मेरी आॅखों में नींद का कहीं दूर दूर तक नामो निशान न था। यही हाल सबका था। मुझे रह रह कर गुड़िया की बात याद आ रही थी कि बड़े पापा और उनके बेटे ने मेरी माॅ और बहन के साथ गंदा सुलूक किया। इन सब बातों से मेरा ख़ून खौल रहा था मगर माॅ की क़सम के चलते मैं कुछ कर नहीं सकता था।
मगर मैं ये भी जानता था कि माॅ की ये क़सम मुझे कुछ करने से अब रोंक नहीं सकती थी क्योंकि इन सब चीच़ों से मेरा सब्र टूटने वाला था। मेरे अंदर की आग को अब बाहर आने से कोई रोंक नहीं सकता था। मैं अब एक ऐसा खेल खेलने का मन बना चुका था जिससे सबकी तक़दीर बदल जानी थी।
दोस्तो अपडेट दे दिया है,,,
आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा और अगर न पसंद आए तो बेझिझक आप सब अपनी बात कह कर मेरी ग़लतियों तथा कमियों से मुझे अवगत करा दीजिएगा। आप सबकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।
धन्यवाद !!

Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.