसास नहीं था बल्कि सब समझता था मैं।”
“हमारे भाग्य में यही सब कुछ लिखा था बेटे।” गौरी की आॅखें छलक पड़ी__”शायद ऊपरवाला हमसे ख़फा हो गया था।”
“कोई बात नहीं माॅ।” विराज ने कहा__”अब उन लोगों का भाग्य मैं लिखूॅगा। साॅपों से खेलने का बहुत शौक है न तो मैं उन्हें बताऊगा कि साॅप को जो दूध पिलाते हैं एक दिन वही साॅप उन्हें भी डस कर मौत दे देता है।”
“क्या कहना चाहते हो तुम?” गौरी मुह और आखें फाड़े देखने लगी थी विराज को।
“हाॅ माॅ।” विराज कह रहा था__”मुझे सब पता है। मेरे पिता जी की मौत सर्प के काटने से हुई थी लेकिन वो स्वाभिक रूप से नहीं हुआ था बल्कि सब कुछ पहले से सोचा समझा गया एक प्लान था। एक साजिश थी माॅ, मेरे पिता जी को अपने रास्ते से हमेशा के लिए हटा देने की।”
“ये तुम क्या कह रहे हो बेटे?” गौरी उछल पड़ी, आखों से झर झर आॅसू बहने लगे उसके__”ये सब उन लोगों की साजिश थी?”
“हाॅ यही सच है माॅ।” विराज ने कहा__”आपको इस बात का पता नहीं है लेकिन मुझे है। मैं तो ये भी जानता हूॅ माॅ कि ये सब क्यों हुआ?”
“क् क् क्या जानते हो तुम?” गौरी के चेहरे पर अविश्वास के भाव थे।
“वही जो आप भी जानती हैं।” विराज ने अपनी माॅ गौरी की आखों मे झाॅकते हुए कहा__”कहिये तो बता भी दूॅ आपको।”
“न नहीं नहीं” गौरी के चेहरे पर घबराहट के साथ साथ लाज और शर्म की लाली छाती चली गई। उसका सिर नीचे की तरफ झुक गया।
“आपको नजरें चुराने की कोई जरूरत नहीं है माॅ।” विराज ने अपने दोनों हाथों से माॅ गौरी का शर्म से लाल किन्तु खूबसूरत सा बेदाग़ चेहरा थामते हुए कहा__”आपने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिससे आपको मुझसे ही नहीं बल्कि किसी से भी नज़रें चुराना पड़े। आप तो गंगा की तरह पवित्र हैं माॅ, जिसकी सिर्फ पूजा की जा सकती है।”
“ब बेटे।” गौरी बुरी तरह रोते हुए अपने बेटे के चौड़े सीने से जा लगी। उसने कस कर विराज को जकड़ा हुआ था। विराज ने भी माॅ को छुपका लिया फिर बोला__”नहीं माॅ, अब आप रोएंगी नहीं। रोने धोने वाला वक्त गुज़र गया। अब तो रुलाने वाला वक्त शुरू होगा।”
“कितनी नासमझ थी मैं।” गौरी ने विराज के सीने से लगे हुए ही गंभीरता से कहा__”मैं जिस बेटे को छोटा और अबोध समझ रही थी तथा ये भी कि वो बहुत मासूम है नासमझ है अभी, मगर वो तो अपनी छोटी सी ऊम्र में भी कहीं ज्यादा समझदार और जिम्मेदार हो गया है। मैंने सब कुछ अपने बेटे से छुपाया, सिर्फ इस लिए कि मैं अपने बेटे को खो देने से डरती थी।”
“आप एक माॅ हैं माॅ।” विराज ने कहा__”और आपने जो कुछ भी किया अपनी ममता से मजबूर हो कर किया। इस लिए इसके लिए मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। लेकिन हाॅ एक शिकायत जरूर है।”
“अच्छा।” गौरी ने विराज के सीने से अपना सिर अलग किया तथा ऊपर बेटे के की आखों मे प्यार से देखते हुए कहा__”ऐसी क्या शिकायत है मेरे बेटे को मुझसे, जरा मुझे भी तो पता चले।”
“शिकायत यही है कि।” विराज ने कहा__”आप हर पल खुद को दुखी रखती हैं और अपनी आॅखों पर तरस खाने की बजाय उन्हें रुलाती रहती हैं। ये हर्गिज़ भी अच्छी बात नहीं है।”
“अब से ऐसा नहीं होगा।” गौरी ने मुस्कुराते हुए कहा__”अब मैं न तो खुद को दुखी रखूॅगी और न ही अपनी आखों को रुलाऊॅगी। अब ठीक है न?”
“यही बात आप मेरी कसम खा कर कहिए।” विराज ने कहने के साथ ही माॅ गौरी का दाहिना हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रखा।
“न नहीं नहीं।” गौरी ने विराज के सिर से तुरंत ही अपना हाॅथ खींच लिया__”मैं इसके लिए तुम्हारी कसम नहीं खा सकती मेरे लाल। तुम तो जानते हो एक माॅ अपने बच्चों के लिए कितना संवेदनशील होती है। उसका ममता से भरा हुआ ह्रदय इतना कोमल और कमजोर होता है कि अपने बच्चों के लिए एक पल में पिघल जाता है। सीने में पल भर में भावना का ऐसा तूफान उठ पड़ता है कि उसे रोंकना मुश्किल हो जाता है, और आंखें तो जैसे इस इंतजार में ही रहती हैं कि कब वो छलक पड़ें।”
विराज माॅ की बात सुन कर मुस्करा उठा। माॅ के सुंदर चहरे और नील सी झीली आखों में खुद के लिए बेशुमार स्नेह व प्यार देखता रहा और हौले से झुक कर पहले उन आखों को फिर माॅ के माॅथे को प्यार से चूॅम लिया।
“क्या बात है?” गौरी विराज के इस कार्य पर मुस्कुराई तथा अपनी आखों की दोनो भौहों को ऊपर नीचे करके कहा__”आज अपनी इस बूढ़ी माॅ पर बड़ा प्यार आ रहा है मेरे बेटे को।”
“प्यार तो हमेशा से था माॅ।” विराज ने कहा__”और हमेशा रहेगा भी। मगर आपने खुद को बूढ़ी क्यों कहा?”
“अरे पगले! अब मैं बूढ़ी हूॅ तो बूढ़ी ही कहूॅगी न खुद को।” गौरी ने हॅस कर कहा।
“नहीं माॅ।” विराह कह उठा__”आप बूढ़ी बिलकुल भी नहीं हैं। आप तो गुड़िया की बड़ी बहन लगती हैं। आप खुद देख लीजिए।” कहने के साथ ही विराज ने माॅ गौरी को कमरे में एक तरफ दीवार से सटे एक बड़े से आदम कद आईने के सामने ला कर खड़ा कर दिया।
“ये ये सब क्या कर रहा है बेटा?” गौरी हॅसते हुए बोली, उसने सामने लगे आईने में खुद को देखा। उसके पीछे ही विराज उसे उसके दोनो कंधों से पकड़े हुए खड़ा था।
“अब गौर से देखिए माॅ।” विराज ने आईने में अपनी माॅ को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा__”देखिए अपने आपको। आप अब भी मेरी माॅ नहीं बल्कि मेरी बड़ी बहन लगती हैं न?”
“हे भगवान!” गौरी ने हॅसते हुए कहा__”तुम्हें मैं तुम्हारी बड़ी बहन लगती हूॅ? कोई और सुने तो क्या कहे?”
“मुझे किसी से क्या मतलब?” विराज ने कहा__”जो सच है वो बोल रहा हूॅ। गुड़िया आपकी ही फोटो काॅपी है माॅ। मतलब आप जब गुड़िया की उमर में रहीं होंगी तब आप बिलकुल गुड़िया जैसी ही दिखती रही होंगी।”
“हाॅ तुम्हारी ये बात तो सच है बेटे कि गुड़िया मुझ पर ही गई है।” गौरी ने कहा__”सब कोई यही कहता था कि गुड़िया की शक्लो सूरत मुझसे मिलती जुलती है। लेकिन मैं उसके जैसी अल्हड़ और मुहफट नहीं थी।”
“वो अभी बच्ची हैं माॅ।”विराज ने कहा__”उसमें अभी बहुत बचपना है। उसे यूॅ ही हॅसने खेलने दीजिए, वो ऐसे ही अच्छी लगती हैं।”
“उसकी उमर में मैंने जिम्मेदारी और समझदारी से रहना सीख लिया था बेटा।” गौरी ने सहसा गंभीर होकर कहा__”अब वो बच्ची नहीं रही, भले ही दिल और दिमाग से वह बच्ची बनी रहे। मगर,,,,,”
“वैसे दिख नहीं रही वो।” विराज ने कहा__”कहाॅ है वह?”
“ऊपर छत पर गई थी कपड़े डालने।” गौरी ने कहा।
“कोई हमें याद करे और हम तुरंत उसके सामने न आएं ऐसा कभी हो सकता है क्या?” सहसा कमरे के दरवाजे से अंदर आते हुए निधि ने कहा__”वैसे किस लिए याद किया गया है हमें? जल्दी बताया जाए क्योंकि हम बहुत बिजी हैं, हमें अभी कपड़े डालने जाना है ऊपर छत पर।”
“इस लड़की का क्या करूॅ मैं?” गौरी ने अपना माथा पीट लिया।
“बस प्यार कीजिए माॅ प्यार।” निधि ने अपने दोनो हाॅथों को इधर उधर घुमाते हुए कहा__”हम आपके बच्चे हैं, हमें बस प्यार कीजिए।”
“तू रुक अभी तुझे बताती हूॅ मैं।” गौरी उसे मारने के लिए निधि की तरफ लपकी, जबकि निधि जिसे पहले ही पता था कि क्या होगा इस लिए वह तुरंत ही विराज के पीछे जा छुपी और बोली__”भईया बचाइए मुझे नहीं तो माॅ मारेंगी मुझे। मैं आपकी जान हूॅ न? अब बचाइये अपनी जान को, हाॅ नहीं तो।”
“रुक जाइए माॅ।” विराज ने माॅ को रोंक लिया__”मत मारिए इसे। आपने देखा न इसके आते ही वातावरण कितना खुशनुमा हो जाता है।”
“हाॅ माॅ।” निधि तुरंत बोल पडी__”मेरी बात ही अलग है। आप समझती ही नहीं हैं जबकि भइया मुझे अच्छे से समझते हैं, हाॅ नहीं तो।”
“तेरे भइया ने ही तुझे बिगाड़ रखा है।” गौरी ने कहा__”अब जा कपड़े डाल कर आ जल्दी।”
“आपकी जान का इतना बड़ा अपमान।” निधि ने पीछे से विराज की तरफ अपना सिर करते हुए कहा__”बड़े दुख की बात है कि आप कुछ नहीं कर सकते मगर, हम चुप नहीं रहेंगे एक दिन इस बात का बदला जरूर लेंगे, देख लीजियेगा, हाॅ नहीं तो।”
“क्या बड़बड़ा रही है तू?” गौरी ने आखें दिखाते हुए कहा।
“कुछ नही माॅ।” निधि ने जल्दी से कहा__”वो भइया को हनुमान चालीसा का रोजाना पाठ करने को कह रही थी।”
“वो क्यों भला?” गौरी के माॅथे पर बल पड़ता चला गया। जबकि निधि की इस बात से विराज की हॅसी छूट गई। वो ठहाके लगा कर जोर जोर से हॅसने लगा था। निधि अपनी हॅसी को बड़ी मुश्किल से रोंके इस तरह मुॅह बनाए खड़ी थी जैसे वो महामूर्ख हो। इधर विराज के इस प्रकार हॅसने से गौरी को कुछ समझ न आया कि उसका बेटा किस बात इतना हॅसे जा रहा है?
अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,,,,
आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा,,,,,,,,

